चिरइ चुरमुन और चीनू दीदी - 1 PANKAJ SUBEER द्वारा बाल कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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चिरइ चुरमुन और चीनू दीदी - 1

चिरइ चुरमुन और चीनू दीदी

(कहानी पंकज सुबीर)

(1)

इस कहानी में जो चिरइ चुरमुन हैं वो ही ‘हम’ हैं । ‘हम’ का मतलब वो जो कहानी सुना रहा है । यहाँ पर ‘मैं’ की जगह पर ‘हम’ इसलिये सुना रहा है कि यहाँ कहानी किसी एक की नहीं है बल्कि हम काफी सारों की है । हम ही यहाँ पर प्रथम पुरुष हैं । हम काफी सारे जो उस समय वैसे तो चिरइ चुरमुन में गिने जाते थे, लेकिन हक़ीक़त ये थी कि हम उस समय चिरइ चुरमुन थे नहीं । ‘हम’ का मतलब इस छोटे से क़स्बे के सरकारी हस्पताल (प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र) के कैम्पस में रहने वाले हम कुछ बच्चे। हम अस्सी के दशक के मध्य में अपना बचपन छोड़ रही पीढ़ी के चिरइ चुरमुन थे । हमारे पास गोपनीय सूचनाओं का सर्वथा अभाव था । चंदामामा, नंदन अब हमें अच्छी नहीं लगती थीं और सत्यकथा, मनोहर कहानियाँ पढ़ने की हमें मनाही थी । गृहशोभा, मनोरमा तक हमसे दूर रखी जाती थीं । दूर इसलिये रखी जाती थीं कि हम उनमें से प्रश्न उत्तर, उलझाव सुलझाव या डॉक्टर से पूछिये टाइप के स्तंभ पढ़ कर घर के बड़ों से प्रश्न पूछने लगते थे । बहुत कुछ ऐसा था जो हम सब जानना चाहते थे । बड़ों की बातों में कुछ खुला अधखुला सा जो हमारे बीच आता था वो हमें बड़ा रहस्यमय लगता था ।

हम बच्चे कुछ बड़े हो गये थे । कुछ बड़े का मतलब बहुत बड़े भी नहीं। ‘हम बच्चे’ जिनमें शामिल थे मनीष, क़मर हसन, सुरेश, मोहन, शोएब, राजेश, कालू, सुशील, दयानंद, सुधीर आदि आदि। इनमें से कुछ ख़ास की बात उनकी विशेषताओं के चलते की जाए तो क़मर हसन जो कि हमारे हिसाब से हम सबमें कमीनेपन और हरामीपन में सबसे अव्वल था । घुँघराले बालों से ढँके उसके दिमाग़ में ऐसे ऐसे विचार जन्म लेते थे जिनके बारे में हम सोच भी नहीं सकते थे । फिर शोएब, जो कि अगर नहा ले तो हम सबमें सबसे गुड लुकिंग और डेशिंग लगता था । मगर शोएब गुड लुकिंग लगने को लेकर बहुत लापरवाह था । कभी कभी तो आठ दस दिन बाद गुड लुकिंग लगता था, जब वो नहाता था । मनीष, जिसको फिल्मों के बारे में ढेर सारी जानकारी थी, कुछ संकोची होने के कारण बहस में हस्तक्षेप की तरह अपनी बात कुछ देर से ही रखता था और अक्सर किसी फिल्म के उदाहरण को अपने पक्ष में प्रस्तुत करता था कि उस फिल्म में तो ऐसा ही हुआ था । फिर दयानंद, जिसे हम सबसे लालची मानते थे, जो एक बार दो रुपये का नोट लकड़ी से निकालने के चक्कर में खुले हुए सेप्टिक टैंक में भी गिर चुका था । सुरेश जिसे लड़ाई-झगड़े का बड़ा शौक़ था, लड़ाई ख़ुद करने का नहीं बल्कि लड़ाई देखने का । वो चाहे फिल्मों में लड़ाई हो या असल की लड़ाई हो । लड़ाई देखने के दौरान सुरेश का चेहरा, उसके हाथों का एक्शन देखने लायक होता था । बाक़ी बचे मोहन, सुशील, सुधीर और राजेश जो बिना किसी अतिरिक्त विशेषता के थे, मगर हमारी टोली के सदस्य थे । रहा कालू तो उसकी एक मात्र विशेषता ये थी कि वो किसी भी एंगल से काले रंग का नहीं था, बल्कि अच्छा ख़ासा गोरा था । तो ये थे वो ‘हम बच्चे’ ।

