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तड़प--भाग(४)

राजमाता चित्रलेखा का दो टूक जवाब सुनकर शिवन्तिका सहम गई,उसे अब अपनी मौहब्बत ख़तरे में नज़र आ रही थी,उसने सोचा कि उसके मन की बात शायद उसकी दादी कभी नहीं समझ पाएंगी,इसलिए उसने टेलीफोन करके फौरन ये बात अपनी सहेली सुहासा से कही,सुहासा बोली....
उन्हें थोड़ा वक्त दे शायद वो तेरी बात समझ जाएं।।
लेकिन सुहासा! मुझे नहीं लगता कि दादी कभी भी इस रिश्ते को मानेंगीं,शिवन्तिका बोली।।
तेरे पास और कोई चारा भी नहीं है,किससे कहेगी? कौन समझाएगा तेरी दादी को? ना तेरी माँ हैं और ना तेरे पिता,जो इस बात को सम्भाल लेते,तेरी दादी के सिवाय तेरा अपना कहने के लिए और कोई भी तो नहीं है,मैं तो कहतीं हूँ अभी सबकुछ ऐसे ही छोड़ दे,मामला ठण्डा होने पर शायद तेरी दादी तेरे मन की बात समझ जाएं,सुहासा बोली।।
शायद तू ठीक कहती है,अब मैं टेलीफोन रखती हूँ,बाद में बात करेंगें,शिवन्तिका बोली।।
शिवन्तिका गहरी सोच में थी कि अब वो क्या करें और कैसे अपनी दादी को मनाएं?उसे कोई भी रास्ता नहीं सूझ रहा था और उसने कुछ दिनों के लिए शिवदत्त से मिलना बंद कर दिया।।
और उधर जब शिवन्तिका,शिवदत्त से ना मिली तो वो परेशान हो उठा उसने ये बात अपने दोस्त सियाशरन से कही तो सियाशरन बोला...
मैं तो पहले ही कह रहा था भाई! अमीर घर की लड़की है,आसान नहीं होगा उसके लिए तेरे साथ मौहब्बत निभाना।।
यार !हो सकता है कि उसके घरवालों को कुछ पता चल गया हो और उन्होंने उसे मुझसे मिलने से रोक दिया हो,शिवदत्त बोला।।
अब तू क्या करेगा?सियाशरन ने पूछा।।
पता नहीं यार! कुछ समझ में नहीं आ रहा,शिवदत्त बोला।।
तभी सियाशरन की दुकान पर सुहासा आई और उसने सियाशरन के साथ शिवदत्त को भी देखा तो बोली...
अरे शिवदत्त ! तुम भी यही हों।।
क्यों क्या हुआ? शिवदत्त ने पूछा।।
मैं सियाशरन के पास आई थी तुम्हारे लिए शिवन्तिका का मेसेज देने,सुहासा बोली।।
अब मैं यही हूँ तो मुझे ही बता दो कि क्या बात है? शिवदत्त बोला।।
शिवन्तिका की दादी को सब पता चल गया है और वें तुम्हारे इस रिश्ते को स्वीकारने से इनकार कर रही हैं ,उन्होंने शिवन्तिका से कहा है कि वो तुमसे ना मिले इसी में भलाई है,इसलिए शिवन्तिका इतने दिनों से तुमसे मिलने नहीं आई,सुहासा सब एक साँस में कह गई।।
लेकिन शिवन्तिका की दादी को क्या एतराज़ है? शिवदत्त बोला।।
तुम एक गरीब घर से हो और शिवन्तिका एक राजघराने से ताल्लुक रखती है,सुहासा बोली।।
आखिर दौलत की दीवार हमारे प्यार के आड़े आ ही गई,शिवदत्त बोला।।
मैने तो पहले ही कहा था ना! कि एक दिन ऐसा होगा,सियाशरन बोला।।
तो अब क्या किया जाएं? शिवदत्त बोला।।
कुछ नहीं! शिवन्तिका ने कहा कि थोड़ा इन्तज़ार कर लो शायद दादी मान जाएं,सुहासा बोली।।
मुझे तो उनके मानने के कोई भी आसार नज़र नहीं आ रहे,शिवदत्त बोला।।
ऐसे ही कुछ देर तीनों बात करते और फिर सुहासा वापस आ गई और उसने शिवन्तिका को टेलीफोन पर सारी बात कह सुनाई,शिवन्तिका ने पूछा....
