एक पाँव रेल में: यात्रा वृत्तान्त - 5 रामगोपाल तिवारी द्वारा यात्रा विशेष में हिंदी पीडीएफ

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एक पाँव रेल में: यात्रा वृत्तान्त - 5

एक पाँव रेल में: यात्रा वृत्तान्त 5


5 जगन्नाथ का भात। जगत पसारे हाथ।


मैं जहाँ भी जाता हूँ पहले वहाँ के सम्बन्ध में होमवर्क कर डालता हूँ। इस यात्रा को करने से पहले मैंने सम्पूर्ण होम बर्क कर लिया था। गंगामैया की कृपा से उसी वर्ष गंगाजल चढ़ाने सर्किल अर्थात् चक्राकार टिकिट बनवाकर यात्रा करने की योजना बना डाली। चक्राकार टिकिट का यह नियम है किं जिधर से जाते हैं उधर से लौटते नहीं हैं। अतः मैं पिताजी- माता जी एवं रामदेवी बहन जी के साथ उत्कल एक्प्रेस से चलकर जगन्नाथ पुरी पहुँच गये। वहाँ भी पण्डा जी के सहयोग से एक धर्मशाला में ठहरने की व्यवस्था हो गई। समुद्रमें स्नान के बाद चन्दन ताल में स्नान कर आये। उसके बाद जगन्नाथ भगवान के दर्श्रन करने में दोपहर होगई।

पण्डा जी ने अपने लोगों के द्वारा जगन्नाथ जी का प्रसाद भिजवा दिया। कहते हैं जगन्नाथ का भात। जगत पसारे हाथ। हम सब ने तृप्त होकर प्रसाद पाया। गरी के तेल के माल पुआ तो इतने स्वादिष्ट थे कि मैं उन्हें स्वाद में अधिक ही खा गया कि दूसरे दिन दोपहर बाद भूख लगी। प्रसाद में लाई गई मिक्स सब्जी भी बहुत स्वादिष्ट थी। उसके स्वाद को आज तक नहीं भूल पाया हूँ। इसमें जाति-पाँति का भेदभाव कही भी दिखाई नहीं दिया। सम्पूर्ण हिन्दुस्तान में इस भात को पाने केी इच्छा रहती है। दूसरे दिन हम वहाँ के साक्षीगोपाल एवं अन्य प्रमुख मन्दिरों के दर्शन कर आये।

यह परम्परा रही है कि जगन्नाथ की यात्रा के बाद चलने से पहले वहाँ से पट-बेंट लेकर चलते हैं। यात्रा पूरी तभी मानी जाती है जब उन पट-बेंट को मथुरा-विद्रावन धाम में पहुँच कर दाऊजी के चरणों में अर्पित कर आते हैं। हमने भी लौटने सो पहले पिता जी की आज्ञा से पट-बेंट दाऊजी में चढ़ाने के लिये लेकर सँभाल कर रख लिये।

वृद्ध माँ-वाप के साथ तीर्थ यात्रा का अलग ही आनन्द होता है। उस समय तो यात्रा में उनका साथ कष्टमय लग सकता है किन्तु जिन्दगी भर उस यात्रा की बातें विस्मृत नहीं कर पाया। मैंने अपना मन बना लिया था कि मैं उन्हें अकेला छोड़कर उन स्थलों के दर्शन करने नहीं जाउँगा जहाँ पिता जी एवं माता जी के जाने की इच्छा नहीं है। इसी करण कोणार्क के सूर्य मन्दिर एवं भुवनेष्वर के मन्दिर की यात्रा नहीं कर पाया। तीसरे दिन दोपहर कटक से हमारा तिरुपति बालाजी के लिये रिजर्वेशन था क्योंकि कटक से ही सीधे तिरुपति बालाजी के लिये ट्रेन थी। अतः जगन्नाथ पुरी से पहली ट्रेन से चलकर कटक पहुँच कर तिरुपति की ट्रेन पकड़ली।

