चलन राजनारायण बोहरे द्वारा क्लासिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

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चलन

कहानी--- राजनारायण बोहरे

चलन

तुलसा खरे साहब के बंगले के लॉन की देखभाल करता है । आज भी रोज की तरह अपना काम काज निपटाकर आया तो उनके सामने जमीन पर ही बैठ गया । बोला ‘साहब , मैं परसों-तरसों तक काम करने नहीं आ सकूंगा ।’

‘ क्यों ऐसा क्या काम आ गया । तुम तो कभी छुट्टी नहीं माँगते ’ एक सहज चालाक मालिक की तरह उन्होने पूछ ही लिया ।

‘ साहब मेरी छोकरी भाग गई कल के भगोरिया मेले में ..! ’ निर्पेक्ष सा तुलसा बोला था तो वे चौंक उठे थे । तुलसा को देखा तो वह सहज था और आगे बता रहा था, ‘ उधर के गाँव का एक लड़का भी घर से भागा है। ऐसा पता लगा है कि दोनों साथ-साथ....।’

‘ तुम मेरे साथ थाने चलो....’ उनके भीतर का अफसर तन कर खड़ा हो गया था , ‘ हम लोग उस लड़के और उसके पूरे कुनबा के खिलाफ रपट दर्ज करा देते हैं ।’

‘ नई साब, ऐसा नहीं कर सकता मैं, ऐसा कर दिया तो मर ही जाऊंगा । मेरी बिरादरी के लोग जाति बाहर कर देंगे मुझे, फिर जीना मुश्किल हो जाएगा मेरा अपने समाज में ।’ तुलसा काँपता सा बोला था ।

‘ अरे, ये कैसा रिवाज है तुम्हारी बिरादरी का ?’ वे चकित थे ।

‘ हमारे इधर ऐसा ही चलता है साब ! ऐसे ही शादी ब्याह होते हैं हमारे यहाँ !’

‘ तो तुम क्या करोगे अब ?’

‘ उस लड़के के बाप के साथ लड़ाई झगड़ा करने जाना होगा ।’

‘ गजब करते हो यार, कानूनी मदद के लिए पुलिस के पास जाना नहीं चाहते और खुद फौजदारी करने पर उतारू हो ।’

‘ इधर ऐसा ही चलन है साहब। वो तो झूठमूठ की लड़ाई होती है हमारी ।’

‘ लड़ाई भी झूठमूठ की...?’ बुदबुदाते खरे साहब एक मिनट को खामोश हुए, फिर बोले थे, ‘ तुम जैसा ठीक समझो निपटा लो, न निपटे तो मुझे बताना ।’

तुलसा उठा और फिर झुककर सलाम करता हुआ बाहर चला गया था।

तुलसा तो चला गया पर खरे साहब एक बार फिर द्वंद्व में फंस गये है । इस इलाके में जब से आये हैं तमाम नई चीजें चौंकाने लगी हैं उन्हे ।

रात पूरी यों ही बीत गई पर मन का क्लेश न मिटा।.. तुलसा ने तो एक वैचारिक भंवर में ला पटका उन्हे । वे भगोरिया मेलों की सार्थकता-निरर्थकता में उलझ गए ।

लगभग दस दिन पुरानी बात है , उस दिन वे दफ्तर में उदास से बैठे थे कि बड़े बाबू झिझकते से भीतर घुसे, ‘ आ सकता हूँ सर !’

‘ हाँ , आओ न! ’ उनकी चिंतित निगाहें पचास साल में बूढ़े़ हो चुके बड़े बाबू के चेहरे पर गड़ी।

‘ अधर के आदिवासी अंचल में इन दिनों भगोरिया मेले चल रहे हैं साहब । आपने तो देखे नहीं होंगे, आज चलें देखने को ...मैंने एक सरपंच से बात कर ली है।’

‘ भगोरिया माने...’

‘ भगोरिया माने आदिवासियों का बसंतोत्सव ! फागुन के महीने में होडी का डांड़ा गढ़ा नहीं कि भगोरिया चालू इस अंचल में । जिस गाँव में जिस दिन की हाट हो उसी दिन वहाँ का भगोरिया मेला तय रहता है अपने आप । ’

‘ चलो, देखते हैं ।...कब चलना है ?’