कैसा है वो? दुखी होगा है ना!
ठीक नहीं है,तुझे बहुत याद कर रहा था,सुहासा बोली।।
मुझे भी उसकी बहुत याद आती है,शिवन्तिका बोली।।
लेकिन तू उससे ना ही मिल तो ज्यादा अच्छा रहेगा अगर दादी को भनक भी लग गई तो फिर तेरी शामत आ जाएगी,सुहासा बोली।।
तू सही कहती है,अच्छा अब मैं टेलीफोन रखती हूँ और इतना कहकर शिवन्तिका ने टेलीफोन रख दिया।।
शिवन्तिका अब पूरे समय घर पर ही रहती अपनी दादी के आदेश का पालन करती,अब वो काँलेज भी ना जाती,लेकिन अब शान्त-शान्त रहने लगी थी,पहले की तरह ना हँसती,ना बोलती और ना किसी बात पर जिद करती ,सुबह भी जल्दी जाग जाती या शायद इसलिए जल्दी जाग जाती थी वो रात रात भर सोती ही नहीं थी,उसकी ऐसी हालत देखकर चित्रलेखा को चिन्ता होने लगी।।
वो सोचती कि कैसा मासूम सा हँसता खिलखिलाता चेहरा फीका और बेनूर होता जा रहा है,कितनी भोली है बेचारी बिना किसी ना नुकुर के उसने उस लड़के के साथ मिलना-जुलना छोड़ दिया,ऐसी सज़ा देना इस मासूम के लिए सही नहीं,लेकिन वो लड़का हमारी बराबरी का नहीं है हम कैसे इस रिश्ते को स्वीकार कर लें।।
चित्रलेखा भी उलझन में फँसी थी,लेकिन पोती की ऐसी दशा देखकर उसका कलेजा मुँह को आता था,बेचारी अनाथ है और ऊपर से हम उस पर ऐसा जुल्म ढ़ा रहे हैं,हमने तो उस लड़के को देखा भी नहीं,उसे मिले भी नहीं और हमने फैसला भी कर लिया।।
हम हर्गिज़ भी उस बच्ची का दिल नहीं दुखा सकते,जब वो हमारी बात मानकर उस लड़के से बात करना बंद कर सकती है तो क्या हम उसकी खुशी की खातिर उस लड़के को स्वीकार नहीं कर सकते?वो लड़का गरीब है तो क्या हुआ? हो सकता है कि हमारा सोचना गलत हो और वो लड़का फरेब़ी ना निकले,शिवन्तिका का हमेशा साथ निभाएं,आज ही हम इस विषय पर शिवन्तिका से बात करते हैं।।

और दूसरे दिन सुबह नाश्ते की टेबल पर शिवन्तिका पहुँची तो राजमाता वहाँ पहले से उपस्थित थी वें शिवन्तिका को देखकर बोलीं.....
शिवन्तिका! आज हमने आपकी पसंद का नाश्ता बनवाया है ,सूखे गोभी-आलू ,अजवायन वाली पूरियाँ और बेसन का हलवा,आपको बहुत पसंद है ना ! ये सब।।
शिवन्तिका कुछ नहीं बोली और चुपचाप अपने प्लेट में नाश्ता परोसने लगी,शिवन्तिका का ना बोलना चित्रलेखा को बहुत खटक रहा था और बात सम्भालने के लिए उन्होंने ने पूछा....
क्या हम उस लड़के से मिल सकते हैं?
शिवन्तिका ने ये सुना तो उसे अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ,उसने फिर से चित्रलेखा से पूछा....
राजमाता! अभी आपने क्या कहा?
हमने कहा कि क्या हम उस लड़के से मिल सकते हैं? चित्रलेखा बोली।।
सच! दादी माँ! आप उससे मिलेगीं,शिवन्तिका ने खुश होकर पूछा।।
हाँ...हाँ...अब हमसे आपका ये बुझा हुआ चेहरा नहीं देखा जाता,चित्रलेखा बोली।।
आप कितनी अच्छी हैं राजमाता!क्या मैं आपके गले लग सकती हूँ?शिवन्तिका बोली।।
हाँ ! जुरूर! हम भी बेताब हैं आपको गले लगाने के लिए,राजमाता चित्रलेखा बोलीं।।
और दोनों गले लग गई,मारे खुशी के शिवन्तिका के आँसू बह निकले और वो चित्रलेखा से बोली.....
