वह अब भी वहीं है - 31 Pradeep Shrivastava द्वारा उपन्यास प्रकरण में हिंदी पीडीएफ

वह अब भी वहीं है - 31

भाग -31

डर, आवेश, घबराहट में मैं कुछ साफ बोल नहीं पा रहा था। मेरी बात पूरी होने से पहले ही सुन्दर हिडिम्बा के बोलने के बजाय इंस्पेक्टर बोला, 'वो एंबुलेंस में है। तुम्हारी लापरवाही के कारण उसकी डेथ हो गई।' यह सुनते ही मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई। मैं जहां खड़ा था वहीं बैठ गया। तभी उसने एंबुलेंस वाले को इशारा कर दिया, ड्राइवर ने गाड़ी स्टार्ट की और चल दिया।

मैं जल्दी से उठा कि छब्बी के अंतिम दर्शन करूँ, मैंने रुकने के लिए आवाज भी दी। लेकिन ड्राइवर को नहीं सुनना था तो उसने नहीं सुना। तभी एक कांस्टेबिल ने मेरा हाथ पकड़ कर कहा, ''चलो।'' मैं कुछ समझूं तब-तक खींच कर मुझे पुलिस की जीप में बैठा दिया गया। मैंने हक्का-बक्का हो सुन्दर हिडिम्बा को आवाज दी, जहां खड़ी थीं, उधर देखा तो वह अपनी जगह पर नहीं दिखीं। वह इसी बीच अंदर जा चुकी थीं । अब-तक सारा खेल मेरी समझ में आ गया था। यह भी समझ गया था कि, ज़्यादा चूं-चपड़ की तो पुलिस और ज़्यादा लठियाएगी।

मैं रात भर लॉक-अप में बंद रहा। तीन राउंड जमकर पीटा गया। बार-बार एक प्रश्न कि, 'बता साले औरत को करंट लगाकर क्यों मारा?' मैं उनसे क्या कहता कि, सालों छब्बी को नहीं, असली करंट तो तुम सबने मुझ पर छब्बी की हत्या का आरोप लगा कर लगाया है। जो मेरी और मैं जिसका प्राण बन चुके थे, इस अनजान अंतःहीन दुनिया में, उसको मैं कैसे मार सकता हूं।

मैंने हाथ जोड़-जोड़ कर बताना चाहा लेकिन सुना तब गया, जब तीन बार लाठी मार-मार कर हड्डी-पसली एक कर दी गई। और सुनने के बाद मुझसे कुछ नहीं कहा गया कि अब मेरे साथ क्या होगा। मैं लॉक-अप में घोर असमंजस में सांस लेता दर्द से कराहता पड़ा रहा। पानी तक डर के मारे नहीं मांगा।

प्यास से हलक सूखता रहा लेकिन हिम्मत नहीं कर सका। सुबह होते ही मुझे यह विश्वास हो चला था कि अब मेरी बाकी ज़िंदगी जेल में बीतेगी। अपनी प्यारी छब्बी की हत्या के आरोप में। मुझे लगा कि अब मैं टूट चुका हूं। अब मेरी मौत करीब है। तोंदियल ने जो बताया था कि कई नौकरों का पता ही नहीं चला कि वो गए कहां? अब उन्हीं में मेरा भी एक नाम जुड़ने जा रहा है। छब्बी और मैंने सुन्दर हिडिम्बा से जो बगावत कर दी थी, उसका परिणाम चंद घंटों में सामने आ गया है।

वह छब्बी की बहस बर्दाश्त नहीं कर पाईं, क्योंकि उन्होंने रुकने की जगह, सारा सामान दिया था। उन्हें गुस्सा आई होगी कि खुद जा रही है, साथ मुझे भी ले जा रही है। ये कहावत चरित्रार्थ कर रही है कि, '' बाण तो बाण गए चार हाँथ पगहो ले गए।'' घर पर बाबू अकसर यह बोलते थे। समीना मैं सोच रहा था कि तोंदियल तो दुर्घटनावश करेंट से मरा। लेकिन छब्बी! मुझे पूरा यकीन था कि, छब्बी को करेंट लगाकर, तड़पा-तड़पा कर मारा गया। और मुझे मारने के लिए पुलिस के हवाले कर दिया गया। पुलिस को अपना गुडवर्क दिखाने के लिए एक माध्यम दे दिया गया।

