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ग्वालियर संभाग के कहानीकारों के लेखन में सांस्कृतिक मूल्य - 8

ग्वालियर संभाग के कहानीकारों के लेखन में सांस्कृतिक मूल्य 8

डॉ. पदमा शर्मा

सहायक प्राध्यापक, हिन्दी

शा. श्रीमंत माधवराव सिंधिया स्नातकोत्तर महाविद्यालय शिवपुरी (म0 प्र0)

अध्याय - चार

प्रतिनिधि कहानीकारों के लेखन में सांस्कृतिक मूल्य

2. पुन्नीसिंह की कहानियों में सांस्कृतिक मूल्य

संदर्भ सूची

2-पुन्नीसिंह की कहानियों में सांस्कृतिक मूल्य

पुन्नीसिंह उन कथाकारों में से हैं, जो ग्राम्य जीवन की प्रत्येक अनुभूति, गाँव की ठसक, उसकी प्रकृति, उसकी संस्कृति एवं होने वाले परिवर्तनों को बहुत बारीकी से चित्रित करते आये हैं। उन्होंने आदिवासियों के सर्वांग जीवन की बहुविध भंगिमाए और क्रियाओं को बखूवी वर्णित किया है। साथ ही सर्वहारा वर्ग, समाज में नीची समझी जाने वाली जातियाँ और शोषित मजदूरों आदि की समस्याओं को भी कथ्य बनाया है।

गाँव की सभ्यता और संस्कृति उनकी कहानियों में खूब देखने को मिलती है। वे ग्राम्य जीवन के चितेरे हैं। वे सामाजिक संस्कृति के हिमायती हैं। जायज हकों की लड़ाई और सकारात्मक जीवन मूल्यों के प्रति-निरंतर संघर्ष उनकी कहानियों की विशेषताएँ हैं। वे स्वयं कहते हैं-

’’मैं आज भी मानता हूॅं कि असली भारत गाँव में ही है। बावजूद इसके कि आज गाँव लगभग पूरी तरह से टूट चुका है उसका एक बड़ा हिस्सा महानगरो से जुड़ गया है। अगर आज की कहानी में गाँव कम हुआ है तो उसका एक कारण शहरीकरण है।’’1

गाँव का वर्णन भी वो इस तरह से करते हैं- ’’गाँव मझोेला-सा है। मैनपुरी-एटा राजमार्ग पर लम्बा-लम्बा पसरा है। यही कोई चालीस पचास घर की बस्ती। दक्षिण दिशा में सड़क पार दूर ईसन नदी तक गेहूँ कि हरे भरे खेत और बीच-बीच में इक्केे-दुक्के आम, जामुन के पेड़, उत्तर की ओर आमों का बगीचा और फुटकर सारे पेड़। बीच-बीच में अरहर की फूली हुई सरसों के खेत। पश्चिम की ओर सड़क की पुलिया और उससे लगी हुई लँगड़े साधू बाबा की बगीची।’’2

उनकी कहानियों में हिन्दू-मुस्लिम धर्म की पूजा के साथ-साथ ईसाई धर्म की पूजा को भी चित्रित किया गया है। धार्मिक मान्यताओं में व्यक्ति इतनी अधिक आस्था रखता है कि अपना भला-बुरा, नफा-नुकसान, दुख नहीं देखता। अपनी सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति या समस्या के निदान के लिये हम भगवान को ही कष्टहर्ता मानते हैं। बटेश्वर धार्मिक स्थल है जहाँं दर्ष न करने लोग जाते है। वहाँ जाने में अस्सी नब्बे रूपये खर्च हो जाती है। रिक्शे वाला वहाँ जाने में तो रूपये खर्च कर सकता है किन्तु रिक्शे की चेन नहीं सुधरवा सकता क्योंकि उसे लगता है कि उसकी घर की सभी समस्याओं से मुक्ति भोले बाबा ही दिला सकते है-

’’मैं फकत चेन ठीक कराने के लिए बटेश्वर जमुना नहाने नहीं जा रहा हूॅ। घर गृहस्थी के लिए और भी बहुत से काम हैं जो उनकी दया के बिना पूरे नहीं हो सकते। घरवाली टी.बी. की मरीज है, दो-दो जवान लड़कियाँ शादी के लिए बैठी हैं घर में, इतना सब बजन इस रिक्शे के बल पर तो उठाया नहीे जा सकता साहब इसमें तो भोले बाबा को ही मदद करनी होगी।3

कहीं सिंदूर पुते भैरों की पूजा होती है तो कहीं मेहर देव की (वोधन की नगड़िया) तो कहीं थान पर देवता पधरवाये जाते हैं। ’’घर की बाहरी दीवार से लगा माटी का एक थान है उसके बीच में लकड़ी का एक छोटा सा लट्ठ गड़ा है। ये उसके कुल देवता सुअर खाँ का स्थान है, शुरू के दिनों में एक सिंदूर की पुड़िया, कुछ अगरवत्ती और सवा रूपये से देवता प्रसन्न होता था। बाद में दारू की बोतल, सुअर के घेंटे और मुर्गियांे का चढ़ावना आने लगा।’’4

ये देवता सहज सरल प्रवृत्ति के थे क्योंकि देवतानुमा लकड़ी को उठाकर बसुआ नाली में फेंक आता था तब बसुआ का बाप उस देवता को उठाकर नहलाता फिर पहले वाले स्थान पर पधारकर अगरबŸाी लगा देता। उसकी पत्नी कल्लन जब भी बाहर से कमाकर आती तो हाथ की डलिया, पंजा और झाडू़ देवता के थान से टिकाकर रख देती। रोज शाम को सट्टेबाज उसके आँगन में देवता के थान के पास जुटते हैं। देवता सट्टे का नम्बर बताने लगा है कल्लन के गुस्सा होने पर वह कहता सुअर खाँ महाराज अपने कुल देवता हैं।