जीप गाँव के भीतर न जा सकी, गाँव के बाहर ही उतरना पड़ा उन्हे। भारी भीड़ थी गाँव में । गली-मुहल्ले, चौक-चौगान में उमड़े पड़ रहे थे आदिवासी स्त्री-पुरूष । छोटी-छोटी दुकान सजाए दुकानदार बैठे थे अनगिनत । बिंदी-चुटीला, अंगूठी-आईना, कंगन-झुमके और वंदनवार से लहराते रूमाल व चोली की दुकानें, पान-तम्बाकू की दुकानें, घर के राशनपानी से लेकर चना-चबेना तक की दुकानें।चौपाल पर पुरूष-स्त्रियों का बड़ा हुजूम इकट्ठा था । गाँव का संरपंच खरे साहब की बाट ही जोह रहा था । वे दिखे तो वह लपककर आया और उनके स्वागत कर सत्कार में लग गया ।

चौपाल के मैदान में एक ढोल वादक प्रकट हुआ जिसके चारों ओर कई आदिवासी युवक जुटे हुए थे वे सब अपनी गरदन को दांये-बायें हिलाते हुये, कमर थिरकाते हल्के हल्के उछाल सी भर रहे थे।

सरपंच ने बताया, ‘ इस वक्त इस झुण्ड के लोग अपने सबसे अच्छे माँदर यानि कि वो ढोल जो बीच वाले लोग अपने गले में लटकाए है परख रहे है। जिसका सुर उम्दा होगा वही माँदर इस झुण्ड में सबसे आगे चलेगा ।’

कुछ देर बात एक-एक कर कई-झुण्ड मैदान में उतर चुके थे । अपना बेहतर माँदल आगे किए एक झुण्ड गाना आरंभ कर रहा था -

कालिया खेत में डोंगली चुगदी

बिजले नारो डोंगली का रूपालो, डुरू

सरपंच ने अर्थ समझाया यह झुण्ड कह रहा है कि हमने अपने काले मिट्टी वाले खेत में प्याज बोई है। प्याज अब पक चुकी है और उसके पौधे का फूल काले खेत में ऐसी चमक मार रहा है जैसे आसमान में तारा। इस चमक का उजाला सब ओर फैल चुका है ।

दूसरे समूह ने एक जनवादी गीत सुनाया-

बाटिये बाटिये जासु बाटिय रेडियो बोले

होंये रेडियो काय काम को वो बांन्दला घर लाले सोभा

खरे साहब ने अपने अनुमान से अर्थ लगाकर बड़े बाबू को सुनाया, ‘ आदिवासी युवक कहता है कि मैं रास्ते-रास्ते जा रहा था कि एक जगह रेडियो गाता हुआ मिला । पहले सोचा कि रेडियो ले लूं । फिर सोचा कि यह रेडियो भला मेरे जेसे आदमी के किस काम का ? रेडियो तो पक्के मकानों की शोभा की चीज है

रात उतरती जा रही थी । नाचते-गाते आदिवासियों की मस्ती बढ़ती जा रही थी । दांये हाथ से अपने घूंघट को ऊंचा उठाये माँदल पर थिरकते पुरूषों को देखती स्त्रियों के हँसते-खिलखिलाते चेहरों पर उनके दांत चमक मार रहे थे खरे साहब को कौतूहल हुआ तो झिझकते हुए उन्होने सरपंच से पूछ ही लिया, ‘ सरपंचजी, मैंने कई आदिवासी समाज देखे हैं, उन सबका रंग सांवला होता है, लेकिन आपके समाज के लोग एकदम गोरे-चिट्ठे हैं। ऐसा क्यों है?’

‘ साहब यह ताड़ी का कमाल है । ताड़ी माने ताड़ वृक्ष का ताजा जूस । हमारे यहाँ हर सुबह ताड़ी का डिब्बा पेड़ से उतार कर पूरा परिवार पीता है, जिसकी वजह से हम लोग तंदुरूस्त भी रहते हैं और गोरे भी ।’

अचानक खरे साहब की निगाह गई, देखा कि एक समूह में शामिल होकर तुलसा भी नाच रहा है। उसी वक्त सहसा तुलसा की नजरें भी उनसे टकरा गईं वह अपने झुण्ड से निकला उसके पीछे-पीछे एक स्वस्थ और सुंदर आदिवासी महिला आ रही थी। उस महिला ने छींटदार कपड़े का घ्ारदार घांघरा पहन रखा था, दुपट्टानुमा साड़ी का एक कोना नाभि के पास ख् हुआ था और उसके कुछ कदम पीछे एक कमसिन आदिवासी लड़की भी चली आ रही थी ।