वह मुझ निर्दोष को मार कर, कोई हथियार साथ में दिखा कर कहेगी कि, फलां माफिया का शॉर्प-शूटर एनकाउंटर में मारा गया। माफियाओं से भरे इस शहर में हर कोई आसानी से पुलिस की इस कहानी पर विश्वास कर लेगा। अंडरवर्ल्ड की दुनिया यहाँ ऐसे ही नहीं फलती-फूलती आ रही है। पुलिस का आधा सच आधा झूठ ही इन्हें खाद-पानी देता आ रहा है। अन्यथा यह पुलिस चाह जाए तो हफ्ते भर में लोगों के नाक में दम किये यह अंडरवर्ल्ड हमेशा के लिए समुद्र में समा जाए। लेकिन पुलिस के आधे सच-आधे झूठ का न डी.एन.ए.बदलने वाला है न हम जैसों की किस्मत।

समीना इसलिए तब मुझे अपनी मौत एकदम अपने सामने दिख रही थी। मौत के करीब होने का अहसास उस दिन मैं पहली बार कर रहा था। मुझे ऐसा लग रहा था जैसे कि मेरी जान हलक में अटकी पड़ी है। ना जाने कितने बरसों बाद मुझे पूरा परिवार, पूरा बड़वापुर, गोपीगंज, जंगीगंज सब ना सिर्फ़ याद आने लगे। बल्कि बड़वापुर छोड़ने के बाद यह पहला अवसर था, जब मेरे दिमाग में आया कि, किसी तरह घर संपर्क हो जाए, तो मेरी जान बच जाए। मेरे तीनों भाई जैसे भी होगा मुझे बचा लेंगे, फिर यहां से जितनी जल्दी हो सकेगा बड़वापुर वापस भाग जाऊँगा।

वहां पहुंचने के बाद दुबारा फिर कभी बड़वापुर के बाहर कदम नहीं रखूंगा। मगर कैसे करूं संपर्क? कोई नंबर नहीं था। दिमाग पर पूरा जोर लगाया लेकिन कुछ भी याद नहीं आया। उसके करीब भी नहीं पहुंच पाया। अंततः मैंने हार मान ली। छोड़ दिया अपने को किस्मत के हवाले। एनकाउंटर का इंतजार करने लगा। लेकिन वह भी लंबा खिंचने वाला था, क्योंकि अमूमन एनकाउंटर रात में ही करे जाते हैं। रात होने में काफी समय बाकी था।

समीना मैं इतना परेशान हो गया कि, अपने को मैंने एनकाउंटर से पहले ही मरा हुआ मान लिया था। पिटाई, भूख-प्यास से पस्त मैं लॉक-अप की जमीन पर पस्त पड़ था। बेहोशी की हालत थी। पीने को एक बूंद पानी नहीं। दिन में दोपहर के बाद एक आदमी जो पता नहीं कहां का था, वह मेरे लिए पानी, बड़ा-पाव लेकर आया।

मेरे लिए यह किसी आश्चर्य से कम नहीं था। देखते ही मैं खाने पर टूट पड़ा। खा-पीकर लगा कि, जैसे शरीर में प्राण लौट आए। मगर यह भी मन में आया कि, मौत से पहले यह दया की जा रही है कि, भूखों नहीं मारना। गुड-वर्क के लिए गोली से मारना जरूरी है। मैं अपने को फांसी की सजा पाए देश-द्रोही गद्दार अपराधी, हत्त्यारे से भी गया बीता पा रहा था। उन्हें कम से कम उनका अपराध तो बताया जाता है। उनकी अंतिम इच्छा तो पूछी जाती है। जब कि वो देश के साथ गद्दारी किये होते हैं, किसी न किसी की निर्मम हत्या किए हुए होते हैं। भयानक अपराध किए होते हैं।

यहां तो मैंने एक चींटी भी नहीं मारी है। उस आदमी से मैं कुछ पूछना चाहता था। लेकिन वह नाश्ता देकर ऐसा गया जैसे कोई घर का जूठन, हल्का सा दरवाजा खोलकर बाहर कुत्तों के लिए फेंकता है, फिर भड़ से दरवाजा बंद कर अंदर चला जाता है। वैसे ही वह चला गया। थाने के बाकी लोगों को देखकर तो मेरी आंखों के सामने अंधेरा ही छा जाता था तो मैं उनसे बात ही क्या करता।

थोड़ा सा वह बड़ा पाव खाकर भूख जैसे और ज़ोर मारने लगी थी। मगर लाठियों की चोट, मौत के भय ने भूख-प्यास कुछ देर में फिर खत्म कर दी। लेकिन समीना भूख भी क्या चीज है कि, मौत सामने दिख रही थी, फिर भी थोड़ी देर शांत रहने के बाद उसकी आग पुनः जल उठी, और बहुत तेज़। समीना उस हालत में पता नहीं क्यों मुझे बड़वापुर में बीता जीवन बहुत याद आ रहा था।

