वैश्या वृतांत - 21

अंधकार से प्रकाश की और                             

                                                                                                            यशवन्त कोठारी

 

 

जैसे जैसे रात गहराती जाती है , वैसे वैसे अन्धेरा बढ़ता जाता है और जैसे जैसे अन्धकार बढ़ता जाता है , वैसे वैसे प्रकाश के महत्व का पता लगता जाता है । अमावस्या की निविड़ अन्धकार वाली रात्रि ही तो दीपावली की रात्रि है , घोर अन्धकार पर प्रकाश के साम्राज्य को स्थापित करने वाली रात्रि । अन्तहीन अन्धेरा एक दीपक के मामूली प्रकाश से दुम दबाकर भाग जाता है , मगर आज कहां है वो दीपक , जो अन्धकार को प्रकाश में बदल दे । आज चारों ओर निराशा का साम्राज्य है । अन्धकार स्थापित हो चुका है। ऐसे समय में अन्धेरों से जूझने की आस्था कहां से आये । प्रकाश की किरणों को किस सूरज में ढूंढ़ा जाए । साहित्य , कला , राजनीति , जननीति , विज्ञान सर्वत्र निराशा का माहौल है । निराशा के इस दौर में आस्था को कैसे पाए । निराशा से बचने का एक उपाय है कि व्यक्ति आत्म निरीक्षण करे । आत्मावलोकन करे , और अन्धकार को , निराशा को दूर करने के लिए आत्म निरीक्षण का दीपक जलाए शायद प्रकाश की किरणें अन्दर से फूटे ।

          आज का युग श्रम और अर्थ का युग है । तेजी के साथ समाज की मान्यताएं , आवश्यकताएं , स्थितियां बदल रही हैं । हमारी आय , वास्तव में हमारे श्रम का पारिश्रमिक मजदूरी है । सम्पन्नता जीवन का आलोक है , जो अन्धकार को दूर करने की सामर्थ्य रखता है । दीपावली के पर्व पर श्रम की महत्ता को आत्म निरीक्षण से जोड़ें ।

          हमारी मान्यताएं , सामाजिक चेतना हर्प और उल्लास , उत्साह और उमंग ये ही तो हमारी धरोहर है । आलोकपर्व पर श्रम की महत्ता को समझें तभी और सम्पन्नता आयेगी । निराशा दूर होगी , आस्था आयेगी । अन्धकार दूर होगा , आलोक और उल्लास आयेगा , हमारी परीक्षा की धड़ियां समाप्त हो गी ।

          आलोक की तलाश अपने अन्दर ही की जानी चाहिए । यह तलाश अपने भीतर करें , दर्शन के अन्दर करें । अन्धकार बार बार आये हैं । ओयेंगे मनुप्य और समाज इस अन्धकारों को पार कर जायेगा । अन्धकार तो प्रकाश के आने की दस्तक है , और दस्तक आ जाने के बाद किरण आने ही वाली है , ये सोचकर इंतजार करें । आ खें जब बंद हो जाती हैं , ष्शब्द जब असमर्थ हो जाते हैं , कविता जब मर जाती है , नादब्रहम अस्वस्थ हो जाता है तब प्रकाश मनुप्य को अपने अदंर से मिलता है । ज्योत्स्ना की  अन्दर से बाहर की ओर की यह यात्रा ही ष्शायद परम पद प्राप्त यात्रा है । रास्ते की फिकर न करें , यात्रा जारी रखें ।

          इतिहास साक्षी है , हमने कितनी बार अपनी इस दुर्गम यात्रा के अन्धेरों  को पार किया । निविड अन्धकार की इन पार्टियों के पार के सूर्योदय को देखा है । अभ्यासी पांवों से अन्धकार को पार किया है। अपने ही हाथों से टटोल कर हम आगे बढ़े हैं । कोईनकोई आन्तरिक ष्शांति हर बार हमें उूबार लेती है। हमारा हाथ पकड़ कर रास्ता पार करा देती है । बिना डरे हम रास्ते के उस पार जाकर खड़े हो जाते हैं , और हांफते हुए फिर चल पड़ते हैं ।

          अविराम , निरन्तर चलते जाना ही हमारी नियति है । यात्रा देश  की हो या स्वयं की , अन्धकार से प्रकाश की ओर जाना ही सच्चे अर्थेा में महायात्रा है । हम इसी महायात्रा की कहानी एक दूसरे को बताते हैं , ताकि रास्ता आसानी से कटे और बातों की फुलवारी से बगिया महके ।

