मीना कुमारी...एक दर्द भरी दास्तां - 1 Sarvesh Saxena द्वारा सामाजिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

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मीना कुमारी...एक दर्द भरी दास्तां - 1

"इन्हीं लोगों ने.. इन्हीं लोगों ने..
इन्हीं लोगों ने ले लीना.. दुपट्टा मेरा"

दोस्तों शायद ही ऐसा कोई हो जिसने इस गाने को नहीं सुना होगा और इस गाने को सुनते ही आंखों के सामने उभर आता है एक सुंदर सा चेहरा, बड़ी बड़ी आंखें और दबी मुस्कान, मानो हजारों गम छुपाकर भी होंठ मुस्कुरा उठते हों और आवाज ऐसी जैसे कोई दर्द भरी नज़्म पढ़ रहा हो |

जी हां हम बात कर रहे हैं मीना कुमारी की, वो मीना कुमारी जिन्होंने हिंदी सिनेमा को बेमिसाल फिल्में दी और फिल्मी पर्दे पर दर्द, दुख और पीड़ा को इस कदर बयान किया जैसे मानो वह फिल्मों में अपनी ही कोई दास्तान सुना रही हो |

मीना कुमारी ने वैसे तो बहुत फिल्में की लेकिन ज्यादातर फिल्मों में उन्हें दुखी और लाचार औरत के किरदार ही मिले जिसके कारण उन्हें ट्रेजडी क्वीन का खिताब भी मिल गया था और उनकी असल जिंदगी भी कुछ उनकी फिल्मों की तरह ही मिलती-जुलती थी |


मीना कुमारी के बारे में बात करने से पहले जान लेते हैं की क्या कहानी थी मीनाकुमारी के माता-पिता की |


गुरुदेव रविंद्र नाथ टैगोर के खानदान की एक लड़की जिसकी बचपन में ही शादी हो गई थी लेकिन अफसोस बाल विवाह के बाद ही वह विधवा हो गई और वह बाल विधवा कोई और नहीं बल्कि गुरुदेव रविंद्र नाथ टैगोर के भाई सुकमा ठाकुर की बेटी थी |

उस बाल विधवा ने बड़े होकर इसका विरोध किया तो लोगों ने उसे समाज, रीति रिवाज और धर्म का उलाहना दिया | इसके बाद उस बाल विधवा ने ईसाई धर्म अपना लिया और मेरठ चली गई और शादी कर ली इसके बाद इनकी एक बेटी हुई जिसका नाम था प्रभावती जो बहुत अच्छा गाती थी और कला के प्रति जिसका काफी लगाव था, हालात तंग थे इस वजह से काम की तलाश में प्रभावती मुंबई जाकर रहने लगी, जहां प्रभावती की मुलाकात संगीतकार अली बख्श से हो गई और इत्तेफाक से दोनों में प्यार हो गया और दोनों ने प्रेम विवाह कर लिया |

शादी के बाद उनका नाम प्रभावती से बदलकर इक़बाल बानो रख दिया गया | दोनों अपना जीवन गुजारने के लिए काम करते उन दिनों उनकी ठीक-ठाक कमाई हो जाती |

इसके बाद घर में एक बेटी हुई जिसका नाम खुर्शीद रखा गया, बेटी के बाद अलीबक्श चाहते थे कि उनका बेटा हो लेकिन दूसरी औलाद भी बेटी ही पैदा हुई जिसका नाम मधु रखा गया |

इस बात से अलीबक्श बहुत दुखी हुए और वह अल्लाह से दुआ करने लगे कि इस बार उनको बेटा ही दे और वो दिन आ गया जब प्रभावती यानी इकबाल बानो तीसरी बार माँ बनी, अलीबक्श को उम्मीद थी कि इस बार उनके घर में बैठा ही जन्म लेगा लेकिन 1 अगस्त 1932 को एक नर्सिंग होम में जब नर्स ने उनको बताया कि उनकी पत्नी ने बेटी को जन्म दिया है तो इससे अली बख्श नाराज हो गए और उन्होंने फैसला कर लिया कि वह इस बेटी को घर नहीं ले जाएंगे हालांकि इक़बाल बानो ने बहुत जिद की लेकिन अली बक्श नहीं माने |



चांद सी खूबसूरत यह बच्ची मासूम मुस्कुराहट के साथ किसी का भी दिल पिघला देती लेकिन अलीबक्श अपने फैसले पर कायम रहे और इस बच्ची को मदरसे की सीढ़ियों पर छोड़ा आए लेकिन छोड़कर जैसे ही मुड़े बच्ची तेज तेज रोने लगी, अली बख्श के कदम आगे बढ़ते रहें और बच्ची की चीखें और तेज होती रहीं |

कुछ कदम और चलने के बाद आखिरकार बाप का दिल पिघल ही गया और उन्होंने दौड़कर इस बच्ची को गले से लगा लिया तो देखा उसके बदन पर न जाने कितनी ही चीटियां चिपकी हुई थी यह देखकर उनकी आंखों में आंसू आ गए और उन्होंने खुदा से माफी मांगी और फैसला कर लिया कि तंग हालातों में भी वह इस बच्ची को अपने घर ले जाएंगे और परवरिश करेंगे |

इक़बाल बानो ने इस बच्ची का नाम मेहजबीन बानो रखा |