भूख पर ही तब अम्मा द्वारा कही जाने वाली यह बात याद आई। वह कहती थीं, '' पेट की आग ही के कारण तो है ई दुनिया और दुनिया का सारा मायाजाल, ई आग ना रहे तो काहे कोई कुछ करे। आदमी की लाश पड़ी रहती है, फिर भी ये आग ऐसी है कि ठंडी नहीं रह पाती।''

ऐसा वह अपनी एक मौसी की याद करके कहती थीं। उन्हें वह धिक्कारतीं, क्योंकि मौसा जब मरे, और तीन दिन भी नहीं बीता था कि, उन्होंने भर-पेट खाना खाया। हालांकि आंसू उनके निकलते रहे। तब अम्मा का मौसी को कोसना मुझे सही लगता था। लेकिन लॉक-अप में मुझे अम्मा की बात गलत और मौसी सही नजर आने लगीं। तब मुझे लगा कि, पेट की आग चिता की आग से कहीं ज़्यादा तेज़ है।

मैं इस जुगाड़ में लग गया कि, कोई मिले तो उससे हाथ-पैर जोड़ूं कि भईया भले चार लठ्ठ और मार लो। हज़ार गाली और दे लो, लेकिन खाना खिला दो। भले बाद में गर्दन उतार दो। जैसे कसाई एक दिन बकरे की गर्दन काटता है। मगर पहले तो उसे खिलाता-पिलाता ही है।

मगर किस्मत में ऐसा नहीं लिखा था। कुछ नहीं हुआ। एक कर्मचारी दिखा, उसी से प्रार्थना की तो बदले में गाली मिली। तब मुझे घर का हर सदस्य और ज्यादा याद आया। जिसे मैं बरसों पहले बस यूं ही हवा में उड़ाता चला आया था, इस नगरी की माया में उलझकर। मैं सोच रहा था कि, पूरा परिवार ही थाने में आ जुटे, लेकिन मेरे करीब मौत आती रही। रात के आठ बज गए। थाने में लोगों का आना-जाना और बढ़ गया।

लॉक-अप दरवाजे से थानेदार और उसके आस-पास बैठे लोगों को आसानी से देखा जा सकता था। मैं बराबर उन पर नजर रखने की कोशिश कर रहा था। सब मुझे एनकाउंटर की तैयारी करते दिख रहे थे। लेकिन रात नौ बजे फिर एक आश्चर्यजनक बात हुई। वही, दिन वाला मनहूस आदमी एक बड़े कागज़ में आलू की सूखी सब्जी, आठ-नौ रोटियां दे गया। खाना उसके हिसाब से ज़्यादा रहा होगा, लेकिन मेरे लिए बस काम भर का था। पानी की एक बोतल भी। जाते-जाते वह भौंक कर गया। उसकी बातों से उस हाल में भी मेरा खून खौल गया। मगर विवश था। इसलिए उसे मन ही मन मां-बहन की ढेरों गालियां देकर ऊपर से शांत रहा। लेकिन खाने पर ऐसे टूट पड़ा कि, मानों मैं उसी मनहूस को अपने दांतों तले कूंच रहा हूं।

दो-तीन रोटी ही खा पाया था कि, मुझे थानेदार के सामने वाली कुर्सी पर, साहब का एक खास आदमी बैठा दिखाई दे गया। शायद उसी ने खाना भिजवाया था। मैं समझ गया कि सब तैयारी हो गई है। आखिरी खाना खिलाया जा रहा है। साहब ने अपना कुत्ता भेजा है कि काम में कहीं कोई खामी ना रह जाए। उस आदमी को मैंने तब देखा था, जब साहब के यहां काम करता था।

वह आदमी पांच मिनट बात करके चला गया। इस दौरान मुंह में जो निवाला था, वह भी खत्म नहीं कर सका। आदमी के जाने के बाद वह खाली कुर्सी ऐसी लग रही थी, जैसे कि मेरी मौत वहां बैठी है, मेरा इंतजार कर रही है। मेरे बाहर निकलते ही मुझे लेकर चल देगी यमराज के पास। मेरी आंखों में आंसू भर आये थे। खाने का अगला निवाला मैं मुंह में नहीं रख पाया। उसे मैंने कागज़ में फिर से लपेट दिया। दो घूंटे पानी मुश्किल से पी पाया।

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