बंसी की तान Saroj Verma द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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बंसी की तान

बुंदेलखंड का छोटा सा गांव__सब तरफ हरियाली ही हरियाली छाई है,बरखा ऋतु भी मेहरबान है,सब तरफ काली काली बदरिया छाई हुई है, बरखा ऋतु की धीमी धीमी फुहार और उस पर सावन का महीना, कहीं तो नाचते हुए मोरों की ध्वनि, तो कहीं से बादलों की गड़गड़ाहट की आवाज, बहुत लुभावना और मनमोहक दृश्य है।

गांव भर में कजली मेले की धूम मची है,जिसको देखो वही अपनी अपनी बैलगाड़ी में सवार होकर,कजली मेले में जा रहा है।
उसी गांव में एक पेड़ के नीचे एक आठ-नौ साल का लड़का बांसुरी बजा रहा है तभी उसके पास एक लड़की गुस्सा करते हुए आती है और बोलती है___
" सूरज,आज फिर तुमने ये धुन बजाई, तुम्हें पता है कि ये धुन मुझे बहुत पसंद हैं और मैं सुने बिना नहीं रह सकती,लो आ गई मैं सारा काम-काज छोड़कर तुम्हारी वजह से,लो सुनती हूं तुम्हारी बांसुरी",किरन बोली।
ये सुन, अकड़ किसको दिखाती है, तेरी वज़ह से तो क्या मैं बांसुरी बजाना छोड़ दूं, चुड़ैल कहीं की,काम करने का खुद का मन नहीं होगा,इल्जाम मेरे ऊपर लगाती है,सूरज बोला।
ए,सुन बहुत घमंड है रे! तुझे अपनी मधुर धुनों पर, अपने आपको क्या समझता है !तू मुरली मनोहर है,जो गांव भर की सारी लड़कियां तेरी बांसुरी सुनकर दौड़ी आएगी,किरन गुस्से से बोली।
हां... हां...आई बड़ी,जा री जा, तेरे जैसे बहुत देखे हैं,सूरज बोला।
हां.. हां..जाती हूं.... जाती हूं, मुझे कोई शौक नहीं तुझसे उलझनें का,जब देखो चिल्लाता रहता है,बेरी का पेड़ कहीं का, कांटों वाला,
इतना कहकर किरन चली गई।
सूरज ने भी बांसुरी बजाना बंद कर दिया,किरन का जाना उसे भी अच्छा नहीं लगा।
किरन उसकी बचपन की दोस्त हैं, दोनों हम उम्र है और साथ साथ बड़े हुए हैं, दोनों बहुत झगड़ते हैं एक-दूसरे से ,लेकिन अलग भी नहीं रह सकते, एक-दूसरे के बिना।
सूरज घर लौट आया, उसे बहुत गुस्सा आ रहा था,एक तो किरन इतनी देर में आई और ऊपर से झगड़ कर चली गई, थोड़ी देर बात भी नहीं की।
तभी,सूरज का छोटा भाई,सोहन आया, बोला भइया सब लोग कजली मेला देखने जा रहे हैं,हम भी बाबू जी से कहकर कल चले।
सूरज बोला,तू जो ठीक समझें, अभी मेरा मन बहुत खराब है, मुझसे बात मत कर!!
भइया दो दिन के बाद मेला खतम हो जाएगा।
सोहन बोला, मां बाबूजी से कहो ना कि हम सब मेला चले कल!!
फुलमत बोली, ठीक है उनके आने पर बात करती हूं।
शाम का समय और बरसात का मौसम,आज दिनभर फुहार पड़ती रही,फुलमत आंगन गीला होने की वजह से कोठे में ही चूल्हा रखकर खाना बना रही है, लकड़ियां हल्की गीली गीली सी है, इसलिए ठीक से नहीं जल रही है,कोठे में लालटेन की हल्की हल्की रोशनी है।
सब्जी छौंककर,फुलमत उठी और सूरज से बोली,सब्जी चढ़ी है,जरा देखना, मैं देखकर आती हूं कि सारे जानवर ठीक है,गोबर उठा आती हूं,कण्डे का धुआं करके आती हूं ताकि मच्छर ना लगे और एक तो बारिश थोड़ी देर के लिए भी बादल दम नहीं ले रहा है और ना कपड़े सूख पा रहे हैं यही बड़बड़ाते हुए वो चली गई।
थोड़ी देर में फुलमत जानवरों को देखकर आ गई,गीले कपड़े उसने बरामदे में सूखने डाले और फिर चूल्हे के पास आ गई।
सूरज से पूछा, तूने सब्जी देखी__
सूरज बोला, नहीं मां, मैं भूल गया__
आज क्या हुआ तुझे, बड़ा उखड़ा उखड़ा है रे!फुलमत ने पूछा।
कुछ नहीं मां, ऐसे ही,सूरज बोला।
नहीं बताना चाहता तो मत बता, तेरी मर्ज़ी,फुलमत बोली।
नहीं मां,ऐसी कोई बात नहीं है, वैसे आज सब्जी क्या बनी है,सूरज ने फुलमत से पूछा।।
अरे,क्या बनाऊं, महीने भर से बरसात नहीं रूक रही हैं, सब्जियां तो जैसे देखने को नहीं मिल रही है,सुबह दाल बनाई थी और जो जेठ मास में मूंग दाल की बड़ियां बनाई थी उसी के लिए तो सिलबट्टे पर मसाला पीस रही थी,सूखी मिर्च भी गीली गीली सी हो गई है बरसात में, तो पीसने में बहुत समय लगा, वहीं बड़ियां ढेर सारी प्याज डाल कर बनाई है,फुलमत बोली।
अरे, मूंग की बड़ियां बनाई है,ये तो किरन को बहुत पसंद हैं, मैं उसको थोड़ी सी देकर आऊंगा,जब सब्जी बन जाए तो मुझे बता दें ना,सूरज बोला।
हां,बता दूंगी,दे आना किरन को सब्जी,फुलमत बोली।।
तभी घनश्याम लाल यादव घर आ गये, उन्होंने अपना छाता सूखने बरामदे में रखा और छोटे से गुसलखाने में जाकर पैर धोकर अंदर आए और फुलमत से बोले अरे सुनती हो,सूखे कपड़े देना,ये तो बिल्कुल भीग चुके हैं।
हां, अभी लाई,फुलमत ने आवाज दी और सूखे कपड़े घनश्याम लाल जी को देने पहुंच गई।
तभी सोहन आया, बोला बाबूजी,कल मेला देखने चले!!
घनश्याम लाल बोले हां,चल सकते हैं अगर कल बरसात ना हुई, क्योंकि मेला तो नदिया पार लगा है और नदिया का पुल बहुत कमजोर हो गया है एक साथ इतनी सारी बैलगाड़ी निकल रही है ऊपर से नदिया भी पूरे उफ़ान पर है।
ठीक है बाबूजी,सोहन बहुत खुश हुआ, घनश्याम लाल जी की बात सुनकर।।
घनश्याम लाल यादव ने कुछ भैंस और गाय पाल रखी है,उनका घी,दूध बेचते हैं और कुछ खेती बाड़ी भी है तो कुल मिलाकर अच्छी तरह गुजर बसर हो रही है।
तभी फुलमत बोली,चलो सब लोग बैठो, खाना खाने, खाना लगा दिया है और फुलमत ने रोटी सेंकना शुरू कर दिया,
तभी सूरज बोला, मां सब्ज़ी बन गई तो मैं थोड़ी सी किरन को देकर आता हूं।
हां,बन तो गई है लेकिन बरसात हो रही है, ऐसे में कहां जाएगा,फुलमत बोली।
मां मैं चला, जाऊंगा,सूरज बोला।
मां ने एक कटोरी में सब्जी परोस दी और ऊपर से ढक्कन ढककर, देती हुई बोली,ले दे आ किरन को।।
तभी किवाड़ को खटखटाने की आवाज सुनाई दी।।
जैसे ही फुलमत ने किवाड़ खोले, सामने किरन थी_
किरन बोली, चाची, मां ने बेसन गट्टे की सब्जी भेजी है,सूरज को बहुत पसंद हैं ना!!
इतनी बरसात में तू क्यो आई बेटी,फुलमत बोली।।
चाची ऐसे ही, वैसे सूरज कहां है,अब तक मुंह फुलाकर बैठा है क्या?
तू आ गई, चुड़ैल, तभी सूरज ने कहा।।
हां,तुम्हारा खून पीने आई हूं,ऐसी बरसात में मैं तुम्हारे लिए बेसनगट्टे की सब्जी लेकर आई हूं और तू मुझे अकड़ दिखा रहा है।
अरे,बस बस..... क्या तुम लोग हमेशा झगड़ते ही रहोगे ,फुलमत बोली।।
चाची देख लो, मैं इतने प्यार से, इतनी रात को बरसात में भीगते हुए ,इसकी पसंद की सब्जी देने आई और ये अकड़ दिखा रहा है,किरन बोली।
अरे, बेटी ये तो है ही ऐसा,इसकी बात का क्या बुरा मानना,फुलमत बोली।।
अच्छा ठीक है, चाची मैं चलती हूं,किरन बोली।।
अरे, रूक जा री!! अब आ गई है तो खाना खाकर जा,तेरी पसंद की सब्जी बनाई है,फुलमत बोली।।
ठीक है, चाची, इतना कहकर किरन रूक गई,
खाना खाते वक्त भी सूरज और किरन ने आपस में बात नहीं की,बस दोनों एक-दूसरे को गुस्से से देख रहे थे।
सबने खाना खाया, फिर फुलमत बोली,चल मैं तुझे पहुंचा आती हूं और फुलमत छाता और लालटेन लेकर किरन को भेजने उसके घर चल पड़ती है.......