‘ ये मेरी बीवी है साहब, और ये मेरी छोरी ।’ तुलसा ने उन दोनों की तरफ इशारा कर के उन दोनों का परिचय दिया । खरे साहब ने हाथ जोड़ लिए ।

‘ चल छोरी पांव छू साहब के ।’ तुलसा ने अपनी पुत्ऱ़ी को आदेश दिया ।

पांवों की तरफ झुकती युवती के हाथ पकड़कर खरे साहब ने उसे रोक दिया , ‘ बस बस! हो गया । हमारे समाज में लड़कियों से पैर नही छुआये जाते ।’

खरे साहब सौंदर्य व स्वास्थ के संयोग की मूर्ति साकार करती उस युवती को देखते रह गये थे । तीखी लम्बी नाक, सींप बराबर बड़ी आँखें, मटर की छोटी फली से कोमल होंठ, स्वस्थ्य और सुडौल गरदन के नीचे चमक छोड़ते गोरे कंधों से हो कर लम्बे फैले हाथ

तुलसा की पत्नी अपने समूह की ओर चली गई थी और तुलसा खुद अपने नाचते झुण्ड की ओर, जबकि उसकी बेटी उस दिशा में बढ़ी थी जिधर युवकों का एक झुण्ड अलग थलग खड़ा भगोरिया के नाच का आनंद उठा रहा था । उसे आता देख झुण्ड का एक युवक उसकी ओर बढ़ा और उन दोनों के हाथ लगभग अंजलि सी बांधते हुऐ एक दूसरे से जुड़ गाए । फिर वे दोनों हँसते हुए जाने किस बात पर अपने दांतो की चमक बिखेरते हुऐ चारपाई पर बैठ कर समूहों का नृत्य देखने लगे थे । खरे साहब ने संकेत किया तो सरपंच से अनुमति माँग वे लोग लौट पड़े थे ।

दस दिन बीत चुके हैं, लेकिन कल तक तुलसा ने भगोरिया के बारे में कोई चर्चा नही की, अन्यथा खरे साहब उसकी बेटी और उस युवक की बात जरूर करते ।

आज तुलसा ने इस लहजे में अपनी छोकरी के भागने की बात सुनाई है जैसे उसे ना तो बेटी के भागने का कोई बिस्मय है, ना इस बात से इज्जत चले जाने का कोई दुःख।

सांझ को घर लौटे तो सोनल अटैची लगा रही थी । उन्हे आश्चर्य हुआ, ‘ क्या हुआ ? कहाँ जाने की तैयारी है?’

‘ घर जा रही हूँ। बाबूजी अस्पताल में एडमिट हैं, उन्हे हार्ट-अटैक हुआ है ।’

वे चिंतित हुए, ‘कोई खास बात !’

इधर-उधर देखा सोनल ने फिर धीमे से बताया ,‘ कल मीनल कॉलेज के अपने एक दोस्त के साथ भाग गई है ।’

‘ऐं...........!’‘ सकपकाते वे खड़े रहे थे कुछ देर, फिर सोनल को लेकर खुद जाना पड़ा उन्हे ससुराल ।

वहाँ पहुंच कर पता लगा कि मीनल जाते वक्त एक खत छोड़ गई्र है जिसमें उसने मम्मी को लिखा है कि वह बालिग है और पूरी तरह से सोच समझ कर घर छोड़ रही है क्योंकि घर रहेगी तो पिताजी उसकी शादी कभी उस के साथ नहीं करेंगे, जिसके साथ वो अभी जाकर शादी करने वाली है।

