राय साहब की चौथी बेटी - 11 Prabodh Kumar Govil द्वारा सामाजिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

राय साहब की चौथी बेटी - 11

राय साहब की चौथी बेटी

प्रबोध कुमार गोविल

11

राय साहब गुलाब राय ने बचपन से ही बच्चों को एक बात की तालीम बहुत असरदार तरीके से दी थी।

वो कहते थे कि हमारे पास ज्ञान, पैसा, संपत्ति, संबंध, भावना चाहे जितने भी हों, इनका उपयोग करने की एक बुनियादी शर्त है- सेहत।

ये सभी चीजें हमारे काम की तभी तक रहेंगी जब तक हम स्वस्थ हैं।

हम कितने भी ज्ञानी हों, यदि घर में बैठे हर समय खांसते रहेंगे तो हमारी कोई नहीं सुनेगा।

हमारा पैसा रखा रहेगा अगर डॉक्टर ने हमारे रोग के चलते हमारा मीठा, तीखा, चटपटा और खट्टा खाना बंद कर दिया।

हमारे मित्रों की जमात एक - एक करके ओझल हो जाएगी अगर उन्हें बार - बार हस्पतालों में हमारे लिए पुष्पगुच्छ लेकर आना पड़े।

अपने पिता की ये बात सभी बेटियों ने बेहद ध्यान से सुनी ही नहीं, बल्कि अपने जीवन में उतारी भी थी।

राय साहब की चौथी बेटी ने तो जैसे इसे अपने जीवन का मूलमंत्र ही बना लिया था।

अम्मा को कभी किसी ने रोग - आजार से लापरवाह होकर पड़े कराहते हुए नहीं देखा।

चाहे कोई कांटा चुभे, चाहे सिर दुखे और चाहे दिल की धड़कन धीमी हो जाए, अम्मा इलाज के लिए तुरंत चौकन्नी हो जाती थीं। खुद अपने लिए ही नहीं, दूसरों के लिए भी।

खास बात ये थी कि यदि किसी को ज़रा सा भी रोग या कष्ट दिखाई दे तो वो घबरा जाता है लेकिन अम्मा बड़ी से बड़ी रोग - जन्य परेशानी में खुद को या दूसरों को भी सहज रूप से ढाढस बंधाती देखी जाती थीं।

कुछ नहीं है, ठीक हो जाएगा, ज़रा सा ये हो गया है, ज़रा सा वो हो गया है...इससे सामने वाला सोचता था कि अम्मा को बीमारी की कोई परवाह नहीं है, लेकिन फ़िर तत्काल अम्मा के अनुभव खज़ाने से कोई न कोई कारगर नुस्खा निकल आता था।

ये बात ज़रूर थी कि अम्मा को होम्योपैथी, आयुर्वेदिक, नेचुरोपैथी या यूनानी जैसी पद्धतियों पर भरोसा नहीं था, वो सीधे एलोपैथी चिकित्सा की वैज्ञानिकता पर ही विश्वास रखती थीं।

कहा जाता है ये बाक़ी सभी पद्धतियां इलाज में कारगर ज़रूर हैं लेकिन धीमी हैं।

अम्मा के पास कई लोगों के ऐसे अनुभवों का प्रामाणिक भंडार था जिन्होंने देर में ही अंधेर होता देखा था। इसलिए अम्मा एलोपैथी चिकित्सा को सर्वाधिक विश्वसनीय मानती थीं।

अम्मा को बहुधा होने वाली बीमारियों से संबंधित ढेरों ऑइंटमेंट्स, टैबलेट्स, कैप्सूल्स, इंजेक्शंस और एंटी बायोटिक दवाओं के बारे में प्रामाणिक जानकारी थी।

कई तरह की फिजिकल एक्सरसाइज और थैरेपी आदि तो उस सब का हिस्सा ही थीं जिस विषय को अम्मा ने वर्षों तक पढ़ाया था।

अम्मा को अपने जीवन में भी एक बार अपेंडिक्स की शिकायत हो गई थी, तब काफ़ी दिन हस्पताल में भर्ती रह कर उन्हें अपना ऑपरेशन कराना पड़ा था।

शायद उस दौरान उन्हें कई सुविधाओं की व्यापक जानकारी तो मिली ही थी, कई नामी गिरामी सर्जनों से मशविरा कर पाने का मौक़ा भी मिला था।

फ़िर एक बार एक एक्सीडेंट में फ्रैक्चर हो जाने के चलते कई दिनों तक अम्मा को चिकित्सा से गुजरना पड़ा था।

अपनी शादी के बाद कुछ समय तक अम्मा को संयुक्त परिवार में अपने ससुराल में रहना पड़ा था तब एक के बाद एक कई प्रसव घर में ही हुए थे।