इधर सूरज गुस्से से आग-बबूला हो रहा था, मुझसे भी तो कह सकती थी कि तू छोड़ने चल,अब मिलेगी तब बताऊंगा, चुड़ैल को।

फुलमत,किरन को लेकर उसके घर पहुंची और किवाड़ खटखटाए_
किरन की मां शांति, किवाड़ खोलते हुए बोली,अरे जीजी तुमने काहे,कष्ट किया, मैंने तो किरन से मना किया था कि मत जा रात को...
कहने लगी,बेसन गट्टे की सब्जी सूरज को बहुत पसंद हैं, उसके लिए लेकर जाऊंगी, शांति बोली।
अरे,बच्चे हैं,जिद तो करेंगे ही......,फुलमत बोली।।
हां, मैंने भी मूंग की बड़ियां बनाई थी, रोज़ रोज़ क्या बनाऊं,मरी बरसात एक महीने से रुक नहीं रही है, सब्जियां तो देखने को तरस गये है और जो खेतों में थी वो भी बरसात की वजह से सड़ गई है,वो तो गेहूं जेठ मास में धोकर सुखा लिया था तो चल रहा है नहीं तो बहुत परेशानी हो जाती।
अच्छा अब मैं चलती हूं, शांति,फुलमत इतना कहकर जाने लगी।
अरे, जीजी यहां तक आ ही गई हो तो, खाना खाकर जाओ, शांति बोली__
नहीं री, खाना खाकर आई हूं और किरन को भी खिला दिया है,अब चलती हूं।।फुलमत बोली।
किरन की मां शांति, वैसे तो फुलमत की हमउम्र है लेकिन घनश्याम लाल यादव,सूरज के पिता जी,किरन के पिता जी दीनदयाल यादव जो कि गांव के स्कूल में अध्यापक है उनसे उम्र में बड़े हैं इसलिए शांति बड़प्पन का लिहाज रखते हुए,सूरज की मां को जीजी बुलाती है
और फुलमत घर आ गई!!
घर आकर सूरज से बोली,क्यो रे! तू इतना क्यो लडता है किरन से, तेरी लिए इतनी बरसात और अंधेरे में सब्जी लेकर आई, और एक तू!!
मैं भी सब्जी देने ही जा रहा था,वो ही पहले आ गई तो मैं क्या करूं!!
अच्छा.... अच्छा....चल ,अब ज्यादा गुस्सा मत कर,चल सो जा,फुलमत बोली।।
मां कहानी सुनाओ ना,सोहन बोला।।
हां... हां... सुनाती हूं,पहले बिस्तर तो बिछा लूं,फुलमत बोली।।
सबकी चारपाई कोठे में अगल-बगल बिछ गई और सब लेट गये।
सूरज और सोहन मां की कहानी सुनते सुनते सो गये।
सुबह हुई,आज आसमान थोड़ा साफ लग रहा था__
घर के पीछे लगे, बबूल के पेड़ से चढ़कर मोर घर की खपरैल पर आकर इयू...इयू ..की आवाज निकाल रहे हैं,
आज जानवरों को बाहर पेड़ के नीचे खुली हवा में बांधा गया और उनके ऊपर कौऐ आकर बैठ रहे हैं, बरसात का समय है तो जानवरों को मक्खियां भी लग रही है, बेचारे जानवर रात में मच्छर और दिन में मक्खियां, कभी चैन नहीं है।
फुलमत ने आज चूल्हा बाहर आंगन में ही रख लिया है,धुंए की सोंधी सोंधी खुशबू आ रही हैं,आज फुलमत ने चने की दाल बनाई है, उसमें खूब सारे देशी घी, खड़ी लाल मिर्च और हींग का बघार लगाया तो सारे घर में बघार की खुशबू फैल गई और फिर उसने चावल धोकर चढ़ा दिए और सिलबट्टे पर खड़ी लाल मिर्च और लहसुन की चटनी पीसने लगी, तभी घनश्याम लाल जी कुएं से नहाकर आए और बोले, मैं मंदिर जा रहा हूं पूजा करने, खाना तैयार है ना , पूजा करके आता हूं, खाना खाकर बाहर जाना है, कुछ जरूरी काम है,आज मौसम साफ लग रहा है तो काम निपटा ही आता हूं।
तभी सोहन आया और बोला, लेकिन बाबूजी आपने तो मेला ले चलने को कहा था,
बेटा, अभी तो मेले के लिए एक दिन बाकी हैं,कल चलते हैं,आज मैं अपना काम निपटा कर आता हूं।
ठीक है बाबूजी,सोहन ने अनमने मन से कहा।
पूजा करके घनश्याम लाल जी आए,फुलमत ने खाना परोस दिया,चने की दाल, लहसुन की चटनी,कटे हुए प्याज साथ में आम का अचार और गरम-गरम रोटियों में ढेर सारा घी चुपड़ कर दे रही है, तभी सूरज और सोहन भी नहा कर आ जाते हैं,फुलमत बोली चलो तुम लोग भी खाना खा लो और स्कूल जाओ,आज मौसम साफ है, दोनों बच्चे बोले, ठीक है मां।
वो दोनो भी खाना खाने बैठ गये, तभी किरन अपनी छोटी बहन बेला के साथ आ गई, दोनों ने चाचा-चाची को नमस्ते किया और बोली,तुम लोग अभी तैयार नहीं हुए स्कूल के लिए,देखो हम लोग तो तैयार होकर आ गये,स्कूल जाने के लिए।
फुलमत बोली,किरन और बेला खाना खाओगी!!
किरन बोली, नहीं चाची,हम खाकर आए हैं!!
अच्छा तो आज क्या खाया,फुलमत ने पूछा।।
बस, चाची आज मां ने कढी-पकौड़ी बनाई है वहीं खा के आए हैं। बहुत अच्छी बात है,मैं भी कल बनाऊंगी,दही जमा दिया है,तुम लोगों के जाने के बाद सारा काम समेटकर चकरी में बेसन पीसूंगी, कढ़ी के लिए,फुलमत बोली।
और सब खाना खाकर निकल पड़े, अपने अपने काम पर,
सूरज और किरन, थोड़ी देर में एक-दूसरे से बात करने लगे__
सूरज बोला,क्यो तू कल रात को बोल नहीं सकती थी कि मुझे घर छोड़ आओ!!
लेकिन तू भी तो छोड़ने आ सकता था,किरन बोली।
सोहन और बेला बोले ,अब तुमलोग झगड़ते ही रहोगे,चलो दोस्ती करो, और सब हंस पड़े।
कल हम मेले जायेंगे,सोहन बेला से बोला।।
बेला बोली, मुझे और जीजी को भी ले चलोगे!!
सोहन बोला, हां क्यो नही।
सूरज बोला,तू भी चलेगी किरन!!