हम टेक्नोलाजी विहीन बच्चे थे । इतने विहीन कि हमारे घरों में टेलीफोन तक नहीं थे । हमारे पूरे क़स्बे में दो टेलीफोन थे, एक थाने में और एक पोस्ट ऑफिस में । हमारी दुनिया में तो टीवी भी दो साल पूर्व आया था । इँदिरा गाँधी ने देश में एशियाड करवाया था (तब यही कहा जाता था कि इँदिरा गाँधी ने करवाया है, तब भारत कुछ भी नहीं करवाता था ।) और जिसके चलते हमारे क़स्बे में टीवी आ गया था । जो हमें उस समय तक केवल तीन चीज़ें प्रमुखता से दिखाता था पहली कृषि दर्शन में खेती के उन्नत तरीक़े, दूसरी समाचारों में प्रधानमंत्री की यात्राएँ एवं तीसरी चीज़ देश भर के प्रमुख शहरों का तापमान । इनमें हमारी वांछनीय गोपन सूचनाओं का सर्वथा अभाव था । खेती हमें करना नहीं थी और देश के शहरों के तापमान से हमें कुछ लेना देना नहीं था । इंदिरा गाँधी के बाद बने नये नये प्रधानमंत्री सुंदर लगते थे सो हम उनको देख कर ज़ुरूर ख़ुश होते थे और उनकी तरह हम लोग भी ‘हम करेंगे’, ‘हमने किया’ बातचीत में बोलने लगे थे । हाँ ये टीवी सप्ताह में दो बार चित्रहार में फिल्मी गाने और एक बार संडे को फिल्म भी दिखाता था, जिनको देखने के लिये हम सब कुछ छोड़ सकते थे। तब सब के घरों में टी वी नहीं होता था । हमारे कैम्पस में केवल हमारे घर ही टीवी था । सारे बच्चे हमारे घर ही टीवी देखते थे ।

शाम के ठीक सात बजे ‘टीऽऽऊँ मीऊँ मीऊँ’ की धुन के साथ दूरदर्शन का गोला घूमना शुरू हो जाता था। सात से नौ बजे तक हम बच्चे लगातार टी वी देखते थे । बीच बीच में विज्ञापन भी आते थे वाशिंग पावडर निरमा, वाशिंग पावडर निरमा या सुपर रिन की चमकार ज़्यादा सफ़ेद । उनमें ही कुछ विज्ञापन ऐसे होते थे जो हमें समझ में नहीं आते थे कि ये किस चीज़ के हैं जैसे एक विज्ञापन में समुद्र के किनारे हाथ में हाथ डाले आदमी और औरत दिखते थे और पीछे से आवाज़ आती थी ‘इनकी खुशी का राज़ डीलक्स निरोध’ या एन फे्रंच हेयर रिमूवर का विज्ञापन जिसे देख कर हम बच्चों को ये समझ नहीं आता था कि क्रीम लगाने से त्वचा रेशम-रेशम कैसे हो गई । इन विज्ञापनों के बारे में बड़ों से जानकारी लेने के चक्कर में हम सब एक एक करके फटकार खा चुके थे । हम नहीं समझ पाते थे कि वो विज्ञापन महीने के किन ख़ास दिनों की बात कर रहा है । बड़ी अजीब सी चीजें थीं जो न समझ में आती थीं और न कोई समझाने को तैयार था, उल्टे जिससे पूछो, वो चमाट मार कर कनपटी अलग गर्म कर देता था । बाद में जब हम बच्चे इकट्ठे मिलते तो चमाट खाने वाला बच्चा बाकियों को सावधान कर देता ‘ओय कोई भी उस विज्ञापन के बारे में मत पूछना रे, उसमें कुछ गड़बड़ है ।’ जैसे मनीष के साथ हुआ था । उसकी बुआ शादी के बाद पहली बार उन लोगों के घर आईं हुईं थीं । एक दिन मनीष की मम्मी ने यूँ ही अपनी ननद को छेड़ते हुए पूछ रहीं थीं ‘क्या बात है बहुत ख़ुश नज़र आ रही हो, ज़रा हमें भी तो बताओ कि इस ख़ुशी का राज़ क्या है ?’ मनीष ने आव देखा न ताव तुरंत अपनी बुआ की तरफ से उत्तर दे दिया था ‘इनकी खुशी का राज़ डीलक्स निरोध’ । किसी भी बच्चे को जिस जिस प्रकार से भी पीटा जा सकता है उन सारे तरीकों से घर के सारे सदस्यों ने उस दिन मनीष पर हाथ साफ किया था । इस पूरे काण्ड की जानकारी मिलने पर हम हैरत में पड़ गये थे कि ये तो टीवी पर बताया गया था कि ख़ुशी का राज डीलक्स निरोध है तो फिर मनीष को क्यों पीटा गया और वो भी इस क़दर ।