होरी जो जमादार था बड़ा दिन एक त्यौहार के रूप में मनाता है उसने ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया था। ऊँची जाति के लोगों द्वारा परेशान और बेइज्ज़त किये जाने पर ये लोग धर्म परिवर्तन कर लेते हैं। बाबू की घर वाली को गाँव के मंदिर के पुजारी ने दिन दहाड़े बेपर्दा किया था। तब भी पंचायत बैठी थी तब बाबू के साले रामलाल ने धर्म परिवर्तन की बात कही थी क्योंकि वो भी धर्म परिवर्तन कर ईसाई धर्म अपना चुका था। अब बाबू की लड़कियाँ युवा हो गयी हैं जिन्हें गाँव के रसूखदार छेड़ते हैं’’ होरी ने पंचायत भी बिठायी लेकिन मामला जहाँ के तहाँ था। इसलिये बाबू ने भी धर्म परिवर्तन का मन बना लिया।

’’ऐटा पहुँचकर बाबू को थोड़ा अट पटा लगा। वैसे अच्छा ही लगा था। दूसरे दिन ही चर्च के छोटे पादरी ने उसकी दोनों लड़कियों और उसका बपतिस्मा कराकर प्रभु ईशु की शरण में ले लिया। बाबू को वहीं चर्च में नौकरी मिल गई।’’5

बच्चा पैदा होने से पूर्व ही परम्पराओं के निर्वाह का कार्य प्रारम्भ हो जाता है जो मृत्युपर्यन्त ही नहीं उसके बाद की विभिन्न क्रियाओं के रूप में चलता रहता है। जापा होने की प्रक्रिया भी मुश्किल होती है वो भी तब जब बच्चा अन्दर ही उलट गया हो। वह कार्य घर में ही दाई द्वारा सम्पन्न किया जा रहा हो, उस समय ऐसे कुशल हाथों की आवश्यकता होती है जो जच्चा और बच्चा दोनों को संभाल ले और दोनों को सुरक्षित कर सके (कृतघ्नता)।

हमारी परम्परा और मन में बैठी विचारधारा है कि लड़की की अपेक्षा लड़के का पैदा होना शुभकारी माना जाता है और खुशी मनाई जाती है। लड़के के पैदा होने पर काँसे की थाली बजाई जाती है और छठी पूजन भी होता है। लड़के के पैदा होने पर बुजुर्ग अधिक खुश होते हैं।

’’वह पैदा हुआ तो दाई की उमंग संभाले नहीं संभल रही थी। उसके पैदा होने पर खुशी की पहली अभिव्यक्ति दादी के आँगन में काँसे की थाली बजाकर की गई। जच्चेे गाए गए। लड्डू बाँटे गए। छठी वाले दिन ’सत्यनारायण’ भगवान की कथा हुई । बहुत बड़ा भोज हुआ।’’6

लड़के से वंश चलता है (इस इलाके की सबसे कीमती औरत, लड़की) इसलिए लड़के और लड़की में भेद इतना किया जाता है कि लड़के का नामकरण पुरोहित से पोथी दिखाकर किया जाता है जबकि लड़की के नामकरण के लिए इसकी कोई आवश्यकता नहीं। लड़का पैदा होते ही लड़की के खान-पान पर प्रतिबन्ध लगा दिया जाता है उसके स्कूल जाने पर रोक लग जाती है यहाँ तक कि उसे उसके भाई के पास भी नहीं जाने दिया जाता। उसके पीठ पर जमे रोंये के समूह को साँपिन मानकर उसे गरम रोटी से दाग दिया जाता है। जिससे उसकी पीठ में फोले तक पड़ जाते हैं। लड़की के साथ ऐसा अमानवीय व्यवहार वह भी महिला द्वारा ही किया जाता है। ऐसा जघन्य कृत्य जिसे पढ़कर ही रोंगटे खड़े हो जायें।

लड़की के इस दोष से मुक्ति का उपाय भी दादी जानती थी। लड़की को नंगे बदन चौके में उस समय बिठाया जाये, जब रोटी सेकी जा रही हो। फिर जो रोटी सबसे अच्छी फूली हो, उसको चूल्हे से निकालते ही उसकी पीठ पर मारा जाय। अगर रोटी फूट जाय तो समझो सांपिन बिला जायेगी। लड़की की दोष हो जाएगी। दादी ने ये जघन्य कृत्य खुद नहीं किया था, लड़की की माँ से ही कराया था।7

लड़का व लड़की मे भेद की सीमा यही तक नहीं है। नारी को आजीवन यह विभेद भुगतना पड़ता है। जन्म का समय हो , परवरिश का मामला हो या विवाह का अवसर। विवाह के बाद भी लड़की का नाम बदलकर उसके अस्तित्व को ही समाप्त करने की योजना रहती है इसलिये लड़की के नामकरण पर कोई कारज नहीं किया जाता है क्योंकि यह नाम दस पन्द्रह साल से ज्यादा नहीं चल पाता। लड़की की माँ अपनी लड़की नाम रखना चाहती है वह सोचती है-

’’शायद वे ठीक ही कहती हैं। कभी उसकी माँ ने भी बड़े अरमानों के साथ उसका नाम रखा होगा। वह खुद भी अपनेे नाम पर फूली नहीं समाती थी। लेकिन ब्याह कर यहाँ आने के बाद पता नहीं, कैसे उसका नाम गोल हो गया है। वह अनुभव करती है जैसे उसका नाम छीन लिया गया है, वैसे ही उसका व्यक्तित्व आधा रह गया है। अगर यही हालत बनी रही तो वह मात्र बच्चे पैदा करने और रसोई सम्हालने वाली मशीन बन जाएगी।8

