उजाले की ओर--संस्मरण Pranava Bharti द्वारा प्रेरक कथा में हिंदी पीडीएफ

उजाले की ओर--संस्मरण

उजाले की ओर ---संस्मरण

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समय अपनी धुरी पर चलता रहता है बिना हमसे कुछ पूछे ,बिना बताए ---अब सोचने की बात है कि हम कितनी चीज़ो पर अपना अधिकार समझते हैं | भाई ! हक है हमारा ,समझना भी चाहिए फिर समय भी तो हमारा है और हमें कुछ भी बिना बताए ,आगे चलता ही रहता है | न जाने कहाँ कहाँ पहुँचा देता है |हम समय के मोड़ों को पहचान कहाँ पाते हैं ? बस,एक फिरकनी बनकर उसके पहिए में चक्कर काटते रह जाते हैं |

मित्रों ! सच -सच बताइएगा ,कभी ऐसा नहीं होता क्या कि हमारा मन हमारे ही समक्ष न जाने कितने सवाल लेकर आ खड़ा हो जाता है | फिर उन सवालों के उत्तर की माँग करता है लेकिन हमारे सामने सवाल ही विकट होते हैं तो उत्तर की बात तो भला क्या ही बताई जाए ?

मुझसे अक्सर मेरा मन पूछता है ऐसा क्यों हुआ ?वैसा क्यों हुआ ?भई ! समय तो तुम्हारा था ,तुम्हें सचेत रहना चाहिए था ! सचेत तो तब रहेंगे न जब पता होगा कि ये समय मियाँ हमारे साथ क्या करने वाले हैं ?ये हमें कोई पीड़ा देने वाले हैं या खुशियों का खज़ाना हम पर लुटाने वाले हैं ?सो भई हमें तो केवल तमाशा देखते रहना है और जो हमारे सामने आने वाला है उसे भोगना है |

'उजाले की ओर' लेख मैं लगभग तीस या इससे भी अधिक वर्षों से रविवारीय परिशिष्ट के रूप में लिख रही हूँ | पहले अख़बार में लिखती थी ,अब इस पटल पर आप सबसे मिलने के लिए लिखती हूँ | समय ने न तब मुझे टेर लगाई थी ,न ही अब पुकारता है लेकिन न जाने कैसे लिखा जाता है ? मैं नहीं जानती | कई बार हमारी समझ में बातें नहीं आतीं और समय हमें तमाशा दिखाकर अपना रूप बदलकर कब चुटकी भर में ही उड़नछू हो जाता है |

सच में समय ! तेरी महिमा बड़ी न्यारी ! तू न जाने क्या-क्या तमाशे दिखा दे और आँखों से ऐसे ओझल हो जाए कि पता ही न चले कि कभी इस लिबास में भी आया था तू --जैसे नदी एक दिशा में बहती है ओर लौटकर नहीं आती इसी प्रकार समय की नदिया भी जिस ओर चलती है, चलती ही जाती है ,कभी लौटकर नहीं आती|

एक मित्र हैं ,अच्छी-ख़ासी पढ़ी-लिखी ,सभ्य ,सुसंस्कृत ! लेकिन समय ने उनके मुख पर भी तमाचे जड़ दिए |

लोगों ने उनसे पूछा --"इतनी समझदार होकर भी आप अपनी परिस्थिति को क्यों सँभाल नहीं सकीं ?"

उनकी आँखों में आँसू भर आए ,बोलीं ---"समय ---दोस्त ! समय ----"

सोचने के लिए मजबूर होना पड़ा कि क्या केवल समय ही होता है जो उल्टा-सीधा कारवा देता है या और भी कुछ है जो मनुष्य बाध्य हो जाता है ,वह सब करने के लिए जो वह दरअसल करना ही नहीं चाहता | यह 'हो जाना',मनुष्य को भीतर से तोड़ देता है |

संभवत: कई बातें मिलकर परिस्थिति बनाती हैं ,जो लोग आपके लिए जान छिड़कने के लिए तत्पर रहते थे ,वे अचानक इतने अलग हो जाते हैं कि मनुष्य के पास प्रश्नों की एक पगडंडी बनती चली जाती है जिसके उत्तर नदारत होते हैं |

कभी-कभी खूब बड़ी-बड़ी दुर्घटनाएँ होने पर भी समय मनुष्य के घावों को भर देता है ,उसके आँसुओं के सैलाब को थाम देता है लेकिन कभी किसी की एक चिंदी भर बात से वह टूटकर बिखर जाता है और हम सोचते हैं कि कैसा समय था जिसने हमें पीड़ा से भर दिया |

मित्रों ! इस जीवन में प्रतिदिन इस प्रकार का समय आता-जाता रहता है किन्तु इससे टूटना नहीं है |यदि कोई कभी अपमान भी कर जाए तो उससे तुरत अलग हो जाना ही अच्छा है |व्यर्थ में उसके प्रति गलत सोचने से भी क्या लाभ? हो सकता है कि वही व्यक्ति समय आने पर अपनी त्रुटियों का एहसास कर ले और फिर से समय हमारी ओर पलट जाए और हम फिर से अपने उस मित्र के प्रति सौहार्द की भावना बना सकें |

हाँ।यह बात एससीएच है कि

कभी कभी पत्थर की चोट से खरोंच तक नहीं आती लेकिन दो शब्दों की धार से इंसान टुकड़ों में बंट जाता है |

आइए ,सोचें ,चिंतन करें और समय को नमन क्रेन कि वह हम सबके लिए सकारात्मक बना रहे और हमें स्वस्थ,सुरक्षित व आनंदित रखे |

अगले रविवार को फिर मिलते हैं ,किसी और चिंतन अथवा संस्मरण के साथ |

सस्नेह

आपकी मित्र

डॉ.प्रणव भारती

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Pranava Bharti

Pranava Bharti मातृभारती सत्यापित 7 महीना पहले