नियति - 8 Seema Jain द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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नियति - 8

नियति

सीमा जैन

अध्याय - 8

रोहन के अनुपस्थिति में शालिनी का कार्यक्रम बेटी के घर ठहरने का था। वैसे तो शांति और सेवक राम चौबीस घंटे घर में ही रहते थे । उनके कमरे घर के पीछे बने हुए थे । लेकिन शादी के बाद शालिनी को बेटी से मिलने का मौका नहीं मिला था। इसलिए दोनों एक दूसरे का साथ पाकर बहुत खुश थी। शिखा को स्वस्थ देकर शालिनी को संतुष्टि मिली । शादी के दिन जल्दबाजी में शालिनी ने घर ठीक से देखा नहीं था, अब एक-एक कमरा देखा तो पता चला बेटी कितने वैभव भरे घर में पहुंच गई है। लोग भी कितने अच्छे हैं। पहली बार उसे लगा भगवान ने उसके धैर्य का उचित फल उसकी बेटी को दिया है। बस उसे एक ही कमी अखर रही थी, वह थी रोहन और शिखा के मध्यस्थ की दूरी। देर रात तक ढेर सारी बातें करतीं रहीं दोनों मां बेटी। शिखा ने अपना सामान दिखाया कुछ गहने सुषमा ने शादी में ही दिए थे और कुछ बाद में बनवाए। शिखा की बातों में केवल सुषमा का ही नाम था, उसकी प्रशंसा करते नहीं थक रही थी । शालिनी बहुत खुश थी इतने दिनों बाद बेटी से मिली और वह इतनी प्रसन्नचित्त थी।

लेकिन जैसे-जैसे शाम ढलने लगी शिखा बैचेन होने लगी। रोहन के आने का समय हो रहा था । शालिनी भी शाम को ही निकलने की सोच रही थी। अगर समय से पहुंच गईं तो अगले दिन कॉलेज जा सकेगी। एक रात दो दिन बेटी के साथ बिताए, उसे तसल्ली हो गई बेटी सुरक्षित स्थान पर है।

बेटी की व्याकुलता का कारण शालिनी समझ नहीं पा रही थी। बहुत बार पूछने पर शिखा ने अपने मन में बसे डर के बारे में उसको बताया, "मां मैं रोहन को कितना जानती हूं, क्या कह सकता है उसके मन में क्या चल रहा है। कहीं वह मुझसे घृणा करता हो उससे जबरदस्ती शादी करने के कारण। अगर उसने मुझे मारने की कोशिश की तो मैं कैसे अपने आप को बचा पाउंगी। या ऐसी वैसी कोई हरकत की तो मैं क्या करूंगी । "इतना कहकर वह रोने लगी।

शालिनी समझ गई शिखा को रोहन पर अभी विश्वास नहीं है। उसने निश्चय किया कि वह एक दिन और रुक जाएगी । इस दौरान उसने शिखा को समझाने के लिहाज से पूछा, " एक बात बता, तू इतने महीनों से यहां रह रही है, तुझे रोहन की किसी हरकत में ओछापन नजर आया । कभी उसे नशे में धुत देखा?"

शिखा ना में सिर हिलाती हुई बोली, " नहीं, लेकिन हो सकता है अपनी मॉम के डर से ऐसा नहीं कर रहा हो । अब किसी का डर नहीं तो अपने असली रूप में आ जाए । "

शालिनी कुछ सोचते हुए बोली, "मुझे रोहन ऐसा इंसान नहीं लगता । उसकी एक गलती के कारण उसके बारे में इतना कठोर राय मत बनाओ। तुम्हें उसके व्यवहार में कोई अंतर नहीं लगा। "

शिखा कुछ सोचते हुए बोली, "नहीं। " शिखा को इन दिनों रोहन के व्यवहार में कुछ अंतर दिखाई दे रहा था। लेकिन मां को कैसे बताती । कई बार उसने रोहन को कनखियों से अपनी ओर देखते हुए देखा था । उसके मुख पर अब उतनी कठोरता नजर नहीं आती थी। वैसे तो वह बोलता नहीं था, आवश्यकता पड़ने पर जब कुछ कहता था तब आहिस्ता से बोलता था । उसके मन में क्या भाव थे कहना मुश्किल था। रोहन रात को खाने तक आ गया था खाना खाकर सोने चला गया बहुत थका हुआ था।

