ज़िन्दगी की धूप-छाँव - 8 Harish Kumar Amit द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

ज़िन्दगी की धूप-छाँव - 8

ज़िन्दगी की धूप-छाँव

हरीशं कुमार ’अमित'

कारण

लोकल बस में मैं एक और एक अन्य नवयुवक ‘केवल महिलाए’ वाली सीट पर साथ-साथ बैठे सफ़र कर रहे थे. एक स्टॉप पर बस जब रूकी तो चढ़नेवालों में एक वृद्धा भी थी. टिकट लेकर जब वह हमारी सीट के पास आई तो उसने मेरे साथ बैठे नवयुवक से सीट देने के लिए कहा, मगर वह तनकर बैठा रहा और कहने लगा, ‘‘लाइन में लगकर चढ़े हैं!’’ मुझे बहुत बुरा लगा. मैंने उससे तो कुछ नहीं कहा, पर खिड़की के साथ वाली अपनी सीट छोड़ दी. लेकिन वह अपनी सीट से खिसककर मेरी सीट पर भी नहीं आया. तब वह वृद्धा मेरे वाली सीट पर आकर बैठ गई. मैं उस नवयुवक के पास ही छत का डंडा पकड़कर खड़ा हो गया.

दो-तीन स्टॉप्स के बाद एक आधुनिका बस में चढ़ी, टिकट लेकर वह अभी उस नवयुवक की सीट के पास पहुंची ही थी कि वह झट से तिरछा होकर बैठते हुए कहने लगा, ‘आइए, मैडम एडजस्ट हो जाइए.’

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भीड़

लोकल बस में आज पहले की अपेक्षा काफ़ी ज़्यादा भीड़ थी. लोग कह रहे थे कि इस रूट की इससे पहलेवाली दो बसें मिस हो जाने की वजह से ऐसा था. वह भी यात्रियों के साथ भीड़ में पिसता हुआ सफ़र कर रहा था. हर स्टॉप पर बस रूकने पर और लोग अन्दर चढ़ आते जिससे भीड़ का दबाव बढ़ता जा रहा था. वह मना कर रहा था कि ड्राइवर हर स्टॉप पर बस न रोके ताकि भीड़ और न बढ़े.

अगले एक स्टॉप पर बस रूकने पर एक नवयुवती भी बस में चढ़ी. आगे जाने की जगह न होने के कारण उसके पास ही खड़ी हो गई. भीड़ की वजह से उस नवयुवती को उसके साथ काफी हद तक सटना पड़ रहा था. उसके चेहरे की सारी परेशानी घुल गई. अब वह मनाने लगा कि भीड़ और बढ़े, और बढ़े.

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रंग चोखा-ही-चोखा

‘‘यार मोहित, पहले तो शाम को तुझे दफ़्तर से भागने की बड़ी जल्दी रहती थी. कहता था देर से निकलो तो मेट्रो पकड़ने से पहले सुरक्षा जाँच के लिए खड़े लोगों की लम्बी लाइन में लगना पड़ता है, मगर अब तो तुझे शाम को कोई हड़बड़ी नहीं होती. तू दफ़्तर का समय ख़त्म होने के बाद भी पन्द्रह-बीस मिनट तक यहीं बैठा रहता है. क्या वजह है यार इसकी?’’

‘‘वो ऐसा है नितिन कि मुझे एक सूरदास का सहारा मिल गया है.’’

‘‘मतलब?’’

‘‘मतलब यह कि साथ वाली बिल्डिंग के एक दफ़्तर में काम करनेवाला एक सूरदास शाम को मेट्रो पकड़ता है. जब वह अपनी बिल्डिंग से बाहर आता है तो मैं उसका हाथ पकड़कर उसे मेट्रो स्टेशन के अन्दर तक ले जाता हूँ और सुरक्षा जाँच के लिए लगी लाइन के बिल्कुल शुरू में चला जाता हूँ. फिर उसे मेट्रो के डिब्बे तक छोड़ने की बात कहकर उसके साथ ही आगे निकल जाता हूँ. इस तरह मुझे लाइन में भी नहीं लगना पड़ता और मैं घर भी जल्दी पहुँच जाता हूँ. इसे ही कहते हैं हींग लगे न फिटकरी और रंग चोखा-ही-चोखा! ’’

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मौन सुख

मैं मेट्रो में वरिष्ठ नागरिकों एवं विकलांगों के लिए आरक्षित दो सीटों पर बैठा सफ़र कर रहा था. मेरे साथ वाली सीट खाली थी.