सावन के महीने में हम नानी के गाँव जाया करते थे । जहाँ और बातों के अलावा एक और चीज़ का लालच होता था और वो होता था नानी से कहानी सुनने का लालच । नानी के गाँव में तो ख़ैर तब तक भी बिजली नहीं पहुँची थी इसलिये टीवी पहुँचना तो दूर की बात थी । जो कुछ मनोरंजन था वो नानी की कहानी से ही होता था । सावन की काली अँधेरी रात, गाँव, और हम बच्चे । बच्चे, जो माँ के साथ रक्षाबँधन पर नानी के गाँव आये हुए होते थे । उस समय स्कूलों की छुट्टियाँ भी तो ऐसी होती थीं, दस-दस, पन्द्रह-पन्द्रह दिनों की । और जो स्कूल की छुट्टी नहीं भी हो तो मास्साब से कह दिया जाता था कि बच्चे सावन में नानी के गाँव जा रहे हैं, आठ दस दिनों में लौटेंगे । तब हमें भी नहीं पता था कि हम नानी से कहानी सुनने वाली आखिरी पीढ़ी हैं जो बाद में दुर्लभ प्रजाति होने वाली है । गाँव में सावन की रात और उस पर नानी की कहानी । जिसमें कमरे के देशी कवेलुओं पर बरसती बारिश, और कमरे के बाहर टर्राते मेंढ़क तथा जाने कौन कौन से जीवों की आवाज़ें मिलकर बैकग्राउंड म्यूज़िक का काम करती थीं । ढिबरी की रौशनी में कमरे की गोबर से लिपी मिट्टी की दीवारों पर अजीब अजीब आकृतियाँ बनती थीं । इन सबके बीच चलती रहती थी नानी की कहानी । लाइट एंड साउंड शो की तरह । कुछ कहानियाँ तो बार बार सुनी जाती थीं फरमाइश कर कर के । जैसे ही किसी कहानी की फरमाइश होती नानी कहतीं ‘थुब (रुक) जा मोड़ा (लड़के), मोय याद कर लेन दे ।’ और थोड़ी देर याद कर लेने के बाद शुरू हो जाती थी फरमाइशी कहानी । बिल्कुल विविध भारती के फरमाइशी कार्यक्रम की तरह । कब नानी की कहानी ख़त्म होती थी और हम बच्चे कब सो जाते थे ये पता ही नहीं चलता था । पता तब चलता था कि सुबह हो गई है और नानाजी सारे बच्चों को सार (गाय भैंसों को बाँधने की जगह ) बुला रहे हैं, ताज़ा ताज़ा निकल रहा धारोष्ण दूध पीने के लिये ।

उन्हीं दिनों में हम सावन पर नानी के गाँव गये थे । इस बार नानी ने बाक़ी कहानियों से हट कर एक अलग कहानी सुनाई थी । नानी ने अपनी ही शैली में कहानी को शुरू किया ‘एक बार एक राजा हतो (था) और बाकी (उसकी) एक रानी हती (थी) । राजा सिकार पे गओ थो, तो उते (उधर) बाने (उसने) रानी को पेली बार देखो । रानी उते नद्दी पे सपड़ (नहा) रइ थी । राजा का घोड़ा जैसे इ उते गओ तो राजा को बिते (उधर)रानी दिख गई । राजा का घोड़ा उतेइ (उधर ही) थुब गओ । रानी उते ऐसेइ (ऐसे ही) सपड़ रइ थी।’ ‘ऐसेइ ? ऐसेइ कैसेइ नानी ?’ ऐसेइ शब्द पर हम बच्चे उलझ गये । नानी प्रश्न पर चिड़ गईं ‘अरे गोंई तुम बीच बीच में बोलते हो, ऐसेइ मतलब उबानी (नग्न) । अब कोई कुछ बोला तो कहानी भँइ पे ख़तम हो जायगी ।’ कह के नानी कुछ देर के लिये चुप हो गईं, हम समझ गये कि प्रश्न नहीं करना है कहानी के बीच में अब ।