सभी धर्मो मेें विवाह अपने-अपने रीति रिवाज एवं परम्परा अनुसार होता है। हिन्दु विवाह हिन्दु रीति में होते है मुस्लिम समाज में एक से अधिक पत्नी रखने की प्रथा है (काफिर तोता)। किन्तु ऐसे हिन्दु जो अपना धर्म परिवर्तित कर ईसाई धर्म अपना लेते है उनका विवाह ईसाई धर्म के रीति-रिवाज के अनुसार होता है।

’’.....ऐटा कि छोटे चर्च के बड़े फादर एक दिन खुद अपनी टमटम में बिठाकर मसीचरन को इसी गाँव में लाये। वहीं गाँव में चर्च के कायदे से श्यामा और मसीचरन की शादी हुई।’’9

श्रम विभाजन समाज को सुचारू चलाने का कार्य था पर उसने बाद में चलकर वर्ण व्यवस्था का स्वरूप धारण कर लिया। ज्यों-ज्यों समय व्यतीत होता गया तयों-त्यों इसकी जड़ें गहरी होती गई और ऊँची वर्ण तथा निम्न वर्ण में खाई पटती गयी। यहाँ तक कि निम्न वर्ण के स्पर्ष मात्र से ही उच्च वर्ण अपवित्र होने का भ्रम पाले थे। जब नहाते, गंगाजल छिड़क कर (कृतघ्नता)। बाल्टी मांजकर मंदिर के कुएँ से पानी लाया जाता। साथ ही पुजारी जी की मिन्नतें करके कुछ बूंद गंगाजल लाते। पंण्डित जी पानी में गंगाजल की बूंदें मिलाकर नहाते और मंत्र पढ़ते। वे नहा लेते तो हमलोग कपड़े धोते और सुखाते। वे सूखे कपड़ों पर फिर गंगाजल छिड़ककर उन्हें पहनते।’’10

समाज में जो बलशाली हैं वह कमजोर की जमीन हड़प लेता है(पंचायत), माँ पर ही बेटा अविश्वास करता है और उस पर चरित्र हनन का आरोप लगाता हृै (तुम्हें सलाम मेरी माँ) जिन कार्यों का विरोध वही काम करना अर्थात् हथियार बेचना (मंसा बढ़ई) सरकारी नीतियाँ केवल दिखावा हैं मूल रूप से उनमें कुछ नहीं वे मात्र झुनझुने के समान हैं जिसमें आवाज अधिक होती है (झुनझुना), पंचायत चलते छोड़कर उठकर जाना अपमान माना जाता है। पंचायत में तरह-तरह की कसमें खाना शगल बन गया है (पंचायत, होरी)

साम्प्रदायिक दंगे भी हुए हैं जिसमें आगजनी हुयी, जानमाल की हानि हुई यहाँ तक कि धर्म विरोध में तोतों का वाक्युद्ध भी चला (कयामत का दिन, माँ तुझे सलाम, काफिर तोता) पर दूसरी ओर साम्प्रदायिक सद्भाव की मिसाल भी पेश कर दी है। मुस्लिम वृद्ध हिन्दू लड़की को खिलाने घर ले जाता है। वह मजहवी झगड़ों के कारण और परिणाम पर भी दृष्टि डालता है।

’’........अच्छा तुम यह बताओ नूरा, हमारे शहर में जितने भी मजहबी झगड़े हुए हैं।, उनमें कभी कोई मजहब का ठेकेदार मरा है क्या? नहीं मरा। उसमें मरे हैं फेरीबाले, खोमचे वाले और वैसे ही और सारे लोग जो रोजी-रोटी की तलाश में एक गली से दूसरी गली में भटकते फिरते हैं।11

त्यौहार, पर्व एवं सभी धर्म बड़े उल्लास से मनाए जाते हैं। हिन्दुओं के प्रमुख त्यौहारों में से होली अपनी परम्पराओं को पूरा करने का त्यौहार है। होली वाले दिन मेहर देव की पूजा की जाती है। सब लोग मेहर देव की झाड़ी पर जाते हैं। वहाँ पूजा करते हैं और मेहर देव को पहला रंग देने के बाद होली शुरू होती है। होली पर नगड़िया बजायी जाती है। ऊँची जाति के लोग नीची जाति के लोगों की घरवालियों से होली खेलने आते हैं जिसमें होली का रंग कम और अश्लीलता का रंग ज्यादा चढ़ा होता है। वो लोग जैसे चाहें उनके गालों पर रंग लगाते हैं शारीरिक उत्पीड़न देते हैं।12

फागुन में जब तक बोधन की नगड़िया न बजे तब तक लगता ही नहीं कि फागुन आ गया है। उसके बिना होली बेरस लगती है (बोधन की नगड़िया)। ’रंग पंचमी के दिन करीला टेकरी पर मेला भरने लगता है। कहने को यह मेला बेड़िनियों का है। पूरे देश में इस तरह का यह शायद अकेला ही मेला है। कहते तो यह भी हैं कि अकेली सीता का मंदिर भी सिर्फ यहीं पर है। सीता के मंदिर के पास ही बाल्मीकि का भी यहाँ मंदिर है। सीता के दोनों बेटों के जन्म पर आश्रम निवासी वन कन्यायें बधाई गाने रंग-पंचमी के दिन वहाँ पहँुची होंगी.......दूर-दूर तक गॉंव में जो बेड़नियाँ मौजूद हैं वे राई नृत्य ही नाचती हैं। इसलिए इस मेले पर चलने वाले नृत्य को ’राई-बधाई’ कहा जाता है। आजकल रंग पंचमी के दिन सैकड़ों बेड़िनियाँ यहाँ आती हैं। वे आती हैं सीता के मंदिर पर मन्नत मांगने कि आगे आने वाले वर्ष में उनकी सुख समृद्धि में बढ़ोत्तरी हो, ज्यादा से ज्यादा ’राई’ नाचने को मिले, फागुन-चैत में अबीर-गुलाल के साथ-साथ ढेर सारा नोट बरसे।’’13