करीब तीस घन्टे में तिरुपति बालाजी पहुँच पाये। वहाँ तिरुपति बालाजी ट्रस्ट की धर्मशाला बुक कराली। रात वहीं व्यतीत की। दूसरे दिन भोर ही तिरुपति बालाजी के दर्शन करने के लिये निकल पड़े। यह स्थल पहाड़ के ऊपर है। टेक्सी से जाने में आसानी रही। वहाँ पहुँच कर दर्शन की व्यवस्था का पता चलाया। हम दर्शन की लाइन में लग गये। भीड़ को कन्ट्रोल करने यात्रियों को बड़े बड़े होलों में भर लिया जाता है। फिर धीरे-धीरे एक एक हाल के लोगों को दर्शन करने निकाला जाता है। यों दर्शन करने छह घन्टे में मुख्य द्वार तक पहुँच पाये। इस स्थिति में पिताजी माता जी का बुरा हाल हो गया। पानी का एक एक घूट पिला कर वहाँ तक आ पाये। वहाँ पहुँच कर गेट का सिपाही पिताजी-माता जी से बोला-‘आप बूढ़े लोग लाइन में क्यों लग गये। आइये, मेरे साथ चलिये। हम उनके साथ लाइन से बाहर निकल आये। उसने हमें दस मिनिट में ही तिरुपति भगवान के दर्शन करा दिये। खैर इससे हमारी छह घन्टे की सारी थकान तिरोहित हो गई। वहाँ के अदभुत लडडुओं का प्रसाद लेकर बस स्टेन्ड आ गये। हमारी दूसरे दिन तीन बजे मदुरै के लिये ट्रेन थी। यही शेष समय व्यतीत करना उचित लगा। इसलिये उसी धर्मशाला में आकर ठहरे रहे।

अगले दिन सुवह ही चेन्नई के लिये निकल पडे़। सुवह की पैसीजर ट्रेन से रवाना होगये। चार घन्टे में हम दस बजे चैन्नई सेंन्टल पहुँच पाये। मैं अकेला ही व्यवस्था देख रहा था। मुझे घर से ही धुन सबार थी कि हमारा रिजर्वेशन एग्मोर स्टेशन से है। वहीं से मीटर गेज ट्रेन मदुरै के लिये जाती है। इसी भ्रम से मैं यह नहीं समझ पाया कि हमें किस स्टेशन से यात्रा करना है। अतः ओटो से हम एग्मोर स्टेशन पहुँच गये। एक स्थान पर बैठकर खाना खाया। उसके बाद मैं दो बजे स्टेशन मास्टर से पूछने चला गया। वह मेरी गल्ती समझ गया। वह बोला-‘टिकिट दिखायें।’

टिकिट देखकर बोला-‘आपको तो चैन्नई सेंन्टल से यह ट्रेन मिलेगी।’ मैं घवड़ा गया। जल्दी में सामान उठाया और स्टेशन से बाहर जाने लगा तो भारी सामान के कारण पैर फिसल गया और सामान के साथ बुरी तरह प्लेटफार्म पर पसर गया। कैसे भी सँभल कर उठा। समय कम बचा था। मुँह मांगे रेट पर ओटो करके चैन्नई सेंन्टल को भागा। संयोग से ठीक समय पर स्टेशन पहुँच गये। ट्रेन स्टेशन पर आकर खड़ी ही थी। बूढ़े लोगों के साथ सीट पर बैठते हुये सोचने लगा। मेरे घर से होम बर्क में यह कमी रह गई कि हमें कहाँ से यात्रा करना है? टिकिट भी ठीक ढंग से नहीं देख पाया। किसी ने यह सुझाया भी नहीं , इसलिये यह भूल हो गई।

सुवह पाँच बजे हम मदुरै पहुँच पाये। मैं ओटो से जाकर होटल तलाश आया। सब को ले जाकर उसमें सिफ्ट कर दिया। मैं भी आराम करने पलंग पर लेट गया। पत्नी बोली-‘सात बज गये पिता जी चाय की कह रहे हैं। मिटटी का तेल लाना पड़ेगा।’

मैं आलस में था बोला-‘थोड़ी देर आराम करने दें, ले आता हूँ।’

वे बोलीं-‘तो मैं चली जाँऊ।’

मैंने सोचा यह अनजान शहर है। ये कहाँ से लायेंगी मिटटी का तेल! यह सोच कर व्यग्य में कह दिया-‘हाँ हाँ चली जाओ।’

वे सच में मिटटी के तेल की छोटी सी कटटी लेकर चलीं गई। मैंने सोचा अभी लौटकर आतीं हैं फिर मैं जाकर ले आउँगा। मैं उनके लौटने की प्रतीक्षा करने लगा। एक घन्टे से अधिक व्यतीत हो गया। मेरा जी घवड़ाने लगा। मैं कपडे पहन कर तैयार होने लगा कि जीने पर उनके चढ़ने की आवाज आई। मैं उधर ही देखने लगा। ये तेल कहाँ से ला पाई होंगी। वे पास आकर बोलीं-‘ लो ले आई तेल और चाय के लिये दूध भी।’

मैंने पूछा-‘भैया, ये सब कैसे कर लाईं?