एक स्टेशन पर रूककर जब मेट्रो आगे चली, तो मुझे महसूस हुआ कि मेरी बगल में आकर कोई बैठ गया है. उसके बाद उस यात्री ने मुझसे दो-एक बातें कीं, जिनसे यह साफ़ हो गया कि वह मेट्रो में पहली बार यात्रा कर रहा था.

फिर वह यात्री तिरछा होकर बाहर के दृश्य देखने लगा. बीच-बीच में उसके मुँह से ‘अरे वाह!’, ‘कमाल है!’ जैसे शब्द भी निकल जाते थे. ज़ाहिर है कि वह मेट्रो की अपनी पहली यात्रा में बच्चों की तरह उत्साहित था. उस यात्री के टेढ़ा होकर बैठने से मुझे काफ़ी असुविधा हो रही थी, पर मैं यही सोचकर चुप बैठा रहा कि मैं तो बाहर के दृश्य देखने में असमर्थ हूँ, कम-से-कम वह यात्री तो बाहर के दृश्यों का मज़ा ले ले.

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वक़्त बनाम वक़्त

रात के साढ़े ग्यारह बज चुके थे, मगर मैं सो नहीं पा रहा था. वजह थी मेरी पत्नी के मुँह से निकल रही ‘हाय’ ‘हाय’ की आवाज़ें. शाम को दफ़्तर से घर आने पर मुझे पता चला कि पत्नी के सिर में सख़्त सिरदर्द है. फिर रात का खाना भी बाहर से मँगवाना पड़ा था. ऐसा सिरदर्द हर तीन-चार महीने बाद उसे हो जाया करता था. ऐसी स्थिति में ली जानेवाली दवाई उसने ले ली थी, मगर उसका कराहना जारी था. इतने सालों के वैवाहिक जीवन के बाद यह बात मुझे अच्छी तरह से पता चल चुकी थी कि तबीयत में थोड़ी-सी भी ख़राबी आने पर आसमान सिर पर उठा लेना उसकी आदत है.

‘‘अब सो भी जाओ! बारह बजने वाले हैं. कल सुबह मुझे कुछ जल्दी जाना है ऑफिस. कोई मीटिंग है.’’ आख़िरकार मैंने झुँझलाकर कह ही दिया.

पता नहीं यह मेरे डाँटने का असर था या दवा का, कुछ ही देर में पत्नी को नींद आ गई और फिर बदस्तूर उसके ख़र्राटे कमरे में गूँजने लगे.

अगली सुबह मैं कुछ जल्दी उठ गया था - ऑफिस कुछ जल्दी जो जाना था, मगर पत्नी तो जैसे अब भी घोड़े बेचकर सो रही थी. मैं उसे जगाने की कोशिश करने लगा, लेकिन शायद पिछली रात को ली गई दवा के असर के कारण वह अब भी गहरी नींद में थी.

‘‘कल रात को तो बार-बार तुम्हें सोने के लिए कह रहा था, पर तुम सो नहीं रही थीं और अब तुम्हें उठ जाने के लिए कह रहा हूँ और तुम उठ नहीं रही हो. क्या तमाशा है!’’ झुँझलाहट भरी आवाज़ में मैं बोल उठा.

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खट्टी चॉकलेट

बच्चा जब भी माँ-बाप से चॉकलेट की फ़रमाइश करता, वे झट-से उसे यही जवाब देते कि चॉकलेट खट्टी होती है. इसे खाने से गला ख़राब हो जाता है और खाँसी लग जाती है.

माँ-बाप के मुँह से बार-बार यही बात सुन-सुनकर बच्चे ने भी मान लिया था कि चॉकलेट खट्टी ही होती है.