किरन बोली, हां, जहां सूरज वहां किरन, कहीं सूरज से किरन दूर हो सकती है भला।।
अच्छा चल तू अपनी बांसूरी निकाल और वही धुन बजा जो मुझे पसन्द हैं,किरन बोली।
और सूरज ने अपनी बांसुरी निकाली और बजाने लगा।
आज बरसात नहीं हुई,मौसम अच्छा रहा,सब जगह थोड़ी हवा लग गई, नहीं तो हर जगह सीलन ही सीलन आ गई थी।
दोपहर तक बच्चे भी स्कूल से आ गये, सबने खाना खाया और फिर खेलने में लग गए,
सूरज और सोहन घर लौट कर आए तो, देखा मां ,बड़े से घड़े में एक खम्भे के सहारे बड़ी सी मथानी से,खड़े होकर दही मथकर छाज बना रही हैं,
बच्चे बोले हम भी छाज पियेंगे मां,फुलमत बोली ठीक है, पहले मैं सब को बांट दू, औरतें सुबह से पूछ रही थी कि आज छाज बनाई है कि नहीं, फिर अपने लिए जो बच जाएगी तो पी लेना,सुबह की कढ़ी के लिए भी तो छाज बचानी है।
बच्चे बोले, ठीक है मां।
छाज बन जाने के बाद,फुलमत ने बच्चों से छाज सबके घरों में भिजवा दी, जिसने जिसने सुबह मांगी थी।
बाकी उसने सुबह की कढ़ी-पकौडी के लिए बचा ली और उसने बाकी छाज को एक छोटे से मिट्टी के मटके में डालकर थोड़ा नमक-मिर्च सिलबट्टे में पीसकर डालकर,एक छोटे दिए को चूल्हे में गरम किया और सरसों का तेल डालकर मैथी दाना,हींग और जीरा डालकर,छाज में बघार लगा दिया और बच्चों से बोली लो पी लो और थोड़ी छाज शांति चाची को भी दे आओ और पूछ लेना कि कल मेला चलोगी।
बच्चे छाज पीकर फिर चले गए,किरन के घर खेलने।।
शांति ने बच्चों से कहलवा दिया कि वो और मास्टर जी मेले नहीं जा पायेंगे क्योंकि मास्टर जी की स्कूल की छुट्टी नहीं है लेकिन किरन और बेला को भेज दूंगी।
दूसरे दिन, मौसम साफ था, बरसात के आसार कहीं से नहीं दिख रहे थे।
सब नये नये कपड़े पहन कर, मेलें में जाने के लिए तैयार हो गये, गांव के और परिवार भी मेला देखने जा रहे थे,कुल मिलाकर चार-पांच बैलगाड़ियां तैयार हो गई, सबने अपने लिए कुछ कुछ खाने को बांधा और निकल पड़े,मेला देखने।
आसमान साफ था,पंक्षी चहचहा रहे थे,पहाड़ों पर हरियाली ही हरियाली दिख रही थी, जमीन पर हरी हरी घास धूप से मखमली और चमकदार दिखाई दे रही थी,जगह जगह ताल-तलइया और पोखर भर हुए थे, जिनमें सारस अपने एक पैर से खड़े होकर अपने शिकार की ताक में थे, बैलगाड़ियां एक के पीछे एक चल रही थी,बैलों के गले में बंधी घण्टियां मधुर ध्वनि उत्पन्न कर रही थी।
और बैलगाड़ी अब नदिया के पुल तक पहुंच गई, तो घनश्याम लाल जी बोले, बैलगाड़ी धीरे धीरे, एक एक करके निकालो,पुल बहुत ही कमजोर हो गया, बहुत ही पुराना पुल है, सबने ऐसा ही किया।
बस बातों बातों में सब मेले पहुंच गये,सब बच्चे बहुत खुश थे, पहले सबने हिंडोला (चक्कर वाला झूला) झूला, फिर गरम गरम पकौड़ियां और जलेबियां खरीदी गई सबने खाई।
घनश्याम लाल जी सबकी नजरें बचाकर चुपके से फुलमत के लिए हरी हरी कांच की चूड़ियां खरीदी,फुलमत ये देखकर शरमा गई, घनश्याम लाल जी ने कुछ और पैसे फुलमत को दिए और बोले जा अपने लिए लाली और स्नू-पाउडर खरीद लें।
फुलमत बोली,ए जी कुछ तो लिहाज करो,बच्चे हैं साथ में।
सबने खूब मस्ती की, गुब्बारे खरीदे गए।
एक जगह गोदना गोदे जा रहे थे,फुलमत बोली,ए जी मुझे आपका नाम अपने हाथ में गुदवाना है, घनश्याम लाल जी बोले गुदवा लो, फुलमत बैठ गई गोदना गुदवाने,
तभी गोदना वाली बोली,क्या गुदवाना है?
फुलमत बोली,पति का नाम।।
पति का नाम बताओ, गोदना वाली बोली।।
तभी फुलमत शरमाते हुए बोली, सूरज अपने बाबूजी का नाम तो बोल दे बेटा।।
सूरज बोला, मां तुम्हे बाबूजी का नाम नहीं पता
पता है बेटा, लेकिन बोल नहीं सकती,फुलमत बोली।
तभी किरन ने नाम बता दिया, बोली बड़ा भाव खा रहा है
ये तू फिर मेरे बीच में बोली,सूरज बोला।
हां, बोलूंगी, किरन बोली।
और सूरज ने किरन को धक्का दे दिया और बोला चल हट यहां से
तभी फुलमत बोली, फिर झगड़ा किया तूने चल माफी मांग किरन से।
सूरज बोला, नहीं मांगूंगा और कभी बात भी नहीं करूंगा उससे।
तभी घनश्याम लाल जी आए और बोले,अरे सूरज और सोहन के हाथों में भी उनके नाम गुदवा दो।
फुलमत बोली , ठीक है
गोदना गुदवाते गुदवाते, पता नहीं बादल अचानक गिर आए,
घनश्याम लाल बोले,अब घर चलते हैं ऐसा ना हो कि बरसात होने लगे,
फुलमत बोली, हां सबको बुलाओ चलते हैं, वैसे भी दोपहर तो बीत गई है।
और सब अपनी अपनी बैलगाड़ियों में बैठ कर निकल पड़े घर की ओर, लेकिन सूरज सबके साथ नहीं बैठा क्योंकि उसकी किरन से लड़ाई जो हो गई थी वो किसी और की बैलगाड़ी में बैठ गया, लेकिन बरसात होने लगी और सावन का महीना है तो कब रूकेगी पता नहीं, थोड़ी देर में बादल एकदम काले काले हो गये और बरसात भी बहुत जोरों की होने लगी,अब बहुत मुश्किल हो रहा था बैलों के लिए आगे बढ़ना, ऊपर से नदिया का पुल कमजोर था, और नदी भी अपने उफान पर थी।
चारों बैलगाड़ी धीरे धीरे पुल पार करते हुए आगे बढ़ रही थी और पांचवीं सबसे पीछे थी उसमें सूरज बैठा था,एक एक करके सभी बैलगाड़ी पार हो गई लेकिन ये क्या,जब तक कुछ पता चलता आखिरी वाली बैलगाड़ी आ ही रही थी कि पुल टूट गया और बैलगाड़ी नदी में समा गई।।

बैलगाड़ी में चार सदस्य थे,दो बच्चे और दो बड़े__
नदिया में पानी का बहाव खतरे के निशान से ऊपर हो रहा था, धुआंधार बारिश हो रही थी, ऐसे काले काले बादल घिर आए थे कि ऐसा लग रहा था कि मानो रात हो गई है,
जैसे ही बैलगाड़ी नदिया में गिरी लोगों ने चिल्लाना शुरू कर दिया, लेकिन ऐसी मूसलाधार बरसात में कौन, कैसे, क्या करें? कुछ समझ नहीं आ रहा था, बरसात की आवाज ही इतनी तेज थी कि एक-दूसरे की आवाज सुनाई नहीं दे रही थी, ऊपर से रोना-धोना मच गया फिर कौन, किसकी सुध ले,__
नदिया में गिरते ही बैलगाड़ी ने एक दम जलसमाधि ले ली, घनश्याम लाल जी तड़प कर रह गये,फुलमत तो बस बस,रो रो कर पागल हुई जा रही थी, वो तो नदी के बहाव में अपने लाल को बचाने के लिए नदिया में बही जा रही थी लेकिन औरतों ने रोक लिया,वहां साथ में आई औरतें उसे गले से लगा कर सांत्वना दें रही थी, लेकिन मां का दिल ये कहां समझता है,वो तो बस ये जानता है कि मेरे बच्चे को कोई कष्ट ना हो और जिस का हंसता खेलता बच्चा मौत के मुंह में चला जाए और ये भी पता ना हो कि वो सही सलामत हो तो वो मां तो अधमरी हो जाती है,बस बिलख बिलखकर रोए जा रही थी,सूरज... सूरज... पुकार कर।
और घनश्याम लाल जी को समझ ही नहीं आ रहा था कि क्या करें,ना तो वो नदिया में कूद सकते थेक्योंकि फुलमत और सोहन को कोई सम्भालने वाला नहीं था,ना तो वे फुलमत से कह सकते थे कि रो मत,चुप हो जा और ना ही खुद रो पा रहे थे,एक बाप बहुत ही विवश था हालातों के सामने।
रातभर अफ़रा-तफ़री मची रही,आधे से ज्यादा गांव इकट्ठा हो गया था लेकिन बरसात ना रूक रही थी,आधी़ रात के बाद बरसात थोड़ी कम होने लगी ,लोगों को थोड़ी थोड़ी आशा बंध गई,सुबह होते होते बरसात पूरी तरह से रूक गई, उजाला होते ही सब से जैसे बन पड़ा ढूंढना शुरू किया, दोपहर तक उनमें से एक बुजुर्ग की लाश मिली,शाम तक एक और लाश मिली वो भी दूसरे बच्चे की और उनमें जो युवक था वो बच गया था, उसे एक लकड़ी का लट्ठा तैरता हुआ मिला गया था जिसके सहारे वो रात पर नदिया में तैरता रहा लेकिन सूरज का कुछ पता नहीं चला ना तो उसकी लाश मिली और ना जीवित शरीर,सब ढूंढ ढूंढ कर हार गये, नदी के दूसरे छोर तक भी गये, जिससे जिससे बन पड़ा वहीं खोजने में लगा था लेकिन तीन दिन बाद भी कुछ पता नहीं चला।
इस बात के लिए किरन खुद को कूसूरवार मान रही थी कि ना वो उससे लड़ती और ना सूरज दूसरी बैलगाड़ी में बैठता।।
लेकिन जिंदगी और मौत के खेल बहुत ही निराले हैं भइया,वो किसी का भी इंतजार नहीं करतीं, कहते हैं कि दुनिया में दो ही चीजें अटल है,जीवन और मृत्यु।
वो कहते है ना कि,"जाको राखे साइयां,मार सके ना कोय"!!
