नैहर आँचल समाय
पूरे पांच साल बाद आ रही थी प्रांजल अपने मायके. लेकिन यह पांच साल उसे युगों जितने लम्बे लग रहे थे. तभी अमेरिका से जब वह दिल्ली आई तो दोनों बच्चों को सास के पास ही छोड़ आई की कुछ दिन तो चैन से मायके में बैठकर पुरानी यादों की जुगाली कर ले फिर बच्चों को भी भोपाल बुला लेगी. हवाई जहाज से भी वह आँखे गडाए शहर को देखती रही. उसका बस चलता तो पेराशूट से ही कूद पडती.
जन्मस्थान का आकर्षण भी कितना प्रबल होता है तभी तो जन्मभूमि के लिए लोग अपनी जान भी न्योछावर कर देते हैं. जिस जगह पर नाभि गडी हो उसका मोह जन्मभर नहीं छूटता. फ्लाईट लेंड करने के बाद सामान लेने तक तक उसका दिन न जाने कितनी बार ख़ुशी से धडक गया. सामान लेते ही उसने तेज़ी से बाहर की तरफ दौड़ ही लगा दी. भैया गाड़ी लेकर खड़े थे. प्रांजल को गले लगाकर उसका सामान डिक्की में रखा और गाडी आगे बढ़ा दी.
कहीं कुछ नहीं बदला था तो कहीं बहुत कुछ बदल गया था शहर में. पुरानी इमारतें वैसी ही थी. कच्ची अस्थायी दुकानों की स्थिति बदल गयी थी. पुराने भोपाल को पार करके जब कार जेल रोड से होती हुई बोर्ड ऑफिस चौराहे पर पहुँची तो प्रांजल के चेहरे पर एक चौड़ी मुस्कान आ गयी जिसे प्राजक्त ने भी देख लिया था. उसने कार चौराहे से अंदर लेकर बायीं तरफ मोड़ ली और दो मिनट बाद ही कार एक सरकारी क्वार्टर के सामने रुकी. ऍफ़ टाइप, एक सौ उन्नीस बटा इकतालीस. सामने लगा निलगिरी का ऊँचा पेड़ और उसकी बगल में गुलमोहर. प्रांजल का जन्म इसी घर में हुआ था. उसके पिता कॉलेज में प्रोफेसर थे. वह बहुत हसरत से अभी घर को देख ही रही थी की प्राजक्त ने कार धीरे से आगे बढ़ा ली. पुलिया पर से मुड़ते हुए भी वह पीछे पलटकर घर को देखती रही. चार साल पहले रिटायर होने के बाद पिताजी खुद के घर में चले गये. और यह घर छूट गया. पांच साल पहले जब वह मायके आई थी अमेरिका से तब यहीं आई थी. पन्द्रह दिन रहकर गयी थी. पता था अब इस जन्म में तो दुबारा यहाँ रहना तो क्या अंदर भी जा नहीं पायेगी.
कितना अजीब अहसास हुआ था उस दिन, जिस घर में जन्म लिया, पली-बढ़ी, जीवन के
इतने सारे दौर से गुजरी, पढाई, सखी-सहेलियाँ, शादी हुई. जीवन के पच्चीस बसंत बिताए. शिशु से विवाह तक सोते-जागते, चेतन-अचेतन हर अवस्था में जिसे अपना घर कहा, माना, महज कुछ ही पलों में एकदम से पराया करके किसी और को सौंप दिया गया. आस-पडौस का आत्मीय, भरापूरा परिवार भी उसी के साथ छुट गया. तब से प्रांजल का मन ही नहीं हुआ कभी भोपाल आने का. वो तो माँ ने राखी पर आने की बहुत मनुहार की तो प्रांजल को आना पड़ा.
चिरपरिचित मुहल्ला, स्कूल-कॉलेज, मार्केट सब पीछे छूटते जा रहे थे और कार बढ़ रही थी नितांत अपरिचित कॉलोनी की ओर. शहर से बाहर बसी एक कॉलोनी में पिताजी ने घर बनवाया था. वहां पहुंची तो देखा हमेशा की तरह उसकी राह देखते पिताजी बरामदे में ही खड़े थे. कार पोर्च में खड़ी करके प्राजक्त ने प्रांजल का सामान मम्मी के ही कमरे में रख दिया. माँ नहाने गयी थी. भाभी चाय लेकर आई. नन्हा भतीजा अभी सो रहा था. चाय पीकर प्राजक्त कॉलेज जाने की तयारी करने लगा. वह भाभी और पिताजी से बात करने लगी.