वे बोली-‘ चौराहे पर एक पुलिस बाला खड़ा था। मैं उसी के पास पहुँच गई। मैं उससे पूछा-‘मिटटी का तेल कहाँ मिलेगा?’

वह मेरी भाषा नहीं समझ पाया तो मैंने उसे ये कटटी सुँघा दी। वह समझ गया। उसने एक आदमी को बुलाया और उससे कहा-‘इन मेडम को जितना ये कहें उतना केरोसिन दिला ला । उस दुकान दार से मेरा नाम ले देना।’ वह मुझे बहुत दूर दुकान पर ले गया। उसने मुझे तेल दिला दिया। वह दुकान दार कह रहा था बस इतना ही। मैंने कहा-‘हाँ इतना ही। उधर से ये दूध भी लेती आई हूँ।’

सच कहूँ, उनके इस विवेक पूर्ण काम के लिये मैं उनके चेहरे की तरफ देखता ही रह गया। आज भी उनके इस विवेकपूर्ण काम के लिये मन ही मन धन्यवाद देता रहता हूँ। इनका साथ न मिलता तो मैं अपनी माताजी और पिताजी को सफलता पूर्वक यात्रा कैसे करा पाता!

वह दिन हमने फिर वहीं गुजारा। मीनाक्षी देवी के दो वार दर्शन किये। सभी जगह घूमते फिरते रहे। अगले दिन सुवह ही रामेश्वरम् के लिये ट्रेन थी। यथा समय स्टेशन पहुँच कर ट्रेन पकड़ली।

हम ग्यारह बजे ही रामेश्वरम् पहुँच गये। मैं वहाँ के पण्डा से मिला। उसने ठीक ढंग से बात ही नहीं की। मैं उसके यहाँ से चला आया। मैंने निश्चय कर लिया कि पण्डा के चक्कर में नहीं पडुंगा। रामेश्वर मन्दिर के पास ही अलंकार होटल में कमरा ले लिया। व्यवस्थित हो गये। चाय पीकर समुद्र में स्नान करने चले गये। रामेश्वर मन्दिर के दर्शन के बाद वहाँ जल चढ़ाने की रीति का जायजा लेते रहे। दोपहर होटल में आकर खाना बना कर खाया।


गंगाजल चढाने से पहले वहाँ के तीर्थें से सम्बधित वाइस कुओं पर स्नान अनिवार्य है। दूसरे दिन रसीद कटाकर वाइस कुओं पर स्नान कर आये। गंगाजल चढाने के लिये जाने लगे। पत्नी रामश्री ने सोचा- गंगाजल भरने मैं गोमुख जा नहीं पाई। इसीलिये गंगाजल का पात्र उन्होंने उठाा लिया। मैंने सोचा- कैसी है? गंगामैया से प्रार्थना किये बिना गंगाजल का पात्र हाथ में ले लिया! उन्होंने ठीक उसी समय गंगाजल का पात्र लौटाकर वहीं के वहीं रख दिया। मैंने पूछा-‘‘क्यों?’’