सूरज इसी तरह बहते बहते, नदी के किनारे बेहोश हालत में पड़ा था, उस गांव के मंदिर के पुजारी स्नान करने नदी पर गये और उन्हें सूरज बेहोशी की हालत में पड़ा मिला, उसके सर पर चोट लगी थी,शायद नदी के बहाव में किसी पत्थर से उसका सिर टकरा गया था, किनारे पर आने पर भी उसके सर से खून बह रहा था जो कि ताजा लग रहा था, पुजारी जी ने तुरंत आस पास के लोगों को आवाज दी क्योंकि पुजारी जी बहुत ही बूढ़े थे, उनके अकेले के बस में ना था बच्चे को उठाना।
लोग आए, पहले तो बच्चे के पेट से पानी निकाला गया फिर गांव के वैद्य को बुलाकर उपचार कराया गया,शाम तक बच्चे को होश आ गया, पुजारी जी बोले,अरे बेटा तू ठीक हो गया, तुरंत गरम गरम दूध दिया बच्चे को, बच्चे ने दूध पिया और इधर-उधर देखने लगा।
पुजारी जी ने उसका नाम पूछा, लेकिन बच्चे को कुछ याद ना आया, पुजारी जी बोले, बेटा तू अभी आराम कर,हम बाद में बात करते हैं, पुजारी जी लोगों से बताया कि सर में चोट ज्यादा गहरी लगने से बच्चा अपने अतीत को भूल गया है,मेरा अपना कोई ठिकाना नहीं है कि कब भगवान का बुलावा आ जाए,इस बच्चे की देखभाल कौन करेगा।
तभी भीड़ में से किसी ने कहा कि पुजारी जी आप अपने बेटे से बात क्यो नहीं करते? इस विषय में।।
मैं और उस नालायक से बात करूं,वो तो चोर है इसे भी वो चोर बना देगा, पुजारी जी बोले।।
लेकिन आपके बेटा-बहू के कोई संतान नहीं है,इतने साल हो गये शादी को,वो इसे अपना बेटा समझकर पालेंगे, वहां मौजूद लोगों में से फिर किसी ने कहा।।
इतने साल हो गए, वापस ही नहीं लौटा, मुझसे जी चुरा रहा है, अपनी शक्ल जो नहीं दिखाई जाती,चोर कही का,इस गांव से उस गांव में छिपता फिरता है, पुजारी जी बोले।
ऐसे ही दो-तीन महीने गुजर गए लेकिन बच्चे को कुछ भी याद ना आया, पुजारी जी ने कई बार कोशिश की कि बच्चे को कुछ याद आ जाए लेकिन नहीं, उसे कुछ याद नहीं आया।
फिर एक दिन कान्हा जी के मंदिर में सब लोगों को बुलाकर पुजारी जी ने बच्चे का नामकरण किया और उसका नाम मुरलीधर रख दिया,वो बोले मैं जब तक जीवित हू,बच्चा मेरे पास रहेगा।
ऐसे दिन बीत रहे थे एक दिन पुजारी जी का बेटा शंकर और बहू मालती लौट आए, पुजारी जी के पैर पकड़ माफी मांगी, बोला मैं अब सारे बुरे काम छोड़ दूंगा ‌।।
पुजारी जी मान गये,बोले लेकिन एक शर्त है इस बच्चे को अपनाना होगा, अगर बहु इसे अपना बेटा मानकर पालेंगी तभी इस घर में घुसने दूंगा नहीं तो इस घर में तुम लोगों के लिए कोई जगह नहीं है।
शंकर और मालती के पास पुजारी जी की शर्त मानने के अलावा कोई चारा नहीं था तो उन्होंने हां कर दी।
मालती के भी कोई संतान नहीं थी तो वो भी मुरली को अपने बच्चे की तरह पालने लगी।
पुजारी जी को भी लगने लगा था कि शंकर अब सुधर गया, इसलिए खेत और सब कुछ उसके नाम कर दिए,बोले अब उमर हो गई ,प्रभु की लीला निराली है,कब अपनों से दूर भेज दें।
मुरलीधर भी अब उसे अपना परिवार समझने लगा था, मालती भी उसे बड़े प्यार से रखती थी, मुरली सब कुछ भूल गया था लेकिन नहीं भूला था तो बांसुरी बजाना,जब वो कोई एक खास मनोहारी धुन जो उसे बहुत पसंद थी, अपनी बांसुरी पर बजाता तो उसकी आंखों से पता नहीं क्यों? आंसू बहने लगते, पता नहीं ऐसा क्या था,उस धुन में जिससे उसका मन द्रवित हो जाता।
ऐसे ही कुछ महीने और बीत गए,एक दिन कोई बड़ा साहूकार पुलिस को लेकर पुजारी जी के पास आया और बोला, कहां है आपका बेटा? आपको पता है कितनी बड़ी चोरी की है उसने, पहले मेरे यहां मुनीमगीरी करता था और मेरी गद्दी सम्भालता था, चोरी करने के बाद यहां छिपा बैठा है, बहुत दिनों बाद पकड़ में आया है,बुलाओ शंकर को कहां है?
पुजारी जी ने शंकर को आवाज दी, शंकर बाहर आया।।
पुजारी जी ने पूछा, इन्हें जानते हो।।
शंकर ने नजरें नीची करके, हां।।
तभी पुजारी जी ने जोर का थप्पड़, शंकर के गाल पर मारा और बोले, गिरफ्तार कर लीजिए इसे,
शंकर के हाथ में हथकड़ियां लगते ही, पुजारी जी को गहरा सदमा लगा, पहले तो सिर्फ़ वो उसकी करतूतें सुनते थे लेकिन आज देख भी ली, सारे गांव के सामने उसकी कलाइयों में हथकड़ियां लग गई, ये बात पुजारी जी को सहन नहीं हुई और उन्हें गहरा आघात लगा और उनकी हृदय गति रुक गई,शायद भगवान का बुलावा आ गया था।
उधर शंकर को पुलिस ले गई,इधर मुरलीधर ने पुजारी जी का अंतिम संस्कार किया।

शंकर को गबन करने के जुर्म में पांच साल की सजा हुई और साथ में जुर्माना भी भरना पड़ा और जुर्माना ना देने पर वही सजा दुगुनी हो सकती थी,तो माल्ती को मजबूरी में जमीन सस्ते में बेचनी पड़ी,अब सिवाय घर के उसके पास कुछ ना बचा था, कुछ जेवर थे बस।।
मालती, गुजर-बसर के लिए सिलाई का काम करने लगी और गांव में किसी के यहां ब्याह-शादी,भोज- भंडारा होता तो उसमें खाना बनाने का काम कर लेती, लेकिन बस गुजारा ही हो पाता था,जिसकी वजह से वो मुरली को स्कूल में ना डाल सकी।
लेकिन इन कामों से गुजर नहीं हो पा रही थी, मालती ने सोचा ये गहने किसी काम के नहीं है इनको बेचकर थोड़ी सी जमीन खरीद लेती हूं और उसनेे गहने बेचकर थोड़ी सी जमीन खरीद ली,अब बैलो के लिए पैसे कहां से आए, तो उसने खुद ही खेतों को जोतना शुरू कर दिया साथ में मुरली भी मदद करवा देता,निराई, गुड़ाई करके सब्जियां उगाना शुरू कर दिया, खेतों के बगल से नहर निकली थी खेती के लिए पानी की भी कोई परेशानी ना थी।
आषाढ़ मास चल रहा था, खेतों में भिंडी, करेले और तोरई की बेले छाई थी,हरी मिर्च भी लगा रखी थीं, सब्जियां अच्छी तरह फल-फूल रही थी, मालती और मुरली की मेहनत रंग लाई,अब इतना हो जाता था कि मालती, मुरली को स्कूल में डलवा सकती थी और मुरली स्कूल जाने लगा, मुरली ने पढ़ना शुरू कर दिया।
ऐसे ही दिन बीत रहे थे अब मुरली चौदह साल का हो गया था और आठवीं में पढ़ रहा था,पढ़ाई में होशियार था, मालती भी बहुत दुलार से रखती थी उसको,इन पांच सालों में मुरली को कभी ये अनुभव नहीं होने दिया कि वो उसकी मां नहीं है।
फिर एक दिन शंकर भी जेल से छूट कर आ गया लेकिन शंकर की आदतें नहीं बदली, उसने वापस आकर फिर से वही सब छोटी मोटी चोरियां शुरू कर दी, मालती ने बहुत समझाया कि वो ऐसा ना करें लेकिन वो नहीं माना।
आए दिन किसी ना किसी से छुपता फिरता,देर रात घर आता और खाना खाकर सो जाता फिर चुपके चुपके कहीं चला जाता,ये सब मालती के बर्दाश्त से बाहर होता जा रहा था और उसने एक दिन कह ही दिया शंकर से__
कि यहां मुफ़्त का खाने को नहीं मिलेगा, यहां रहना है तो कोई ना कोई काम करना पड़ेगा, मैं और मेरा बेटा इन पांच सालों में कैसे रहें तुम्हें क्या पता? तुमने तो जिंदगी भर गलत काम किए हैं लेकिन अब और नहीं, तुम्हारी वजह से सारी जमीन बिक गई और तुम्हारी वजह से ही पिता जी ने भी दम तोड़ा था,तुम ही सारी चीजों के जिम्मेदार हो कुछ गहने थे मेरे पास मेरे मां के दिए हुए जिन्हें बेचकर मैंने थोड़ी सी जमीन खरीद ली और हम मां बेटे ने इसमें सब्जियां लगाकर अपना गुज़ारा किया है लेकिन तुम नहीं समझोगे, तुम्हें हम लोगों के बारे में सोचने की फुर्सत कहां?
