नियति - 7 Seema Jain द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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नियति - 7

नियति

सीमा जैन

अध्याय - 7

गृह प्रवेश करते हुए शिखा का दिल कच्चा सा हो रहा था । जल्दबाजी में सिलाए गए ब्लाउज में वह बहुत असहज महसूस कर रही थी। साड़ी भी बहुत भारी थी, एक तो साड़ी पहने की आदत नहीं और जब पहनी तो इतनी भारी की लटकी जा रही थी। गर्मी के कारण पसीना पसीना हो रही थी । सुबह से कुछ खाया भी नहीं था पित्त से बन रहे थे । उसे लग रहा था घर में और भी रस्में करनी होंगी, कैसे कर पाएगी। शालिनी उसकी हालत समझ रही थी लेकिन सुषमा से बोलने की हिम्मत नहीं हो रही थी। लड़की अब पराई लगने लगी थी, जैसे उसका शिखा पर कोई हक नहीं रह गया था।

सुषमा बोली, "बहन जी आप शिखा को उसके कमरे में ले जाओ, कुछ हल्के कपड़े पहनवा दो। मैं खाना वही भेज देती हूं इसका । थोड़ा आराम कर लेगी तो अच्छा रहेगा। चेहरा बहुत उतर गया है। "

कमरे में पहुंचकर शिखा ने राहत की सांस ली। सूती सलवार कुर्ता पहन कर लेट गई । तभी सुषमा ने किसी के हाथ गरम गरम खाना भिजवा दिया। खाना खाकर शिखा को अपनी तबीयत कुछ ठीक लगी। थकान इतनी लग रही थी बस सोने का मन कर रहा था। शालिनी ने धीरे से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, "आराम से रहना, सुषमा जी सुलझी हुई समझदार औरत लग रही है। अपनी परेशानी उन्हें बताओगी तो वे अवश्य समझेंगी। रोहन के लिए कुछ मन में गलत मत रखना, वह अब तेरा पति है। धीरे धीरे उसको समझने की कोशिश करना सब ठीक हो जाएगा।

शिखा लेटी हुई सब सुन रही थी। शालिनी ने धीरे से उसेअपनी बाहों में भर लिया और उसके रुलाई फूट गई। शिखा भी थोड़ी देर तक रोती रही, शालिनी ने उसको चुप कराकर सोने को कहा । शालिनी आहिस्ता से कमरे से बाहर आ गई सबसे विदा लेकर गुप्ता जी के परिवार के साथ वापस भोपाल रवाना हो गई।

जब शिखा की आंख खुली तो कमरे में रोशनी बहुत कम थी । एकदम से समझ नहीं आया कि वह कहां है। अपरिचित सा कमरा देख कर एहसास हुआ कि वह मायके से विदा होकर ससुराल आ गई है । उसे बहुत अकेलापन महसूस हो रहा था, अब तो मां भी साथ में नहीं थी आस पास। उठ कर पहले बिजली का खटका ढूंढा, फिर कमरे को ध्यान से देखा। घड़ी में 8:00 बजे थे, इतनी देर तक सोती रही कोई उठाने भी नहीं आया। मां शाम को सोने के सख्त खिलाफ थी, छः बजे के बाद एक पल नहीं सोने देती । कमरे में तब तक चक्कर काटती रहती जब तक उठकर मुंह न धो लो। क्या हर पल मां की एक एक बात इस तरह याद आती रहेगी। मुंह धोकर बाल बना कर कमरे से बाहर आई तो नीचे से आवाज आ रही थी । वही चली गई, खाने की मेज पर बैठकर सुषमा और रोहन खाना खा रहे थे । उसको देखते हैं सुषमा खड़ी हो गयी।

सुषमा बोली, " मैंने तुम्हारे कमरे में जाकर देखा था, तुम गहरी नींद में थी। मैंने उठाना उचित नहीं समझा। अब उठ गई हो तो खाना खा लो। "

शिखा का मन तो नहीं था कुछ खाने का लेकिन तबीयत ठीक रहे इसलिए थोड़ा सा प्लेट में लेकर बैठ गई। रोहन का खाना खत्म हो चुका था वह एकदम से खड़ा हो गया । अपने कमरे की ओर जाते हुए सुषमा से बोला, " मां दस बजे के आसपास कॉफी भिजवा देना। "