महिलायें साज-श्रंृगार किये रहती थीं चेहरे में आकर्षक भले न हो, सौन्दर्य भी न हो लेकिन सुहाग का सामान तो सजना ही था ’’चेहरा काले से भी काले चकŸाों से भरा हुआ था और पान के रचाव से उभरे हुए होंठ। चमक-दमक जैसे कुछ भी नहीं था फिर भी आँखों में गाढ़ा काजल, स्याह काले बालों में तेल कुछ ज्यादा और कंघी करीने से, मांग में तीखे रंग का सिन्दूर, माथे पर लाल रंग की बड़ी सी गोल टिकुली, चूड़ियाँं पहँुचों तक भरी हुई,....................... 14

साधु महात्मा अपनी ही धुन में रहते हैं। चरस-गांजे का प्रयोग करते हैं। भजन में लीन रहते हैं।’’वह अंगद मल्लाह की नाव पर सवार होकर बगीची तक पहँुचता। धीरे-धीरे वह बाबा की सेवा में लीन रहने लगा। उनके संग कीर्तन गाने लगा। बाबा ने उसे हारमोनियम बजाना सिखालाया। साथ ही, गांजा का दम लगाना भी सिखा दिया।15

अंगिया चोली पहनने का प्रचलन था। लहँगा भी पहना जाता था। ’बट्टू’ का लहंगा हर कोई नहीं सिल पाता था उसके लिए अनुभवी हाथ की आवश्यकता पड़ती है।

’’किसी घर की बूढ़ी महिला कभी अपना - चौबीस गजा ’बट्टू’ का लहंगा लेकर औरतों के बीच में आ पड़ती। उस लहंगे की सिलाई नयी औरतों को उंगली रख रखकर दिखाती ’उसकी’ ’गोट’ उसका ’अंगुआ’, उसके पट्ट, उसका नेफा एक-एक चीज को समझाती और हर बात में जिरह करती कि हीरा दर्जी बहुत गुनी आदमी है। उस जैसा दर्जी गंगा-जमुना के बीच में कोई दूसरा नहीं है। यद्यपि बाद के वर्षों में अंगिया-चोली का चलन धीरे-धीरे कम होता गया था, लेकिन गाँव की बड़ी-बूढ़ी महिलाएं अक्सर अंगिया पहने मिल जाती थी। वे अंगिया से भी हीरालाल का नाम जोड़कर उसकी तारीफ के कसीदे पढ़तीं।16

नट अपने क्रियाकलाप में बड़े ही जोखिम का काम करते हैं। अपने करतब दिखाने के लिए वे अपनी जान की बाजी तक लगा देते हैं। आजकल यह काम लुप्त प्राय होता जा रहा है। वे ढोलक बजाकर व्यक्ति पढ़ते हैं। कभी-कभी कला-कौशल जानलेवा भी सिद्ध हो जाता है।

नटिनी रज्जु छांड़े नहीं,

नट छांड़े नहि बांस,

कदम-कदम को तुम जँचे

जोखिम साँस-दर साँस।

जब उसे विश्वास हो गया कि वे सब पाँच हल भाले के साथ बंधे हुए हैं तो वज्रासन की हालत में नीचे ज़मीन पर बैठ गया। गरदन पीछे की ओर करली ताकि ठोढ़ी सीधी ऊपर की ओर आ जाए। ठीक उसी समय मैदान में चारों ओर खड़े लोगों में से पांच आदमी आगे आए। उन्होंने हलों को पहले अपने हाथों पर उठाया और फिर सीधा खड़ा करके भाले के फल की नोंक को नत्थूराज के संकेत से बतायी जगह पर टिका दिया।..........अब नत्थूबाज ने भी हलों के उस भारी

बंडल से अपने हाथ अलग कर लिये थे और वह आगे पीछे, दाये बाये आ जाकर संतुलन बना पा रहा था और उस भार को ठोढ़ी जैसी नाजुक जगह पर भाले की नोंक पर संभाले हुए था।’’....जरा से ठेवा के चलते जो संतुलन बिगड़ा वह फिर संभले नहीं संभला......फल दाहिनी बगल में जा घुसा और धराशायी होते-होते भाला और हलों का भार पूरी तरह जानलेवा सिद्ध हुआ।’’17

घर से बाहर पुरूष नौकरी पर जाता है तो सभी लोग आशा करते हैं कि गाँव में उनकी धाक जम जायेगी। जब पुरूष वापस आयेगा तो सबके लिए ढेर सारा सामान लेकर आयेगा। पुरूष घर के मोह में फसा हुआ जब वापस आता है तो’कम सामान’ उनके बीच दूरी पैदा कर देता है। वह महीने भर की छुट्टी में आया था पर दसवें दिन ही वह वापस चला जाता है। ’’कोई बात जरूर है उसे उस आदमी और चीजों के बीच में नये रिश्ते बनाती होती है। और तोड़ती भी है वह कोई और ही चीज है जो आदमी की नजरों में आदमी का महत्व घटा देती हैं किसी रिश्ते को कायम नहीं रहने देती।18