वे बोली-‘‘ध्यान नहीं रहा , परमहंस गौरीशंकर बाबा क्षमाकरें। उनसे गंगाजल लेकर चलने का निवेदन करना चाहिये था कि नहीं? ये गंगाजल तो उन्हीं का है ना।’

इसके बाद परमहंस गौरीशंकर बाबा से गंगाजल लेकर चलने की प्रार्थना की। पत्नी रामश्री ने श्रद्धा-भक्ति से गंगाजल का पात्र उठा लिया। मन्दिर पहुँचकर गंगाजल चढाने वाली पंक्ति में लग गये। वहाँ दो तरह की पंक्तियाँ थी। एक गंगाजल चढ़ते हुये खड़े-खड़े दर्शन करने वाली सस्ती दर वाली पंक्ति । दूसरी मन्दिर के समक्ष बैठकर गंगाजल चढ़ते हुये दर्शन करने वाली कुछ महगी दर की पंक्ति । हम भूल से खड़े-खड़े गंगाजल चढ़ने वाली पंक्ति में लग गये थे। पुजारी जी के पास पहुँचकर पता चला कि हम गलत पंक्ति में लगे हैं। हमने उनसे अपनी भूल की बात कही। वे बोले-‘‘ जाकर दूसरी पंक्ति की तरफ से आओ।’’

हम उधर के लिये चल पड़े। गंगाजल का छोटा सा पात्र इतना भारी होगया कि पत्नी से चला नहीं जारहा था। वे बोलीं-‘‘ गंगाजल का पात्र इतना भारी होगया है कि मुझ से चला नहीं जारहा है इसे सँभालो।’’

उनकी बात सुनकर मैं समझ गया- गंगा माँ अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही हैं। मुझे उनकी शक्ति के संदर्भ में व्यवधान नहीं बनना चाहिये। यह सोचकर मैंने पत्नी को समझया- ‘‘परमहंस गौरीशंकर बाबा का गंगाजल है वे अपने आप सहारा देंगे।’’ कुछ ही क्षणों में हम मुख्य द्वार पर पहुँूच गये। परमहंस गौरीशंकर बाबा के नाम से जल चढ़ने के लिये पुजारी जी को दे दिया। पिताजी-माताजी ने भी अपना गंगाजल अपने नाम से चढ़ने के लिये पुजारी जी को सौंप दिया। हमारी आँखों के समक्ष गंगाजल से रामेश्वरम् भगवान का अभिषेक हो गया। हम खुशी-खुशी होटल में लौट आये।

मैं होटल आकर सोचने लगा- इस घटना से हमें गंगा माँ के अस्तित्व का बोध हो गया हैं। घटना के बाद तीन दिन तक श्रीमती जी को वेहोशी सी बनी रही। इतनी हाई पावर का आवेश हुआ हो फिर कैसे वेहोशी सी न रहती? यही शक्ति के आवेश का प्रमाण है। तब से हर पल लगता रहता है, निश्चय ही गंगा माँ आज भी एक शक्ति के रूप में हमारा भौतिक एवं आध्यत्मिक कल्याण कर रहीं हैं।

अगले दिन राम झरोका, समुद्र और सुग्रीव आश्रम के दर्शन कर आये। उससे अगले दिन कन्या कुमारी के लिये निकल पड़े। हमारे टिकिट में रामष्वर से कन्या कुमारी लिया था। बैसे कन्या कुमारी के लिये रास्ता तो मदुरैसे ठीक रहता है। लोगों के परामर्श से यह भूल भी हा ेगई। हम टिकिट के अनुसार पथ पर चल पड़े। इसमें तीन स्थानों पर ट्रेन बदलना पड़ी। बूढ़े लोगों कें साथ यह बहुत समस्या बहुत बड़ी रही। यों दस घन्टे का रास्ता अठारह घन्टे में टेªनें बदलते हुये नागर कोविल होते हुये कन्या कुमारी सुवह आठ बजे तक पहुँच पाये।

रात भर के थके थे, इसलिये टेक्सी वाले से कह दिया , ऐसे होटल में ले चलें जहाँ से कन्या कुमारी के समुद में स्थित स्वामी विवेकानन्द स्मारक के दर्शन होते रहें। टेक्सी बाले ने सही होटल में पहुँचाया। उसमें ऐसा कमरा ले लिया जहाँ से पिताजी-माताजी को बैठे-बैठे उस स्मारक के दर्शन होते रहें। पहले दिन तो पिताजी-माताजी को वहाँ के सभी स्थलों के दर्शन कराये। पानी के जहाज से जाकर स्वामी विवेकानन्द स्मारक के भी दर्शन करा लाया। हम वहाँ तीन दिन रहे। सुवह-शाम उगते-डूवते सूर्य की आभा के दर्शन एवं घूमना- फिरना पिताजी-माताजी के साथ ही रहा। शेष समय वे दोनों उस खिड़की में बैठे रहते और अपने परम प्रिय संत विवेकानन्द के स्माारक के दर्शन करते रहते। यहाँ गाँन्धी स्मारक एवं कन्याकुमारी के मन्दिर के नित्य दर्शन का लाभ लेते रहे। इस तरह चौथे दिन सुवह ही वहाँ से तिरुअनन्तपुपम् के लिये निकल पड़े और वहाँ से केरला ट्रेन से ग्वालियर लौट आये।