शिखा को रोहन का मुख देखकर ही क्रोध आ गया था, और अब उसकी बेरुखी से उसे और अधिक चिढ़ हो रही थी । वह तीन चार महीने से कितनी परेशान है और वह झूमता फिर रहा है। उसका मन तो कर रहा था पानी से भरा गिलास उसके सर पर उड़ेल दे। अभी तक एक शब्द नहीं बोला, माफी मांगना तो दूर की बात है । कितना बेशर्म और निर्लज्ज इंसान है, कॉफी क्यों पीता है दो चार बोतल चढ़ा ले, पियक्कड़ कहीं का । शिखा रोहन को जाते हुए देख रही थी और यह सब सोच रही थी। सुषमा की दृष्टि शिखा के मुख पर थी, लेकिन वह उसके भाव नहीं पढ़ सकीं। वह सोच रही थी, ' हाए बेचारी कितनी लाचार सी रोहन को देख रही है और वह बदतमीज एक बार भी उससे ढंग से नहीं बोला। उसे ही उन दोनों को निकट लाने के लिए कोशिश करनी पड़ेगी। '

भोजन करके सुषमा शिखा को लेकर बाहर बगीचे में घूमने चली गई । खाना खाने के बाद टहलना ऐसे समय में आवश्यक है और थोड़ी चुस्ती भी बनी रहेगी। घूमते घूमते उसने शिखा से इधर-उधर की बातें की। ठंडी ठंडी हवा और फूलों की भीनी महक में टहलना अच्छा लग रहा था । अंदर आकर दोनों ने थोड़ी देर टीवी देखा । सुषमा ने शांति को कॉफी बनाने को कहा, शांति रसोई का काम देखती थी । जब वह कॉफी लेकर आई तो सुषमा एकदम से बोली, " शांति तुम हम दोनों के लिए दूध बना दो, कॉफी शिखा देगी रोहन को। "

शिखा का मन तो नहीं था रोहन के कमरे में जाने का लेकिन सुषमा को मना करने का साहस उसमें नहीं था।

शिखा ने जैसे ही कमरे में प्रवेश किया पुरानी यादें ताजा हो गई, कैसे मीठे मीठे सपने बुने थे इस कमरे में और कैसे एकदम से धराशाई हो गए । रोहन पलंग का सहारा लेकर बैठा था, हाथ में लैपटॉप था और कान में इयरफोन लगे थे । आँखें लैपटॉप में गड़ी थी। शिखा ने धीरे से कहा, "कॉफी रखी है, पी लेना। "

रोहन ने नहीं सुना वह बेखबर था कोई उसके कमरे में आया है । शिखा को रोहन के नजरअंदाज करने पर वैसे ही बहुत गुस्सा आता था । वह तीखी आवाज में बोली, "कॉफी रखी है पी लेना । " रोहन ने नजरें उठाकर देखा और झटके से सीधा बैठ गया।

रोहन बोला, "तुम मेरे कमरे में क्या करने आई हो । "

शिखा अकड़ के बोली, " कॉफी देने आई हूं, कोई दोस्ती करने नहीं आई हूं। "

रोहन गुस्से से बोला, "मुझसे तुम दूर ही रहो तो अच्छा है । बेकार में फिर कोई दोष लगा दो, गुनहगार तो तुम ने मुझे बना ही दिया है । स्वयं मेरे कमरे में आकर सो गई और सारा दोष मुझ पर मढ़ दिया। "

शिखा भी तैश में आ गई बोली, " जब मैं कमरे में सोने आई थी यहां कोई नहीं था। आंटी ने स्वयं हमें यह कमरा दिया था ठहरने के लिए। गलती आप की थी और आप इस बात से इंकार नहीं कर सकते । शराब पीकर कुछ भी करो फिर भूलने का नाटक करो। "

रोहन पलंग से कूदकर शिखा के सामने खड़ा हो गया और जोर जोर से बोलने लगा, " भूलने की बात मुझसे मत करो । कहीं ना कहीं दोषी हूं इसलिए चुपचाप तुमसे शादी कर ली, वरना इस दुनिया में ऐसा कोई नहीं है जो मुझसे जबरदस्ती कोई काम करवा ले । "