पता है दादी माँ! आज मैं कितनी खुश हूँ,आपने मुझ पर कितना बड़ा उपकार किया है,आपको पता है शिवदत्त गरीब जरूर है लेकिन बहुत ही अच्छा इन्सान है,आपको उससे मिलकर बहुत खुशी होगी।।
तो उसका नाम शिवदत्त है,चित्रलेखा बोली।।
जी! दादी माँ! तो जितना जल्दी हो सकें हम उससे मिलना चाहते हैं,चित्रलेखा बोली।।
जी,मैं! कोशिश करती हूँ,शिवन्तिका बोली।।
तो अब हमारे गले ही लगी रहेंगीं या फिर नाश्ता भी करेंगीं,चित्रलेखा बोली।।
वो तो मैं भूल ही गई थी,शिवन्तिका बोली।।
तो फिर आराम से बैठकर और पेट भर के नाश्ता कीजिए,आज तो आपकी समस्या हल हो चुकी है ना!,चित्रलेखा बोली।।
जी दादी माँ!आज तो मैं पेटभर नाश्ता करूँगीं,शिवन्तिका बोली।।
और आज के बाद आप हमें दादी माँ ही कहा कीजिए,आपके मुँह से अच्छा लगता है,चित्रलेखा बोली।।
जी! दादी माँ! शिवन्तिका बोली।।
और ऐसे ही दादी और पोती के बीच बातें चलती रहीं....

अगले दिन दोपहर के खाने पर शिवन्तिका ने शिवदत्त को दादी से मिलने के लिए बुला लिया,शिवदत्त खाने की टेबल को देखकर आश्चर्य में पड़ गया,एक साथ इतने सारे ब्यंजन उसने पहली बार अपनी जिन्दगी में देखे थे,शिवन्तिका ने खा़सतौर पर ये सब उसके लिए ही बनवाऐ थे,इतने सारे ब्यंजन देखकर शिवदत्त बोला....
मैने तो अपनी जिन्दगी में पहली बार इतने सारे ब्यंजन एक साथ देखें हैं।।
शिवदत्त का इतना कहना ही था कि पीछे से चित्रलेखा आ गई और उन्होंने शिवदत्त की बात सुन ली,शिवदत्त के मुँह से सच्ची बात सुनकर उन्हें अच्छा लगा,शिवदत्त ने जैसे ही चित्रलेखा को देखा तो फौरन ही चरणस्पर्श कर लिए,फिर चित्रलेखा ने शिवदत्त से कहा.....
तो तुम ही शिवदत्त हो ।।
जी! मैं ही शिवदत्त हूँ और ये मेरा मित्र सियाशरन हैं,मुझे यहाँ आने में थोड़ा असहज महसूस हो रहा था इसलिए इसे भी साथ ले आया,शिवदत्त बोला।।
शिवदत्त के मुँह से ऐसी बेबाक़ी और सच्चाई सुनकर चित्रलेखा को शिवदत्त पसंद आया और उन्होंने शिवदत्त और सियाशरन से कहा.....
चलो! दोनों लोंग बैठों! खाना खाते हैं।।
पहले आप बैठिए दादी माँ ,आप हम में सबसे बड़ी हैं,शिवदत्त बोला।।
पहले चित्रलेखा बैठीं फिर सब भी बैठ गए,चित्रलेखा ने सबसे कहा कि ....
आप लोंग अपनी अपनी प्लेट में खाना परोस सकते हैं।।
सबने अपनी अपनी प्लेट में खाना परोसा और खाने लगें,शिवदत्त ने खाने मे चम्मच का इस्तेमाल नहीं किया उसने अपने हाथ से ही खाना खाया,ये सब चित्रलेखा बड़े गौर से देख रहीं थीं,उन्हें शिवदत्त का भोलापन और अपनी असलियत में रहना पसंद आया।।
बाद में उन्होंने शिवदत्त से कुछ बातें पूछीं.....