एक दिन किसी दूसरे शहर से बच्चे के चाचा जी उन लोगों के पास आए. वे बच्चे के लिए चॉकलेट का डिब्बा लाए थे. उन्होंने जैसे ही वह डिब्बा बच्चे की ओर बढ़ाया, वह ज़ोर से कहने लगा, ‘‘चॉकलेट तो खट्टी होती हैं. इसे खाने से गला ख़राब हो जाता है और खाँसी लग जाती है. मुझे तो झुमरू की दुकान से चूरन वाली गोलियाँ दिला दो.’’

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छतरी

लोकल बस के इन्तज़ार में बस स्टॉप पर खड़ा था. बस स्टॉप पर कोई शेड वग़ैरह नहीं था सिर्फ़ एक खम्बे पर लगे बोर्ड से पता चलता था कि वह बस स्टॉप है. अचानक हल्की-हल्की-सी बूँदाबाँदी होने लगी. संयोग से मेरे पास छतरी थी, इसलिए मैंने उसे खोलकर अपने सिर पर कर लिया. तभी यह सोचकर कि मेरे पास खड़े व्यक्ति पर भी बारिश पड़ रही होगी, मैंने थोड़ा-सा दाईं तरफ़ खिसककर उस व्यक्ति के सिर के ऊपर भी छतरी करनी चाही, मगर मेरी इस हरक़त पर वह व्यक्ति एकदम से भड़क उठा, ‘‘सीधी तरह खड़े नहीं हो सकते क्या? बारिश से ज़्यादा पानी तो आपके छाते से टपककर मुझे भिगो रहा है.’’

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क्रिया-प्रतिक्रिया

लोकल बस में यात्रा करते हुए मेरा मोबाइल फ़ोन बार-बार बज उठता था. अपनी पैंट की बाईं जेब से फोन निकालने के लिए मुझे सीट पर बैठे-बैठे थोड़ा सा दाईं ओर झुकना पड़ता. बातचीत खत्म होने के बाद फोन को उसी जेब में रखने के लिए मुझे फिर उसी तरह दाईं तरफ़ झुकना पड़ता. ऐसा जब दो-तीन बार हुआ, तो मेरी दाईं तरफ़ बस की खिड़की के साथ बैठा यात्री झुँझलाकर कहने लगा, ‘‘यह सब क्या है? सीधे क्यों नहीं बैठते?’’

मेरे हिसाब से तो उसे मेरे इस तरह दाईं तरफ़ झुकने से कोई विशेष असुविधा होने का सवाल ही पैदा नहीं होना चाहिए था, पर फिर भी मैंने उसकी बात को ध्यान में रखा और अपना फोन पैंट की जेब से निकालकर कमीज़ की ऊपरी जेब में रख लिया.

कुछ समय बाद मैंने देखा कि उस यात्री को झपकी आ गई और सोते हुए उसका सिर मेरे दाएँ कंधे से आ लगा.

यह देख एकबारगी तो मेरा मन चाहा कि मैं भी अपने मन की भड़ास निकालने के लिए उसे जगाकर कुछ उल्टा-सीधा सुना दूँ, पर फिर न जाने क्या सोचकर चुप रह गया.

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धुँध

रात के अंधेरे को चीरती टैक्सी तेजी से सड़क पर दौड़ रही थी. मेरा मन बार-बार पिताजी की यादों में खोने लग जाता जो अब इस दुनिया में नहीं रहे थे. क़रीब एक घंटा पहले ही कैथल से छोटे भाई का फोन आया था कि दिल का दौरा पड़ने से पिताजी चल बसे हैं. पिताजी की ऐसी अचानक मौत ने मुझे अन्दर तक झिंझोड़ दिया था. उनकी पहली सन्तान होने के कारण उनका सबसे ज़्यादा लाड़-प्यार शायद मेरे ही हिस्से में आया था. अभी तो पिताजी की उम्र भी कुछ ज़्यादा नहीं हुई थी. साठ के भी नहीं हुए थे अभी.

आधी रात के समय कैथल जाने के लिए कोई बस या रेलगाड़ी तो मिलनी नहीं थी, इसलिए हम लोग (मैं, मेरी पत्नी और दोनों बच्चे) एक टैक्सी किराए पर लेकर तुरन्त ही कैथल के लिए निकल पड़े थे.