उसकी आंखों से अंगारे बरस रहे थे और उसकी आवाज तेज होती जा रही थी। शिखा की शरीर में बहुत कमजोरी थी इतनी तेज आवाज उसे सहन नहीं हो रही थी। उसे चक्कर से आने लगे लड़खड़ा कर गिरने को हो गई तभी रोहन ने लपक कर उसे अपनी बाहों में ले लिया। धीरे से उसे पलंग पर बैठा दिया । इतने में सुषमा कमरे में दौड़ती हुई आई। उसने तो शिखा को कमरे में इसलिए भेजा था कि थोड़ी शांति की लहर बहेगी दोनों के बीच, लेकिन यहां तो ज्वालामुखी फूट रहा था । उसको आता देख रोहन अपनी कॉफी लेकर कुर्सी पर बैठ गया। शिखा भी खामोशी से उठ कर अपने कमरे में चली गई, उसे अपने आप पर बहुत गुस्सा आ रहा था। बेकार ही रोहन से उलझी।

सुषमा रोहन से बोली, " शिखा अभी बहुत कमजोर है, उससे इतनी तेज आवाज में मत बोला करो। कल दस बजे डॉक्टर का समय लिया है, उसके चेकअप करवाने के लिए, तुम भी साथ चलना। "

अगले दिन डॉक्टर ने शिखा का मुआयना कर के सुषमा और रोहन से बोली, "शिखा बहुत कमजोर हो गई है, कुछ खाती पीती नहीं है क्या ? उसके पेट में पानी की कमी हो जाएगी, उसे अधिक से अधिक तरल पदार्थों दो। खून में लौह तत्व कम है, मैं कुछ दवाइयां लिख रही हूं उसे अवश्य देना। साथ में अनार चुकंदर जैसे फल सब्जी भी देते रहना। सुबह शाम टहलने अवश्य जाएं और खाने में पौष्टिक खाना अधिक लें। एक बात समझ में नहीं आई शिखा अपने बच्चे को लेकर बहुत उत्साहित नहीं लगी। "

सुषमा एकदम से बोली, " नहीं नहीं ऐसी कोई बात नहीं है । वह तो कमजोरी के कारण थक जाती है, इसलिए आपको ऐसा लगा होगा। " डॉक्टर बोली, "खैर जाने दो, आप उसे खुश रखने की कोशिश करें। बच्चों से संबंधित अच्छी बातें करें उसके सामने। उस पर किसी प्रकार का मानसिक और शारीरिक बोझ ना डालें। " रोहन की ओर देख कर मुस्कुराते हुए बोली, " आप भी अपने आप पर थोड़ा नियंत्रण रखें। "

रोहन शर्म से गडा़ जा रहा था, समझ में नहीं आ रहा था कहां अपनी नजरें टिकाए। वह घड़ी की ओर ध्यान से देखने लगा।

घर पहुंचकर सुषमा ने आदेशात्मक स्वर में सब को निर्देश दिए।

सुषमा बोली, "शांति सुबह शाम शिखा को चुकंदर अनार और गाजर का रस निकाल कर देना तुम्हारी जिम्मेदारी है। सेवक राम रोज सुबह दो नारियल खरीद के लाना और उसका पानी पिलाना शिखा को तुम्हारा काम है। सुबह शाम शिखा के साथ टहलने जाना और उसके पौष्टिक खाने का ध्यान में रखूंगी । शिखा दवाई बिना नागा तुम्हें स्वयं लेनी है । रोहन तुम शिखा के सामने बिल्कुल भी तेज आवाज में नहीं बोलोगे । "