          हाथ को हाथ नहीं सूझता । अन्धकार में ष्शस्त्र अपने ही हाथें को काटे तो क्या करें ?लेकिन स्पर्श कभी नहीं मरता , उसे ष्शस्त्र नहीं काट सकते , संवेदना नहीं मारती , स्पर्श और संवेदना हमारे प्राण हैं । प्राण ष्शेप है तो अन्धकार भगेगा , आलोकपर्व फिर आयेगा ।

          विश्वासहीनता , संवाद हीनता और संवेदनशुन्यता  का यह दौर ज्यादा समय तक नहीं रहेगा । भावी पीढ़ी की बौद्धिक समझ सहयोग और तेज तर्रार वक्तृता शेली ही अपने सोपान पर चढ़ने में मदद देगी । समय नहीं गुजरता , इतिहास गुजर जाता है । हम नहीं गुजरते , अन्धकार गुजर जाता है । स्वभाव की स्वार्थपरता , व्यक्तिव का संकट , मन की दुर्बलता आदि अन्धकार के ही प्रकार हैं ।

          अस्तित्व और आस्था के संकट अन्ध्कार में ज्यादा गहराते हैं ,क्योंकि कमजोरी में दोष उभर कर सामने आते हैं । आस्थाहीन व्यक्ति का अस्तित्व हमेशा अन्धकार में रहेगा । स्वयं से टकरायेगा , विखंडित होगा और नप्ट हो जायेगा । लेकिन यदि प्रकाश मिल गया तो आस्था को बल मिलेगा  । वह विखण्डन से बच जायगा । आस्थ और अस्तित्व से लड़ने का यह बल भीतर से आत्मा से मिल सकता है । दर्शन , धर्म , ईश्वर , गोड , अल्लाह सभी अन्दर से प्रकाशित करते हैं । ज्योति पुंज स्वयं के अन्दर से प्रस्फुटित होते हैं ।

          सन्त ,महात्मा , पीर , पैगम्बर , भक्त , ऋपि - मुनि , ज्ञानी - ध्यानी सभी ने अपने अपने ढं़ग से अन्दर से उर्जा और प्रकाश प्राप्त किया । ‘ स्व ’ की उर्जा ही हमारे ‘ स्व ’ के निमित्त है । अपने भीतर की यह तलाश हमें हमेशा नये द्वारों की ओर ले जाती है , जो हमेशा आलोक की ओर खुलते हैं एक गहरी और अन्धेरी सुरगं से गुजरने का अहसास ही प्रकाश की खोज का अहसास है ।

          खोज की पीडा़ सभी को सताती है । निरन्तर खोज निरन्तर पीड़ा देती है । सृजन की पीड़ा से कम नहीं । आविप्कार की पीड़ा भी अन्धकार से प्रकाश की ओर जाती है ।

          आधुनिक विज्ञान के अध्येता भी मानते हैं कि तम को दूर करने के लिए मन से रोशनी मिल सकती है । तंत्र शास्त्रों में इसका उल्लेख है । विज्ञान की उपलब्धियों से कोई इंकार नहीं कर सकता , मानव जीवन को अनेकों सुख सुविधाएं देता है - विज्ञान । भैतिक साधनों से हमारी आंखें चौंधिया गई हैं । और हमें एक नए प्रकार  के अंधकार ने घेर लिया है । प्रगति के सोपानों पर चढ़ते चढ़ते हम अंधे हो गये हैं । समय की धारा को मोड़ने का साहस रखने वाला मनुप्य स्वयं ही खो गया है । अन्धकार को दूर करने का दायित्व भाषा  कला , साहित्य से संबंधित व्यक्यिों का है जो नया सृजन कर रहा है उसे अन्धकार कब तक दबा सकता है । वह तो अन्धकार को चीरकर बाहर निकल जायेगा और पूरे वातावरण में आलोक भर देगा । माहौल में एक आलोकपर्व हो जायेगा । जीवन में नये मूल्यों की प्रतिप्ठापना करना , मानव जीवन में वास्तविक मूल्यों का प्रकाश भरना ही वक्त की आवाज है । हम सभी की जिम्मेदारी है कि हम सभी वर्गो को एक साथ करके पूरे जन मानस के चारों ओर छाए अन्धकार को दूर करें और आलोक पर्व मनाएं तो ‘ तमसो मां ज्योतिर्गमय ’ सच सिद्ध होगा ।

 

 

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यशवन्त कोठारी 86, लक्ष्मी नगर, ब्रह्मपुरी बाहर, जयपुर-302002 फोनः- 9414461207

         

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Ranjana Singh 1 महीना पहले

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Swapnil 1 महीना पहले

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Suresh Meena 1 महीना पहले

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pradeep Tripathi 1 महीना पहले

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Sunhera Noorani 1 महीना पहले