अभी क्या कर रहे हो? चित्रलेखा ने पूछा।।
जी! काँलेज करने के बाद अभी तो बाबूजी का उनके स्कूल के काम में हाथ बँटाता हूँ,थोड़ी बहुत खेती है,वो भी मैं ही सम्भालता हूँ,शिवदत्त बोला।।
एक बात बताओ,शिवन्तिका तो इतने ऐशोआराम में पली है,उसकी ख्वाहिशें कैसे पूरी करोगें?चित्रलेखा ने पूछा।।
मैं झूठ नहीं बोलूँगा और आपको कोई झूठा आश्वासन भी नहीं दूँगा कि मैं शिवन्तिका के लिए चाँद-तारे तोड़कर ला दूँगा, क्योकिं दादी माँ! मैं उसकी हर ख्वाहिश तो पूरी नहीं कर पाऊँगा,लेकिन हाँ जो मेरी हद है,उस हद तक तो जरूर उसकी ख्वाहिश पूरी करने की कोशिश करूँगा,इतना वादा जरूर करता हूँ आपसे कि उसकी आँखों में आए आँसुओं की वज़ह कभी नहीं बनूँगा,शिवदत्त बोला।।
शिवदत्त का जवाब सुनकर चित्रलेखा को बहुत खुशी और फिर वें बोलीं.....
शादी के बाद तुम दोनों यहाँ रह सकते हो ,मुझे एतराज़ ना होगा।।
लेकिन मुझे एत़राज है दादी माँ! हम दोनों हमारे गाँव के ही घर में रहेंगें,मैं अपने पिताजी को नहीं छोड़ सकता,आप भी अकेली पड़ जाएगीं यहाँ तो हम आपसे मिलने आते रहा करेगें,लेकिन रहेंगे हम गाँव में ही,शिवदत्त बोली।।
शिवदत्त के स्वाभिमानी विचारों से चित्रलेखा बहुत प्रभावित हुईं और इस रिश्ते के लिए मान गई और ये सुनकर सब बहुत खुश हुए,फिर चित्रलेखा बोली....
लेकिन शादी अभी कुछ महीनों तक नहीं हो सकती ,हम चाहते हैं कि शिवन्तिका पहले ग्रेजुएशन पूरा कर ले,फिर हम उनकी शादी करें।।
जी! दादी माँ! मैं भी यही चाहता हूँ,आपने हमारे रिश्ते को मंजूरी दे दी,हमारे लिए तो वही बहुत बड़ी बात है,इतना इन्तजार तो हम कर ही सकते हैं,शिवदत्त बोला।।
हमें इसी जवाब की आशा थी,चित्रलेखा बोली।।
और उस रात बहुत दिनों के बाद दादी और पोती को चैन की नींद आई थी।।
शिवन्तिका और शिवदत्त का रिश्ता तय होते ही उधर सियाशरन और सुहासा के बीच भी प्यार का अंकुर फूट पड़ा,वे दोनों भी एक दूसरे से मौहब्बत करने लगे,ये बात जब शिवदत्त और शिवन्तिका को पता चली तो बहुत खुश हुए,दोनों ने कहा कि जब तुम दोनों ने हमारा साथ दिया था तो हम भी तुम दोनों का साथ देगें और तुम दोनों की शादी करवाकर रहेंगें।।
सियाशरन के पिता तो उसके बचपन में ही गुजर गए थे,माँ ने ही उसे पालपोस कर बड़ा किया था लेकिन दो साल पहले उसकी माँ भी गुजर चुकीं थीं,वो अपनी किताबों की दुकान चलाता था और अपने पुस्तैनी मकान में अकेले रहता था।।
और उधर सुहासा के पिता रेलवें कर्मचारी थे,रेलवे के सरकारी घर में रहते थे,माँ घरेलू महिला थीं,सुहासा अपने माँ बाप की इकलौती सन्तान थी,इसलिए सुहासा की खुशी के लिए सुहासा के माँ बाप इस शादी से इनकार ना कर सकें और फिर उन्होंने सोचा कि सियाशरन इकलौता है,दुकान से अच्छी खासी कमाई हो जाती है,ऊपर से इतना बड़ा पुस्तैनी मकान है,हमारी बेटी सुहासा सियाशरन के साथ खुश रहेगी,
और कुछ ही दिनों में सुहासा और सियाशरन की शादी तय हो गई,शिवन्तिका अपनी सहेली सुहासा की खरीदारी में लगी रही और शिवदत्त अपने दोस्त सियाशरन की खरीदारी में,सुहासा के माँ बाप बोले कि सियाशरन अकेला है ,शादी की रस्में वो कैसे निभाएगा इसलिए शादी हमारे रेलवें वाले घर से होगी,मण्डप वाले दिन से ही सियाशरन हमारे रेलवें के गेस्टहाउस में ही आकर रहने लगें,ताकि सभी रीति- रिवाज ठीक से निभाएं जा सकें।।
फिर शिवदत्त ने सियाशरन से कहा.....