जेठानी, देवरानी और ननदों के बच्चों के साथ - साथ खुद अम्मा की भी संतानें घर पर हुई थीं। इस अनुभव ने भी अम्मा की जानकारी में बहुत इज़ाफ़ा किया।

और वहीं अम्मा ने अपने रिश्ते के एक ससुर और एक जेठ को लंबी, असाध्य बीमारी के दौरान निरंतर रुग्णावस्था में भी देखा।

बीमारी के इस वीभत्स रूप ने अम्मा को बहुत पीड़ा पहुंचाई किन्तु दूसरी ओर घर की सब महिलाओं के हास- परिहास ने इस बीमारी और कष्ट को भी सहज ग्राहय बना छोड़ा।

निरंतर बीमार रहने से चिड़चिड़ाये व्यक्ति की दुर्दमनीय पीड़ा भी एक करुणा मिश्रित हास्य पैदा कर छोड़ती है।

लालाजी के ये निरंतर बीमार रहने वाले भाई रोग से विकल होकर दिन भर बिस्तर पर पड़े- पड़े ऊल- जलूल बका करते थे। वो अनवरत गालियां देते और घर की महिलाएं अपने पल्लू में चेहरा छिपा कर इधर - उधर भागती दिखाई देती थीं।

मर्दों को गुस्सा आता था और बच्चों को कुछ समझ में नहीं आता था कि ये क्या गोरखधंधा है।

केवल घर के किशोर और युवा लड़के इधर- उधर खड़े होकर हंसा करते थे।

वो बीमारी के कष्ट की धुर - बेचैनी में भी अपनी गालियों में ऐसी- ऐसी क्रियाओं को बयान करते कि लड़कों की कनपटी गर्म होकर लाल हो जाती।

खुद उनका सबसे छोटा बेटा उनकी भाषा पर अपने आप को अपमानित महसूस करता था।

शायद अपनी युवावस्था और अधेड़ावस्था में गांव में रहने के दौरान उनकी ज़बान पर पशु- मवेशियों को इसी तरह संबोधित करते रहने से ये भाषा चढ़ गई थी जो बीमारी से मिल कर और भी खौफनाक बन गई थी।

अपने बेटे से वो बिना गाली दिए बात ही नहीं करते थे।

उनकी लाइलाज बीमारी के कारण उनका बेटा अवसाद से घिर गया था, और सुनने में आता था कि वो शराब पीने लगा था। छोटी सी उम्र से ही उसके और भी नशों की गिरफ्त में आजाने की खबरें लगातार मिलती रही थीं।

घर में इस समस्या का इलाज किसी के पास नहीं था।

संयुक्त परिवार होने के कारण उन्हें घर परिवार से निकाला भी नहीं जा सकता था। वर्षों तक ज़मीन - जायदाद और कारोबार में उनकी भी हिस्सेदारी रही थी।

आखिर एक दिन सारे घर ने वो हृदय विदारक खबर भी सुनी, जिसका अंदेशा मन ही मन सबको रहता तो था,पर कोई खुले आम बोल नहीं सकता था।

और ये खबर भी जिस रूप में सामने आई, वो तो किसी ने सोचा भी न था।

वर्षों से लाइलाज बीमारी से जूझ रहे बेदम बुज़ुर्ग ने नहीं, बल्कि उनके युवा अविवाहित बेटे ने आत्महत्या कर ली थी।

कहते हैं कि मौत से पहले उस ज़मीर से घायल लड़के ने अपने लाचार पिता से बेहद तल्ख जिरह की थी। और फिर पंखे से लटक कर जान दे दी।

बगल की कोठरी में सोते, गांव से आए हुए एक पुराने काश्तकार ने रात को पेशाब के लिए उठ कर बाहर गली में आने पर बाप- बेटे के बीच चीख - चीख कर होती तकरार अपने कानों से सुनी थी।

लेकिन वो बूढ़ा अगर ये जानता कि इस भद्दी तकरार की परिणति कुछ घंटों में उसके मालिकों के परिवार के एक जवान लड़के की मौत में होने वाली है तो वह जान पर खेल कर भी उस गंदी बहस के बीच- बचाव में आ जाता।

सुबह रोते हुए उसने सारा माजरा बताया कि क्या छिपा था उस काली रात के पल्लू में!

शाम को लड़के से मिलने उसके कुछ दोस्त आए थे। वो उनसे बात कर ही रहा था कि पिता ने ज़ोर से उसे आवाज़ दी। हमेशा गाली- गलौज़ से बोलने वाले पिता ने उसके जल्दी न आने पर चीख कर कहा- बेटी चो... आता क्यों नहीं, क्या अपनी मां पर...