माँ भी नहाकर आ गयी. “घर क्या बदला तू तो मायके का रास्ता ही भूल गयी प्रन्जू. क्या हम लोगों की भी याद नहीं आती तुझे?” माँ ने गले लगाते हुए मीठा सा उलाहना दिया. “पांच बरस हो गये तुझे देखे को.”
माँ की आँखे भीग आयीं तो प्रांजल को एक अपराधबोध सा हुआ. वह माँ से बातें करने लगी. थोड़ी देर बाद भाभी ने आकर कहा की उसका सामान गेस्ट रूम में रख दिया है जाकर नहा ले. ‘गेस्ट रूम’ प्रांजल के मन को ठेस लगी. वह इस घर में गेस्ट है क्या. उठकर कमरे में गयी. डबलबेड, एक अलमारी, ड्रेसिंग टेबल से सजा कमरा जिसके साथ वाशरूम था. तभी माँ अंदर आकर बोली-
“प्रांजल देख ले साबुन वगैरह है की नहीं, नहीं तो मेरे बाथरूम में नहा ले. या कहे तो मैं साबुन ला देती हूँ.”
‘मेरे बाथरूम में’ माँ के मुंह से यह शब्द कितने अजीब लगे. सरकारी क्वार्टर में सिर्फ ‘बाथरूम’ था. न तेरा न मेरा बस सबका था. चाहे घर के सदस्य हों या मेहमान. वह घर सिर्फ घर था, ‘बेडरूम’ या ‘गेस्ट रूम’ में बंटा हुआ नहीं था.
“सब होगा माँ भाभी ने रख ही दिया होगा.” कहते हुए प्रांजल नहाने चली गयी. एक घंटा ही
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हुआ होगा उसे आये हुए लेकिन अजीब सा अजनबियत जैसा महसूस हो रहा था उसे. जैसे किसी बहुत दूर के रिश्तेदार के यहाँ पहली बार रहने आई हो. अजब सा संकोच मन पर हावी होता जा रहा था. पुराने घर की बहुत याद आ रही थी. नहाकर आई तो सब नाश्ते की टेबल पर इंतजार कर रहे थे. नाश्ता करके प्राजक्त कॉलेज चला गया. भाभी उसे घर दिखाने लगी. नीचे दो कमरे, एक माँ-पिताजी का, एक गेस्ट रूम और उपर दो बेडरूम, एक सीट आउट. अमूमन सोफासेट, पलंग समेत सब कुछ नया था. बस लोग ही पुराने थे, या बस काया ही पुरानी थी, मन भी नये घर में नये हो गये थे. उपर गयी तो माँ भी आ गयी, कमरे देखने के बाद छत पर गयी तो एक कोने में कुछ सामान पड़ा था. प्रांजल ने देखा उसकी टेबल-कुर्सी, तख्त था. यह तखत पिताजी ने खास उसके लिए बनवा कर हाल में खिड़की के पास रखा था. दिन भर इसी पर अपनी किताबें फैलाये वह पढ़ती रहती थी और देर रात पढ़ते हुए इसी पर सो जाती. कमरे में टेबल-कुर्सी जो पहले भैया की थी और उनके होस्टल में जाने के बाद प्रांजल को मिल गयी थी. उसकी किताबें, कॉलेज का बेग इसी पर रखा रहता. छुट्टियों में इसी पर वह ड्राइंग करती. एक छोटा सा टेबल फेन. पिताजी रात में उसके सिरहाने लगा देते ताकि मच्छर दानी के अंदर भी उसे हवा मिल सके और वह आराम से सो सके. कितना सुकून था उस हवा में जो आज एसी की ठंडक में भी नहीं मिलता.
