वह अब भी वहीं है - 33 Pradeep Shrivastava द्वारा उपन्यास प्रकरण में हिंदी पीडीएफ

वह अब भी वहीं है - 33

भाग -33

जमीन पर ही सही, कुछ देर लेट लेने से मुझे थोड़ी राहत मिल गई थी। मैं उठा और किसी तरह मंदिर के गेट पर पहुंच कर, हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया। अंदर एक पुजारी आरती कर रहा था। दूसरा पुजारी घंटा बजा रहा था। शंकर भगवान को मैंने भी प्रणाम किया। दस मिनट की आरती पूरी कर दोनों पुजारियों ने भगवान के चरण रज माथे पर लगाए। प्रसाद वाला डिब्बा उठाया चार क़दम पीछे चल कर मंदिर के बाहर आ गए।

मैं मंदिर की चार सीढ़ियों के एकदम नीचे सड़क पर था। पुजारी ने मुझे प्रसाद देते हुए, कुतुहल-भरी नज़र से देख कर पूछा, 'क्या हुआ तुम्हें, क्या बात है?' वह दोनों ही मेरे सूजे हुए चेहरे, जिसमें एक आंख इतनी सूजी थी कि करीब-करीब बंद थी। लाठियों की मार से सूजे नंगे पैर, जिसमें कई जगह खून लगा था, जो अब तक सूख चुके थे, को बार-बार देख रहे थे।

मैंने हाथ जोड़े-जोड़े ही कहा, '' मैं काम से वार्सोवा जा रहा था। रास्ते में कुछ लोगों ने मुझे मार-पीट कर बेहोश कर दिया। मेरा पैसा, सामान सब-कुछ छीन ले गए। होश आया तो, किसी तरह यहां भगवान की दर पर आ गया, कि भगवान मेरी मदद करेंगे, किसी ना किसी को मेरी मदद को जरूर भेजेंगे।'' इतना कह कर मैं बड़ी याचना भरी दृष्टि से उन्हें देखने लगा। समीना उस हालत में भी मैंने झूठ इसलिए बोला था कि, पुलिस का नाम सुनकर कहीं वह लोग मुझे चोर-उचक्का समझ कर दुत्कार ना दें। मैंने अपनी जान बचाने के लिए झूठ बोला था। दोनों पुजारी मुश्किल से तीस-पैंतीस के ही रहे होंगे।

मेरी बातें सुनने के बाद उनकी आँखों में मेरे लिए दया-भाव उभर आये थे। उन्होंने प्रसाद के डिब्बे से चार लड्डू निकाल कर दिए। कहा, '' लो प्रसाद ग्रहण करो, पानी देता हूं।'' मैंने जल्दी से प्रसाद खाया। उन्होंने मोटरसाइकिल की डिक्की से बोतल निकाल कर पानी पिलाया। बोतल भी मुझे दे दी। वार्सोवा में कहां जा रहे थे? यह पूछने पर मैंने वह पता बताया, जहां मोटी ने एक बार किसी काम से भेजा था। वह वहां से काफी दूर था। थोड़ी देर और पूछताछ करने के बाद उन्होंने मुझे इतने पैसे दिए कि, मैं बस वगैरह से वहां पहुंच जाऊं। दोनों ही पुजारी आपस में भाई थे।

जाते-जाते उन्होंने पता नहीं क्या सोच कर मुझे और पैसे देते हुए कहा, '' पहले आस-पास कहीं मरहम-पट्टी करा लो, फिर जहां जाना है, वहां जाओ। अगर स्वयं जाने में असमर्थ हो, तो मरहम पट्टी के लिए हम ले चलें।'' मैं उन्हें और कष्ट नहीं देना चाहता था, इसलिए धन्यवाद देते हुए कहा चला जाऊँगा। उन्होंने जाते-जाते डिक्की से एक एकदम नई तौलिया निकाल कर दी, साथ में चार लड्डू और दे दिये।

उनके जाने बाद मैं करीब घंटे भर उसी मंदिर की छाया में लेटा रहा। दुबारा दिए लड्डू भी खा लिए। बचा पानी भी पी गया। उस समय मुझे याद आ रही थी, तोंदियल की वह बात जो उसने कही थी कि, ''ज़्यादा चकर-पकर, इधर-उधर देखने की जरूरत नहीं है। नहीं तो साहब कब, कहां फिंकवा देगा किसी को कुछ पता भी नहीं चलेगा। कई नौकर ऐसे ही गायब हुए हैं। जिनका कुछ भी पता नहीं चला।'' उसकी यह बात जितनी याद आती, उतना ही ज़्यादा मुझे डराती।

मैं वहां से किसी तरह वार्सोवा चला आया। दो दिन इधर-उधर फुटपाथ पर बीता। छब्बी की याद कलेजा छील कर रख दे रही थी। घर से निकलते समय मेरी सुरक्षा को लेकर वह बहुत चिंतित थी। चलते समय कहा गया उसका आखिरी वाक्य मेरे कानों में बार-बार गूंज रहा था, '' इस मोटी के मनहूस काम से ज्यादा अपना ध्यान रखना समझे। आज फिर ये काली बारिश हो रही है। मेरा मन बहुत घबरा रहा है, मेरा वश चले तो जाने ही न दूँ।''

