बेनाम शायरी - 4 Er.Bhargav Joshi અડિયલ द्वारा कविता में हिंदी पीडीएफ

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बेनाम शायरी - 4


बेनाम शायरी

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अपने वजूद को यूं बचाए रखकर समर नहीं छेड़ा जाता।
"बेनाम" कुरबानी में सबसे पहले सर कटाना पड़ता है।।

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कुछ अनजाने अनसुने ख्वाब चुने है हमने।
कैसे कहे क्यों उसे दिन रात बुने है हमने।।

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बे घड़ी बेवक्त बेवजह यूं रूठ ना जाया करो।
जुबां की बातों को यूं दिल में ना दबाया करो।।

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फिर जख्म दे गई ये सावन की बारिश मुझे।
फिर से याद आ रहे है भूल जाने वाले मुझे।।

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साथ मिट्टी के सिवा कोई नहीं निभाता है जहान में।
छोड़ चलते है सब चाहे इश्क हो या लहू के संबंध में।।

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फिर कोई शमा तो होगी,
फिर कोई परवाना जलेगा।

आंसू आंखो से पोछने आये,
ऐसा भी कोई दीवाना होगा।।

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यह तख्तो ताज, शान-ओ-शोकत का हमें शोख नहीं।
एक छोटी सी ख्वाहिश है, तेरे दिल में बस जाने की।।

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तेरी जुल्फो का हवाओ के संग लहराकर उड़ना,
यूं ही आपका आधी राह में पूछे देखकर मुड़ना।

गजब ठा गया जब आपकी पलको का छुपना,
फिर मुश्किल हो उठा हमारी नींद का टूटना।।

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तेरे संग रहकर मुजमे कुछ आदतें पड़ी,
होश में भी मदहोश होने की आहते पड़ी।

मै क्या था तेरे बिन इस रसधरा में यारा,
तेरे होने से खुद को जानने की चाहते पडी।।

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चाहत है लखलूट इसका क्या प्रमाण दे।
दर्द में भी मुस्कुराते है, अब क्या प्राण दे!?

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मुश्किल है जख्मों को लफ़्ज़ों में बयां करना।
आंखे अक्सर ये काम आसानी से करती है।।

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न चुभा, न दिखा,बस सिर्फ महसूस किया।
दर्द और गम को भी मैं बहुत खूब जिया।।

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क्या परवान चड़ा इश्क !? क्या किस्मत पाई !?
दर्द से लगाव मिला और बेवफाई हिस्से आई।।

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क्या मिला सबकुछ या मिली रुसवाई !?
इश्क में साकी यही तो मिलती तुरवाई ।।

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ये बेनायाब शख्शियत तुझसे बिछड़ना जरूरी था मेरा।
वो राह छोड़कर जाने से पहले बिखरना जरूरी था मेरा।।

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मानो तो जहान में चाहत से बठकर कुछ भी शामिल नहीं।
मिल जाए सच्ची चाहत तो खुदा भी उस के काबिल नहीं।।

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ढूंढने हम खुद को कई बार गए है,
खाली ये मेरे प्रयास सौ बार गए है।

एक अजनबी आया था एहसास में,
फिर पा लिए हम खुद के द्वार गए है।।

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जिंदगी की हर राह तब आसान बन उठी ।
वो मिल लिए तो राह भी मंजिल बन उठी।।


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Thank you 😊
...✍️ Er. Bhargav Joshi "benaam"

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[ क्रमशः ]