उस दिन के बाद शंकर ना जाने कहां चला गया, मालती खेतों में अकेले काम करती तो मुरली भी पहुंच जाता उसकी मदद को, मालती कहती, बेटा तू पढ़ तेरे इम्तिहान आने वाले हैं, लेकिन मुरली कहता मां थोड़ी देर करने दो फिर चला जाऊंगा,जब तक मैं करता हूं तुम पेड़ की छांव में आराम कर लो, मालती आंखों में आंसू छलक पड़ते कि पराया होकर भी इसके मन में कितना प्रेम है मेरे लिए, ये जिसका भी बेटा है उस मां के दिल पर क्या बीती होगी इसके खो जाने पर।
उधर किरन इतने सालों से उस घटना के लिए खुद को जिम्मेदार मानती है, उसे लगता था कि उसकी वजह से ये सब हुआ था,ना वो उस समय नाम बताती और ना सूरज उससे झगड़ा करके अलग बैलगाड़ी में बैठता।
सावन का महीना है,सब जगह झूले पड़े हैं सारी लड़कियां झूला झूल रही है लेकिन किरन उदास सी एक पत्थर पर बैठी सोच रही है कि काश सूरज यहां होता और वो अपनी मनपसंद धुन सुनती,साथ में झूला झूलती,क्यो चले गए सूरज मुझे अकेला छोड़कर,ये सोच कर उसकी आंखों से झर झर आंसू बहने लगते हैं।
तभी उसकी छोटी बहन बेला ने आकर पूछा, जीजी यहां क्या कर रही हो,चलो झूला झूलते हैं!!
तू जा बेला,मेरा जी नहीं कर रहा,तू जा के झूल,किरन बोली।।
ठीक है जीजी, मुझे पता है कि तुम सूरज भइया के बारे में सोच रही हो, अभी तक भूली नहीं हो उन्हें, है ना!!
हां,बेला पता नहीं उससे मेरा कौन सा नाता था जो इतने सालों बाद भी उसकी याद मेरे मन से ना हटी,किरन बोली।।
जब से सूरज गया था,किरन ऐसे ही अनमनी सी रहती थी,इतने सालों बाद भी वो सूरज को एक पल के लिए भी ना भूल पाई थी।
उधर मुरली जब भी एक धुन बजाता जो कि उसके दिल के बहुत करीब थी उसके बजाते ही उसके झर झर आंसू बहने लगते और इसका उसे पता ही नहीं था कि वो किसे याद करके रो रहा है।
इसी तरह दिन बीत रहे थे, एक दिन थोड़ा अंधेरा हो गया था, मां बेटे खेतों से लौट रहे थे, रास्ते में पता नहीं एक काला सांप सरसराते हुए निकला, मुरली बातों में मग्न था लेकिन मालती ने उसे देख लिया और मुरली को जैसे ही हटाया उसने मालती को डस लिया, मुरली ने तुरंत अपना गमछा मालती के पैर में बांध दिया और वैद्य जी के पास गोद में उठा कर लाया लेकिन मालती मौत से ना जीत सकीं।
वैद्य ने नब्ज देखकर ना में सिर हिला दिया, मुरली दहाड़े मारकर रो पड़ा, शंकर भी उस वक्त वहां नहीं था, मुरली ने ही मालती का अंतिम संस्कार किया,अब मुरली के पास अपना कहने के लिए कोई नहीं था और अब उसकी पढ़ाई छूट गई,वो अब बस खेतों में ही काम करने लगा,जैसा भी कच्चा -पक्का खाना बनाते बनता तो बनाता और खाकर सो जाता, मालती की खबर सुनकर शंकर वापस आ गया क्योंकि अब उसे कोई टोकने वाला नहीं था,उसका फिर से वही रवैया हो गया,कई कई दिन तक घर से गायब रहना।
कभी कभी महीनों नहीं आता अगर आता तो एक दो दिन रूककर चला जाता,ऊपर से जो बेचारे मुरली के पास पैसे होते लेकर चला जाता।
मुरली को भी ये लगता था कि अब सिवाय पिताजी के उसका कोई नहीं है,चाहे जैसा भी हो कहने के लिए बाप तो है और शंकर इसी बात का मुरली से फायदा उठाता था।
ऐसे ही समय बीतता गया अब मुरली बीस साल का हो गया था,
सावन का महीना फिर आ गया और इस महीने में मुरली को कष्ट का अनुभव होता था,वो बस अपनी बांसुरी लेकर पहाड़ पर चढ़ जाता, बकरियां चराता और बांसुरी बजाते बजाते एकाएक रो पड़ता।
साथ वाले लड़के कहते कि मुरली चल सावन का मेला लगा है देखने चलते हैं लेकिन वो मना कर देता,उसका मन नहीं करता।
उसके मन में रह रह कर तरंगें उठती कि ऐसा क्या है इस धुन में जो मेरी आंखों में आंसू दे जाती है ऐसे कौन से मेरे दिल के तार जुड़े हैं इस धुन से जिससे मेरे दिल में रह रह कर एक हूक सी उठती है,जब भी ये धुन बजाता हूं पता नहीं किस दुनिया में पहुंच जाता हूं।
उधर बेला बोली,चलो जीजी मेला देखने नहीं चलोगी ।।
नहीं बेला, मैं उस मनहूस नदिया के पास नहीं जाना चाहती,वो सूरज को खा गई, तबसे देखा नहीं चाची का क्या हाल है।।
बेला बोली, ठीक है जीजी और बेला चली गई।
सोहन अब शहर में पढ़ने लगा है, घनश्याम लाल जी और फुलमत बस गांव में रहते हैं,वो भी सूरज को अभी तक दिल नहीं निकाल पाए हैं, उन्हें भी सावन का महीना पसंद नहीं है।
फिर एक दिन बहुत ही बरसात हो रही थी,रात का समय था, मुरली खा-पीकर सोया ही था कि किसी ने जोर जोर से दरवाजा खटखटाया, मुरली ने दरवाजा खोला तो देखा शंकर आया है, उसने कहा बेटा कुछ रूपए है तो साथ ले लो हमें अभी यहां से भागना पड़ेगा , पुलिस मेरे पीछे पड़ी है।
, मुरली बोला लेकिन मैं ऐसा नहीं करूंगा,आप अपने कर्मों की सजा खुद भुगतो, मां भी बेचारी ऐसे ही चली गई आपने उनके साथ भी वही किया, मैं आपके पाप में भागीदार नहीं बनूंगा।
शंकर गुस्से से बोला,तो तू मेरी मदद नहीं करेगा।।
मुरली बोला नहीं!!
हां,तू अपना खून होता अगर मेरा बेटा होता तो तू मेरी मदद जरूर करता, मालती ने अपना समझकर तुझे पाल-पोस कर बड़ा किया और तू मेरे साथ ऐसा व्यवहार कर रहा है, शंकर बोला।
इतना सुनकर मुरली को बहुत धक्का लगा, उसने पूछा क्या ये सच है मैं आपका बेटा नहीं हूं!!