समीना मुझे लगता जैसे वह अगल-बगल, आगे-पीछे ही कहीं खड़ी है। उसकी बातें जितनी याद आतीं वो मुझे उतना ही ज्यादा उठ खड़ा होने, आगे बढ़ने की ताकत देतीं, प्रेरित करतीं। दो-तीन दिन मैंने लड्डू, और जो पैसे पुजारी जी ने दिए थे, उससे जीने भर का, इधर-उधर का खा कर गुजारे। मैं किराए में पैसा खर्च करने के बजाए ज़्यादा से ज़्यादा पैदल चलकर, उसे खाने के लिए बचाए हुए था।

मगर पैसे थे ही कितने जो ज़्यादा दिन चलते। यह बात मेरे दिमाग में थी। इसलिए मैंने पहले दिन ही से काम-धंधा ढूंढ़ना शुरू कर दिया था। तीसरे दिन जिस होटल के सामने फुटपाथ पर मैंने रात बिताई थी, उसके खुलने पर जैसे ही उसका एक कर्मचारी आया, उससे किसी तरह भी कुछ काम दिला देने की बात की। बर्तन की साफ-सफाई से लेकर, वेटर तक का कुछ भी। वह होटल अच्छा-खासा बड़ा था। जहां ज़्यादातर काम-धाम में लगे रहने वाले तबके के लोग ही आया करते थे। मैंने सोचा वेटर का काम तो मिल ही जाएगा।

मगर जब मालिक आया तो साफ बोला, 'बर्तनों की सफाई, कुछ ऊपर के कामों के अलावा फिलहाल और कोई काम नहीं है। करना चाहो तो अभी से शुरू हो जाओ।' यह मेरे लिए डूबते को तिनके का सहारा जैसा था, तो मैं तुरंत लग गया। अब-तक मेरे चेहरे, पैरों की सूजन काफी कम हो गई थी। उससे भी मैंने पुलिस की बात छिपाते हुए लुटने-पिटने की ही बात बताई थी। उसने सुनने के बाद कुछ कहा नहीं, बस काम दे दिया। दोपहर को खाना भी दिया ।

रात को जब होटल बंद हुआ तब भी खाना मिल गया। होटल बंद होते समय मैंने एक साथी कर्मचारी से रात काटने के लिए, जगह की बात की तो वह बोला, 'जहां मैं रुकता हूँ, वहां रुक सकते हो तो चलो मेरे साथ।' मेरे लिए इससे बड़ी मदद और क्या हो सकती थी? मैं तुरंत तैयार हो गया। वह मुझे लेकर एक निर्माणाधीन हीरानंदानी आवासीय एरिया में पहुंचा। वहीं बन रही एक बिल्डिंग के बरामदे में ठहरा। साथ में चार-पांच लेबर टाइप के और लोग भी थे। बिस्तर के नाम पर सीमेंट की बोरियां, कार्टन, गत्ते थे। फर्श पर गिट्टियां पड़ी थीं। उन्हीं पर बितायी रात। चार दिन ऐसे ही चला। पांचवें दिन इससे थोड़ा बेहतर इंतजाम हुआ।

सबसे बड़ी समस्या मेरे सामने कपड़ों की भी थी। कोई कपड़ा मेरे पास नहीं था। उन्हीं साथ काम करने वालों से बात कर दो सेट कपड़ों का इंतजाम किया। उन सबने पहले ब्याज पर पैसा देने को कहा। लेकिन फिर पता नहीं क्या सोचकर खुद ब्याज से मना कर दिया।

समीना दुनिया में कुछ भी हो जाए, कुछ भी रुक जाए, लेकिन समय किसी के लिए भी पलक झपकने भर को भी नहीं ठहरता। मेरे लिए भी नहीं ठहरा, जल्दी ही यहां काम करते तीन महीना बीत गया। अपनी मेहनत ईमानदारी से मैंने होटल मालिक का विश्वास जीत लिया। मेरे काम से वह मान गए कि, मैं दो लोगों के बराबर अकेले काम करता हूं। धीरे-धीरे मुझसे होटल के सामान मंगाने लगे। घर भेजकर घर और बाहर के और काम भी कराने लगे। बाहर काम के लिए अपनी मोटरसाइकिल से भेजते।

उनका छह लोगों का परिवार था। वार्सोवा में ही उन्होंने ठीक-ठाक एक मकान बना रखा था। उनकी दो लड़कियां, दोनों लड़के पढ़ने-लिखने में तेज़ थे। पत्नी खाना बनाने और होम डेकोरेशन की एक्स्पर्ट थी। कई फूड फेस्टिवल में वह ईनाम जीत चुकी थीं। मेरे वहां जाने के बाद ''वार्सोवा कोली सी फूड फेस्टिवल'' में उन्होंने फिर हिस्सा लिया। फेस्टिवल में उनकी मदद के लिए मालिक ने मुझे भेज दिया। वहीं फेस्टिवल में मुझे वह आदमी मिला जो पहले साहब के एक दोस्त के यहां काम करता था और साहब के यहाँ अक्सर काम से आता रहता था। वहीं उससे परिचय हुआ था।