रोटी सब्जी, समोसा, पान, मुर्गा मीट, शराब, चाय, सिगरेट, बीड़ी, हुक्का आदि खान-पान की संस्कृति रही है। अम्माँं-अम्मी, नाना-नानी, मामा-मामी, भाभी, बहनोई, साहब भैया-भाभी, बब्बा रामपुरवाली, दादा, महाराज काका आदि संबोधन दिये गये। इसके अतिरिक्त नाम के साथ जाति लगाने का भी प्रचलन था। प्रीतम कुम्हार, चतुरी चमार, बद्री पंडित, चमार टोला, भग्गू मेहतर, चमारों का पुरा आदि। हसन भाई, हरेन के बापू, बसीर मियाँ चचा जान भी संबोधन दिए गए।

पुरूषों में कुर्ता-धोती, बंडी अंगोछा, कुर्ता-पाजामा, पेन्ट-शर्ट, छींट का तहमद, कमीज आदि पहनते हैं तो महिलाओं ने साड़ी, लहँगा, शॉल धोती बिछिए, चूड़ी, करधनी भी पहने हैं माँग में सिंदूर लगाया है, पतलून चस्मा, वूट, गर्म जर्सी, कम्बल, सरदारी पगड़ी आदि का प्रयोग किया गया है। गाँव के लड़के फौज में जाने लगे हैं सोफानी की सामग्री गाँव में प्रवेश कर चुकी है। ’’इलाके के चारों ओर फौजी-संस्कृति बिखरी पड़ी है कृषि संस्कृति से वह होड़ लगाये हुए हैं। उसे पग-पग पर मात देना चाहती है। बात खाकी कमीज से शुरू होती है तो सेना की पतलून, गर्म जर्सी, कम्बल और किट बैग तक जाती है। सेना के इस्तेमाल के तमाम तार, फौजी कैण्टीन की शराब, कारतूस और कहीं-कहीं हल्के हथियार भी किसी-किसी गाँव में मिल सकते हैं।19

भाषा संस्कृति की पहचान है। परछाई, ओर, पोखर, चौपाल, ढिबरी, कनस्तर, कथरी, खोली, ठठरी, अखाड़ा, जुआ, जनीमांस, लालटेन, बाखर, गढ़ी, टपरिया, छप्पर, हड़वाई, छोकरा, चौका, हवेली, खेतकी, मिराई, मोढ़ा आदि शब्दों का प्रयोग किया गया है।

पुन्नीसिंह जी की कहानियों में एक गतिशीलता है और तदनुरूप उनके नारी-पात्र भी क्रियाशील हैं। इनके पात्र कही भी नियतिवादी नहीं हैं। वे भाग्य को न मानते हैं और कोसते हैं अपितु संघर्ष करना जानते हैं और संघर्ष अपना मार्ग प्रशस्त करते हैं। ’पंचायत’ के चोखा और हीरा जड़वत चौधरी एण्ड कम्पनी के अत्याचारों को सहन करते रहते हैं चौधरी के खूंखार बेटे खेत की मेंढ़ फोड़कर उसका खेत अपने खेत में मिला लेते हैं। यह समाचार सुनकर हीरा तो चुप रह जाता है परन्तु उसकी पत्नी-झुनिया तमक उठती है। ’’झुनिया चबूतरे से नीचे आयी और अपने लड़के की बाँह पकड़कर हीरा की ओर बढ़ाती हुई बोली-’ले इसको देखना। मैं उस हरामी चौधरी के हाथ से मरूँगी’’।

झुनिया तेजी से हार की ओर जाती है और चौधरी के बडे़ लड़के को खेत की मेड़ तोड़ने को मना करती है। चौधरी का लड़का उसे गालियाँ देता हुआ उसके बाल पकड़कर घसीटता है, परन्तु झुनिया बड़े जीवट वाली महिला है। वह उठकर चौधरी को गालियाँ देना शुरू कर देती है।

’’उसने शायद जिन्दगी में पहली बार इतनी सारी गालियाँ दी थीं और शायद इससे पहले चमार टोले की किसी औरत ने किसी चौधरी को उसके मुँह पर इतनी गालियाँ नहीं दी थीं।’’20

क्या होली और क्या दीवाली? लकड़हारे ने कभी जाना ही नहीं कि रक्षाबंधन क्या होता है। उसने तो अपनी दीदी के साथ लकड़ी काटने के मध्य एक झाड़ी में उसकी चीख सुनी थीं और देखा था की परमा उसकी दीदी से ’गुंथा’ हुआ है। क्रोधावेश में उस पर मारी गयी ईंट ने उसे पहुंचाया था थाने में, क्योंकि झोंपड़ियों की लड़कियाँ ही ’ऐसी’ होती हैं- पुलिस की दृष्टि में। भले ही वह सफाई में कहता रहे - ’’हवलदार साहब, मेरी दीदी ऐसी नहीं है’’। लकड़हारा तो पिटा ही और - ’’दीदी को अलग ले जाकर हवलदार न मालूम क्या करता रहा। और हुआ सो हुआ, पर यह बात अच्छी हुई कि देर रात गये हम दोनों को छोड़ दिया गया। दीदी उस दिन खूब रोयी थी।21

दीदी के साथ जो हुआ था, उसे उसने स्वीकार कर लिया था किन्तु अपना भाग्य या अपनी नियति समझकर नहीं। यह नियतिवादी पात्र है या नहीं। यह विवाह करना चाहती हैं, पर किससे? राखी बांधना चाहती है, पर किसे?

