वह अब भी वहीं है - 8 Pradeep Shrivastava द्वारा उपन्यास प्रकरण में हिंदी पीडीएफ

वह अब भी वहीं है - 8

भाग - 8

मगर मेरा यह सारा सोचा-विचारा धरा का धरा रह जाता, जब साहब को देखता। इस बीच मैं हर तरह से यह भी जानने में लगा रहा कि आखिर ये करते क्या हैं ? इसी सब में तीन महीने और बीत गए। दूसरे मैं लाख कोशिश करके भी कुछ नहीं बोल सका। तीसरे महिने बाद मैंने पूरा जोर लगाया और एक दिन काम खत्म होने के बाद जब देखा कि, साहब फ़ोन पर किसी से हंस-हंसकर बात कर रहे हैं, तो मुझे लगा कि उनका मूड सही है, आज बात कर ही लूँ । यह सोच कर मैं उनकी बात खत्म होते ही उनके पास पहुंच गया, हाथ जोड़ कर अपनी बात कह डाली। इस पर भावहीन चेहरे के साथ उन्होंने एक नज़र मेरे चेहरे पर डाली, कुर्सी से उठे और अपने दाएं हाथ से मेरे कंधे पर हौले से दो बार थपथपाया और अपनी गाड़ी में जा कर बैठ गए। मैं मायूस चुपचाप अपने काम में लग गया। सारा ताम-झाम जो फैला हुआ था, वह समेटना भी था।

वापस घर पहुँच कर मैं अंदर ही अंदर खौलता जा रहा था। हज़ार गालियां साहब को देते हुए यह तय कर लिया मौका मिलते ही भाग लूंगा यहां से। देखता हूं लोगों से बजबजाते इस शहर में यह मुझे कहां ढूँढ लेंगे। इसी उधेड़-बुन में मैं उस रात भी ठीक से नहीं सो नहीं पाया। भागने का रास्ता ढूंढ़ता रहा और तनख्वाह मिलने का इंतजार भी। भागने में सबसे बड़ी बाधा साथी नौकर-चाकर ही थे। जहां मैं अपना सामान लेकर निकलता तो धर लिया जाता। लेकिन कहते हैं न कि, भागने वाले को कौन रोक पाया है। यही मेरे दिमाग में चलता रहा कि, एक दिन निकल भागूंगा। मगर नहीं भाग पाया। क्योंकि एक शर्त पर ही वहां से भाग सकता था कि, अपना सारा सामान वहीं छोड़ देता। लेकिन बड़ी कठिनाईयों से मैंने एक-एक चीज जोड़ी थी, इसलिए उन्हें छोड़ने की हिम्मत नहीं कर पा रहा था। उनमें अब भी वो अधिकाँश जेवर थे, जो मैं घर से उठा लाया था। तब-तक बहुत मजबूर होने पर ही कुछ बेचे थे।

समीना तुम कहती थी ना कि तुमने अनगिनत रूप देखे हैं ज़िदंगी के, इतने कि, तुम उसी में डूब जाती हो। खो जाती हो। समीना तुम से कम ज़िदगी के रूप हमने भी नहीं देखे हैं। हममें तुम में फर्क सिर्फ़ इतना है कि, तुम उसमें डूब जाती थी, खो जाती थी, और मैं उसका एक-एक अध्याय याद रखता हूं। उसमें डूबकी भी लगाता हूं। तैरता भी हूं। इस डूबने, तैरने में मेरे हाथ काम की कोई चीज लगती थी कि नहीं, यह कहना मेरे लिए मुश्किल है। खैर जब मुझे उस महीने तनख्वाह मिली, और सिर्फ़ तनख्वाह मिली, मुझसे जो मॉडलिंग कराई गई उसका पैसा तो देना दूर दो शब्द धन्यवाद भी नहीं कहा गया तो, मैंने भागने का दृढ़ निश्चय कर लिया। दो दिन बाद मेरी नाइट ड्यूटी लगने वाली थी। मैंने तय कर लिया कि, नाइट ड्यूटी के समय ही किसी तरह नौ दो ग्यारह हो लूंगा। अगर पकड़ा गया तो साफ कह दूंगा कि, मुझसे मॉडलिंग कराई है, उसका भी पैसा दो। या फिर फिल्मों में काम दिलाओ। काम दिला दोगे तो भी अपनी ड्यूटी करूंगा। और अगर बच निकला तो कोई बात नहीं। मगर किस्मत में तो कुछ और लिखा था समीना। तो जो मैंने सोचा वैसा कुछ भी नहीं हुआ। अगले ही दिन शाम करीब चार बजे साहब का सबसे बड़ा चमचा, उनका शैडो मेरे पास आया और बोला, 'तुम्हें मेरे साथ लोअर परेल चलना है। साहब ने कहा है।'