अगले दिन रोहन ने शालिनी से कुछ इधर-उधर की बातें की, उसका जाने का कार्यक्रम पूछा । जब शालिनी ने यह कहा कि वह उस दिन शाम तक चली जाएगी, तो उससे दो-चार दिन और रुकने का आग्रह किया । शालिनी के लिए और छुट्टी लेना मुमकिन नहीं था। शालिनी ने रोहन के जाने के बाद शांति और सेवक राम से रोहन की आदतों के बारे में बात की । दोनों के ही दिल में रोहन के लिए स्नेह और सम्मान था। शांति रोहन की नानी के गांव की थी, बाल विधवा थी, दोबारा शादी करना गांव में मुमकिन नहीं था। इसलिए नानी के साथ शहर आ गई थी। जब रोहन होने वाला था सुषमा की तबीयत कुछ ठीक नहीं रहती थी । शांति सुषमा का ध्यान रखने के लिए आई थी लेकिन फिर वापस नहीं गई। बचपन से रोहन को उसने पाला, अपनी ममता उस पर लुटा दी । उसके लिए रोहन सब कुछ था, उसके होने वाले बच्चे को लेकर बहुत उत्साहित थी । इसलिए शिखा के खाने-पीने का भी विशेष ध्यान रखती थी। शालिनी ने उस को निर्देश दिया कि वह शिखा के कमरे में सोएगी रात को । उसकी तबीयत खराब हो जाए, उसे किसी वस्तु की आवश्यकता हो तो ध्यान रखेगी। शिखा का मन नहीं था शांति को सुलाने का, वह चाहती थी कमरे को अच्छी तरह से कुंडी लगाकर सोए। लेकिन मां ने सख्त हिदायत दी थी की वह शांति को कमरे में अवश्य सुलाएगी।

रात को जब रोहन आया तो शालिनी चली गई थी । शिखा उसका इंतजार कर रही थी । आते ही रोहन ने पूछा, " शालिनी आंटी चली गई क्या ?"

शिखा ने कहा, " हां दो घंटे पहले ही गई है । "

रोहन, "तुम्हारी तबीयत ठीक है शिखा। "

शिखा, " हां ठीक है । "

रोहन बोला, " मैं फ्रेश होकर आता हूं फिर खाना खा लेते हैं । "

लग रहा था दो राष्ट्र में शांति वार्ता चल रही थी।

खाना खाते ही शिखा ने सोचा जल्दी से कमरे में जाकर दरवाजा अंदर से बंद कर लेती हूं । लेकिन उसके भागने से पहले ही रोहन बोला, "चलो बाहर थोड़ा टहल आते हैं, मां कह रही थी बहुत आवश्यक है तुम्हारे लिए । नहीं तो रात को पेट दर्द से परेशान रहोगी।, " शिखा जी पक्का करके उसके पीछे चल दी। शिखा को दिल में घबराहट थी, वह घर के दरवाजे से अधिक दूर नहीं जाना चाहती थी। वह सोच रही थी अगर रोहन ने कुछ छेड़खानी की तो तुरंत दरवाजे से अंदर प्रवेश करके अपने कमरे में चली जाएगी । लेकिन रोहन ने ऐसा कुछ नहीं किया, खामोशी से उसकी बगल में चलता रहा। और जिस गति से वह चलती वह भी कदम से कदम मिलाकर चलता रहा। आधे घंटे बाद जब शिखा अंदर आ गई तो वह भी अंदर आ गया। उसके सीढ़ी पर चढ़ने से पहले वह बोला, " रात को किसी भी वक्त आवश्यकता पड़े तो उठा देना, तुम्हारे फोन में अपना नंबर डाल देता हूं। बस फोन कर देना मैं स्वयं आ जाऊंगा। " शिखा ने अपना फोन उसके ओर बढ़ा दिया।