’नन्दो’ संघर्षशील नारी है। भाई-भाभी ने माँ-बाप का लाड़-प्यार दिया। चम्बल के बीहड़ों ने उसे निडर बना दिया-’’वह उठी और तनकर बागी सरदार के सामने खड़ी हो गयी-क्यों?......... चम्बल पर क्यों नहीं आऊँ रे चम्बल क्या तेरे बाप की जागीर है?’’22

पुलिस प्रताड़ना से बचने छोटे भाई का साला पूरे परिवार को सुरक्षित स्थान पर ले जाने हेतु आता है। सब जाते हैं। नारी-जीवन में यही सबके भयावह घटना होती है-’’किसी आदमी के प्रथम स्पर्ष से जो गुदगुदी होनी चाहिए थी, वह इतनी निष्ठुर और घृणास्पद थी कि नन्दो तय नहीं कर पा रही थी कि उसको इस घटना के बाद जीवित रहना चाहिए या मर जाना चाहिए....।’’उसके अहसास उसके कोमल भाव इस घटना से कुचल कर मर गये। तभी तो पुनः उसी घटना की पुनरावृŸिा होने पर भी उसमें विरोध के कोई लक्षण प्रकट नहीं होते-’’तभी दो आदमी फिर पौरि के रास्ते से उसके पास आये। अबकी बार वह चीख नहीं विरोध में हाथ-पांव भी नहीं पटके। दोनो ने वही किया लेकिन बड़े आराम के साथ।

सुतिया कोई नारी पात्र नहीं, अपितु नारी का एक आभूषण है, जो गले में पहना जाता है। इसे कहीं कहीं खंगारिया और कहीं हँसुली भी कहते हैं। विवाहित नारियाँ इसे धारण करती हैं। मंगलसूत्र की ही भाँति इसका उपयोग होता है। बद्री सेठ ने सुखऊ के विवाह के अवसर पर उसकी डोकी को जो सुतिया उपहार स्वरूप दी थी, सात साल बाद उपहार की चांदी की साढ़े सत्ता ईस रूपये की वही सुतिया सात वर्षों में साढ़े तीन सौ रूपये के कर्जऱ् में बदल गयी। कर्ज चुकाने में एक खेत की जगह सारे खेतों की रजिस्ट्री बद्रीसेठ ने अनपढ़ सुखऊ से करा ली। प्रभावशाली बद्रीसेठ के सामने उसकी एक न चली। सुखउ के जमदूर पुत्र भीखू ने अपनी अनपढ़, पर व्यावहारिक बुद्धिधारी पत्नी रमिया को यह गाथा सुनायी। रमिया भी बद्री सेठ की इसी जालसाजी का शिकार है। ऐसे और भी अनेक श्रमिक हैं जो सेठ के अत्याचार से पीड़ित है पर हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं। रमिया भीखू को अन्याय के विरूद्ध संगठित होने हेतु प्रेरित करती है।

ऐसा कहा जाता है कि पुरूष की सफलता के पीछे किसी न किसी नारी का योगदान होता है। जड़ भीखू को चेतन बनाकर आदिवासियों के नेता के रूप में स्थापित करने का श्रेय रमिया को है।

’’बाल वर्ष के बाद की माँ’’ कहानी का कथानक तो वही चिर-परिचित है- कुँआरी माँ से उत्पन्न परिवार की ’लाज’ का संकट। पर इसमें नारी के तीन रूप अत्यन्त कलात्मक ढंग से प्रस्तुत किये गये हैं। इसमें पहला पात्र है कंचन, जिसे कुँवारेपन में माँ बनने के अभिशाप ने अभिशप्त कर रखा है। दूसरा पात्र है कंचन की माँ, जिसे कंचन के पिता के साथ परिवार की ’नाक कटने’ का भय है और तीसरा पात्र है उस घर की विश्वासपात्र नौकरानी-रधिया, जो वर्षों पूर्व उसी कंटका कीर्ण मार्ग पर चल चुकी है, जिस पर कंचन अब चली है, इसीलिए उसे कंचन से हार्दिक सहानुभूति है।

रधिया का दूसरा रूप है - विश्वासपात्र नारी का जहाँ एक नौकरानी का इतना उदात्त चरित्र है, वहीं मालकिन का भ्रष्ट चरित्र नारी जाति को कलंकित करने वाला है-’’कंचन की माँ ने लड़के का नाल काटने के लिए हंसिया लेनेे के बहाने रधिया को कमरे से बाहर भेज दिया। वह जैसे ही कमरे से बाहर गयी, वैसे ही माँ ने तत्परता से बच्चे की गर्दन मरोड़ दी। ’लड़के के गले से एक अजीब तरह की आवाज निकलकर शान्त हो गयी और कंचन चीखती हुई चारपाई से उठी और उसी पर गिरकर बेहोश हो गयी। रधिया हाथ में हंसिया लिये कमरे के दरवाजे में अवाक् खड़ी रह गयी।..........रधिया जड़वत् दरवाजे के पास खड़ी थी। उसकी नजरों में अभी कुछ क्षण पूर्व घटी घटना समा नहीं रही थी।23

’नये जिनावर’- जिनावर अर्थात् - जानवर। आज सरकारें परेशान हैं- नक्सलवाद से। नक्सलवाद का मूल क्या है और कहाँं है? युवकों व आम जन का रूझान प्रजातांत्रिक व्यवस्था से क्यों दूर होता जा रहा है और क्यों वे नक्सली बन रहे हैं? इन प्रश्नों के सटीक उत्तर निहित हैं - ’नये जिनावर में’ इसमें इस तथ्य को भी रेखांकित किया गया है कि शोषण का विरोध करने वालों को कैसे ’नक्सली’ घोषित कर मार डाला जाता है। गाँव का थोड़ा पढ़ा लिखा और शिक्षक सोमारू और सोमारू को चाहने वाली बुधनी के साथ यही होता है।