दोस्त तो अचकचा कर वापस चले गए, किन्तु बेटे ने रात के पहले पहर से ही अंधेरी कोठरी में अपने को बंद कर लिया।

आधी रात को भूखा और ज़मीर से घायल बेटा उठकर बाप के कमरे में आया और उन्हें गिरेबान से पकड़ कर झिंझोड़ डाला।

कुछ लफ्ज़ बाहर गली में पेशाब कर रहे बूढ़े कर्मचारी के कानों में भी पड़ कर ज़हरीला कोलतार सा भर गए..."ये तुम बेटी चो... बेटी चो... किसे कहते रहते हो? मैं भी कहूं तुम्हें... माद...?

बाप के गले से घरघरा कर कुछ अस्पष्ट सी आवाज़ निकली। मानो बूढ़ा गिड़गिड़ा रहा हो।

और बेटे ने रोते हुए अपने कमरे में लौट कर अपने पायजामे का फंदा बना कर गले में डाल कर पंखे से झूलते अपने शरीर को दुनिया से लौटा ले जाने का यान बना लिया।

रुग्णता चाहे शरीर की हो, चाहे विचारों की, और चाहे भाषा की, इंसान की ज़िन्दगी को पंगु बना छोड़ती है।

अगर कभी अम्मा के दांत में दर्द भी होता तो अम्मा लौंग तेल से दर्द को सहनीय बना कर ही नहीं बैठ जाती थीं, बल्कि इस पूरी पड़ताल में जाती थीं कि दर्द की वजह क्या है!

इसके लिए डॉक्टर से अपॉइंटमेंट लेने से लेकर डेंटल क्लीनिंग और रूट कैनाल तक के लिए अम्मा सहज तत्पर रहती थीं।

चाहे बेटे का साइनस हो, या बहनोई के पाइल्स, अम्मा की सलाह यही रहती थी कि इलाज में देर न हो।

साथ ही अम्मा स्वास्थ्य के सामान्य नियम कभी नहीं भूलती थीं।

नियमित घूमना- टहलना उनके खाने के शौक को संभालता था।

अच्छी- भली चलती भरी - पूरी रसोई के बावजूद अम्मा की अलमारी में हाजमोला जैसे चूर्ण - चटनी ही नहीं, बल्कि सिरके में डूबी हरी मिर्च, प्याज़ और अदरक तक हमेशा उपलब्ध रहती थी।

घर की वस्तुओं और फर्नीचर को उलट- पलट कर खिसकाते रहना, पर्दों को दिन के तापमान और मौसम के मिजाज के अनुसार खिसकाना, समेटना, डस्टिंग तथा धूप और हवा का समुचित प्रबंध करते रहना अम्मा के अपने परिवार को दिए गए तोहफ़े थे।

हां, अम्मा दुनियादारी के दस्तूर भी आसानी से नहीं भूलती थीं। उन्हें हर समय ये अहसास रहता था कि बेटे की पर्सनल कार में कितनी शान से बैठना है और बहू की ऑफिशियल कार में कितने अनमने भाव से!

राय साहब की इस चौथी बेटी ने ज़िन्दगी में बहू से कभी एक रुपया भी नहीं मांगा, चाहे वर्षों से साथ - साथ रहती रही हों।

बहू चाहे अपनी ज़िम्मेदारी समझ कर उन पर हज़ारों रुपए ख़र्च कर दे। बेटे की कमाई को वो ज़रूर अपना हक़ मान कर स्वीकार भी करती थीं और मांग भी लेती थीं।

जबकि अम्मा को चाहे इस घर में आके पचास साल से भी ज़्यादा हो चुके हों, और ये अब के कमाने - धमाने वाले उनके बेटे- बहू उनके आने के बाद ही पैदा हुए हों।

लेकिन कुदरत ने बहू को अम्मा से "छीनने" का मौक़ा केवल एक ही बार दिया, जब उसने अम्मा से उनका तीसरा बेटा छीना।

हां, बाक़ी अम्मा को "देने" के अवसर तो विधाता उसे देता ही रहता था।

हुआ यूं, कि अम्मा की सबसे छोटी बेटी की शादी थी। अपने जेवरों में से उस बिटिया का हिस्सा, और वकील साहब की छोड़ी पूंजी में से उसकी शादी के लिए बनवाए गए गहने अम्मा ने एक बैंक के लॉकर में रख छोड़े थे।