अगले दिन नाश्ता करते हुए रोहन बोला, " कोई दवा खत्म हो रही हो तो बता देना, मंगवा दूंगा या कुछ खाने का मन हो तो फोन कर देना आता हुआ ले आऊंगा। "

शिखा ने इनकार कर दिया । रोहन जाते हुए बोला, "मेरे कमरे में कुछ फिल्मों की सीडी पड़ी है और कुछ किताबें रखी हैं। दिन में समय बिताने के लिए चाहो तो ले लेना । "

शिखा ने हामी भर दी, उसे आश्चर्य हुआ रोज्ञन ने उसे अपने कमरे में जाने की अनुमति दी है, जब पहली बार कॉफी लेकर गई तो कितना गुस्सा हो रहा था।

दिनभर कुछ भी करने को नहीं था बोरियत तो होनी ही थी। शांति रसोई में नहीं घुसने देती, " नहीं भाभी जी आप आराम करो, यहां कुछ काम नहीं है। " जिस दिन रोहन के कमरे का पेपरवेट टूटा था, सेवक राम भी उसको अपने पास नहीं फटकने देता। फोन पर मां से बहुत देर तक बात की । फिर दीपा का फोन आया, दीपा नौकरी करने लगी थी, अधिक समय नहीं रहता था उसके पास । थोड़ी देर बात करके उसने फोन काट दिया । शिखा रोहन के कमरे में गई, वहां अंग्रेजी फिल्मों की सीडी रखी थी । लेकिन एक तरफ हिंदी फिल्मों की सीडी का ढेर लगा था, लगता था पिछले 10 सालों में जितनी भी फिल्में बनी है वह सब यहां है। शिखा को बड़ी प्रसन्नता हुई कितनी फिल्में वह समय के अभाव के कारण नहीं देख पाई थी, अब वह सब आराम से बैठकर देखेगी । कुछ किताबें भी रखी थी जो नयी लग रही थी। हो सकता है रोहन को पढ़ने का समय नहीं मिला हो । वह स्वयं वे किताबें पढ़ना चाहती थी लेकिन महंगी होने कारण खरीद नहीं सकी थी । उसके दिमाग में विचार आया जब रोहन के कमरे में ठहरी थी, उसने बहुत ध्यान से उसका कमरा देखा था । वीडियो, किताबें तब उसे कहीं नजर नहीं आई थी । हो सकता है और कहीं रखता हो और आज उसके लिए निकाल कर रख दी हो। दिल के किसी कोने में आवाज आई, हो सकता है उसका ध्यान रखकर रोहन यह सब खरीद के लाया हो। लेकिन उसे उसकी पसंद के बारे में क्या पता, दीपा से भी तो पूछ सकता था लेकिन इतना महान नहीं हो सकता। खैर इन बातों में दिमाग लगाने से क्या लाभ, उसे अपने सामने पड़ी सीडी और किताबों से लाभ उठाना चाहिए और मस्त हो जाना चाहिए।

सारा दिन कैसे बीता पता ही नहीं चला, एक फिल्म देखी, कुछ देर किताब पढ़ी। शाम को रोहन आया तो बहुत प्रसन्न थी। उससे फिल्म और किताब के बारे में बात करती रही। इससे पूर्व वह रोहन से इतनी बात कभी नहीं कर पाई थी । आज सारा दिन किसी से नहीं बोली थी इसलिए लगा रोहन के आते ही जैसे बांध टूट गया हो। रोहन बराबर उत्तर देता रहा। बाहर टहलने गए तो शिखा उस दिन दूर तक जाने की हिम्मत कर सकी। उसे लग रहा था रोहन को मन ही मन हंसी आ रही होगी, कल तो इतनी डरी हुई थी कि अगर रोहन सिर खुजाने के लिए भी हाथ उठाता तो बंदूक की गोली की तरफ वह अंदर भाग जाती । लेकिन रोहन के मन में क्या चल रहा था जान पाना मुश्किल था क्योंकि वह अपने मुंह पर कोई भाव नहीं आने देता था।