बुधनी सुन्दरी है और जंगल के ठेकेदार की उस पर बहुत दिनोें से कुदृष्टि है। उसे पाने के लिए उसने साम-दाम-दण्ड-भेद-चारों उपाय आजमा लिए हैं। गाँव के कोतवार को तो दिन-रात एक ही चिन्ता है कि वह किस उपाय से बुधनी को ठेकेदार के साथ एक रात सोने को राजी करे? क्योंकि उसकी नौकरी को खतरा है। पर, बुधनी-’’ठेंगा........हर आदमी को ठेंगा। नये पटेल को ठेंगा....जंगल के साहब को ठेंगा, ठेकेदार को ठेंगा...। गजब टूरी है रे भाई। हर किसी को ठेंगा दिखाती है। इस दूरी की सूरत जो भी देखता है, वह दीवाना हो जाता है। जंगल के कितने साहब और कितने ठेकेदार उस पर दीवाने हैं, लेकिन वह किसी को घास भी नहीं डालती।.........वाह री टूटी।24

औरत के शरीर की वांछा अन्य लोगों को भी रही है और मोतीबाई उसकी पूर्ति भी करती रही है। रंगकर्मी ने कोई नयी या अनोखी बात नहीं की थी। मोतीबाई ने अपना तन लुटाया था, मन नहीं। उस समय वह करता उसकी उदरपूर्ति का साधन था, विवशता थी, पर मन सुरक्षित था, जिसकी बगिया में प्यार की खुशबू बिखरती है। बर्षों से सुरक्षित मन - वह हृदय जिस को सौंपा - विश्वासकर वह छलावा निकला। यही मोती बाई के रूप में हर नारी की कहानी है। मोतीबाई को अपने जाये वे बच्चे प्यारे हैं जिनके पिताओ का पता न बच्चों को है और न ही स्वयं मोतीबाई को। परन्तु उसने बच्चे जने हैं, वह जननी है। उसे अपने बच्चों की चिन्ता है - ’’आज उसकी सबसे बड़ी आकांक्षा है कि अपने बच्चों को उस दलदल में फंसने से बचायेे, जो दलदल कभी उसकी माँ को निगल गया था और फिर वह खुद भी उसमें फंसकर अपना सर्वनाश कर चुकी है। वह जानती है कि उसके आसपास की जिंदगी भूख के चलते तबाह है। उसके चारों ओर भूख का डेरा ह। भूख, भूख, भूख। कहीं पेट की भूख तो कहीं तन की भूख। दोनों मिलकर कुछ ऐसी सबल हुई हैं कि जिंदगी को पग-पग पर मटियामेट करती रहती है। इसी कारण से मोतीबाई बड़ी शंकालु हो चली है। भूख रहित संवेदना के प्रति’’।25

देश में अब भी ऐसे अनेक स्थल हैं जहां औरतों की अमानवीय रूप से बिक्री की जाती है।-’’इस इलाके में आज भी जब किसी औरत के नाम की चर्चा चल पड़ती है तो यह चर्चा अन्त में टूटती है उसके बिकने खरीदने की बात पर जाकर। यहाँ औरत को बेचा जाना जानवर के बेचे जाने जैसा सहज है। औरत का व्यापार की वस्तु बन जाना, आज के युग में शुरू नहीं हुआ है, यह इस इलाके की बहुत पुरानी परम्परा है......।’’26

लच्छू गूजर के यहाँ पुलिस के डर से रामकली को पहरे में और बंदूको के साये में रखा जाता है। पर वह रंचमात्र भी भयभीत नहीं होती। एक दिन अवसर पाकर वह भाग जाती है। वर्दी में डाकुओं को पुलिस समझकर वह उनकी ओर सहायतार्थ दौड़ती है, अपनी गाथा सुनाती है और डाकुओं की सहानुभूति तथा सहायता से अपने घर पहुंचती है। डाकुओं कें पत्र के कारण थानेदार भी उसकी भरपूर सहायता करता है

’कृतघ्नता’ मनुष्य के दोमुहेपन की कहानी है। कहानी की नायिका रधिया मेहतरानी से अस्पृश्यता का व्यवहार किया जाता है। उसे गालियाँ दी जाती हैं अपमानित किया जाता है-’’रांड़। खसम को छोड़कर बैठी है और यहाँ गाँव में नित नये खसम करती है....मेरे छोरा को बेदीन कर दिया न हरामजादी ने.......। छोरा से अपने आपको छुपा लिया और खड़ी खड़ी मुस्कुराती रही रण्डी.......। यह भी नहीं बना कि जहां खड़ी है, वहां से हट जाय.....। ’’इसी राधा को बहू के प्रसव के समय न केवल सम्मान दिया जाता है, अपितु रसोईघर के पास वाले कमरे में उसे ले जाया जाता है-’’अम्मा एकदम अधीर हो चली थीं। वह आगे बढ़कर रघिया से बोली-अरे अब वहाँ क्यों रूक गयी। छोटी उधर चौका के पासवाले कमरे में हैं। चल जल्दी।.......छोटे चाचा भी उसी समय राधा की चिरौरी करते हुए बोले-हाँ हाँ राधा दीदी तुम संकोच मत करो। यह तो तुम्हारां ही घर है........ हमारे यहाँ छुआछूत नहीं मानी जाती।27