कहता हुआ वह पास में खड़ी कई गाड़ियों में से एक में बैठ गया। मैं गाड़ी के पास पहुंचा तो मुझे पीछे बैठने का इशारा मिला। मैं बैठ तो गया लेकिन अंदर ही अंदर डर रहा था। साहब से। खैर वह शैडो मुझे लोअर परेल न ले जाकर उससे कुछ और आगे एक बड़ी सी बिल्डिंग के सामने रुका। जिस पर एक बोर्ड लगा था, जो काफी पुराना लग रहा था। उस पर लिखा था, जटवानी एसोसिएट्स । बाहर से बिल्डिंग कुछ पुरानी लग रही थी। उसकी हालत बता रही थी कि, बीते कई बरसों से उसकी रंगाई-पुताई कुछ भी नहीं हुई है। वहां सात-आठ मोटर-साइकिलों के अलावा कुछ कारें भी खड़ी थीं। जिसमें दो कारें बेहद शानदार एवं बहुत महंगी लग रही थीं।

बिल्डिंग के अंदर रूप कुछ दूसरा ही था। ऑफ़िस बहुत ही अच्छा था। शैडो ने रिसेप्सनिस्ट से कुछ कहा, तो उसने इंटरकॉम पर कुछ बात कर के विज़िटर्स स्पेस में बैठने को कह दिया।

कुछ देर बाद रिसेप्सनिस्ट ने शैडो को बुलाकर फिर कुछ कहा, उसे सुनने के बाद वह एकदम जल्दी में आ गया और बड़ी फुर्ती से मेरे पास आकर कहा, 'तुम यहीं रुको, मैम अभी बुलाएंगी। मैं जा रहा हूं।'

मैंने पूछा, 'कितनी देर में ?' तो वह बोला, 'मुझेे कुछ नहीं मालूम, यह सब मैम बताएंगी। साहब ने तुरंत बुलाया है।' यह कहते हुए वह चला गया। इधर मैं इंतजार में बैठा-बैठा पस्त हो गया।

शाम के छह बजने को थे, लेकिन अंदर चैंबर में मैम कान में न जाने कौन सा तेल डाल कर बैठीं थीं, कि उन्हें होश ही नहीं था, कि बाहर किसी को बैठा रखा है। एक-एक कर सब चले गए। बाकी बचा था मैं, एक चपरासी और वह रिसेप्सनिस्ट। उन दोनों के चेहरों पर भी थकान साफ नज़र आ रही थी। मुझे वहां दो घंटे में रिसेप्सनिस्ट ने एक कप चाय पिलवाई थी।

इस बीच मैंने देखा कि, रिसेप्सनिस्ट ने भी अपना बैग वगैरह तैयार किया, वॉश-रूम जा कर अपना मेकप सही किया, फिर चैंबर में जाकर मिनट भर में निकली और बड़ी तेजी से बाहर चली गई। उस समय मैंने उसकी चाल में गजब की फुर्ती देखी। वह पैंतीस-छत्तीस की अच्छी-खासी मोटी सी थी, लेकिन फुर्ती में किसी छरहरी महिला को मात दे रही थी। उसके जाने के बाद मैंने सोचा कि, चलो अब मुझे भी फुरसत मिलेगी। इसकी मैम साहब कितनी देर अकेले रहेंगी। लेकिन मेरा यह सोचना गलत निकला।

