The Author DHIRENDRA SINGH BISHT DHiR फॉलो Current Read मौली ’’मौली’’ By DHIRENDRA SINGH BISHT DHiR हिंदी लघुकथा Share Facebook Twitter Whatsapp Featured Books अयान एक नफ़रत की आग या वजूद की तलाश - 40 हॉल में हुई उस गंभीर चर्चा के बाद अयान ने बिना एक पल गंवाए अ... दो पतियों की लाडली पत्नी - 67 दिन बीतते जा रहे थे…घर में अब बच्चे की मौजूदगी ने सब कुछ बदल... Life Story of Legendry Shreta Goshal श्रेया घोषाल भारत की उच्च निंदा गई गांव में से एक है जिन्हों... माई डियर प्रोफेसर - भाग 40 ---------------चारू जल्दी से अपार्टमेंट मे आ जाती है। उसकी ध... सौभाग्याची शपथ - भाग 4 EPISODE 4 सौभाग्याची शपथ सौभाग्याची शपथ मालिकेचं सुरुवाती ग... श्रेणी लघुकथा आध्यात्मिक कथा फिक्शन कहानी प्रेरक कथा क्लासिक कहानियां बाल कथाएँ हास्य कथाएं पत्रिका कविता यात्रा विशेष महिला विशेष नाटक प्रेम कथाएँ जासूसी कहानी सामाजिक कहानियां रोमांचक कहानियाँ मानवीय विज्ञान मनोविज्ञान स्वास्थ्य जीवनी पकाने की विधि पत्र डरावनी कहानी फिल्म समीक्षा पौराणिक कथा पुस्तक समीक्षाएं थ्रिलर कल्पित-विज्ञान व्यापार खेल जानवरों ज्योतिष शास्त्र विज्ञान कुछ भी क्राइम कहानी शेयर करे मौली ’’मौली’’ (25.9k) 2.2k 8.3k 1 (इस कहानी में मौली एक गाय का नाम है। कहानी में मुख्य भूमिका मौली की है उसके बाद एक नन्हे चार वर्षीय बालक की है। बालक बहुत नटखट और शरारती है। एक दिन मै खेलते खेलते अचानक गौशाला में चला गया। मौली अपना चारा खा रही थी और पूछ से मख्खी को अपने शरीर में बैठने से भगा रही थी। मै उसकी पूछ को देखने लगा और इतने में मैने उसकी पूछ पकड़ ली और झुलने लगा। तभी अचानक मौली का पैर मेरे पैर के ऊपर आ गया, मै जोर से चिल्लाया और रोने लगा। इतने में मौली ने अपने पैर को उठाया और मेरे पैर को अपनी जीभ से चाटने लगी। इतने में माँ आ गई और माँ ने पैर पर मरहम लगाया और गौशाला में जाने से मना किया। कुछ दिन बाद पैर की चोट सही हो गई। एक दिन मै फिर से गौशाला की तरफ गया, किन्तु इस बार मै थोड़ा डरा हुआ था फिर भी मै कोशिश करते हुये मौली के पीछे जाने के बजाय आगे की तरफ बढ़ा।और मौली के सामने खड़ा हो गया।मैने डरते हुये अपनी अँगुली मौली के नाक पर रखी। मौली मेरी हथेली को अपनी जीभ से चाटने लगी। नटखट तो में था ही, इतने में मुझे एक शरारत सूझी और मै मौली के नाक पर बैठा और उसके सीगों को हाथ से पकड़कर बोला “मौली झूला झूला”। इतने में मौली ने अपना सिर ऊपर किया और गर्दन हिलाई मुझे नीचे गिरा दिया।तभी आहट सुनकर माँ आ गई पर इस बार मुझे कोई चोट नहीं आयी। माँ कान पकड़कर ले गई।अगले दिन जैसे ही सवेरा हुआ में पुनः गौशाला गया और वही हरकत फिर दोहराई और बोला “मौली झूला झूला”। किन्तु आज मौली ने मुझे नीचे गिराने के बजाय झूला झुलाया। मै बहुत खुश हुआ। मेरी ये शरारतें रोज होने लगी। मेरा रोज का नियम बन गया, मौली की नाक में बैठकर झूला झूलने का। मौली जानवर होने के बाद भी एक बच्चे (मुझे) को माँ की तरह बहुत प्यार करती थी। मेरा और मौली का साथ इतना ही था। एक दिन अचानक पापा ने मौली को दूर के सम्बंधियों को शौप दिया। यह सुनकर मुझे बहुत दुःख हुआ। मै मौली के पास रोज की तरह गया और मौली ने मुझे झुलाने के लिए अपना सर नीचे की ओर झुकाया पर उस दिन मै झूलने की बजाय, उसे बिस्किट दिये और उसके कान मै बोला “मौली तू उनके साथ मत जाना”। पर तब में नादान था और वो बेजुबां मौली बेबस थी। जैसी ही वो लोग मौली को ले जा रहे थे तब मौली बार बार अपने कदम पीछे को ओर खींच रही थी। किन्तु वो लोग फिर भी मौली को ले गये। मै देखता रहा और पुरे दिन रोता रहा पर किसी ने मेरी नहीं सुनी। उस दिन के बाद से मैने मौली को कभी नहीं देखा। आज भी मै उन पलों के बारे मै जब भी सोचता हूँ,पहले अपनी नटखटपन से मुस्कुराता, फिर आँखों की लहरों को ना रोक पाता।“मेरी प्यारी मौली”© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट Download Our App