जब शिखा को गर्भ धारण किए पांच महीने हो गए तो डॉक्टर को दिखाने जाना था। रोहन के साथ अकेले जाते हुए उसे झिझक हो रही थी। मां अगर इसी शहर में होती तो कितना आसान होता, वह उन्हें बुलाकर डॉक्टर के पास चली जाती । वहां उन्हें भी तो कितना अकेलापन लगता होगा। कॉलेज से जब घर आती होंगी तो एकदम खाली घर । पता नहीं रात को खाना भी ठीक से बनाती है कि नहीं, ऐसे ही दूध के साथ कुछ खाकर काम चला लेती होंगी। रोहन के साथ ही उसे डॉक्टर के यहां जाना पड़ा। डॉक्टर ने उसका वजन लिया और निरीक्षण किया । उन्हें उसकी सेहत में कुछ सुधार लगा, फिर अल्ट्रासाउंड मशीन से उसके पेट के अंदर का मुहाना किया। शिखा को अपने अंदर हलचल महसूस होने लगी थी, खाली समय में वह कभी-कभी बच्चे के बारे में कल्पना भी करती थी। कैसा होगा और कैसा महसूस करेगी उसे गले लगा कर। लेकिन पर्दे पर बच्चे की हल्की सी आकृति देकर उसकी आंखें दंग रह गई । उसको पहली बार मातृत्व का सही मायने में एहसास हुआ। रोहन की ओर देखा तो वह भी बहुत ध्यान से स्क्रीन देख रहा था, उसकी आंखें चमक रही थी । शिखा को लगा उसकी तरह उसको भी पहली बार अपने पिता होने का एहसास हो रहा था । आगे के लिए क्या क्या दवाई लेनी है, क्या सावधानियां बरतनी है डाक्टर बताने लगी। रोहन भी बहुत ध्यान से सुन रहा था। अच्छे से समझाने के बाद डॉक्टर मुस्कुराते हुए शिखा से बोली, "रोहन तंग तो नहीं करता। मैंने उसे पिछली बार अच्छी तरह समझा दिया था, सख्त हिदायत थी कि तुम्हारा शरीर अभी कमजोर है। निकट आने की कोशिश ना करना। " शिखा का चेहरा एकदम लाल हो गया, इतना लाल की काश्मीर के सेब को भी मात दे रहा था । इस बार रोहन की निगाह दीवार घड़ी पर नहीं शिखा के चेहरे पर थी। इस कारण शिखा को और अधिक शर्मिंदगी महसूस हो रही थी । काफी समय लगा उसे सामान्य होने में।

डॉक्टर को दिखाकर बाहर आए तो शिखा को कुछ भूख सी लग रही थी। सामने चाट पकौड़ी की दुकान थी, वह उस ओर देख रही थी। मन में गोलगप्पे खाने की तीव्र इच्छा हुई, लेकिन रोहन को दफ्तर जाने में देर ना हो जाए इसलिए चुप रही। रोहन ने स्वयं ही पूछ लिया, खाने का मन है क्या? शिखा ने हामी भरी और दोनों दुकान में चले गए। रोहन ने कुछ नहीं खाया लेकिन शिखा को मन भर कर खाने दिया। उसे घर छोडता हुआ वह दफ्तर चला गया।

