अतीत के पन्ने - भाग ९ RACHNA ROY द्वारा उपन्यास प्रकरण में हिंदी पीडीएफ

अतीत के पन्ने - भाग ९

मेरी अवस्था अब अच्छी नहीं है और अब आगे।।


फिर डायरी को बन्द कर दिया और फिर छत पर चली गई अपने आलेख को याद करने लगी।
छाया ने कहा दीदी ये सारे पापड़ तो सुख गए हैं। काव्या ने कहा हां पर आलेख को बहुत पसंद हैं। एक काम करो सब पैकिंग करवा कर कोरियर कर देना।

छाया ने कहा हां दीदी ठीक है कल ही कर देती हुं।पर दीदी ये तो आपको भी पसंद था ना।। काव्या ने कहा हां पसंद था पर अब बिल्कुल पसंद नहीं है और इस तरह जीने का क्या मतलब है बोल। छाया ने कहा देखो दीदी सब कुछ अब भगवान पर छोड़ दो। काव्या ने कहा हां ये भी ठीक है।

और फिर दोनों नीचे आ गई और फिर फोन की घंटी बजा।
काव्या ने फोन उठाया और उधर से आवाज आई काव्या कैसी हो तुम?


आलोक तुम, ये कहा काव्या ने।देखो तुम्हें मेरी परवाह है पर तुम्हारे बेटे को नहीं।

एक बार भी भुल कर भी फोन नहीं किया ना उसने।। छोटी मां उसके लिए मर गई।

आलोक ने कहा नहीं काव्या ऐसा नहीं है। यहां आने के बाद से एक दिन भी ऐसा नहीं गया जिसमें छोटी मां को याद ना किया हो पर अब तो बुखार में तप रहा है कोई भी दवा काम नही कर रही हैं।

काव्या ने कहा हां जिद्द करता है बहुत तुम्हारी तरह। ऐसा क्या करूं जो वो ठीक हो जाए।

आलोक ने कहा तुम बस यहां आ जाओ ठीक हो जाएगा।

काव्या ने कहा मैं भला कैसे आऊं। मेरी हालत पहले जैसी नहीं है।उसे जब भी बुखार आता था तो मैं एक काढ़ा बनाकर पिला देती थी। मैं बता रही हुं कैसे बनाना होगा। फिर सब बता दिया।उसे चार बार देना होगा।

आलोक ने कहा मैं तुम्हें कुछ नहीं दे सका।
काव्या ने हंस कर कहा अरे इतना कुछ तो दिया है। आलोक ने कहा मैं तुम्हारा गुनहगार हुं

आलोक आप ऐसा क्यों नहीं करते आप सभी यहां आ जाइए।
आलोक ने कहा हां ठीक कहा तुमने। फिर किसी तरह वहां कुछ बिना बताए आलोक हवेली पहुंच गए।। और आलोक सीधे काव्या के रूम में जाकर देखा तो अवस्था बहुत ही खराब था।
आलोक ने काव्या का माथा छू कर देखा तो गर्म था तो वो बोला अरे शरीर तप रहा है ये ठीक नहीं है चलो मैं अस्पताल में भर्ती करवाता हूं। काव्या ने कहा ना बाबा ना मुझे कहीं नहीं जाना है। आलोक ने कहा जिद बहुत करती हो। काव्या ने कहा देखो समय कम है बाबू को लेकर आ जाओ उसे जी भर कर देख लूं।
आलोक ने कहा हां ठीक है मैं कुछ करता हूं पर तुम्हारा शरीर तप रहा है वो जल्दी ठीक करना होगा। ये सोचते हुए छाया को एक बाल्टी पानी और एक टब ले आने को कहा।
फिर छाया जल्दी से लेकर आ गई। आलोक और छाया मिल कर काव्या का पुरा बाल धुलाया और फिर बुखार उतर गया। काव्या ने कहा मुझे अब जीने का कोई मतलब नहीं नजर आता है।
आलोक ने कहा देखो ये दुध पी लो और मैं तुम्हारे बेटे को ले आता हूं।
फिर आलोक चला गया।