हमारा सर्किल टिकिट ग्वालियर तक का ही था। हमें दाऊजी पट-बेंट चढ़ाने के लिये जाना ही था। उसके बाद मथुरा- विन्द्रावन होते हुये गोवर्धन की परिक्रमा भी करनी ही थी। ग्वालियर के स्टेशन पर पुत्र राजेन्द्र एवं उसकी पत्नी आशा भी हमारे लिये खाना साथ लेकर आ गये। आगे के टिकिट भी ले लिये। जो सामान आवश्यक नहीं था, उसे राजेन्द्र के पास छोड़ दिया। स्टेशन पर खाना खाकर अगली ट्रेन से जनरल के डिव्वे में बैठकर मथुरा के लिये रवाना हो गये। 000000


हम स्टेशन से सीधे ओटो करके दाऊजी पहुँच गये। सहज तलाश में ही हमारे पण्ड़ा जी मिल गये। उनका बस्ती के बाहर ही उनके यात्रियों को ठहरने की व्यवस्था थी। हमें पण्डा जी ने उसी में ठहरा दिया। वहाँ के कुण्ड में पण्डा जी ने पट-बेंट का पूजन कराया। उसके बाद दाऊ जी पर पिताजी के हाथ से पट-बेंट अर्पित करवा दिये। उसके बाद पण्ड़ा जी के सहयोग से भण्डारे की व्यवस्था हो गई। कन्या एवं ब्राह्मण भोजन कराये। पिताजी से उन्हें दक्षिणा अर्पित करा दी। इस तरह भण्डारे से निवृत होकर हम गोवर्धन के लिये चल दिये। रात वही मानसी गंगा के किनारे एक पण्डा जी के यहाँ ठहर गये।

सुवह से ही रेडा कर लिया । माताजी-पिताजी उसमें बैठ गये। मैं ,पत्नी रामश्री एवु उनकी बहन ने पैदल परिक्रमा उठाली। रेडा वाली घीरे-धीरे हमारे साथ चलता रहा। इस तर छह घन्टे में परिक्रमा दे डाली और रात वृन्द्रावन में एक धर्मशाला में कमरा लेकर ठहर गये।

दूसरे दिन सुवह से ही निवृत होकर ओटो से माता जी एवं पिता जी को लेकर प्रमुख-प्रमुख मन्दिरों के दर्शन करा लाये। पिताजी यमुना किनारे कदम के पेड़ के दर्शन करने जरूर गये। मैंने पूछा-‘ इस वृक्ष के दर्शन में बड़ी रुचि रही, क्या बात है?

वे बोले-‘मुझे लगता रहा है, मेरे इष्ट इसी कदम के वृक्ष के नीचे बैठे वाँसुरी बजा रहे हैं।’

मैंने पूछा-‘ क्या आपको कभी वाँसुरी की आवाज सुनाई पड़ी है?’

उन्होंने उत्ता दिया-‘मैं जीवन भर उस वाँसुरी की आवाज सुनने तरसता रहा हूँ। कभी कभी लगा है कोई वाँसुरी सी आवाज सुन पड़ रही है,ऐसा भाष हुआ किन्तु स्पष्ट रूप से वह आरवाज सुनाई नहीं पड़ी। कहीं स्पष्ट रूप से सुनाई पड़ जाती तो मेरा कल्याण ही हो जाता।’

घर आकर याद हो आई थी दादी की बातें। वे कहा करतीं थीं-‘ तुम्हारे दादा जी परम योगी थे। वे नेती- घोती जैसी क्रियायें प्रति दिन किया करते थे। उन्हें अनहदनाद सुनाई पड़ता था। वे घन्टों एकान्त में साधना रत रहते थे। जब तुम्हारे पिता जी छह माह के थे तभी वे संसार से चले गये। दादी ने ये बातें मेरे पिताजी से भी कहीं होगीं। मेरी भूल यह रही मैंने उनसे इस सम्बन्ध में कभी चर्चा नहीं की। शायद इन्हीं बातों के कारण पिताजी को भी अनहदनाद सुनने की चाह रही होगी।