रविवार को अक्सर रोहन घर में ही रहता और बारह बजे तक सोता रहता। शिखा अपना रोज की तरह ही समय बिताती, लेकिन उस दिन रोहन जल्दी उठकर बाहर आया । उसके हाथ में दो फिल्म की टिकट थी । शिखा वह फिल्म बहुत समय से सोच रही थी जब लगेगी अवश्य देखेगी। वह उसके पसंदीदा हीरो की फिल्म थी और उस शुक्रवार को ही सिनेमा घर में लगी थी। लेकिन टिकटों के लिए बहुत मारा मारी थी, उसे विश्वास नहीं हुआ रोहन उसके लिए टिकट लेकर आया है । रोहन को भी तो फिल्में देखने का शौक है, अपने लिए लाया होगा । उस पर तरस आ गया होगा कि उसे भी ले जाओ नहीं तो घर में बैठी बोर होती रहेगी बिचारी। उसे क्या उसको तो फिल्म देखने को मिल रही थी। रोहन का तो पता नहीं शिखा को फिल्म देख कर बहुत आनंद आया। वह तो वैसे भी जब हीरो-हीरोइन बिछड़ते हैं तो उनसे अधिक रोती है, पता नहीं रोहन क्या सोच रहा होगा। फिल्म के बाद वह उसे एक अच्छे रेस्टोरेंट में ले गया खाना खिलाने।

जैसे जैसे समय बीत रहा था शिखा का गर्भ नजर आने लगा था । उसे अब उठने बैठने में भी थोड़ा भारीपन लगने लगा था। सबसे बड़ी परेशानी कपड़ों को लेकर हो रही थी । उसके सब सलवार कमीज फसने लगे थे। दो तीन जो दर्जी से सिलवाएं थे, उसने उन्हें खोल कर बड़े कर लिए थे । लेकिन अब वे भी फंसने लगे थे, समझ नहीं आ रहा था क्या करें । मां को इस काम के लिए बुलाना ठीक नहीं लग रहा था और अकेले जाने कि इस स्थिति में हिम्मत नहीं हो रही थी। एक दिन अचानक रोहन बोला, " तुम दो-तीन कुर्ते को पहने रहती हो, कपड़े खत्म हो गए हैं क्या ?"

शिखा बोली, "हां, सब छोटे हो गए हैं। " रोहन बोला, " तो बोला क्यों नहीं, चलो बाजार कुछ नये कपड़े दिलवा दूंगा। " कपड़े खरीदने के लिए रोहन के साथ जाने में शर्म आ रही थी लेकिन कोई विकल्प नहीं था।

रोहन उसे महंगी बुटीक में ले गया, लेकिन दो-चार महीनों के लिए इतने महंगे कपड़े लेने का शिखा का मन नहीं था। दो आने जाने के लिए अच्छी कुर्तियां लेकर वह रोहन को सस्ती दुकानों पर ले गई । वहां से उसने रोजमर्रा के पहनने के लिए सस्ते से चार पांच जोड़ी कपड़े ले लिए। बच्चा होने तक उसका काम आराम से चल जाएगा। रोज सुबह उठकर उसे चिंता नहीं करनी पड़ेगी कि वह क्या पहने।

एक दिन ऑफिस से रोहन का फोन आया कि शिखा रात को खाने पर इंतजार ना करें । उसे किसी दोस्त के यहां किसी आयोजन में जाना था, देर हो सकती थी। शिखा को लगा रोहन उसके कारण अपने दोस्तों के यहां भी नहीं जा पाता है। दीपा ने बताया था कि रोहन के कई बचपन के दोस्त हैं जिनके साथ वह घूमने भी जाता था, उसका उनके यहां बहुत आना जाना था। शिखा को अच्छा नहीं लगा कहीं रोहन उसके कारण बंधन तो महसूस नहीं कर रहा । उसका मन दीपा से बात करने को हुआ। दीपा शिखा की आवाज सुनते ही बस शुरू हो गई। उसको कोई लड़का अपने परिवार के साथ देखने आया था। दीपा बहुत उत्साहित थी, उसे लड़का अच्छा लगा था‌ बहुत देर तक उन लोगों के बारे में बात करती रही । शिखा भी सुनकर प्रसन्न हो गई क्योंकि लड़का इंदौर का रहने वाला था । अभी लड़के वालों की ओर से कोई उत्तर नहीं आया था फिर भी दीपा बहुत प्रसन्न थी, उसे पूर्ण आशा थी उसका रिश्ता वहां अवश्य हो जाएगा। फिर उसने पूछा, "रोहन भाई कैसे हैं ? लगता है आजकल तेरा बहुत ध्यान रखते हैं । अक्सर फोन करके तेरी पसंद की फिल्मों, किताबों के नाम, खाने पीने में तुझे क्या अच्छा लगता है आदी के बारे में पूछते रहते हैं। "