यार! तू तो गेस्टहाउस चला जाएगा तो मैं कहाँ रहूँगा? मैं क्या उतनी दूर से रोज गाँव से आया करूँगा?
तेरी शादी का सब मज़ा किरकिरा हो जाएगा।।
अरे! तू भी गधा है,ये ले मेरे घर की चाबी और शादी होने तक इसी घर में रह,घर की साज सजावट भी करवा देना,क्योंकि दुल्हन तो विदा होकर इसी घर में आएंगी,सियाशरन बोला।।
ये ठीक कहा तूने और इतना कहकर उसने सियाशरन के घर की चाबी ले ली और वहीं रहने लगा,उसने घर का रंग रोगन भी करवा दिया,घर की सजावट भी करवा दी,अब घर सुन्दर दिखने लगा थ।।
इसी तरह शिवन्तिका भी पूरे समय सुहासा के साथ ही लगी रही,शादी वाले दिन के दोपहर के समय शिवन्तिका ने शिवदत्त से कहा.....
मैं अब घर जा रही हूँ,अब शाम को ही आऊँगीं,तुम मुझे शाम को सियाशरन के घर पर तैयार मिलना मैं तुम्हें वहीं से ले लूँगी और हम दोनों मोटर से साथ साथ शादी में आ जाऐगे,क्योंकि दादी तो शादी में आने से मना कर रहीं हैं वें कह रही थी कि उन्हें भीड़-भाड़ कम पसंद है,तो मैं तुम्हारे साथ आ जाऊँगीं।।
हाँ! यही सही रहेगा,मैं शाम को तैयार रहूँगा,शिवदत्त बोला।।
और फिर दोपहर में ही शिवन्तिका अपने घर चली गई,थोड़ी देर के लिए सो गई ताकि उसकी थकान मिट जाएं,जागी तो देखा शाम हो चुकी है,धनिया ने उससे आकर कहा....
बिटिया!मालकिन नीचें बुला रहीं हैं.....
अभी आई काकी! और इतना कहकर शिवन्तिका नीचे पहुँची तो चित्रलेखा ने पूछा.....
क्या उपहार खरीदा है सुहासा के लिए?
जी! एक बनारसी साड़ी खरीदी है और सोच रही थी कि एक फूलों का बड़ा सा गुलदस्ता ले लूँ,शिवन्तिका बोली।।
ओहो...! आपकी इतनी अच्छी सहेली और केवल बनारसी साड़ी,चित्रलेखा बोली।।
जी! मुझे कुछ समझ नहीं आया,शिवन्तिका बोली।।
ये लीजिए! हम ने सोने का नेकलेस लिया है सुहासा के लिए,साड़ी और फूलों के साथ इसे भी रख दीजिएगा,चित्रलेखा बोली।।
नेकलेस देखकर शिवन्तिका चहक उठी और चित्रलेखा के गले लगते हुए बोली....
थैंक्यू...दादी माँ...थैंक्यू सो मच!
हाँ...हाँ...ठीक है...और फिर शिवन्तिका से अलग होते हुए बोलीं....
ये रही आपके लिए रेशमी मैरून साड़ी,ये रहा हमारा खानदानी कुन्दन का हार और झुमके,आज आप यही पहनकर जाऐगीं सुहासा की शादी में,चित्रलेखा बोली।।
दादी माँ! ये तो बहुत ही खूबसूरत है,ये सब मेरे लिए है,शिवन्तिका ने पूछा।।
हाँ! ये सब आपके लिए है ये साड़ी हमने हफ्ते भर पहले ही खरीदी थी आपके लिए,इसका ब्लाउज भी सिलवा दिया है हमने और आज आपको हम ही तैयार करेगें,जाइए तो जल्दी से हाथ मुँह धोकर कुछ थोड़ा बहुत खा लीजिए,फिर हम आपको तैयार करेंगें,चित्रलेखा बोली।।
सच! दादी माँ! मैं बस अभी आई और इतना कहकर शिवन्तिका हिरणीं सी कुलांँचे भरते हुए अपने कमरें में चली गई।।
ये सब देखकर धनिया बोली....