सांप निकल चुका था, लाठी पीटना बाकी था अब तो । लेकिन खरे साहब मजबूर थे, उन्हे दो दिन रूकना पड़ा । दूसरे दिन सांझ को तब जब प्रोफेसर अस्पताल में थे घर पर पंचायत जुटी । सोनल-मीनल के मामा आये थे और बिरादरी के अध्यक्ष भी आये थे और घर के कानूनी सलाहकार भी । वकील ने मीनल की बी0 ए0 की अंकसूची देखकर बताया कि वह सचमुच बालिग है और उसके खिलाफ कोई कानूनी कार्यवाही संभव नही है। हाँ उसके खिलाफ चोरी का मामला बनाया जा सकता है यह कह कर िक वह घर से जेवर और नगदी रूपया लेकर भागी है। माँ तो इसके लिए भी तैयार थीं, पर मामा तैयार नहीथे, वे तो लाठी लेकर उस लौण्डे को सबक सिखाने का तत्पर थे, जिसके लिए वकील ने सीधी भाषा में मना कर दिया उन्हे। । परिणाम यह हुआ कि वह पंचायत बिना परिणाम के ही समाप्त हो गर्इ्र ।

सोनल और खरे साहब ने रात को घर लौटने का निर्णय लिया , घर पर बच्चे अकेले जो थे ।

चलते-चलते खरे साहब ने सास से पूछा, ‘ आपको उस लड़के के घर का पता मालूम हो तो मैं मिल कर आता हूँ ।... ना हो तो अपन लोग खुशी-खुशी उसी लड़के के साथ.....!’

‘ कतई नहीं’ लगभग चीखती हुई सोनल की माँ बोली थीं ‘ उस कुलच्छिनीको मरा मान लो आप सब । इस घर से सारे रिश्ते खतम उसके ।’वे सहम गये थे ।

घर पहुंचे तो लग रहा था कि सब जगह लड़कियां भाग रहीं थीं इन दिनों, अगले दिन दफ्तर में पता चला कि कलेक्टर साहब की बहन किसी कुंवारे डिप्टी कलेक्टर के साथ भाग निकली है । कलेक्टर के दफ्तर में पहुंचे तो वहाँ का माहौल बहुत गमगीन नहीं लगा उन्हे । भीतर से लौटते स्टेनो-टू-कलेक्टर से पूछा तो दबे स्वर में बोला वह, ‘साहब ने इस रिश्ते को स्वीकार कर लिया है। कल वे लोग लौट रहे हैं और लौटते ही बाकायदा ब्याह किया जा रहा है उनका। कल ऑफीसर क्लब में दावत है और आमंत्रितों में आपका नाम भी सम्मिलित है ।’

‘ऐं..........’ चोंके वे ‘ सुना है कलेक्टर साहब की विरादरी का नहीं है वो डिप्टी कलेक्टर !’

हँसा स्टेनो, ‘ इन अफसरों की काहे की बिरादरी खरे साहब! हो सकता है कल वही लड़का आय.ए.एस. में सिलेक्ट हो जाय , नहीं तो बारह साल बाद आय. ए. एस. एबार्ड तो हो ही जायगी उसे । इस अफसरों की से बड़ी कौन सी बिरादरी होती है ?’

खरे साहब मुंह बाये उसे ताकते ही रह गये और सीधे घर लौट आये ।

अगले दिन ऑफिस के लिए बाहर निकले ही थे कि लॉन में काम करता तुलसा अचानक उनके सामने हाजिर था, ‘ साहब मामला निपट गया सब । लड़के के बाप ने डण्ड भरने का वायदा किया है । हम लोगों की आपसी तकरार खत्म हो गई । रूपया मिलते ही धूमधाम से ब्याह करूंगा उसी लड़के के साथ अपनी छोरी का ।’

‘ऐं.........!’ वे फिर से चकित थे ।

‘ हाँ साब,’ कहता प्रमुदित तुलसा खुरपी-तसला उठा कर दूब खोदने में जुट गया था ।

ऑफिस में अपनी टेबल पर बैठकर खरे साहब काम करने के पहले यह तय करने का प्रयास कर रहे थे कि किस सोसायटी को सही मानें वे, अपने ससुर की , तुलसा की या फिर कलेक्टर साहब की !

सहसा वे चेते ।

तुलसा और उसके समाज का जीवनदर्शन बेहद शानदार लगा उन्हे । जिस पर विचार करते हुए एकाएक उन्हे लगा कि तुलसा ने उनके चिन्तन को कितना विस्तृत आयाम दिया है, दृष्टि ही बदल डाली है ऐसी घटनाओं को देखने की । क्या फर्क है तुलसा और बड़े लोगों में, एक से हैं वे, लेकिन खुद की सोसायटी कहाँ है उन दोनों के सामने ? वे तर्क-वितर्क की भूलभुलैया में फंसते जा रहे थे।

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