वैश्या -वृतांत - 2

अथातो दुष्कर्म जिज्ञासा

(बलात्कार :एक असांस्कृतिक  अनुशीलन )

                            यशवंत कोठारी

जैसा की आप सब जानते हैं आज का युग   बलात्कार का युग  है  है. अत:जो बलात्कार का चमत्कार नहीं कर सकता वो जीवन में कुछ नहीं कर सकता. इस एक शब्द ने थ्री इडियट्स फिल्म को हिट कर दिया.उत्तर आधुनिक काल  के बाद उत्तर सत्य काल आया है जो वास्तव में बलात्कार, दुष्कर्म ,जोरजबर दस्ती का युग है. ये सब काम दबंग, शक्तिशाली  और हिंसक मानसिकता वाले ही करते हैं.बलात्कार केवल शारीरिक ही नहीं होता, मानसिक, आर्थिक सामाजिक व् वैज्ञानिक भी होता है.राज नेता सत्ता के साथ बलात्कार करता है, अफसर फाइलों के साथ दुष्कर्म करता है,व्यापारी ग्राहकों के साथ जोर जबरदस्ती  कर ता है ,जनता पर रोज़ बलात्कार होते हैं , लेकिन चुनाव के दिन जनता सत्ता व् पार्टी के साथ एसा बलात्कार करती है की दबंग सत्ता धारी धू ल चाटते नज़र आते हैं.बलात्कार साहित्य के क्षेत्र में भी काफी होते रहते हैं.कवि  कविता के साथ दुष्कर्म करता है ,कहानीकार कहानी के साथ बलात्कार करता है, उपन्यास कार उपन्यास के साथ जोर जबरदस्ती कर  ता है. संपादक रचना के साथ बलात्कार तब तक करता है,जबतक रचना साँचें  में फिट नहीं  हो जाती .दुनिया की हर भाषा में प्रतिदिन हजारों कवितायेँ, कहानियां, गीत,उपन्यास बलात्कार पर लिखे जाते हैं.  नोबल पुरुस्कार विजेता बाब डिल्लन  ने भी ऐसे उदास गीत लिखे . विष्णु प्रभाकर का उपन्यास अर्ध नारीश्वर  इसी मानसिकता पर लिखा गया व् साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाज़ा गया.पत्नी के अतिरिक्त प्रेयसी विवाद के जनक जेनेन्द्र कुमार ने भी इसी विषय पर लिखा और मैं भी लिख रहा हूँ.विश्व कविता समारोह में विदेशों से आये कवियों ने भी आतंकवाद के बाद सबसे ज्यादा जोर बलात्कार की मानसिकता पर ही दिया.एक  मनो चिकित्सक ने बताया –यह एक शारीरिक अपराध मात्र नहीं है.मूल रूप से यह किसी को बदनाम करने, नीचा  दिखाने ,अपनी दबंगई को साबित करने का प्रयास है.अपमानित करने का यह सबसे बड़ा हथियार माना  गया है. यह अपमान या बदला लेने की भावना केवल स्त्री  –पुरुष के बीच हि नहीं होती अपितु दो समुदायों, दो जातियों ,दो गांवों,दोप्रदेशों. या दो राष्ट्रों के मध्य भी  हो सकती है.लम्हे खता  करते हैं और सदियाँ सजा पाती हैं.