काव्या एक जिन्दा लाश बन गई थी वो एक बार अपने बाबू को देखना चाहती थी और फिर मरना चाहती थी।

अपने अधुरी अतीत को डायरी में कैद करना चाहती थी ताकि ये एक किताब का रूप लेकर घर घर में पहुंच जाएं।उसकी यही बात अच्छी
थी।

काव्या ने फिर डायरी के पन्ने पलट कर लिखने लगीं।

आलेख जब तुम बचपन में तुतलाहट में टोटी मां कहते थे तो मेरा दिल करता कि तुम्हारे मुंह से मां सुन लूं। शायद गलती मेरी है जो मैंने तुम्हें नहीं बताया कि मै ही तुम्हारी मां हुं तो शायद तुम मुझे छोड़ कर नहीं जाते।

मैं भी कितनी भोली हुं कभी भी अपने बारे में नहीं सोचा, हमेशा दूसरों के बािरे में सोचा कि रेखा दीदी को क्या चाहिए, सरिता दीदी को अपने सपनों पुरा करने है,इन सब की मदद किया करती पर ये भूल ही गई कि मेरी मदद कौन करेगा कौन साथ देगा मेरा। मैं आलेख को अपनी जिगर से लगा कर जिंदगी बिता रही थी पर कहते हैं ना कि भगवान को कुछ और ही मंजूर था।।।पर हां मुझे जो मिला वो सिर्फ क्या था ताने।।

स्कूल से नौकरी किया सिर्फ घर को चलाने के लिए और फिर भी सबके प्यार और आदर को तरसती रही।

मां हमेशा सोचती थी कि मेरे बाद क्या होगा, मां को डर था कि काव्या अकेली ना रह जाए।

आज सच में मैं अकेली रह गई इस हवेली में सिर्फ और सिर्फ अतीत के पन्नों के अलावा कुछ नहीं बचा मेरे पास।।

एक बार शायद मुझे आने मैं जरा सा देर क्या हुआ आप लोग तो बरस पड़ी हम पड़ कि कहा घुम रही थी किसी के साथ। खाना क्यों नहीं बनाई। और फिर उसके बाद ही मैंने छाया और उसकी मां को काम पर रख लिया क्यों कि मेरी मां को खाना बनाना पड़ता।

पर सच मानो मुझे किनारे वाले के यहां राशन लेने में देरी हो गई थी बस और घर पर आ कर देखा बिचारी मां चूल्हे पर खाना बना रही थी। उनकी तकलीफ सिर्फ मुझे ही दिखा।
खाना खाने के लिए सब बेताब थी पर
घर में एक भी अनाज का दाना तक नहीं था।
पर किसी को कुछ फर्क नहीं पड़ता था।आप लोगों को तो खाने से मतलब था ना कि ये जानने की कोशिश किया की मैं कहां से लाई हुं। और मां किसी तरह दाल से खिचड़ी बनाकर रखी थी।

बस किसी तरह से खाना खा कर सो जाते थे और मैं मां के साथ काम करती रहती थी। ऐसा नहीं की पैसे नहीं होते थे आप लोगों के पास पर परवाह नहीं करते थे।

मैंने भी कुछ कम नहीं किया इस हवेली के लिए पर मुझे क्या मिला सिर्फ रू
तन्हाई,वेबफाई,

मैंने क्या क्या न किया सबको एक अच्छी जिंदगी देने के लिए पर सबने मुझे गलत समझा मुझे कोसा ।

जब आलेख को दीदी मुझसे लेकर चली गई तो मैं तो एक जिन्दा लाश बन गई थी।ना तो दिन का चैन था और ना रातों की नींद थी।