और न जाने कैसे, बिटिया की शादी के एक पखवाड़े पहले अम्मा से बैंक के लॉकर की चाबी खो गई। न जाने कहां गुम हो गई। अम्मा कहीं रख के भूल गईं या किसी कपड़े- लत्ते में अटक कर इधर -उधर चली गई, पर लाख ढूंढने पर भी नहीं मिली।

अब अम्मा हैरान -परेशान, बेटा- बहू हैरान -परेशान, बिटिया मायूस, घर भर तनाव और सकते में आ गया, घर के सब सदस्यों को ये भय सताने लगा कि अब मांग - तांग चलेगी।

बैंक वालों ने साफ कह दिया कि लॉकर को तोड़ने की प्रक्रिया ख़र्चीली भी है, और बेहद लंबी भी। मान कर चलो कि कम से कम महीना भर तो लगेगा ही।

शादी में बस मुश्किल से दो सप्ताह बाक़ी थे, ये जोखिम नहीं लिया जा सकता था कि बारात चढ़ने तक बैंक का लॉकर टूटने का इंतजार किया जा सके।

लेकिन किसी से भी न एक तोला अहसान लेना पड़ा, न एक माशा सहायता और न एक रत्ती सहारा!

घर में जबरदस्ती लवमैरिज करके आ घुसी इसी बहू ने चुपचाप अपने पीएफ से लोन लेकर गहनों से डेढ़ गुना रकम भी लाकर रख दी, और अपनी शादी के तमाम गहने भी, कि जो चाहे ले लो!

बहू की इस दरियादिली पर अम्मा भी पसीज गईं।

बिटिया तो अपनी भाभी की लाडली थी ही। आंखों में आसूं भर कर कुछ भी बिन बोले बस आंखों ही आंखों में ये ही कह सकी कि इतना तो पापा भी नहीं करते मेरे लिए!

धूमधाम से शादी हुई। हाथी पर चढ़ कर दूल्हा आया।

ये अम्मा की आख़िरी ज़िम्मेदारी ही थी।

बाद में लॉकर भी टूटा और बिटिया के गहने भी निकल कर आ गए, लेकिन ऊंचे सरकारी ओहदे पर बैठी बहू ने उनमें से एक भी गहना लेना तो दूर, पूरी ज़िन्दगी अपने लिए कभी कोई नया गहना न बनवाया, और न अपनी मर्ज़ी से कभी कुछ पहना।

जो कुछ भी ज़रूरी सादा - सच्चा पहना, वो अम्मा के ही कहने से, अम्मा के ही ज़ोर देने से, अम्मा के ही चाहने से।

अम्मा जब अपनी ज़िम्मेदारियों से फारिग होकर ज़िन्दगी में अकेली हुईं, उसके बाद ज़िन्दगी भर इसी बहू के पास, इसी के साथ रहीं। जबकि बहुत से साल तो ऐसे भी गुज़रे जब नौकरी के चलते अम्मा का तीसरा बेटा भी अम्मा और बहू के साथ नहीं था। अर्थात बेटा परदेसी और सास- बहू एक छतरी के नीचे!

जबकि अम्मा के अपने कहने को इस बहू से बड़े दो बेटे- बहुएं भी थे, एक बेटी - दामाद भी।

अम्मा की दोपहरियां क्या थीं, साक्षात सत्तर एमएम के सिनेमास्कोप पर्दे थे जो अम्मा की ज़िन्दगी के गुज़रे लम्हे रोज़ अम्मा को किसी राम कहानी की शक्ल में दिखलाते थे।

आदमी जो जी ले, उसे दोबारा तो नहीं जी सकता, लेकिन उसके अक्स अपनी स्मृतियों के बटुए में सहेज कर तो रख ही सकता है।

अम्मा को भी लगता था कि जिंदगी केवल समय बिताने का ही नाम नहीं है, इसमें सबक भी हैं।

अम्मा की बहू के बच्चे अपने माता - पिता से जितना सीख रहे थे उससे कहीं ज़्यादा अम्मा, यानी अपनी दादी से।

ज़िन्दगी में भला सीखने को है भी क्या, और सिखाने को भी क्या है?

हम जिस देश के वासी हैं वहां तो रामायण - महाभारत देख लो, समझो सब कुछ देख लिया।

कोई किरदार ऐसा नहीं जो उनमें न हुआ हो, कोई नसीब ऐसा नहीं जो उनमें न झलका हो, कोई भाव ऐसा नहीं, जो उनमें न छलका न हो!

अम्मा ये दोनों ही सीरियल्स बहुत चाव से देखती थीं।

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monika

monika 2 साल पहले

Saroj Kumari

Saroj Kumari 2 साल पहले

Rajkumar Choure

Rajkumar Choure 2 साल पहले

amit agarwal

amit agarwal 2 साल पहले

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