“माँ यह सामान....” बोल नहीं पायी वह की कबाड़ की तरह यहाँ क्यों पटक दिया है. याद आया उस घर में यदि उसका कोई भी सामान अपनी जगह से हटा दिया जाता था तो वह पूरा घर सर पर उठा लेती थी. पिताजी की सकत हिदायत थी की उसके किसी भी सामान को कोई हाथ न लगाये. लेकिन अब इस घर में वह किस अधिकार से किसी को कुछ कहे.
“यह सामान बिका ही नहीं. अब आजकल कौन ऐसे पुराने तखत रखता है घर में. एक कबाड़ी वाले से बोला है वो आकर कुछ दिनों में ले जाएगा.” माँ अत्यंत सहज स्वर में बोली.
और प्रांजल को लगा उसके सहज स्नेह की डोरियों को जैसे किसी ने काट-छाँट कर छत के एक कोने में फैंक दिया है. इंसानों से ही नहीं, मन की यादें और नेह की डोरियाँ वस्तुओं से भी कितनी मजबूती से जुडी होती है. अगर वो वस्तुएं वहां से हट जाएँ तो लगता है किसी ने बलात वो यादें, वो समय ही मिटा डाला है. कुछ भी तो उससे जुदा हुआ बचा नहीं है इस घर में. दीवारों की तरह रिश्ते भी नये और पराये हो गये लग रहे थे. तीन दिन प्रांजल इसी दुःख में रही. उपर से हंसती-बोलती लेकिन अंदर अपनी टूटी हुई नेह डोरियों की पीड़ा से व्यथित.
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कहते हैं मायका माँ से होता है. लेकिन आज समझ में आ रहा है मायका और भी बहुत सारी बातों से होता है. एक घर होता है, कुछ वस्तुएं होती हैं जो लम्बे समय तक व्यक्ति से जुडकर अपने प्रति व्यक्ति के मन में एक सहज स्वाभाविक मोह उत्पन्न कर देतीं हैं. जिन पर मन का एक आत्मीय अधिकार होता है और वही अधिकार भाव फिर व्यक्ति को उस जगह और लोगों से बांधे रखता है. आस-पडौस के लोग जो आपको खट्टी-मीठी यादें, कुछ नसीहतें, बहुत सा प्यार बाँटते हैं. जिनके साथ घुलमिल कर जीवन आगे बढ़ता है. वो आस-पडौस के रिश्ते, चाची, ताऊ, मामा-मौसी, दादा-दादी, कितने धागे तो बंधे हुए थे. अमेरिका की जिस सारोकारहीन, शुष्क मशीनी संस्कृति के अकेलेपन से घबराकर वह यहाँ चली आई थी आत्मीयता की छाँव की तलाश में, वही शुष्कता यहाँ भी हावी दिखी रिश्तों पर. चमचमाती कॉलोनी में रिश्ते बहुत धुंधला गये थे. पांच बरस पहले प्रांजल सिर्फ घर की ही नहीं पूरे मुहल्ले की बेटी होती थी. सुबह की चाय के पहले शर्मा आंटी गर्म-गर्म सूजी का हलवा दे जाती थी की प्रांजल को बहुत पसंद है, दीक्षित चाची के यहाँ से पोहा आ जाता था. यही बातें भारत को अन्य भौतिकवादी स्तर पर विकसित देशों से अलग करती थी. लेकिन अब ये देश भी उसी राह पर चल पड़ा है. इस कॉलोनी में किसी को कोई सरोकार नहीं की प्रांजल कौन है.
आज आंचल एकदम से खाली हो गया लग रहा था. लग रहा था मायका कहीं छुट गया है. गलियाँ सूनी हो गयीं अचानक. पांच साल तक अमेरिका में स्नेह के निर्मल झरने को तरसता अंतर्घट यहाँ आकर भी रीता ही रह गया. रात में गेस्ट रूम में अकेले पलंग पर पड़े हुए देर तक नींद नहीं आती थी. पहले आती थी तो पिताजी बाहर हाल में सो जाते और माँ हमेशा उसके साथ ही सोती, देर रात तक दोनों बातें करती रहती. तब वह अपने घर की बेटी होती थी, अब इस नये घर में जैसे गेस्ट बनकर रह गयी है. वह घर चमक-दमक से खाली लेकिन भावनाओं से भरा था. बस बिट्टू की बालसुलभ क्रियाओं से मन कुछ बहल जाता.