शंकर बोला हां,तू पिता जी को नदी के किनारे बेहोश पड़ा मिला था और तेरी तो यादाश्त भी जा चुकी थी।
मुरली की आंखों से आंसू टपकने लगे लेकिन उसे अपना फ़र्ज़ याद आया चाहे जो हो ये ही मेरे पिता है और मैं इनकी अवश्य मदद करूंगा और दोनों रातों-रात गांव छोड़कर चल दिए।

श्रावण मास था,रात का घना काला अंधेरा, चन्द्रमा भी दूर कहीं बादलों में छुपा बैठा था, पेड़ तो अंधेरे में वैसे भी भूतों की तरह डरावने लगते हैं,गीली मिट्टी में पैर सन गये थे और कीचड़ की वजह से धंसे जा रहे थे, तेजी से भागते भी नहीं बन पा रहा था,ऊपर से कहीं से सांपों की सरसराहट ,मेंढ़कों की टर्र टर्र, और झीगरों की झाय -झाय सुनाई दे रही थी, मुरली को डर लग रहा था क्योंकि उसे इतनी रात गये बाहर निकलने की आदत नहीं थी।
शंकर और मुरली पुलिस से बचने के लिए नदिया के तरफ गये, किसी की एक छोटी सी नौका नदिया किनारे बंधी थी शंकर ने खोली और मुरली से बोला,चलो बैठो।
दोनों नौका में बैठ अपनी पोटली लेकर बैठ गये और चप्पुओ से नौका खेने लगे,खेते खेते आधी रात हो गई लेकिन पता ही नहीं चल रहा था कि नौका किस दिशा में जा रही है,बस वे लोग नौका को खेते जा रहे थे,आधी रात से ज्यादा का समय हो गया था, कहीं कोई रोशनी नहीं,चारों तरफ घुप्प अंधेरा, नदी का पानी भी काला दिखाई दे रहा था, सिर्फ नदी में लहरों की और चप्पू खेने की ही आवाज सुनाई दे रही थी, थोड़ी में हल्की हल्की बूंदाबांदी होने लगी, मुरली ने अपने गले का गमछा शंकर को ओढ़ा दिया बोला आपके सर पर पानी नहीं पड़ेगा, फिर बूंदाबांदी रूक गई, मुरली बोला आप थोड़ी देर टिक कर झपकी लेलो मैं नौका खे लूंगा, शंकर नौका में टिक गया और आंखे बंद कर ली, थोड़ी देर में उसे झपकी आ गई।
नौका खेते खेते थोड़ा थोड़ा उजाला नजर आने लगा, पास में एक गांव दिखा लेकिन अभी उनकी नौका किनारे से बहुत दूर थी, मुरली ने नौका की दिशा उसी ओर मोड़ ली, नौका खेते खेते नदिया के किनारे पर ले जाकर नौका बांधी और शंकर को जगाकर बोला, पिताजी कोई गांव है,हम यहां ठहर सकते हैं।।
शंकर बोला तो चलो,जेल से तो यहां रहना अच्छा है, कोई ना कोई काम तो मिल ही जाएगा।
दोनों नदी के किनारे उतर कर, गांव में घुसे लेकिन मुरली को कुछ कुछ सब जाना पहचाना सा लग रहा था उसे लग रहा कि वो यहां पहले भी कभी आ चुका है।
तभी एक बुजुर्ग व्यक्ति दो भैंसों को ले जा रहे थे लेकिन अचानक कुत्ते भौंकने लगे तो भैंस उस व्यक्ति के हाथ से रस्सी छुड़ाकर भागी तो वह व्यक्ति गिर गया , मुरली ने तुरंत उस व्यक्ति को उठाकर पूछा,आपको कहीं चोट तो नहीं लगी और तुंरत भैंस की रस्सी पकड़ कर भैंस को भी ले आया।
उस बुजुर्ग व्यक्ति ने पूछा कि बेटा तुम्हारा नाम क्या है?
जी मुरली, उसने जवाब दिया।
किसके बेटे हो,उस बुजुर्ग ने पूछा।
जी,ये मेरे पिताजी है, उसने शंकर की ओर इशारा किया।
क्या काम करते हो, बुजुर्ग ने पूछा।।
जी,काम की तलाश में हूं, कहीं कोई काम मिल जाता है तो, मुरली ने कहा।
मेरे यहां बहुत से जानवर हैं, मैं घी दूध बेचता हूं,अब मेरी उमर हो चुकी है, बेटा शहर में पढ़ता है ये मैं अब अकेले नहीं सम्भाल सकता तो तुम मेरे यहां काम करने के इच्छुक हो, तो बताओ ,ये उन बुजुर्ग ने पूछा,ये बुजुर्ग और कोई नहीं घनश्याम लाल यादव थे।
मुरली को भी काम की जरूरत थी तो उसने हां बोल दिया।
मुरली बोला लेकिन चाचा जी, हमारे पास रहने का कोई ठिकाना नहीं है, पहले हमे रहने का ठिकाना ढूंढना होगा।
घनश्याम लाल जी बोले, घबराने की कोई बात नहीं बेटा,हम पति-पत्नी घर में अकेले ही रहते हैं,सारा घर खाली पड़ा तुम वहीं रह जाओ।
लेकिन आप हम पर इतनी जल्दी भरोसा कैसे कर सकते हैं, मुरली ने पूछा।
बेटा!! पता नहीं क्यों तुम मुझे एक ही नजर में अपने से लगे और तुमसे लगाव सा हो गया है, घनश्याम लाल जी बोले।।
जी, चाचा लेकिन इतनी जल्दी किसी पर भरोसा करना ठीक नहीं है, मुरली बोला।
ठीक है बेटा, तुम्हारी बात भी सही है लेकिन मुझे तुम पर भरोसा हो गया है इसलिए पहले घर चलो, खाना खाकर आराम करो,कल से काम शुरू कर देना, घनश्याम लाल जी बोले।
और वो घर पहुंचे, घनश्याम लाल जी ने मुरली और शंकर की मुलाकात फुलमत से करवाई तो फुलमत मुरली को एकटक देखती रही, मुरली ने फौरन फुलमत के पैर छुए,फुलमत ने तुरंत मुरली के सर पर हाथ रखा और बोली जीते रहो बेटा!!
फुलमत ने जैसे ही मुरली के सर पर हाथ फेरा, मुरली को तुरंत मालती की याद आ गई, उसने कहा, मेरी मां भी ऐसे ही मुझे आशीर्वाद देती थी, आपकों देखकर मुझे मेरी मां की याद आ गई।।
फुलमत बोली,मैं भी तुम्हारी मां जैसी ही हूं, तुम मुझे मां कहकर बुला सकते हो।।
पता नहीं बेटा, लेकिन तुम्हें देखते ही मुझे किसी की याद आ गई,बस और फुलमत की आंखें छलक पड़ी।
घनश्याम लाल जी बोले अच्छा अब आप लोग कुंए पर जाकर स्नान कर आइए, चलिए मैं आपको कुंए पर ले चलता हूं।
मुरली और शंकर स्नान करके आए और बैठक में बैठे ही थे कि किरन, चाची..... चाची..... पुकार कर अंदर आ गई लेकिन जैसे ही मुरली को देखा तो सकपका गई और जल्दी से अंदर चली गई,अंदर जाकर फुलमत से पूछा कि चाची मेहमान आए हैं क्या?
फुलमत बोली, नहीं रे,इस लड़के को तेरे चाचाजी ने जानवरों की देखभाल के लिए रखा है और बाप बेटे का रहने का कोई ठिकाना नहीं है,नये नये है गांव में तो रहने को एक कोठा दे दिया है।
किरन बोली, ठीक है चाची लेकिन इस लड़के को देखकर ......
हां,सुबह जब मैं मिली थी तो मुझे भी ऐसा ही कुछ लगा था......फुलमत ने कहा।
कभी कभी एक-दूसरे के मन के भावों को जानने के लिए पूरे शब्दो को कहने की आवश्यकता नहीं होती,मन खुद बखुद मन के भावों को समझ जाता है कि सामने वाला क्या कहना चाह रहा है।
पहले दिन तो मुरली ने कोई काम नहीं किया लेकिन अगले दिन से उसने सब सम्भाल लिया,अब घनश्याम लाल जी जानवरों की तरफ से बिल्कुल निश्चिंत हो गये थे, मुरली खेती बाड़ी भी देखने लगा था लेकिन शंकर का यहां भी मन ना लगा,वो मेहनत मजदूरी से भी जी चुराता था और वो यहां से भी ना जाने बिना बताए कहां चला गया।

मुरली का काम, मेहनत और ईमानदारी देखकर घनश्याम लाल जी को बहुत तसल्ली हुई,वो मुरली के आ जाने से अब निश्चिंत हो गए थे,उधर फुलमत भी अब खुश रहने लगी थी,रोज कुछ ना कुछ नया बनाती खाने में,एक दिन फुलमत ने बेसन गट्टे की सब्जी बनाई, मुरली को बहुत पसंद आई, उसे खाते देखकर फुलमत का जी भर आया, मुरली ने फुलमत की आंखों में आंसू देखे,तो बोला मां जी क्या हुआ, मैंने आपकी सारी सब्जी खत्म कर दी,आपके लिए नहीं बची जो आप रो रही है!!