बलात्कार स्त्री का हि नहीं  होता,पुरुष का  भी होता है,स्त्री स्त्री का भी करती है, पुरुष पुरुष का भी करता है,किन्नर भी दुष्कर्म के शिकार होते हैं,मासूमों, नाबालिगो के साथ कुकर्म आम बात है.विद्या निवास मिश्र के अनुसार स्त्री –पुरुष सम्बन्ध सहभागिता के आधार पर होने चाहिए,मगर ऐसा हो नहीं पता.अपराधों में पुरुष प्रधानता सर्व विदित है, कहीं कहीं न्नारी भी सहज आनंद के लिए जोर जबरदस्ती की और मुड जाती है.हिंसा का जन्म अतृप्ति,विपन्नता, अपमान ,बदला लेने की भावना से पैदा होती है.मन में कही न कहीं एक जानवर छुप कर बैठा है , जो कभी भी अपना विकराल रूप दिखा देता है. दानव , राक्ष स  ,असुर,अतिबल के कारण  ये सब करते  है.मुल्क राज आनंद ने इस विषय की गहरी पड़ताल कि है .उनकी पुस्तकों में इसका विशद वर्णन किया गया है.जीवन की स्वाभाविक वृति  का त्याग , उपेक्षा के कारण आसुरी प्रवृति मन में उठती है.नए समाज में होमो, लेस्बियन ,हेट्रो, लिव  –इन आदि सम्बन्धों की खूब चर्चा है, मगर इन विकल्पों के बावजूद  समाज में हिंसा ,बलात्कार, अपहरण ,की घटनाएँ क्यों बढ़ रही है ,इस पर विचार की जरूरत है.सेकड़ों मामले दब जाते है. हजारों दबा दिए जाते है , जो अदालतों तक पहुचतें है उन मेसे तीन प्रतिश्त को सजा होती है.फेसला आने में १५ से २० साल लग जाते हैं.गवाह पक्ष द्रोही हो जाते हैं, जो सवाल पूछे जाते हैं वे भी कम अपमान जनक नहीं  होते, कई बार सहमती से सहवास  साबित कर  दिया जाता है,पूरा मामला ख़ारिज.सामूहिक  गेंग रेप एक और बड़ी समस्या है.पीड़ित के पुनर्वास एक कठिन कार्य है.सेक्सुअल एब्यूज से बचना मुश्किल्  है , घर हो  या बाहर या वर्क प्लेस,बस,कार ,रेल हवाई जहाज , सर्वत्र खतरा ही खतरा.

भारतीय वैदिक साहित्य, उपनिषदों,पुराणों व् संस्कृत साहित्य में इस पाशविक प्रवृत्ति के हजारों उदाहरण है.रामायण , महाभारत व् अन्य ग्रंथों में भी विशद विवेचना है.इंद्र ने देव गुरु ब्रस्पति की पत्नी के साथ छद्म से विहार किया, चंद्रमा ने ऋषि गोतम-पत्नी अहल्या के साथ कुकर्म-प्रसंग  किया.राम  ने उसका उद्धार किया.विदेशी साहित्य में भी इस प्रकार के विवरण थोक में है.आखिर क्या कारण है की हर तरफ अनादी काल से यह सब चल रहा है?कब रुकेगा?शायद ही कोई दिन गुजरता होगा जब अख़बार या मीडिया में ऐसे समाचर नहीं आते हो.सत्ता और विपक्ष दोनों अपनी अपनी रोटियां सेकनें में लग जाते हैं.आम आदमी ठगा सा रह जाता है.पीडिता या उसका घर परिवार जिन्दगी भर यह बोझ उठाते रहते हैं.

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जब जब भी युद्ध होते हैं तो भारी क्षति होती हैं ,योरोप में युद्धों के बाद यह प्रव्रत्ति बढ़ जाती है.मानव यदि सुख और सोंदर्य  को जान लेगा तो कभि हिंसक नहीं होगा , कभी अमानुषिय  व्यव्हार नहीं करेगा.शांति, सुख संतोष आनंद ही सही मार्ग है. प्रेम करो युद्ध या बलात्कार नहीं यहीं हे जीवन का सार.

अस्मत असुरक्षित है,सत्ता के केंद्र देख समझ नहीं पाते ध्रत् राष्ट्र  कुछ बोलते नहीं विदुरों, भीष्मों की कोई सुनता नहीं.भद्रलोक में दुराचार बढ़ता ही जाता है.शहर हो या गाँव सब तरफ एक सा हाल .बल के जरिये सब कुछ प्राप्य है ,शैतान के वशीभूत होकर यह सब होता है.दबा , कुचला ,कमजोर तबका ज्यादा दुखी है. कोई सुनवाई ही नहीं. पुलिस, न्यायलय तक पहुच् ना ही मुश्किल, पहुच गए तो मिलता कुछ नहीं.दबंगों का कुछ बिगड़ता नहीं वे फिर अपमानित करने आ जाते हैं.समस्या पुरानी है लेकिन कोई रास्ता नहिं दिखता .कुकर्म के बाद हत्या , आत्म हत्या ,अपहरण, या फिर जिन्दगी भर की ज़लालत ,दुःख,अपमान और मानसिक संताप .बड़े शहर तो इस कुकर्म की राजधानियां हो गए है.कहीं भी कभी भी किसी के भि साथ यह दुर्घटना घटित हो सकती है.