प्राजक्त देख रहा था, प्रांजल इस बार कुछ अनमनी सी है. जब से वह आई है तबसे उसे भी कॉलेज में इतना काम था की चाहकर भी उसे समय नहीं दे पा रहा था. दो-चार दिन बाद तो वह लौट भी जाएगी, और अगर यूँ अनमनी सी वापस गयी तो पता नहीं बहुत दिनों तक उसका मन करेगा भी की नहीं वापस आने का. वह उसके मन की स्थिति को काफी-कुछ समझ रहा था. उसने तय किया कल छुट्टी लेकर दिन भर उसके साथ रहेगा.
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“चल एक जरूरी काम है थोड़ी देर में आते हैं.” दोपहर के खाने के बाद प्राजक्त ने प्रांजल से कहा.
प्रांजल प्रश्नवाचक दृष्टि से उसकी तरफ देखने लगी.
“जैसी है वैसी ही अच्छी लग रही है, चल.” प्राजक्त ने उसका हाथ पकडकर उसे उठाया.
“कहाँ जा रहा है अचानक, क्या हुआ?” माँ-पिताजी दोनों अचकचा कर पूछने लगे. भाभी भी कौतुहल से देखने लगी.
“कुछ नहीं आते हैं थोड़ी देर में.” कहते हुए प्रांजल को लेकर वह घर से बाहर निकल गया. कॉलोनी के बाहर निकलकर वह जैसे ही पुरानी चिरपरिचित सडक पर पहुंचे, प्राजक्त ने देखा प्रांजल के चेहरे का रंग बदलने लगा है. अपरिचितों की भीड़ में उकताए एकाकी मन को अचानक किसी अपने को देखकर जो ख़ुशी महसूस होती है, ख़ुशी के वही रंग एक-एक करके प्रांजल के चेहरे पर आते जा रहे थे. उसने गाडी सीधे प्रांजल के स्कूल के सामने खड़ी थी. अपना स्कूल देखते ही प्रांजल के चेहरे पर मुस्कान खिल उठी. किशोरावस्था की, सखियों की, शिक्षकों की न जाने कितनि स्मृतियाँ ताज़ा हो गयी एक साथ. बहुत देर तक वह स्कूल के प्रांगण, में गेट, दरवाजे खिडकियों को देखती रही, फिर कॉलेज की स्मृतियाँ ताज़ा की. गेट के बाहर चना चोर वाला काका अब भी अपना खोमचा लेकर खड़ा था. प्रांजल ने खिड़की का कांच खोला और काका को दो दोने बनाने को कहा. काका तत्परता से दो दोने चटपटे चना चोर के ले आये.
“अरे बिटिया तू तो एही की पढ़ी है न? बड़े दिनों बाद आई रही. सादी हो गयी का तोहार?” काका ने उसे पहचान लिया. कितना तो चना चोर लेती थी वो काका से ढेर सारा निम्बू डलवाकर. आज भी काका झट एक निम्बू काटकर ले आये और उसके चने पर निचोड़ दिया-
“हमें याद है बिटिया तोहे खूब सारा निम्बू डला हुआ चना पसंद है.”
“कैसन हो काका?” प्रांजल ने आत्मीयता से पूछा और बीस का नोट बढ़ा दिया उनकी ओर.
“नहीं-नहीं बिटिया, पीहर आई बिटिया से कोई पैसे लेट हे क्या. जग-जुग जियो, खुस रहो.” काका ने हाथ पीछे कर लिए. “खूब फूलो-फलो.”
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“बेटी से नहीं तो कमाऊ बेटे पर तो हक बनता है न काका.” कहते हुए प्राजक्त ने पचास का नोट काका की जेब में जबरदस्ती रख दिया. बदले में काका ने ढेर सारी दुआओं से प्रांजल की झोली भर दी और अपनी छलक आई आँखें पोंछते हुए उसे विदा दी.