इतना कहकर, मुरली हंस पड़ा और साथ में फुलमत भी।।
फुलमत को ऐसे हंसते हुए देखकर, घनश्याम लाल जी को बहुत प्रसन्नता हुई कि इतने सालों बाद मुरली की वजह से फुलमत के चेहरे पर मुस्कराहट आई है,घर में खुशहाली आ गई है।
अब किरन भी आ जाती थी, कुछ ना कुछ बहाने से, कुछ था जो उसे मुरली की ओर खींच रहा था, मुरली भी उसे देखकर खुश हो जाता था लेकिन अभी तक दोनों आपस में बात नहीं करते थे।
ऐसे ही श्रावण मास बीत गया, मुरली को रहते दो तीन महीने बीत गए,अब आते जाते किरन और मुरली के बीच थोड़ी थोड़ी बातें होने लगी थी,अब मुरली जानवरों को चराने ले जाता तो किरन भी कुछ ना कुछ बनाकर ले जाती थी, मुरली को लगता था कि किरन उसे पसंद करने लगी है लेकिन किरन का दिल तो सूरज को चाहता था और दीमाग मुरली को,वो खुद बीच मझधार में पड़ी थी कि वो आखिर किसको चाहती है, आंखों में तो सूरज ही समाया हुआ था लेकिन मुरली भी धीरे-धीरे उसका मन मोह रहा था।
कार्तिक मास चल रहा था, खेतों में जुताई-बुवाई का काम चल रहा था, कोई अपने खेतों में गेहूं और चने बो रहा था तो कोई सरसों और मसूर, लेकिन मुरली ने घनश्याम लाल जी के खेतों में गेहूं ,चना और मटर बोया, उसकी मेहनत रंग लाई,फसल में हरी हरी कोंपले निकल आई थी, घनश्याम लाल जी ख़ुश हो गए फसल को देखकर, मुरली की बहुत तारीफ भी की।
इसी तरह दीवाली भी आ गई,सोहन भी घर आया, उसने फुलमत से मुरली के बारे में पूछा,फुलमत बोली, ये हमारे जानवर और खेत सम्भालता है अब तेरे बाबूजी के बस का नहीं है,
सोहन बोला,एक बात कहूं मां!!
फुलमत बोली , हां बोल।।
सोहन बोला, भइया अगर होते तो, बिल्कुल ऐसे ही होते।।
फुलमत बोली, हां, बेटा और उसकी आंखें छलक आई।।
सोहन,फुलमत को रोते हुए देखकर बोला, मां फिर से, देख मैं शहर से तेरे लिए, साड़ी लाया हूं और बाबूजी के लिए भी कपड़े है।।
फुलमत बोली, और वो क्या छिपा रहा है,समझी !! बेला के लिए कुछ लाया होगा।
कुछ नहीं है मां,और इतना कहकर,सोहन शरमाते हुए, बेला से मिलने चला गया।।
इस बार दीवाली बहुत अच्छी तरह मनाई गई,घर की साफ-सफाई में मुरली ने बहुत हाथ बंटाया था,फुलमत का।।
फिर दूज वाले दिन मेला लगा, गांव में,सब गये‌‌।।
घनश्याम लाल जी मुरली को भी साथ ले गए,बोले तू भी अब इस परिवार का हिस्सा है, मुरली ने भी बात मान ली।
मेलें में सोहन तो बेला के साथ ख़ुश था लेकिन मुरली और किरन ज्यादा बातें नहीं कर रहे थे, घनश्याम लाल जी ने कुछ पैसे मुरली को दिए और बोले जो खरीदना है खरीद लो, लेकिन मुरली ने मना कर दिया बोला,आपको अगर कुछ खरीदवाना है तो एक बांसुरी दिलवा दीजिए,कई महीने हो गए, मैंने बांसुरी नहीं बजाई।।
घनश्याम लाल जी बोले,अरे पहले क्यो नही बताया कि तुम बांसुरी बजाते हो,चलो तुम्हें बढ़िया वाली बांसुरी दिलाते हैं।
बांसुरी पाकर मुरली बहुत खुश हुआ।।
अब उसे जब भी काम से फुर्सत मिलती तो बांसुरी बजा लेता, जानवरों को चराने जाता और वहां भी टीले पर बैठकर बांसुरी बजाता तो सारे जानवर पास आ जाते।
अब गेहूं की फसल थोड़ी बड़ी हो आई थी और चने का साग भी खाने लायक हो गया था, मुरली ने अपनी मेहनत से खेतों को बहुत सुंदर रूप दे दिया था,कुंए के पास उसने थोड़े गेंदें के फूल और कुछ गुलाब के पौधे लगा दिए थे,एक क्यारी में मैथी,पालक, और धनिया लगा रखी थी, कहीं किसी क्यारी में टमाटर,बैंगन और मिर्च लगा रखे थे, थोड़ा लहसुन,प्याज और गोभी भी लगा रखा थी, तो कहीं बैंगनी रंग के अलसी के फूल तो कहीं पीले रंग के सरसों के फूल, खेतों की शोभा देखते बनती थी,हर आने-जाने वाले का मन खुश हो जाता था, घनश्याम लाल जी के खेत देखकर, अब मुरली खेतों में घास फूस की झोपड़ी बनाकर रहने लगा, खेतों की रखवाली के लिए,दिन में जानवर खेत के पास वाले मैदान में चराने ले जाता और बांसुरी बजाता,शाम को फिर छोड़ आता,शाम को जानवरों को घनश्याम लाल जी देख लेते।
शाम का खाना फुलमत बना देती तो साथ में लिए आता,सुबह घनश्याम लाल जी दे जाते।
एक दिन किरन और फुलमत भी खेत पर चने का साग खाने आई, फुलमत और किरन खेतों से साग तोड रही थी, तभी मुरली बोला, मां जी मैं जानवरों को देखकर आता हूं, कहीं किसी के खेत में ना घुस जाए।
फुलमत बोली, ठीक है बेटा,जाओ।
और मुरली जाकर टीले पर बैठकर बांसुरी बजाने लगा,धुन इतनी मधुर थी कि सारे जानवर खुद बखुद आ गए और इतनी दूर से बांसुरी की धुन सुनकर किरन भी रह ना सकी और मुरली की ओर खिंची चली गई।
थोड़ी देर बाद, मुरली ने जब बांसुरी बजाना बंद कर दिया तो किरन को सुध आई कि वो यहां बैठी है?
और वो उठकर जाने लगी, तभी मुरली बोला।।
रूको किरन, मुझे तुमसे कुछ कहना है।।
किरन बोली, हां कहो।।
कुछ नहीं किरन बस इतना कहना चाह रहा था कि तुम मेरे पास रहती हो तो मुझे अच्छा लगता है, मुरली बोला।
ठीक है,अब मैं जाती हूं और इतना कहकर किरन चली गई।।
मुरली को किरन का रूखापन अच्छा नहीं लगा।

किरन ने मुरली को रूखा सा जवाब दे तो दिया लेकिन उसका दिल भी मुरली को ऐसा जवाब नहीं देना चाहता था, किरन को लगने लगा था कि वो मुरली से लगाव रखकर सूरज को अनदेखा कर रही है लेकिन फिर उसका दिल ये भी कहता था कि सूरज तो है ही नहीं, जिसको वो चाहती है तो मुरली से कौन सा नाता है मेरा, जो ना चाहते हुए भी मेरा मन उसकी ओर खिंचा चला जाता है।
बहुत ही दुविधा में थी किरन,उसके दिल और दिमाग आपस में विपरीत दिशा में जा रहे थे,दिल दीमाग की बात नहीं सुन रहा था और दीमाग दिल की बात नहीं मान रहा था, इसलिए वो मुरली से नजदीकियां नहीं बढ़ाना चाहती थी।
मुरली का मन बहुत ही खराब था, आखिर किरन ने ऐसा जवाब क्यो दिया, मैं नहीं अच्छा लगता तो साफ साफ बोल देती तो तसल्ली हो जाती, बिना कुछ कहे,किरन का ऐसे चले जाना अखर गया मुरली को।।
शाम का समय,गुलाबी-गुलाबी ठंड है, मुरली जानवरों को चराकर ला रहा है, लोगों के घरों में चूल्हे बाले जा चुके हैं,धुंए की सौंधी सौंधी महक आ रही है, पंक्षी भी अपने अपने घोंसलों में लौट चलें है,पनिहारियां गांव के बाहर कुंए से मीठा पानी भरकर ला रही है।
मुरली ने जानवरों को अपने अपने खूंटे से बांधा और दाना पानी दिया, फिर सानी के लिए साथ में लाई हरी घास का कटिया काटने बैठ गया,उसका मन आज अच्छा नहीं था।
कटिया काटने के बाद वो फुलमत से बोला,मां जी मैं जा रहा हूं,
फुलमत बोली ठहर, खाना खाकर जा, तैयार है।
मुरली बोला, मां जी मन नहीं है आज।।
फुलमत बोली, कैसे? मन नहीं है,चल भीतर आजा।।
मुरली हाथ-पैर धोकर,खाने बैठ गया।।
फुलमत बोली, थोड़ा चूल्हे के नजदीक बैठ,आज ठंड है और मुरली बैठ गया।
फुलमत बोली, इतनी मेहनत से आज खाना बनाया है और तू जा रहा था, तेरे ही मेहनत से उगाई सब्जियां बनाई है देख, वहीं खेतों के बैंगन हैं,खूब सारी हरी धनिया,हरी मिर्च वाला मसाला डालकर भरवां बैंगन बनाए हैं,चने का साग, लहसुन हरी मिर्च की चटनी और ज्वार की गरम गरम रोटी,खूब सारा घी डालकर, और आज दूध ज्यादा खत्म नहीं हुआ तो ये लो रबड़ी बना दी।
फुलमत बोली,तू रहता है तो खाना बनाने का मन करता है, तुझे खाते हुए देखती हूं तो मन को बहुत तसल्ली मिलती है बेटा।।
नहीं तो हम बुढ्ढा बुढ़िया कुछ भी कच्चा पक्का खा कर सो जाते थे।
मुरली,फुलमत का प्यार देखकर भावुक हो गया, उसकी आंखें भर आईं और उसने खाना खाना शुरू कर दिया।
उस दिन के बाद से किरन ने सूरज के पास ही आना बंद कर दिया, कभी सामने पड़ जाती तो अनदेखा कर देती, मुरली को किरन का ऐसा व्यवहार रास नहीं आ रहा था,वो बस इसका कारण उससे पूछना चाहता था कि वो ऐसा क्यो कर रही है।
मुरली बहुत ही ब्यथित था, उसके अंदर भावों के वेग ने उथल-पुथल मचा रखी थी,उसका किसी काम में मन नहीं लग रहा था, बांसुरी बजाने बैठता था तो हमेशा करूण ध्वनि ही निकलती,इस अथाह संसार में आखिर अपने हृदय की पीर किसको कहें,वो समझ नहीं पा रहा था।
बड़ी ही दुविधा में था,उस नादान को ये नहीं समझ आ रहा था कि उसे किरन से प्रेम हो गया है और ये बात हृदय तो स्वीकार कर रहा था लेकिन मस्तिष्क नहीं, हृदय और मस्तिष्क अपना अपना काम विपरीत दिशा में कर रहे थे।
फिर एक दिन घनश्याम लाल जी बाहर गये थे और फुलमत कुंए पर पानी भरने और मुरली फुलमत के कहने पर खपरैल ठीक कर रहा था, तभी किरन चाची..... चाची.....की आवाज लगाते हुए अंदर आंगन में, मुरली उतर कर नीचे आया और बोला मांजी कुंए पर पानी भरने गई हैं, इतना सुनकर किरन जाने लगी।
तभी मुरली भावावेश में बोला,किरन तुम मुझे अच्छी लगती हो और मैं तुम्हें चाहने लगा हूं!!
