अनैतिक - २७ suraj sharma द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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अनैतिक - २७

कल जो हुआ उसने हम सबको अन्दर से झंझोलकर दिया..अब माँ पापा, उनके घरवालो से कम बाते करने लगे एक दिन उन्होंने खाने पर बुलाया पर पापा ने मना कर दिया, अंकल को बहोत बुरा लगा।। इसीलिए मैंने पापा को समझाया. इसमे उनकी गलती नहीं पापा, और वैसे भी आप दोनों को थोड़े दिन ही यहाँ रहना है फिर तो हम सब जर्मनी में ही जाएंगे, मेरे समझाने पर पापा मान गये और आज का डिनर हमने उनके यहाँ करने का पक्का किया.

रात को हम उनके यहाँ पहोचे तो निकेत वाहा नहीं था, पापा के पूछने पर अंकल ने बताया की कल हुए झगड़े के बाद से ही वो घर पर नहीं आया, अंकल ने उसे घर से निकल दिया था...किसी के पास बात करने को कुछ नहीं था सब चुपचाप खाना खा रहे थे, रीना अपने ससुराल चले गयी थी और कशिश भी अब चल पा रही थी. उसने मुझे देखा और सॉरी का मेसेज किया पर मैंने कोई जवाब देना ज़रूरी नहीं समझा..हाँ मैंने उस दिन निकेत के दोस्तों से उसकी मदद की थी पर मै वो सब नहीं भुला था जो कशिश ने मुझे था ...तभी पापा ने अंकल से कहा

"छोटी कह रहा है, हम उसके साथ हमेशा के लिए जर्मनी जाए

अंकल ने धीरे से कहा ये तो बहोत अच्छी बात है..

पर पापा समझ गये थे की अंकल सोच रहे होगे कल जो हुआ उसके लिए पापा ने उन्हें अब तक माफ़ नहीं किया..पर तभी पापा ने ..

तू दिल में कुछ भी गलत मत रख, हम तेरे वजह से नहीं जा रहे, छोटी ने तो मुझे एक हफ्ते पहले ही कह दिया था...

ये बात सुनकर अंकल आंटी को थोड़ी राहत मिली पर कशिश की आँखे भर आई थी...किसी नज़र उस पर नहीं गयी, वो मेरी ओर ऐसे देख रही थी मानो मेरे जाने के बाद वो नहीं जी सकती..पर मैंने ध्यान नही दिया।।मैंने अंकल और आंटी से माफ़ी मांगी की मुझे निकेत पर हात उठाना पड़ा पर वो जानते थे की मै गलत नहीं था इसीलिए उन्होंने मेरे सर पर हात रखा और कुछ बोल नहीं पाए फिर थोड़े देर बाद अंकल ने पूछा "कब जा रहे हो बेटा?

मैंने कहा, जल्दी ही, माँ और पापा के वीजा का इंतजाम कर रहा हूँ, अच्छा होता अगर उन्हें मेरे साथ ही ले जाऊ..बादमे अकेले आने में उन्हें परेशानी होगी

अंकल ने कहा." मै जानता हूँ सरकारी ऑफिस में कुछ लोगो को, शायद वो हमारा काम कर सके...मै तुझे एक नंबर देता हूँ कल जाकर मिल उनसे, मेरा नाम बोलना वो जल्दी कर देंगे..

ठीक है अंकल थैंक यू...बाते अंकल से कर रहा था पर मेरी नज़रे अब भी कशिश पर थी, कशिश खाना खा कर अपने रूम में चली गयी थी, मेरा भी खाना हो गया था पर मै माँ पापा के लिए रुका हुआ था, वो धीरे धीरे बाते करते हुए खा रहे थे, पापा और माँ, अंकल आंटी को दिलासा दे रहा थे की सब ठीक हो जायेगा..तभी अंकल को रीना का कॉल आया, उन्होंने और आंटी ने बात की फिर अंकल ने मुझसे कहा, "बेटा फ़ोन कशिश को दे आना"

मै कशिश की रूम की ओर गया, दरवाज़ा अन्दर से बंद था, मैंने एक दो बार दरवाज़ा खटखटाया पर उसने नहीं खोला मुझे कुछ गड़बड़ लगी..मैंने धीरे धीरे से आवाज़ लगायी ताकि घर में बाकी लोगो को टेंशन ना हो...

उसका कमरा ऊपर था जिसके वजह से मेरी आवाज़े निचे नहीं जा सकती थी,

कशिश..कशिश..दरवाज़ा खोलो रीना का कॉल आया है, उसे तुमसे बात करनी है..

जब मेरे एक दो बार बोलने पर भी उसने दरवाज़ा नहीं खोला तो मैंने थोड़ी जोर से आवज़ लगायी..कशिश दरवाज़ा खोलो...अब भी दरवाज़ा नहीं खुला..मैंने रीना को कहा ५ मिनिट बाद फ़ोन करता हूँ..मै उसे ये बताना नहीं चाहता था की कशिश दरवाज़ा नहीं खोल रही।। मैंने वापस कॉल करता हूँ बोलकर कॉल रख दिया..और एक आखरी बार कहा...कशिश दरवाज़ा खोलो..अब की बार उसने दरवाज़ा खोला और मैंने जो देखा उस से मेरी आँखे फट गयी..उसके रूम में पंखे पर एक रस्सी तंग रही थी..मै समझ गया अगर मुझे आने में थोड़ी भी देर हो जाती तो शायद बहोत देर हो जाती..निचे किसी को कुछ पता ना चले इसीलिए मैंने दरवाज़ा अन्दर से बंद कर दिया और जोरदार थप्पड़ उसके गाल पर लगा दिया..वो पलंग पर जाकर बैठ गयी उसकी आंख में अब भी आंसू थे..

क्या करू ऐसी ज़िन्दगी का? बचपन से लेकर आजतक मेरे नसीब ने हमेशा ही मुझे धोका दिया है, जब भी कुछ अच्छा होने जाता, कुछ न कुछ बुरा हो जाता ..और भी बहोत कुछ कहा उसने ..

हम दोनों इतने करीब बैठे थे की मै उसकी साँस लेने की आवाज़े भी सुन सकता था..मैंने बिना कुछ बोले कस कर उसे गले लगाया और हम दोनों एक दुसरे से चिपक गये..मुझे होश ही नहीं रहा मै क्या कर राहा हूँ...पर जैसे ही होश आया मैंने खुद को उस से दूर किया पर वो अब भी मुझे खुदकी ओर खींच रही थी..