डेढ़ घंटे और बीत गए मैम साहब का चैंबर बंद तो बंद ही रहा। चपरासी जो करीब पचास के आस-पास था, अच्छी-खासी तोंद निकली हुई थी, वह चैंबर की घंटी की तरफ कान लगाए सतर्क बैठा था। इस बीच मैं उससे एक बार पानी मांग कर पी चुका था। मैंने उससे कई बार बात करने की कोशिश की, कि टाइम भी पास होगा और इस रहस्यमयी मैम के बारे में भी कुछ पता चलेगा। मगर तब वह ऐसा नीरस, अंतर्मुखी निकला था कि, कई बार कोशिश करने पर हूं, हां करके चुप हो जाता था। वैसा भावहीन चेहरा मैंने अब-तक के जीवन में दूसरा नहीं देखा। इंतजार कुछ इस तरह बढ़ रहा था, जैसे गर्मियों की छुट्टी में लेट भारतीय रेल गाड़ियां, इंतजार करा-करा कर यात्रियों का तेल निकाल देती हैं, खासतौर से पैसेंजर गाड़ियां। जैसे अंततः इन यात्रियों की किस्मत कुछ संवरती है, और ट्रेन आती है, कुछ वैसे ही मेरी किस्मत ने भी पलटा खाया और इंतजार खत्म हुआ। करीब साढ़े नौ बजे चपरासी को अंदर बुलाया गया। वह मिनट भर में ही बाहर निकला और दरवाजा खोल कर खड़ा हो गया, मैं समझ गया कि मैम साहब बाहर आने वाली हैं, तो मैं भी खड़ा हो गया कि, मैडम जल्दी से जल्दी जो बताना है, बताएं और मैं यहां से निकलूं। सच कहूं समीना गुस्से में मेरे मुंह से गालियां बहुत निकलती हैं, वह भी बहुत भद्दी-भद्दी। तो उस समय मैं साहब और मैडम दोनों को गालियां बके जा रहा था। जितना वह देर कर रही थीं, मैं अंदर ही अंदर उतनी ही ज़्यादा गालियां उन्हें दे रहा था।

खैर मैम साहब मोबाइल पर बातें करती हुई निकलीं। तब मोबाइल आज की तरह इतने आम नहीं थे कि, एक दिहाड़ी मजदूर के हाथ में भी दिखे। मैडम मेरी कल्पना से परे थीं। उनका कद औसत से काफी ज़्यादा था, करीब पांच फीट दस-ग्यारह इंच के आसपास। रंग हद से ज़्यादा गोरा था। बाल एकदम मर्दों की तरह छोटे-छोटे कटे थे। और सुनहरे कलर से रंगे थे। बड़ी-बड़ी खूबसूरत आंखें थीं। जो हल्की सूजी हुई सी लग रही थीं। कद की तरह उनका वजन भी औसत से कहीं बहुत ज़्यादा लग रहा था। उन्हें ठीक-ठाक मोटी औरत कह सकते थे, मगर थुल-थुल नहीं।

उन्होंने पीले रंग की बड़ी स्टाइलिश जींस पहन रखी थी। आसमानी रंग की गोल गले की टी-शर्ट। उनके कपड़े इतने टाइट हो रहे थे कि, लग रहा था जैसे अंग उन्हें फाड़कर बाहर आ जाएंगे। मैंने क्षण भर को उनकी गजब की काया को देखा, फिर नजरें नीचे कर हाथ जोड़ कर नमस्कार किया। मन में यही था कि, जवाब तक नहीं मिलेगा। साहब के व्यवहार ने मेरी यही धारणा बनाई थी, लेकिन उन्होंने अपनी असाधारण काया की तरह फिर चौंकाया और एक नजर मुझ पर डाली, आंखें थोड़ी फैलाईं, होंठ भी चौड़े हुए, सिर को रत्तीभर आगे झुका कर मेरे नमस्कार को स्वीकार किया। वह दरवाजे से बाहर चार कदम आगे आकर रुक गईं । चपरासी फिर अंदर गया, एक ब्रीफकेस और एक बैग लेकर बाहर आया।

मुझे लगा कि इनकी तरह इनके भारी-भरकम बैग को इनकी गाड़ी में रख कर मुझे जाने की फुरसत मिलेगी। मुझे उन्होंने क्यों बुलाया, इसे समझने से ज़्यादा मैं इस उधेड़-बुन में था कि जेब में नाम-मात्र को पैसे हैं। यहां से वापस साहब के पास कैसे पहुंचूंगा ? मगर अगले ही पल मैं गहरे असमंजस में पड़ गया। मैडम बजाय बिल्डिंग से बाहर निकलने के एक गैलरी पार कर बाएं तरफ बनीं सीढ़ियों से ऊपर चढ़ने लगीं।

मोबाइल पर बातें भी अंग्रेजी में करती जा रहीं थीं। जिनका मैं थोड़ा-बहुत मतलब ही निकाल पा रहा था। बाक़ी मेरे लिए करिया अक्षर भैंस बराबर था। उनके ठीक पीछे ब्रीफकेस लिए उनका चपरासी चल रहा था, और उसके पीछे भारी-भरकम बैग लिए मैं। मैडम एक-एक सीढ़ियां चढ़तीं बिना रुके तीसरी मंजिल पर पहुंच गईं। मैं उनकी क्षमता देखकर दंग रह गया कि, इतना भारी-भरकम शरीर और यह क्षमता। जबकि मैं काफी हांफने लगा था और तोंदियल चपरासी भी।