किरन फिर भी वहां से आने लगी,इतने में मुरली ने किरन का हाथ पकड़कर लिया और बोला जवाब तो दें के जाओ।
किरन ने गुस्से में एक मुरली के गाल पर एक थप्पड़ दिया और चली गई।
मुरली बिल्कुल सन्न रह गया और उसकी आंखों से आंसुओं की तेज धार बहने लगी,इतने में फुलमत ने बाहर से आवाज दी कि__
मुरली बेटा,जरा कलसी तो उतरवा ले, मुरली रूंधे हुए गले से बोला आया मां जी!!
और तुंरत आंसू पोंछकर कलसी उतरवाने पहुंच गया।।
अब मुरली रोज रातों को खेतों में पड़े पड़े रोया करता,इधर किरन ने मुरली को थप्पड तो मार दिया लेकिन खुद भी कितना रोई उसका दिल ही जानता है, उसने सोचा उसका क्या दोष है अगर वो मुझे पसंद करता है,तू भी तो उसे पसंद करती हैं!!
फिर कौन तूझे रोक रहा!!उस सूरज का प्यार जो सूरज अब इस दुनिया में है ही नहीं,बोल क्यो नही देती कि मुरली मैं तुमसे प्रेम करती हूं!! तू इतनी कठोर कब से हो गई किरन!!
किरन की अंतरात्मा उससे जवाब मांग रही थी जो उसके पास उस समय नहीं था।
इसी तरह पन्द्रह दिन हो गए, मुरली खेतों से वापस नहीं आया, घनश्याम लाल जी मुरली के लिए खेतों में ही खाना ले जाते,उसका मन नहीं करता था घर आने को,फुलमत एक दिन खेत पहुंची और मुरली से पूछा भी कि बेटा घर क्यो नही आता!!
मुरली बोला, मां जी खेतों में बहुत काम है, फ़ुरसत मिलते ही आता हूं।।
उधर किरन भी परेशान थी कि मुरली ने गुस्से से घर आना ही छोड़ दिया मुझे उसके साथ ऐसा बर्ताव नहीं करना चाहिए था।
फिर एक दिन शाम का समय था, घनश्याम लाल जी घर पर ही थे और फुलमत खाना बना रही थी,उस दिन घनश्याम लाल जी जबरदस्ती मुरली को खेतों से घर लाए थे फुलमत के कहने पर क्योंकि सोहन भी उस समय शहर से आया हुआ था,फुलमत चाह रही थी कि सब एक साथ खाना खाएं, मुरली जानवरों को दाना-पानी दे रहा था।
इतने में पुलिस उनके घर आई, बहुत ही भीड़ जमा हो गई थी,घनश्याम लाल जी के घर के सामने,किरन और उसका परिवार भी आया ,क्योकि किसी शरीफ आदमी के घर पुलिस आना अच्छी बात नहीं माना जाता,पुलिस वालों ने पूछा कि मुरली आपके घर में काम करता है।।
घनश्याम लाल जी बोले, हां!!
इतने में सोहन भी बाहर आ गया, उसने पूछा क्या बात है?
उनमें से एक पुलिस वाले ने पूछा कि क्या शंकर ही मुरली का पिता है?
घनश्याम लाल जी बोले, हां, लेकिन वो तो यहां रहता ही नहीं जाने कहां चला गया।।
पुलिस वाला बोला,जी, हां वो एक चोर था और अभी तक जेल में था,कल रात जेल से फरार होते वक्त उसे गोली लग गई और वो ढेर हो गया,ये उसका कुछ समान जेल में जमा था और उसने आपका पता लिखवाया था तो हम यहां पहुंच गये, उसके कागजात में उसने लिखवाया था कि उसका एक बेटा है जिसका नाम मुरली है,आपको यही बताने आए थे कि सावधान रहिएगा,चोर का बेटा कभी कभी चोर ही होता है, सुबह शंकर का पुलिस ने अंतिम संस्कार करवा दिया है, मुरली को सूचना देनी थी कि उसके पिता अब नहीं रहे।
पुलिस वालों में से एक ने पूछा,कौन है मुरली!!
मुरली सामने आकर बोला, जी मैं हूं, मुरली
पुलिस वालें ने कुछ सामान दिया और चले गये।
पुलिस वालों के जाने बाद मुरली को गांव वालों ने चोर का बेटा,झूठा, धोखेबाज और ना जाने क्या क्या कहा।
लेकिन फुलमत और घनश्याम लाल जी कुछ ना बोल सके,बस उनकी आंखों में आंसू थे।
मुरली बोला, अच्छा मांजी अब चलता हूं, आपलोगो ने बहुत प्यार दिया, इतना प्यार तो कोई सगे मां बाप ही अपने बच्चे से करते हैं, भूल-चूक माफ करना और अंदर जाकर उसने सिर्फ अपनी बांसुरी उठाई ,फुलमत और घनश्याम लाल जी के पैर छूकर बोला, वो मेरे सगे पिता नहीं थे, मैं उनके पिता जी को नदी के किनारे बेहोश पड़ा मिला था, इतना कहकर मुरली चल पड़ा गांव छोड़कर।
फुलमत की आंखों से झर झर आंसू बहे जा रहे थे।
मुरली के हृदय में अत्यधिक पीड़ा थी और हृदय की पीड़ा को आंसुओं द्वारा ही दूर किया जा सकता है उसने अपनी बांसुरी निकाली और वहीं धुन बजाने लगा जब वो दुखी होता था।
धुन सुनकर,किरन बोली,ए रूको,ये धुन तुमने कहां से सीखी,ये धुन तो सूरज बजाया करता था बचपन में।
मुरली बोला,कौन सूरज? ये धुन तो मैं बचपन से बजाता आया हूं।।
तभी सोहन, मुरली के पास आकर बोला,तुम सूरज भइया ही हो,याद करो हम मेले गए थे और गोदना गुदवाये थे लेकिन भइया तुमने अपना नाम नहीं गुदवाया था,सूरज का चित्र बनवाया था अपनी बाजू में ,फिर मेले से आते समय तुम नदी में बह गए और फिर हमें कभी नहीं मिले , कुर्ते की बांह उठाओ और दिखाओ सबको अपनी बाजू।
मुरली बोला, हां सूरज का चित्र तो है मेरी बाजू और उसने अपने कुर्ते की बांह उठा दी।
सबने देखा कि मुरली की बाजू पर सूरज का चित्र है।।।।
घनश्याम लाल जी तुरंत मुरली के पास आए और सूरज.....
कहकर सीने से लगा लिया,फुलमत तो कुछ बोल ही नहीं पा रही थी, वर्षो से इंतजार कर रही मां एकाएक अपने बेटे को पाकर विश्वास नहीं कर पा रही थी कि अंत में उसकी ममता जीत गई है और उसका लाल उसकी आंखों के सामने है।।
फुलमत की आंखों से खुशी के आंसू झरने लगे,बेटे का माथा चूमकर गले से लगा लिया।।
फिर एकबार बिछड़ा परिवार एक साथ मिल गया,उस रात फुलमत ने सारे घर में दिए जलाकर दीवाली मनाई।
एकांत पाकर किरन ने सूरज से कहा कि मैं तुमसे प्रेम करती हूं और सूरज ने इतना सुनकर किरन को अपने हृदय से लगा लिया।

समाप्त___
सरोज वर्मा___