पिताजी से मैंने वृन्द्रवन में अनहदनाद की बात जब से सुनी है तभी से मैं भी अनहद नाद सुनने का इच्छुक हो गया हूँ पर यह तो गुरु कृपा से ही सम्भव है अथवा मंत्रों के जाप से भी शक्पिात होने पर नाद शुरू हो जाता है। उस दिन से मैं इसी की खोज में प्रयास रत हूँ।

मैं गौमुख से एक कट्टी में गौमुख का अतिरिक्त गंगाजल साथ लेकर आया था। घर के मन्दिर में उसे विराजमान कर दिया है। प्रतिदिन घर के मन्दिर के पूजन के साथ उनकी पूजा भी चल रही है।

एक दिन मेरे गाँव सालवई के मित्र बाला प्रसाद शुक्ल का घर में आगमन हुआ । वे आते ही बोले-‘भावुक जी, इन दिनों बाल मकुन्द राजौरिया काका जी कह रहे हैं कि मैं बूढ़ा होगया हूँ। बहुत पहले गंगाजल तो भर लाया था किन्तु अभी तक चढ़ाने के लिये रामेश्वरम् नहीं जा पाया हूँ। तुम साथ चलकर गंगाजल चढ़वा आओ।’

वे पुनः बोले-‘मेरे साथ समस्या यह है कि मैं गंगाजल भरने नहीं जा पाया हूँ किन्तु काका कह रहे हैं कि जल तो चढ़ाने के लिये वहीं मिल जाता है। तुम तो साथ चले चलो। बताइये भावुक जी मैं क्या करू?’

मैं अपने मन्दिर के समक्ष ही बैठा उधर ही देख रहा था। मेरे चित्त में उत्तर आया-‘देखो शुक्ल जी, मेरे यहाँ परमहंस गौरीशंकर बाबा के द्वारा गौमुख से लाया गंगाजल रखा है। आप परमहंस जी से गंगाजल रामेश्वरम् के अभिषेक के लिये माँग ले। एक छोटा सा पात्र ले आये। मैं उसमें गंगाजल भर कर परमहंस जी के समक्ष रख दूँगा। उस जल को ले जाकर रामेश्वरम् का अभिषेक कर आयें।

वे परमहंस जी से जल लेकर काका जी के साथ रामेश्वरम् चले गये। कुछ दिनों बाद शुक्ल जी का घर आना हुआ। वे आते ही बोले-‘भावुक जी, जब मैं जल चढ़ाने रामेश्वर के मन्दिर में पहुँचा, जाने कैसे वहाँ के पुजारी जी की दृष्टि मेरे ऊपर पड़ी। उन्होंने मुझे बलवा लिया और बोले-देखो, गंगाजल तो अभिषेक के लिये यह आया है। उन्होंने मेरे हाथ से पात्र ले लिया और जाकर सीधे उसी पात्र से रामेश्वरम् की पिंड़ी का अभिषेक कर दिया। मैं देख रहा था औरों का जल तो वे अपने पात्र में उडे़लकर अभिषेक करने ले जा रहे थे । मेरे छोटे से पात्र से रामेश्वरम् का सीधा अभिषेक मुझे आष्चर्य में डाल रहा था।

उस दिन से हर पल गंगामैया की शक्ति का बोध होता रहता है। निश्चय ही मृत्यु के समय गंगाजल की एक बूँद आदमी के कण्ठ में पहुँचकर उसे मुक्त करने में समर्थ है। हमारा कर्तव्य है कि हम गंगामैया को प्रदूषण से मुक्त रखें।

हमारे देश में जो जनश्रुति प्रचलित है कि यदि प्राणी के अन्तिम समय में प्राण निकलते समय गंगाजल की एक बूँद उसके कण्ठ में पहुँच जाये निश्चय ही उसका कल्याण होजाता है।

गंगा मैया से हुये साक्षात्कार से यह जनश्रुति आज के परिवेश में भी प्रमाणिक हो गई है।


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