सीढ़ियां जहां खत्म हुईं, वहीं बांयीं तरफ बड़ा सा दरवाजा था, जिस पर ताला लटका था और दूसरी तरफ सीढ़ियां ऊपर को चली जा रही थीं। मैडम दरवाजे के पास एक कोने में खड़ी हो गईं। चपरासी ने आगे बढ़ कर चाबी निकाली, लटका हुआ ताला खोला। फिर दूसरी चाबी से इंटर-लॉक खोलकर दरवाजे को अंदर की तरफ ठेल दिया। इसी बीच एक युवक-युवती ऊपर सीढ़ियों से तेजी से उतरे और मैडम को, ‘हाय ज़ूबी’ कहते हुए नीचे उतर गए। मैडम ने बड़ी बेरूखी में जवाब दिया और अंदर चल दीं।

अब-तक मोबाइल पर उनकी बातें बंद हो गई थीं। अंदर लॉबी क्रॉस करके वह ड्रॉइंग रूम में पहुंचीं, जिसकी साज-सज्जा बहुत शानदार थी। कम से कम मेरी नज़र में तो थी ही। काफी बड़ा सोफा पड़ा था जो संभवतः लेदर का था और बहुत महंगा लग रहा था। एक कोने में जमीन पर ही मोटा गद्दा जैसा पड़ा था, जिस पर तीन-चार लोगों के हिसाब से गाव तकिए आदि रखे थे। सोफे के सामने बड़ी सी शानदार टेबिल थी। जिसके निचले हिस्से में अंग्रेजी की कई पत्रिकाएं पड़ी थीं। जिन्हें मैं जीवन में पहली बार देख रहा था। जिनके कवर पर करीब-करीब निर्वस्त्र औरतों की फोटो थीं।

हर कोनों पर स्टाइलिश स्टैंडों पर खूबसूरत सजावटी समान रखे थे। कमरे की दीवारें बड़ी ही कारीगरी से बनाई गई थीं। लगता था जैसे वे पत्थर की बनी हैं। उनमें मुर्तियां ऐसे बनी थीं मानो पत्थर को बड़ी बारीकी से तराश कर बनाया गया है। ऐसी डिजायनर दिवारें मैं पहली बार देख रहा था। मैडम सोफे पर बैठ गईं। चपरासी के साथ मैं ड्रॉइंग-रूम से लगे कमरे तक गया और बैग रखकर उसी के साथ वापस मैडम के पास लौट आया।

पता नहीं क्यों मैं उस शानदार घर में इतनी ही देर में घुटन सी महसूस करने लगा। मैं तुरंत वहां से निकलना चाहता था। तभी मैडम तोंदियल से बोली, 'सोहन इनको सारी बातें बता दीं कि नहीं।' उसके 'न' में सिर हिलाने पर बोलीं, 'अरे! बात करना कब सीखोगे।' फिर वह मेरी तरफ मुखातिब होकर बोलीं, 'अभी तुम्हें कुछ दिन यहीं काम करना है, यहीं रहना है। मेरा एक आदमी अपने घर गया है, वह जब लौट आएगा तब चले जाना। तुम्हें कोई परेशानी तो नहीं?'

मेरे पास ''नहीं'' बोलने के अलावा कोई रास्ता नहीं था। आसमान से गिर कर मैं खजूर में अटक गया था। उनकी जगह कोई सामान्य कद-काठी की महिला होती तो मैं शायद कुछ बोलने की हिम्मत करता, लेकिन उनकी लहीम-सहीम कद काठी और तानाशाह अंदाज के सामने भीतर ही भीतर सहमा सा जा रहा था। दूसरे वह बैठी थीं और मैं खड़ा तो उनके असाधारण शरीर पर मेरी नज़र बहक-बहक जा रही थी। इससे मैं और गडमड हो रहा था।

इसी बीच वह सोहन से मुखातिब हो बोलीं, 'इन्हें सारा काम समझा दो।'

सोहन मुझसे कुछ कहता कि इसी बीच मेरे दिमाग में साहब और यहां से निकल भागने की एक योजना कौंधी, मैं तुरंत बोला, 'मैडम मेरे कपड़े, सामान-वगैरह सब वही हैं। मैं उन्हें जाकर लेता आऊं।'

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Suresh

Suresh 3 महीना पहले

Sanjeev

Sanjeev 3 महीना पहले