उजाले की ओर - 29 Pranava Bharti द्वारा प्रेरक कथा में हिंदी पीडीएफ

उजाले की ओर - 29

उजाले की ओर

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आ, एवं स्नेही मित्रो

स्नेहिल नमस्कार

मुझे भली प्रकार याद है जब हम छोटे थे तब हमारे यहाँ प्रतिदिन ही कोई न कोई मेहमान आया ही रहता था |माता-पिता ’अतिथि देवो भव’का पाठ पढ़ाते थे | कई बार ये अतिथि यानि मेहमान कोई एक-दो घंटे अथवा एक-दो दिन के नहीं बल्कि हफ़्तों तक रहने वाले होते थे जिनकी खातिरदारी की ज़िम्मेदारी बच्चों पर भी सौंपी जाती थी!इनके अतिरिक्तपास-पड़ौस के गाँव से किसी वर्ष कोई चाचा की लड़की आ रही है तो किसी मौसी की लड़की ने शहर में किसी स्कूल में प्रवेश ले लिया है |इन बड़ों या बच्चों को मेहमान नहीं समझा जाता था वरन ये घर के सदस्यों की भांति ही रहते थे और घर के कामों में भी यथाशक्ति हाथ बँटाते थे | बाहर से आकर स्कूलों में शिक्षा ग्रहण करने वाले बच्चे सभी एक-दूसरे के छोटे-बड़े भाई-बहन होते थे जो परिवार के अन्य बच्चों के जैसा ही अधिकार पूरे परिवार पर रखते थे |

देखते-ही देखते जीवन जीने के तरीकों में कितना परिवर्तन आ गया है कि विश्वास ही नहीं होता किन्तु विश्वास करना पड़ता है ,यह आवश्यक भी है |वैसे पूर्व समय में भी ‘अतिथि’ की परिभाषा ‘बिना तिथि’के मानी जाती थी अर्थात जो मेहमान घर में आए तो किन्तु उसके लौटने की कोई तिथि निश्चित न हो |संभवत:इसीलिए इसे ‘अतिथि’ पुकारा जाता होगा |लेकिन आज के समय में यह संभव नहीं है |पहले समय में अतिथि जितने भी दिन रह जाए ,जब वह वापिस लौटने लगता था उसे रोका अवश्य जाता था और वह मोहवश रुक भी जाता था |आज न तो वह सहज,सरल वातावरण है और न ही अतिथि के प्रति किसी के मन में कोई अधिक रूचि!इसके भी अनेक कारण हैं |समय के अनुसार परिस्थितियों में बदलाव होता रहता है,जो स्वाभाविक भी है | किन्तु आज की परिस्थितियाँ तो इतनी तेज़ी से बदल रही हैं कि हमें लगता है हम किसी और ही लोक में आ गए हैं|परिस्थितियाँ बदलने के साथ मनुष्य के विचारों में ,रहन-सहन में भी परिवर्तन स्वाभाविक है |जो कहीं न कहीं आवश्यक भी है | तीव्रता से बढ़ती हुई मंहगाई,जीवन जीने के साधनों में होड़,अपने आपको ऊँचा दिखाने की लालसा ने आम आदमी की कमर तो तोड़ दी है |इस सबने सबकी सोच में भी बहुत बदलाव ला दिया है |

आज ‘अतिथि’अथवा मेहमान को सम्मान नहीं दिया जाता ,ऐसा नहीं है किन्तु आज अतिथि को स्वयं ही यह समझने की आवश्यकता है कि वह किस प्रकार का मेहमान बनकर अपने संबंधियों के घर जाए |जैसा हम सब जानते ही हैं कि आज परिवारों में विघटन हो रहा है ,संयुक्त परिवार न के बराबर रह गए हैं,’स्टैंडर्ड’के माप दण्ड बदल गए हैं | आजीविका के लिए पति-पत्नी दोनों को काम करना आवश्यक होता जा रहा है ,ऐसे में यदि ‘अतिथि’ कहीं पुराने जमाने का पहुँच जाए तो उसकी कितनी खातिरदारी हो सकती है,यह तो स्वयं ही समझा जा सकता है |संबंधों को संभालना बहुत आवश्यक होता है,अत: मेहमान को भी समयानुसार चलना होगा |कई बार ऎसी स्थिति आ जाती है कि पूरा प्रयास किया जाता है कि मेहमान का अच्छी प्रकार स्वागत किया जाए किन्तु समय व कभी धन के अभाव के कारण भी अधिक स्वागत-सत्कार करना संभव नहीं होता |यदि वे मेहमान पुरानी पीढी के होते हैं तो कई बार वे पुराने समय की तथा आज की तुलना करने लगते हैं,वे सोचते हैं कि उनकी बैठे-बैठे सेवा की जाए,कई बार तो वे अपने हाथ-पैर हिलाना भी पसंद नहीं करते और अपनी ओर से पर्याप्त मेहमाननवाज़ी करने के उपरान्त भी ये बुरा मान जाते हैं|

आज के समय में ऐसे ‘अतिथि’ परिवार को कठिनाई में डाल देते हैं|कई बार तो इशारा करने पर भी वे कुछ समझ नहीं पाते अथवा न समझने का नाटक करते हैं |आज ऐसे मेहमानों को अपनी सोच से किसी संबंधी के यहाँ इतना ही समय रहना चाहिए जितना उन्हें लगे कि वे स्वयं भी बेहिचक रह पा रहे हैं और उनके मेज़बान भी उनसे नाखुश नहीं हैं,इसके अतिरिक्त परिवार को सहयोग देने की भावना भी हमार मन में होनी चाहिए अन्यथा संबंधों में दरार पड़ने की संभावना बनी रहती है |

महाकवि तुलसीदास जी ने भी कहा है ;

आवत ही हर्षे नहीं ,नयनन नहीं सनेह|

तुलसी तहाँ न जाइए,कंचन बरसे मेह ||

तो मित्रो ! जिस परिवार के सदस्यों के मुख पर अतिथि को देखकर मुस्कुराहट न आए वहाँ हमें स्वयं ही नहीं जाना चाहिए चाहे कितना भी संपन्न परिवर क्यों न हो |

प्रसन्न रहें ,मुस्कुराते रहें

आप सबकी मित्र

डॉ.प्रणव भारती

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