चना चोर खत्म होने तक दोनों न्यू मार्केट में थे. अपनी उसी फेवरेट आइसक्रीम पार्लर के सामने जहां बचपन में पिताजी के साथ आते थे स्ट्राबेरी आइसक्रीम खाने और बड़े होने पर प्राजक्त अपनी मोटर सायकल पर बिठाकर लाता था और दोनों हर बार अलग-अलग फ्लेवर खाते थे, और हर बार प्रांजल प्राजक्त की आइसक्रीम खाकर कहती तुम्हारी ज्यादा अच्छी है और प्राजक्त अपनी भी उसे दे देता. स्नेह की ऐसी मिठास थी उस आइसक्रीम में जो कभी भी अमेरिका के महंगे पार्लरों की महंगी आइसक्रीमो में भी नहीं मिली. आइसक्रीम का स्वाद लेते-लेते दोनों ने न्यू मार्केट की गली-गली घूम ली.
मन भर जब उन गलियों में घूम ली तो प्राजक्त ने देखा प्रांजल के चेहरे पर पांच साल पहले वाली प्रांजल की झलक दिख रही थी. वह उसे शिवाजी नगर की चौपाटी पर ले गया. जहाँ दोनों अक्सर मामा-भांजे चाट कोर्नर पर आलू टिक्की और पानी पूरी खाते थे. अमेरिका में तो वह इन दोनों का ही स्वाद भूल गयी थी. उसके मुंह में पानी भर आया. भांजा तो नही पहचान पाया लेकिन मामा दोनों को देखकर खूब खुश हुआ. भर पेट टिक्की और पानी पूरी खाकर प्राजक्त उसे पुराने घर की पुलिया पर ले गया. शाम ढलने को थी. आसमान का रंग बदल रहा था. प्रांजल के चेहरे पर भी एक गुलाबी आभा छाने लगी थी. बचपन में दादाजी उसे गोद में लेकर इस पुलिया पर आ बैठते थे और घर लौटते पंछियों के झुण्ड दिखाते. फिर वह उनकी ऊँगली पकडकर यहाँ आने लगी. पंछियों को घर लौटते देखकर उसे बड़ा आनंद आता. गोद से डोली तक का सफर कब तय हो गया पता नहीं चला. प्रांजल ने पिछला पूरा जीवन यादों में जी लिया. दायें हाथ की तरफ पुराना घर था. क्षण भर को वह भूल ही गयी की अब वह यहाँ नहीं रहती. उसे लगा वह बस पंछियों को देखने पुलिया पर बैठी है, थोड़ी देर में घर जाएगी, अपने घर.
आसपास के घरों के कुछ परिचितों ने देखा तो पुलिया पर ही चौपाल जम गयी, वहीं चाय आ गयी, कुर्सियां आ गयीं, चाची-ताई, मौसी, ताऊ सब आ गये. मिठाई और न जाने क्या-क्या आ गया. अमेरिका की एकाकी, सम्वेदनहीन संस्कृति की शुष्कता में इन पुलियाई रिश्तों की आत्मीय तरलता मन को भिगो गयी.
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पॉश कॉलोनियां चाहे पश्चिमी संस्कृति में रंगी रुखी होती जा रहीं थीं लेकिन इन जमीन से जुड़े मुहल्लों में अभी भी रिश्तों में नमी बची हुई है.
प्रांजल को लगा पंछी की तरह इस ढलती शाम को वह भी कुछ पलों के लिए ही सही अपने नीड को लौट आई है. स्नेहशिषों से आंचल भर गया. कुछ ख़ुशी के मोती भी आँखों से छलक आये. न खत्म होने वाली आत्मीय बातो से जी जुड़ा गया. दुसरे दिन के निमन्त्रण मिल गये. बेटी मायके आई है, बिना खाना खिलाये कैसे जाने दे. लिहाजा स्वीकार करना ही पड़ा. भरे मन से सबसे विदा ले जब वापस जा रही थी तो प्राजक्त ने कहा –
“मानता हूँ बदलती परिस्थितियों में काफी कुछ छूट गया, बदल गया लेकिन फिर भी तेरा बड़ा भाई तेरा पुराना अहसास, पुराना घर जितना सम्भव हो सके तुझे लौटाने की कोशिश हमेशा करेगा. मेरे रहते तेरा मायका बना रहेगा.”
प्रांजल ने मुस्कुराकर भैया को देखा. भैया ने आज उसके आंचल में नैहर का सुख भर दिया था.
डॉ विनीता राहुरिकर