हिम्मत करके मैंने कहा ‘ हूँ नानी’ हुंकारा पाते ही नानी की कहानी फिर से शुरू हो गई । ‘राजा ने रानी को सपड़ते देखी तो बाको (उसको) रानी खूब पसंद आ गई । बाको नाम चम्पा हतो । गुपचाप (चुपचाप) नद्दी पर बासन-लत्ते (बर्तन कपड़े)धोने के बहाने से आ जाय हती और इते गुपचाप देखकर उबानी होकर सपड़ने लगती थी । बड़े बूढ़े केते (कहते) थे कि जा (इस) चम्पा के लच्छन ठीक नइ हैं, गाँव के दूसरे मोड़ा मोड़ी भी जाके कारन बिगड़ रय हैं । मगर दिखबे दिखाबे में खूब हती वो । ऐसी हती कि मैदे को दूध में उसन के बनाई हो । भक भक चिलकती (चमकती) हती। राजा ने जब चम्पा को सपड़ती देखी तो देखतो ही रे गओ । बाको घोड़ो भी फत्तर (पत्थर) को हो गओ और बाकी हालत भी फत्तर जैसी हो गई । चम्पा सपड़ के बाहर हीटी (निकली) तो इते राजा ठाड़ो हतो । बाने, बाको देखो और बाने बाको । चम्पा तो पेल सेइ बदमास हती, बाके अंदर तो वैसेइ आग भरी हती और राजा तो फिर राजा हतो । बाने चम्पा को उठाई और घोड़ा पे बिठा के सरपट कर दइ । इते आके फिर बाने चम्पा के बाप मतारी को खबर करी, बिनन के तो भाग ही खुल पड़े हते, बे क्या केते । बस तो इते (इधर) राजा के इते आके वो चम्पा, चम्पा रानी हो गइ ।’ एक विचित्र सी रानी की कहानी चल रही थी । नानी की भाषा में वो रानी एक ‘ख़राब रानी’ थी । ख़राब क्यों थी ये बात नानी ने बहुत खोल कर नहीं समझाई । बस ये कहा कहानी में कि वो रानी बदमासी करती थी । उसके अंदर आग भरी थी । आग ? हम बच्चे हैरत में पड़ गये कि किसी इन्सान के अंदर आग कैसे भरा सकती है, मगर नानी से प्रश्न पूछा नहीं जा सकता था, कहानी के बीच में ही ख़तम हो जाने का डर था, तो मन मसोस के रह गये।

‘इते आके चम्पा रानी बन गइ, मगर बाके लच्छन नइ सुधरे । राजा भोत दिना से शादी बियाह में लगे हते सो उते राजपाट को नुसकान (नुकसान) हो रओ हतोे । थोड़ेक दिना में राजा अपने राजपाट में लग गए और चम्पा इते महल में अकेली हो गई । पर चम्पा तो ठेरी चम्पा बाने इते भी गुपचाप-गुपचाप बाको जाल फैलाबो सुरू कर दओ । बाके अंदर तो आग भरी हती, बाये राजपाट को सुख से का लेबो देबो हतो । ऊँसे (एसे) ही कछु दिना बीत गये । एक दिना की बात राजा सिकार पर जा रओ हतो, बाने चम्पा रानी से भी कई सिकार पे चलने की, पर रानी नइ गई। बाने कछू ऊँसोइ बहाना बना दओ। राजा लोग तब पूरे धूम धाम के साथ सिकार पर जात हते । उनके साथ पंडित, हकीम, सिपाही, खाना पकाबे बारे, दास दासियाँ सब जात हते । राजा गओ तो सिकार पे भोत दिनन के लिये हतो, पर एक दिना बाके साथ गए पंडित ने कई कि राजा साब आज तो जा तरफा दिशाशूल (किसी विशेष दिन किसी विशेष दिशा में यात्रा करने की मनाही) है उते जाने में ख़तरो है । इते आपकी पत्री में भी कछु ख़राब जोग बन रय हैं । वापस चलें तो भोत अच्छो है। पंडित की घरवाली को मोड़ा मोड़ी होबे बारो थो सो बाये वापस लौटनो हतो बाने वापस लौटबे की कहानी बना दइ । राजा शुगन विचार को खूब मानतो हतो सो गुपचाप से भुनसारे में वापस आ गओ । इते आके जब वो अपने महल में गओ तो बाने का देखी की रानी और सेनापति तो साथ साथ हैं । बाने रानी और सेनापति को साथ में देखो तो बाके तो आग लग गई, बाने झट से अपनी तलवार निकाली और खट से सेनापति की गरदन काट दइ । चम्पा रानी ने सेनापती की कटी मुंडी देखी तो बाके होस उड़ गय, पेले तो इते उते दौड़ी फिरी और फिर घबरा के क़िले पर से कूद गई । राजा बाए पकड़बे दौड़ो मगर पकड़ नइ पाओ। बाके बाद से राजा सब राज पाट छोड़ के संन्यासी हो गओ । लोग जने केते हैं कि उते क़िले में आज भी चम्पा रानी घूमती है और हर आनन जानन बारों को बुलाती है । बाके डर से रात को कोई भी क़िले में नइ जात है ।’

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