आज बिटिया कितनी खुश है,नज़र ना लगे किसी की।।
हाँ! बस ऐसे ही हमेशा खिलखिलाती रहें,मुस्कुराती रहें ,चित्रलेखा बोली।।
और फिर जब तैयार होकर शिवन्तिका नीचे आई तो सभी नौकर उसे देखते ही रह गए,शिवन्तिका ने सुनहरे बार्डर वाली मैरून साड़ी पहनी थी,स्लीपलैस ब्लाउज के साथ,गले में कुन्दन का हार और कान में बड़े बड़े झुमके,बालों को बीच से माँग काढ़कर पीछे जूड़ा बना था और जूड़े को मोगरे के गजरे से सजाया गया था,माथे पर छोटी सी बिन्दी,आँखों में मोटा काजल, होंठो पर सुर्खी और गालों पर गुलाबी रंगत थी,हाथों में कुन्दन के ही कंगन थे मैरून काँच की चूड़ियों के साथ,ऊँगलियों में कुन्दन की ही शाही अँगूठियाँ,उसे देखकर फौरन ही धनिया ने काजल का टीका लगा दिया और बोली।।
बिटिया! आज तो तुम्हार खूबसूरती देख के स्वरग की मेनका और रम्भा भी जल भुन जाऐ,इतनी सुन्दर लग रही हो बिटिया।।
ये देखकर शिवन्तिका बोली....
सच में काकी!
हाँ! बिटिया! सच में,धनिया बोली।।
और फिर शिवन्तिका ने धनिया से मोटर में सभी उपहारों को रखने को कहा और चित्रलेखा से बोलीं....
अच्छा! दादी माँ! चलती हूँ।।
आप अकेले जा रहीं हैं,ड्राइवर को नहीं ले जा रहीं,चित्रलेखा ने पूछा।।
दादी माँ!शादी का समय है क्या पता कितनी रात हो जाएं?ड्राइवर वहाँ परेशान हो जाएगा,यही सोचकर अकेले जा रही हूँ,शिवन्तिका बोली।।
ठीक है,हाँ सही कहा आपने,तो फिर जाइए,चित्रलेखा बोली।।
और फिर शिवन्तिका चल पड़ी सियाशरन के घर की ओर शिवदत्त को लेने,सियाशरन के घर पहुँचकर उसने दरवाजा खटखटाया,जैसे ही शिवदत्त ने दरवाजा खोला तो वो शिवन्तिका को देखता ही रह गया और बोला.....
माशाअल्लाह! कयामत लग रहीं हैं मोहतरमा आप तो।।
शुक्रिया....शुक्रिया...जनाब! शिवन्तिका बोली।।
बस,तुम दो मिनट ठहरो, मैं बस अभी आया तैयार होकर,शिवदत्त बोला।।
ठीक है,शिवन्तिका बोली।।
और फिर शिवन्तिका घर को देखने लगी,घर की सजावट वाकई शिवदत्त ने बहुत सुन्दर करवा दी थी,शिवन्तिका घूम घूम हर एक कमरें की सजावट देख रही थी,वो जब दूसरे कमरें में पहुँची तो तभी उसे ढूढ़ते हुए शिवदत्त आ पहुँचा और चुप होकर शिवन्तिका को निहारने लगा,जैसे ही शिवन्तिका पीछे को मुड़ी तो वो उसके पीछे खड़े शिवदत्त से जा टकराई और हील्स पहनने की वजह से सम्भल नहीं पाई,इसलिए गिर पड़ी,
शिवदत्त ने उसे उठाया तो उसे अपने इतने करीब पाकर मदहोश सा हो गया और अपने होश खो बैठा,उसने शिवन्तिका को बाँहों में भर लिया,शिवन्तिका भी शिवदत्त की इस गुस्ताखी में शरीक़ हो गई और खुद को शिवदत्त के हवाले कर दिया,दोनों ही जज्बातों में बह गए और खुद पर काबू ना रख सकें।।
जब दोनों को होश आया तो बात बहुत आगें बढ़ चुकी थी और शिवन्तिका ने रोते हुए शिवदत्त से कहा....
