कोट - ११ महेश रौतेला द्वारा उपन्यास प्रकरण में हिंदी पीडीएफ

कोट - ११

कोट-११

कलम विद्यालय का चित्र खींच रही थी। छोटा विद्यालय फिर बड़ा विद्यालय। पचास साल के बाद अपनी स्मृतियों की गठरी लिये, एक पूर्व वरिष्ठ प्रोफेसर अपने राजकीय विद्यालय में जाना चाहती हैं,कुछ क्षण अतीत में बिताने। क्या पता वहाँ शान्ति और सुकून मिले! कोविड-१९ के कारण विद्यालय बन्द है। वह विद्यालय के प्रधानाचार्या से अनुरोध करती हैं और वह अनुरोध मान कर स्कूल खुलवा देती हैं। प्रेषित फोटो के साथ वह अपने राजनैतिक विचारों के साथ कक्षा में बैठी एक फोटो भी भेजती हैं सोशियल मीडिया पर। टिप्पणियां में कहा गया है विद्यालय के रंगों में साम्य नहीं है। स्कूल का फर्नीचर ठुलमुल तथा साधरण है। विद्यालय की आर्थिक स्थिति कमजोर लगती है। लेकिन फोटो जो कक्षा में बैठ कर खिंचाई है वह अतीत की रेखाओं से भरी लगती है। तब वह चुलबुली, मुस्कराती यहाँ बैठा करती थी। श्यामपट पर आँखें बैठी ज्ञान बटोरा करती थीं। उसकी गहरी सांसों में वह चुलबुला बचपन दौड़ रहा था।आत्मा और मन वहाँ बैठने की चाह में सजीव हो उठा था। यही सब उनको वहाँ खींच लाया था। वह अपने बचपन को ढूंढने वहाँ आयी थी,राजनैतिक टीका टिप्पणी केवल बाहरी आवरण मात्र था। हम एक बड़े संघर्ष और युद्ध के बाद अन्त में शान्ति ही चाहते हैं। निखर आता है बचपन मन में बार-बार, सैकड़ों बार। मैं अपने कोट को देखता हूँ और नैनीताल के उबड़-खाबड़ और सपाट रास्तों से स्मृतियों को कुरेदने लगता हूँ। लग रहा है जैसे बैठा हूँ गुनगुनी धूप में। आकाश में कुछ बादल लटके हैं। अपनी प्रयोगात्मक कापी में लिख रहा हूँ जो प्रयोग प्रयोगशाला में किये थे। प्रयोग का उद्देश्य क्या है? विधि क्या है? और परिणाम क्या है? बिल्कुल जीवन की तरह। समाचार मिलता है, "नैनीताल में एक विशेष वनस्पति ऐसी उग आयी है जो नैनीताल और नैनीताल झील का विनाश कर देगी।" वैसे भी झील ही नैनीताल की जीवन रेखा है। साइंटिफिक पेपर वनस्पति विज्ञानी द्वारा एक अन्तर्राष्ट्रीय पत्रिका में छापा गया था। लोगों के मन में शंकायें घर करने लगी थीं। यह सन सत्तर के आसपास की बात है।आज हिन्दी के पूर्व प्रोफेसर और लेखक महोदय द्वारा इसका उल्लेख सोशियल मीडिया पर पढ़ा तो उन दिनों की कनाफूसी स्मृतियों को खोरोंचने लगी।
अपने परिचित से बात की तो उन्होंने कहा उस समय अखबारों में भी जोर- शोर से इसकी चर्चा हुयी थी।और यह उन्नीस सौ सत्तर के दशक की बात है और इसे विनाशकारी पौधे की संज्ञा दी गयी थी,अखबारों ने। आमतौर पर हम पढ़ते हैं कि पौधे या पादप पर्यावरण के लिए वरदान होते हैं लेकिन यह सिद्धांत वनस्पति विज्ञान के किस नियम पर प्रतिपादित हुआ,पता नहीं। बाद में सत्य और यथार्थ यह निकला कि नैनीताल अपनी जगह स्थिर है और सम्पूर्ण रूप से जगमगा रहा है। विनाशकारी पौधा कहीं दुबक गया या परिकल्पना त्रुटिपूर्ण,पता नहीं!
लेख गलत सिद्ध हुआ इसीलिए तो लिखने का मन हो रहा है-
"प्यार अद्भुत होता है
न आराम से खाने देता है,
न आराम से चलने देता है
न आराम से रहने देता है।

प्यार अनोखा होता है
न आराम से बैठने देता है,
न आराम से सोने देता है
न आराम से उठने देता है।"

( क्रमशः)

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महेश रौतेला

महेश रौतेला मातृभारती सत्यापित 7 महीना पहले