वह एक अच्छा आदमी था। उसने मेरी सारी कहानी, संघर्ष को सुनने के बाद कहा, 'कहाँ बर्तन, झाड़ू-पोंछा में पड़े हो? मेरे साथ चलो मैं काम दिलाता हूं।' अचानक मैं होटल से काम नहीं छोड़ना चाहता था। मेरे मन में होटल वाले के लिए श्रृद्धा थी। उन्होंने बहुत कठिन समय में मुझे काम दिया था। मेरा जीवन बचा लिया था, नहीं तो मैं मर जाता। उनके पूरे परिवार का नौकरों के साथ अच्छा व्यवहार था। मैंने सोचा जो भी हो, मैं उस आदमी से पूछ कर ही जाऊंगा।

उन्होंने बात करते ही खुशी-खुशी कहा, 'ठीक है जाओ।' चलते वक्त मैंने उन्हें प्रणाम किया तो वह फिर बोले, 'बात ना बने तो फिर चले आना।' मैंने कहा, 'ठीक है।'

तो समीना विलेन-किंग बनने के प्रयास में, मैं एक बार फिर पहले जीवन बचाने के लिए संघर्षरत हो गया। इस बार मेरा युद्ध क्षेत्र हीरानंदानी एरिया में '' रमानी हाउस'' बना। जहां दुनिया का वह रंग देखा, जिसे पहले कभी नहीं देखा था। हाँ, सुना जरूर था। '' रमानी हाउस '' को वफादार ऑलराउंडर वर्कर की जरूरत थी। वे नौकरों को अपने सर्वेंट क्वार्टर में ही रखते थे। उस भारी-भरकम बंगलो की रखवाली से लेकर बाकी सारे काम भी करवाते थे। इसके लिए वह तनख्वाह अच्छी देते थे। खाना-पीना और साथ में वर्दी भी। मैं उनके लिए एक ऑलराउंडर वर्कर बन गया।

मैं जब पहुंचा तब सत्तर वर्षीय रमानी साहब डायलिसिस पर जीवन के दिन गिन रहे थे। लड़का परिवार सहित अमरीका में बस गया था। वहीं धंधा जमाए था। जिसने मुझे वहां पहुंचाया वह उनके संपर्क में बीस सालों से था। उसी ने बताया कि, जब वह संपर्क में आया तब-तक रमानी साहब धारावी में चार सिंगिल रूम फैक्ट्री के मालिक बन चुके थे, लड़का बहुत होनहार था। बाप के धंधे को दिन-दूना रात चौगुना बढ़ाए जा रहा था।

धंधे के ही चक्कर में अमरीका जाना शुरू किया। फिर अचानक एक बार बताया कि, वह वहां की नागरिकता ले चुका है, ज्यादा दिन नहीं बीते कि घर भर को यह बता कर हैरान कर दिया कि उसने वहीं एक अमरीकन लड़की से शादी कर ली है। उसे एक बार भारत भी ले आया, फिर एक बार हमेशा के लिए अमरीका चला गया।

उसके जाने के बाद ही पता चला कि, वह बाप की खून-पसीना एक कर खड़ी की गईं, चार में से तीन फैक्ट्रियां भी बेच गया। इकलौती बची फैक्ट्री पर बैंक का भारी कर्ज था। बाप के विश्वास का उसने ऐसा खून किया, जैसा दुश्मन भी नहीं करता। बाप ने किसी तरह जमा-पूंजी सब निकाल कर बैंक को दिया। एक-एक वह पैसा भी चला गया, जो उन्होंने अपनी दोनों लड़कियों की शादी के लिए रखा था।

वह फैक्ट्री तो बचा ले गए, लेकिन खुद को नहीं। बेटे के धोखे को वह नहीं सह पाए। बी.पी., डायबिटीस के भीषण हमले का शिकार हो गए। दवाओं का साइड एफेक्ट किडनी ले डूबी। डायलिसिस से जीवन तो किसी तरह खींच रहे थे, लेकिन धंधा खींचने की ताकत उनमें नहीं रह गई थी।

ऐसे में दोनों लड़कियों ने उनके दिशा-निर्देशन में धंधा संभाल लिया। '' रमानी हाउस '' एक बार फिर से आगे बढ़ चला, और इसी आगे बढ़ते '' रमानी हाउस '' में मेरी समीना, मेरी सैमी, यानी तुम मुझे मिली। छब्बी के बाद तुम ही वह माध्यम बनीं जिसके सहारे मैं एक बार फिर विलेन-किंग बनने का अपना सपना पूरा करने की सोचने लगा। मेरे आने के पांच-छह महीने बाद तुम आई थी।

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