सकुशल प्रसव किया सम्पन्न होते ही, इन्ही माजी और इन्हीं चाचाजी के रंग बदल जाते हैं। बाहर दरवाजे से लगी चबूतरिया पर खड़ी राधा पर बरसने लगते है-’’तुम लोग सही नीच ही हो। कोई थोड़ी सी भी सह दे दे, प्यार से बोल दे तो तुम लोग उसके सिर पर चढ़कर हग दोगे। हमने तो इंसानियत के नाते कल रात को प्यार से दो शब्द बोल दिये और तूने समझ लिया कि इस घर में तेरी भीतर तक पहंच हो गयी? बदजात कहीं की। चल नीचे खड़ी हो। ’’काम पड़ने पर जो परिवार छुआछूत नहीं मानता या, जो रधिया ’राधा दीदी थी, काम निकल जाने पर वही ’रण्डी’ और ’बदजात’ हो गयी। ऐसी स्थिति में नारी मन को लगी अपमान जनक ठेस से उत्पन्न क्षोभ का आवेग अवर्णनीय है।

’रामजीत ढोलकिया’ भावप्रधान कहानी है। युवा रामजीत के ढोलक-वादन पर हवेली की ढोलक प्रिय ठकुरानी मुग्ध है और ठाकुर की अनुपस्थिति में प्रायः रामजीत को बुलाती है। परन्तु ढोलक वादन तो एक बहाना है। ठकुरानी उसकी दैहिक यष्टि पर मुग्ध हैं रामजीत यह जानता है परन्तु वह स्वयं ठकुरानी की दासी रेशमा पर मुग्ध है और रेशमा इस बात को जानती है। परन्तु-’’किसी पर किसी का रीझना काम नहीं आया। ठाकुर ने ठकुरानी कके पर कतर दिये थे और उसके कारिन्देक रेशमा के पर नोंच डाले थे।’’28

’खूबतघाटी की अहिल्या’ नारी के त्याग, बलिदान और महानता का जीवन्त दस्तावेज है। कहानी की नायिका परिस्थितियों की दासी है। यह विवशतः तन तो बेचती है पर मन नहीं। गौतम प्रिया अहल्या से इसका साम्य मात्र इतना है कि यह खूबतघाटी की अत्यन्त रूपसी नारी है और अपने पितृतुल्य श्वसुर का पक्ष लेने के कारण पति द्वारा परित्यवत्रा है; पर खूबत घाटी की अहल्या पाषाणी नहीं है। श्वसुर की हर हरकत में बिलबिलाती भूख को देखकर उसके रोंगटे खड़े हो गये थे।’’ वह शरीर को दाँव पर लगा देती है। मन को समझाते हुए देह व्यापार से प्राप्त रूपये और होटल की रोटियाँ लेकर जब वह घर लौटती है, तब तक काफी देर हो चुकी थी। श्वसुर भूख से दम तोड़ चुका था। अहल्या का बलिदान विफल हो चुका था, व्यर्थ गया था। ’’सोच रही थी कि आज बूढ़ा होटल की रोटी-तरकारी भरपेट खायेगा तो आशीष देगा। वह भी क्या याद करेगा कि जब लड़का बुढ़ापे में छोड़कर चला गया है, तब बहू ने अपना तन बेचकर उसको ऐसा बढ़िया खाना खिलाया था।29

नांगफाँस यथार्थवादी कहानी है। मध्यप्रदेश में ’हरिजन एक्ट’ का दुरूपयोग भी हुआ। आदमी के मरते ही सबसे पहला उत्पात उसके साथ उसके जेठ ने किया था। उसने उसके आदमी की पांच बीघा जमीन पर सबसे पहले कब्जा किया। फिर उसने उस पर भी ठीक वैसे ही कब्जा कर लेना चाहा, जैसे जमीन पर किया था। ऐसे समय में रमेश सरपंच ने उसकी मदद की थी।

संदर्भ सूची

2- पुन्नीसिंह की कहानियों में सांस्कृतिक मूल्य

स.क्र. कहानी - कहानी संग्रह -पृ. संख्या

1- जाहिद खान-पुनर्नवा (दैनिक जागरण कानपुर), अक्टूवर 2006

2- फौजी-कयामत का दिन- पृ. - 48

3- दूसरा विचार, कयामत का दिन- पृ.-106

4- हारे के हरिनाम-नाग-फाँस - पृ.- 75

5- होरी - नाग-फाँस संग्रह पृ.-22-23

6- लड़की- कयामत का दिन- पृष्ठ 112

7- वही- पृ. - 56

8- वही-पृ.- 114

9- होरी-नाग-फाँस पृ.- 58

10- वही- पृ. - 18

11- काफिर तोता-काफिर तोता - पृ.-18

12- बोधन की नगड़िया-नाग-फाँस- पृ.-48

13- बेड़िनी-गोलियों की भाषा- पृ.-68

14- पुरा अवशेष-नाग-फाँस - पु. 32

15- बेड़िनी - गोलियों की भाषा- पृ.-68

16- गोलियों की भाषा-गोलियों की भाषा- पृ.-10

17- लुप्त संदर्भ- गोलियों की भाषा-17 व 25

18- फौजी-कयामत का दिन- पृ.-67

19- फौजी-कयामत का दिन- पृ.- 69

20- होरी- काफिर तोता - पृ.-14-15

21- लकड़हारे की राखी - काफिर तोता - पृ.-22

22- नन्दो - काफिर तोता - पृ.-60

23- सुतिया - काफिर तोता - पृ.-127-128

24- नये जिनावर - जंगल का कोढ़ - पृ.-9

25- पुरा अवशेष - नाग-फाँस - पृ.-38

26- इस इलाके की सबसे कीमती औरत - नाग-फाँस - पृ.- 59

27- कृतघ्नता - नाग-फाँस - पृ.-86

28- रामजीत ढोलकिया - नाग-फाँस - पृ.-94

29- खूबत घाटी की अहल्या - नाग-फाँस -- पृ.-113

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