बलात्कार पर हजारों फिल्मे बनी है, सेकड़ों सीरियल लिखे गए हैं .आडियो विसुअल मीडिया तो चटकारें ले ले कर इस प्रकार के संचार या नाट्य रूपांतरण दिखाता रहता है .अश्लील साहित्य ,पोर्नोग्राफी,ब्लू फ़िल्में  इंटर नेट आदि ने इस समस्या को और बढाया है.मोबाईल का खतरा भी इस में शामिल है .

अपराधी या तो पकडे नहिं जाते या अदालत से छूट जाते हैं या मामूली सजा पाते हैं बाहर आकर  फिर वहीँ कर्म.नीले  फीते का जहर बढ़ता ही जा रहा  है . सब तरफ नीली आँखों वाले दरिन्दे बैठे हैं.ऐसा साहित्य छापने वाले या फिल्म बनाने वालो के खिलाफ सर् कार को कठोर कार्यवाही करनी चाहिए.

पश्चिम का अँधा अनुकरण करने के कारण  हमारे समाज की यह हालत हुई है.लेकिन वहाँ भी इस गलती को सुधारा  जा रहा है.

ज्यादातर मामलों में नर ही अपराध की और बढ़ता है, नारी तो शिका र बनती है.यही आज के युग का सत्य है,महाभारतकार ने भी यही लिखा था.मध्य युग व् आधुनिक का ल, उत्तर आधुनिक का ल, उत्तर सत्य का ल सभी का का ल सत्य यहीं है की शोषण करो , यह शोषित व् शोषक की बार बार दोहराई गयी कहानी है.देवासुर संग्राम से लगाकर आधुनिक का ल के युद्धों में प्रमुख दुःख महिला ने ही उठाया है.

आर्य से पहले,वैदिक  व् गुप्त का ल तक हम प्रकृति के पास थे,लेकिन धीरे धीरे हम प्राकृतिक वातावरण से दूर होते चले गए, परिणाम स्वरुप मादा एक भोग्य हो गई .कबीलों के समय यह सब आम हो गया. बलात हरण , एक सामान्य बात हो गई .

अमेरिका मेंएक महिला ने मुझ से कहता-नो वन केन रेप मी  मेरे पूछने पर उसने बताया आ इ  एम् सो विलिंग,एक अन्य  महिला ने भी कहा –कोई देख ले तो बलात्कार नहीं तो सत्कार.ये सब मजाक नहीं गंभीर  विचारणीय मुद्दे हैं जिन पर सर् कार समाजको मिल बैठ कर सोचना चाहिए.

मेन पावर , मसल पावर , मनी पावर जिस किसी के पास है उसके लिए सब जायज़ है.सत्ता का चरित्र एक जैसा है ,जो विपक्ष में है भी, दोनों अपना अपना रोल अदा कर देते हैं बस.

स्त्री पुरुष सम्बन्धों पर पुनर्विचार होता रहना चाहिए.साहचर्य परतंत्र नहीं होना चाहिए.दोनों एक दुसरे के सहयोग की अपेक्षा करे, सीमा न लांगे, पावर  या पोजीशन का मिस यूज न करे.दुष्कर्म , जोर जबर दस्ती , बलात्कार रोकने  का काम सत्ता, समाज, परिवार , जाती  को मिल कर करना चाहिए.विश्व के इस सबसे पुराने अपराध को रोकने के  प्रयास जारी रहने चाहिए .००००००००००००००००००

यशवंत कोठारी ८६, लक्ष्मी नगर ब्रह्मपुरी बाहर , जयपुर -३०२००२

मो-९४१४४६१२०७

               

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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Shahin Bhatt 2 महीना पहले

Vimal Balbhadra 2 महीना पहले

Priyanka Patel 2 महीना पहले

Amrinkhan Zaheenkhan 2 महीना पहले

ram shirole 3 महीना पहले