जैसी तेज़ गति से टैक्सी चल रही थी, वैसी ही तेज़ गतिवाला संगीत भी टैक्सी में लगे म्यूजिक सिस्टम में बज रहा था. मैं ड्राइवर के साथ अगली सीट पर बैठा हुआ था. काफ़ी देर से मैं देख रहा था कि ड्राइवर बीच-बीच में गाने की धुन पर स्टेयरिंग पर अपने हाथ से ताल देने लगता था. साथ ही कभी-कभी वह किसी गाने की कोई पंक्ति भी गुनगुनाने लगता. हद तो तब हो गई जब उसने एक गाने के साथ-साथ अपने होठों को गोल करके सीटी बजाना भी शुरू कर दिया.

यह सब देख मेरे सब्र का बाँध टूट गया. एक तरफ़ मेरा दिल रोने को कर रहा था और दूसरी तरफ़ वह ड्राइवर तेज़ संगीत सुनते हुए गीत गुनगुना रहा था और साथ ही सीटी भी बजा रहा था.

मुझसे रहा न गया और मैं ड्राइवर से थोड़ा सख़्त लहज़े में बोला, ‘‘यह सब क्या है, भई? तुम्हें पता है न कि मेरे पिताजी की मौत हो गई है और तुम हो कि ये फिल्मी गाने सुनते हुए गुनगुना रहे हो और सीटी बजा रहे हो.’’

मेरी बात सुनकर ड्राइवर ने बिना विचलित हुए सड़क की सीध में देखते हुए जवाब दिया, ‘‘सर, यह सब मैं आपके लिए ही कर रहा हूँ. आप जानते हैं मैं अभी शाम को ही मसूरी से तीन दिन बाद वापस आया था. वापस आकर अभी दो घंटे ही सो पाया था कि आपने रिक्वेस्ट करके मुझे कैथल चलने के लिए कह दिया. मुझे भी नींद आती है, सर. मैं जानता हूँ कि आपके पिताजी गुज़र गए हैं, लेकिन अगर मैं ये गाने न सुनूँ, इस तरह न गुनगुनाऊँ या फिर सीटी न बजाऊँ, तो शर्तिया मुझे भी झपकी आ जाएगी. और तब क्या होगा, यह आप समझ ही सकते हैं. ’’

ड्राइवर के जवाब ने मुझे निरुत्तर कर दिया था.

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मतलबपरस्ती

‘‘यार, धीरज कुमार का मोबाइल नम्बर चाहिए था.’’ वे अपने साहित्यिक मित्र से कह रहे थे.

‘‘क्यों उससे क्या काम पड़ गया कवि महोदय? आपको तो उसकी कविताएँ बस घटिया तुकबन्दी लगती हैं.’’

‘‘यार, ऐसा है कि धीरज कुमार अब ‘राग-रंग’ जैसी प्रतिष्ठित पत्रिका में सहायक सम्पादक लग गया है. जान-पहचान बढ़ाएँगे तो छपने के मौके बनेंगे न पत्रिका में. क्या शानदार पारिश्रमिक मिलता है वहाँ से!’’

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सीट

शाम को दफ़्तर से छुट्टी करके घर जाने के लिए बस में चढ़ा, तो पाया कोई सीट ख़ाली नहीं थी. तभी एक सीट पर बैठे अपने अधीनस्थ पर नज़र पड़ गई. शायद उसने भी मुझे देख लिया था, पर जान-बूझकर न देखने का नाटक कर रहा था.

अभी एक घंटा पहले इसी अधीनस्थ को मैंने अपने कमरे में बुलाया था और दफ़्तर के किसी काम में लापरवाही बरतने के लिए ख़ूब डाँट लगाई थी. इस दौरान मैंने उसे कुर्सी पर बैठने तक के लिए नहीं कहा था.

बस में खड़े होकर यात्रा करते हुए यह बात मेरी समझ में आने लगी थी कि ये सब चक्कर सीट के ही हैं.

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vishi

vishi 2 साल पहले