मां एक तू ही थी जो सब कुछ जानती थी और सबको बताना भी चाहती थी पर मैंने ही मना कर रखा था मैं किसी का घर तोड़ना नहीं चाहती थी पर मैंने तो उस रात खुद को समर्पित किया था किसी से मेरा कोई सरोकार नहीं है पर एक विनम्र अनुरोध है कि मेरी डायरी पढ़ने के बाद कोई भी मेरे आलेख को ग़लत साबित ना करें मैंने कोई पाप नहीं किया है।

बेटा आलेख जब तक तुम ये डायरी पढ़ोगे तो शायद बहुत देर हो चुकी होगी।
तूं अपनी छोटी मां को ग़लत मत समझना, तुम भी मुझे अकेले छोड़ कर चले गए ना।

छोटी मां का साथ कभी नहीं छोड़ोगे पर इसमें तुम्हारी गलती तो नहीं है बेटा। मैंने ही कहा था कि चला जा।

आलोक आप एक बहुत ही अच्छे इंसान हैं और हमेशा सच का ही साथ दिया आपने।
रेखा दीदी मुझे कभी नहीं समझ पाई। शायद वो आपको भी गलत समझे तो मै एक बात उनको बता देना चाहती हुं कि मैं और आलोक एक दूसरे को चाहते थे पर कभी भी हमने एक-दूसरे को पाने के लिए कुछ भी नहीं किया क्योंकि हमलोग आपको धोखा नहीं देना चाहते थे।
आशा करतीं हुं कि आप सभी मुझे गलत नहीं समझोगे। जिंदगी बहुत ही छोटी होती है और हमें उसको खुश रह कर गुजारना चाहिए। मैं आप सभी से एक अनुरोध करती हुं कि इस हवेली पर सिर्फ आलेख का अधिकार है तो चाहे जो करें उस हवेली के साथ। मैंने अपनी खुशी से सबकुछ अपनी सन्तान को दे दिया है।जब तक आप लोग यहां आओगे तब तक मैं नहीं रहुंगी और हां आलोक जी आप आलेख से ही मेरी मुखाग्नि करवाना।
तभी मुझे शान्ति मिल पाएगी। और हां मेरा तो ब्याह न हो पाया।पर मेरी भी आस थी ना, तो कुछ गहने कपड़े रखे हैं वो आलेख की पत्नी के लिए है।आलेख बेटा तो कहता था कि कभी शादी नहीं करेगा।पर उसकी छोटी मां तो हमेशा चाहती थी कि वो ब्याह करेगा और एक सुन्दर सी लड़की को लाएगा। मेरी इच्छा जरूर पूरी करना बेटा।।

और मेरी कोई इच्छा नहीं है जीने की पर हां भगवान की शुक्रगुजार हूं कि उन्होंने मेरी झोली मेरे सन्तान के प्यार से भर दिया। और हां एक मां होने का अधिकार दिया।



आलेख को एक बार देख लेती तो मरना आसान हो जाता। पर शायद भगवान नहीं चाहते कि मैं आलेख को एक बार अपने गले से लगाना चाहती थी।


मेरी इच्छा-सूची बता दिया मुझे पता है कभी शाय़द पुरा नही हो सकता है मेरे आंसु कोई पोंछने वाला नहीं है।




फिर आज बहुत दिनों बाद कुछ शुकून से सो पाऊंगी हमेशा के लिए। मेरी मां मुझे बुला रही हैं। छाया ओ छाया जा कर बाबू की पसंद का खाना बना।आते ही कहेगा छोटी मां मुझे आलू की पुरी दो ना।



छाया ने कहा कहा आया बाबू पर आप कहती हो तो बनाती हुं। चलो अब।।

क्रमशः

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Suresh

Suresh 5 महीना पहले

Deboshree Majumdar

Deboshree Majumdar 6 महीना पहले

Harsh Parmar

Harsh Parmar मातृभारती सत्यापित 6 महीना पहले