अपनी प्रसन्नता में दीपा वह सब कह गयी जो रोहन ने शायद उसे बताने से मना किया था। फोन रखकर शिखा गंभीरता से सोच विचार में डूब गई।

आदत भी बहुत बुरी बात है, एक बार जिस व्यक्ति को किसी विशेष वक्त पर देखने की आदत पड़ जाए तो उसकी अनुपस्थिति में बड़ा खालीपन सा लगता है। खाना तो शिखा ने किसी तरह खा लिया लेकिन बाद में ना टीवी अच्छा लग रहा था न शांति की बातें। बार-बार ध्यान घड़ी और दरवाजे पर टीका था। उसे अपनी बेचैनी का कारण स्वयं समझ नहीं आ रहा था, उसे रोहन से कुछ काम तो नहीं था। फिर उसने अपने आप को समझाया इतने बड़े घर में जब गिनती के दो तीन प्राणी हो तो एक की भी अनुपस्थिति अखर जाती है। आधी रात तक वह करवटें बदलती रही। जब गाड़ी के आने की आवाज सुनाई थी, और जब उसने खिड़की से झांक कर देखा रोहन अंदर दाखिल हो रहा है तो उसे आराम से नींद आ गई।

एक दिन शिखा का भुट्टा खाने का मन हुआ, सेवक राम से मंगाया तो सख्त दानों वाला भुट्टा ले आया। तीव्र इच्छा के कारण उसने खा लिया लेकिन हल्का हल्का सा पेट में दर्द का अनुभव होने लगा । अपने कमरे में आकर भी उसको नींद नहीं आ रही थी, बेचैनी महसूस हो रही थी। शांति को उठाना उचित नहीं लगा, वो नीचे हॉल में चहल कदमी करने लगे। अपने कमरे में रोहन लैपटॉप पर काम कर रहा था, आवाज सुनकर नीचे आया। उसे बेचैन घूमता देखकर पूछा, " क्या हुआ मुझे बुलाया क्यों नहीं। "

शिखा बोली, " ऐसे ही नींद नहीं आ रही थी । "

रोहन बोला, "चलो थोड़ी देर कुछ खेल खेलते हैं। "

उस दिन से नियम बन गया रोहन को जब काम नहीं होता तो, वो दोनों ताश या शतरंज खेलते । और काम होता तो वह अपने लैपटॉप पर काम करता और शिखा वही कंप्यूटर या फोन पर कोई गेम खेलती। शिखा को रोहन के साथ ताश खेलने में बहुत आनंद आता। रोहन हंसते-हंसते कोई ना कोई पत्ता इधर उधर कर देता और शिखा भी उसकी चालाकियां पकड़कर बहुत खुश होती । जब वह काम कर रहा होता तो उसकी उपस्थिति कमरे में अकेलेपन को फटकने भी नहीं देती। कईं बार उसे लगता रोहन उसे बहुत ध्यान से देखता है। अब उसकी आंखों में अपने लिए चिढ़ या गुस्सा नजर नहीं आता था। एक अपनेपन का एहसास महसूस होता था। रोहन उसके बारे में क्या सोचता है निश्चित रूप से नहीं कह सकती थी लेकिन वह स्वयं उसके साथ सहज हो गई थी। उसे उसका साथ अच्छा लगता था, उसके बिना उसे बेचैनी होती थी, मन उचाट हो जाता था। वह कहीं जाता तो बस उसका इंतजार सा रहता था। उसकी अनुपस्थिति में वह यही सोचती रहती उससे क्या कहना है, उसे क्या बताना है, भले ही उसके सामने आधी बात भी नहीं बोल पाती हो । उसे अपने अंदर परिवरर्तन सा महसूस होने लगा था। जब भी रोहन को अपनी ओर देखते हुए महसूस करती एक बिजली सी सारे शरीर में दौड़ जाती।

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