ये सब नहीं होना चाहिए था शिवदत्त! मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई।।
गलती तो मुझसे भी हो गई शिवी! मैं बहक गया था,मुझे सम्भल जाना चाहिए था,शिवदत्त बोला।।
शिव! बहक तो मैं भी गई थी,लेकिन अब क्या होगा?शिवन्तिका बोली।।
शिवी! तुम खुद को कूसूरवार ना समझों,मैं भी इसमें बराबर का हिस्सेदार हूँ,कोई बात नहीं शिवी! चिन्ता मत करो,अब हमारी शादी होने वाली है ,मैं वादा करता हूँ,अगले महीने हम भी शादी कर लेंगें,शिवदत्त बोला।।
लेकिन मुझे सच में बुरा लग रहा है शिव! ,शिवन्तिका बोली।।
बुरा तो मुझे भी लग रहा लेकिन अब जो होना था वो हो चुका,तुम चिन्ता मत करो,अपना हुलिया ठीक करो,शादी में भी तो जाना है,दोनों हमारी राह देखते होगें,मन में कुछ मत रखो,हमारा मिलन पवित्र था,इसमे कोई भी मालीनता नहीं थी,इतना मत सोचो,शिवदत्त बोला।।
शायद तुम ठीक कहते हो,लेकिन गलती तो हुई है ना हमसे,शिवन्तिका बोली।।
हाँ! लेकिन अब क्या किया जा सकता है?तुम ज्यादा मत सोचो,पहले शादी में चलते हैं,अगर तुम चाहो तो मैं कल ही तुमसे शादी करने को तैयार हूँ,शिवदत्त बोला।।
मुझे तुम पर पूरा भरोसा है शिव! मुझे पता है तुम मुझे धोखा नहीं दोगें,शिवन्तिका बोली।।
तुम फिर मुस्कुराओ और आइने में जाकर अपना चेहरा देखकर आओ फिर चलते हैं शादी में,शिवदत्त बोला।।
हाँ! अभी आई और इतना कहकर शिवन्तिका ने अपना हुलिया ठीक किया औ दोनों मोटर में बैठकर चल पड़े शादी में।।
दोनों ने शादी में रात भर खूब मस्ती की,शादी की सभी रस्मों के बीच हँसी-खुशी का माहौल रहा,दूल्हा दुल्हन भी बहुत खुश थे,दोनों के मन की मुराद जो पूरी हो गई थी एक दूसरे को पाकर।।
दुल्हन विदा होकर अपने घर भी पहुँच गई,दोनों पति पत्नी अपनी गृहस्थी में रम गए और इस तरह से दोनों की शादी को दो महीने बीत गए।।
इधर शिवदत्त भी अपनी शादी की प्लानिंग कर रहा था,वो अब खुद को उस रात के लिए दोषी समझ रहा था इसलिए जल्द से जल्द शिवन्तिका के साथ शादी करना चाहता था।।
लेकिन एक दिन शिवदत्त के पिता मुँहअँधेरे स्नान करने नदी पर जा रहे थे,जोकि उनकी रोज की आदत में शामिल था,उन्होंने ध्यान नहीं दिया,बुढ़ापे की आँखें थी बिना ऐनक लगाए दिखाई ना देता था,ना जाने कहाँ से एक विषधर आया और उनके पैर को विषाक्त करके चला गया,जब तक वे कुछ समझ पाते तब तक वें धरती पर गिर पड़े फिर वे किसी को भी मदद के लिए नहीं चिल्ला पाए और कुछ ही देर में उनके प्राण-पखेरू उड़ गए,जब लोंग उस रास्ते से गुजरे तब उन्होंने मास्टर जी को धरती पर गिरा हुआ पाया,लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।।
शिवदत्त को ये खबर पता चली तो बहुत रोया,सियाशरन भी उसके दुख में शरीक़ हुआ,आखिरकार मास्टर साहब का अन्तिम संस्कार हो गया और शिवदत्त उनकी अस्थियाँ लेकर ऋषिकेश पहुँचा उनकी अस्थियाँ विसर्जित करने,जब अस्थियाँ विसर्जित करके लौट रहा था तो रास्तें में बस दुर्घटनाग्रस्त हो कर नदी में जा गिरी,बहुत से यात्रियों को को तो बचा लिया गया लेकिन शिवदत्त का कहीं कुछ पता ना चल सका।।
ये ख़बर जब शिवन्तिका तक पहुँची तो वो बेहोश होकर गिर पड़ी,डाक्टरनी साहिबा को शिवन्तिका का चेकअप करने के लिए बुलाया गया तो डाक्टरनी साहिबा बोलीं कि ये माँ बनने वालीं हैं,ये सुनकर चित्रलेखा के पैरों तले जमीन खिसक गई।।

क्रमशः.....
सरोज वर्मा.....


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