सुषमा अमेरिका जाने से पहले चाहती थी कि शिखा की कमजोरी भर जाए और स्वस्थ महसूस करने लगे। अमेरिका जाना वह टाल नहीं सकती थी, सोहन बड़े बेटे से इंटरनेट पर बात होती थी। दोनों बेटे बहु बहुत चिंतित और परेशान लगते थे । बहू की बच्चेदानी थोड़ी नीचे थी और उसको डॉक्टर ने आराम करने की सलाह दी थी। ऐसे में सुषमा की वहां अधिक आवश्यकता थी, यहां तो बहुत से रिश्तेदार थे । शालिनी भी तो थी जो आवश्यकता पड़ने पर शिखा का ध्यान रख सकती थी। सुषमा ने अमेरिका में दोनों को रोहन और शिखा की शादी के बारे में संक्षेप में बता दिया था। दोनों को सुनकर बड़ा अचंभा हुआ, जिस हालात में इन दोनों की शादी हुई। सोहन को विश्वास नहीं हो रहा था कि मां ऐसे कैसे किसी अनजान लड़की से रोहन की शादी करवा सकती है। अधिक नहीं बोला मां के निर्णय पर उसे पूरा भरोसा था दूसरा वहां क्या हालात थे वह नहीं समझ सकता था इतनी दूर बैठकर।

सुषमा ने शिखा को कंप्यूटर के आगे बैठने को कहा । उसने सोहन और अंजली का परिचय शिखा से करवाया। औपचारिक बातें करके शिखा अपने कमरे में चली गई। शालिनी का फोन आया, बहुत बेचैन थी बेटी से बात करने के लिए । बहुत देर तक दोनों बातें करती रही।

धीरे-धीरे शिखा की दिनचर्या सुनिश्चित सी हो गई। सुषमा उसके खाने पीने का बहुत ध्यान रखती, कोई भी बात उसके सामने ऐसी नहीं होने देती जिससे वह परेशान हो । रोहन उसके सामने कम से कम पड़ता । खाने की मेज पर जब आमना सामना होता, दोनों ही खामोशी से खाना खाते और इधर उधर हो जाते । सुषमा को वैसे भी जाने की तैयारी करनी थी इसलिए अब इन दोनों को निकट लाने की अपनी योजना उसने स्थगित कर दी । भाग्य और वक्त अपने आप सब ठीक कर देगा। अपने लिए गर्म कपड़े खरीदने थे, बहू बेटे के लिए उपहार और भी आवश्यक सामान खरीदना था । दिन में शिखा को लेकर व कईं बार बाजार भी चली जाती । शिखा अपने साथ बहुत कम सामान लाई थी, उसकी भी आवश्यकता का सामान दिलवा देती। धीरे-धीरे शिखा सुषमा के साथ सहज होने लगी थी। सुषमा को भी शिखा, सीधी सरल और अच्छी लगी । उसकी मासूमियत भरी बातों से उसका दिल ही नहीं भरता था । उसे लगने लगा जैसे भगवान ने उसकी बेटी ना होने की कमी पूरी कर दी थी।

सुपाच्य भोजन और चिंता रहित वातावरण में अपना रंग दिखाना आरंभ कर दिया था । दो हफ्ते में ही शिखा के स्वास्थ्य में बहुत अंतर आ गया था, चेहरे पर ललाई लौट आई थी। चेहरा खिला सा लगने लगा था । समाज और भविष्य को लेकर जो चिंताएं उसे परेशान कर रही थी उनसे छुटकारा मिल गया था । उल्टियां भी बंद हो गई थी । अब वह हंसती रहती, घर के काम में भी हाथ बटाती । सुषमा के ले जाने का सामान लगवाने में भी सहायता करती । अब उससे लेटा नहीं जाता था, कभी शांति के साथ रसोई में खाना बनवाने लग जाती तो कभी सेवक राम के साथ सफाई करवाने लग जाती। सुषमा उसको समझाती रहती कौन से कक्ष में क्या सामान रखा है । उसके पीछे कौन सी बातों का उसको ध्यान रखना था। आवश्यक फोन नंबर की सूची तैयार करवा दी । घर का किराना और दूसरी आवश्यक वस्तु सेवकराम लाता था, लेकिन शिखा को समझा दिया क्या ध्यान रखना है । रोज की समस्याएं के लिए शिखा सुषमा से फोन पर सलाह ले सकती थी । लेकिन इतनी जिम्मेदारी ओढ़ते हुए शिखा को घबराहट हो रही थी। रोहन से सहयोग की उसे आशा नहीं थी, वैसे भी वह नौ बजे दफ्तर चला जाता और रात को आठ बजे तक आता। इतने बड़े घर में कैसे रहेगी, यह सोच कर उसका दिल बैठा जा रहा था।

जैसे-जैसे जाने के दिन नजदीक आ रहे थे सुषमा की चिंता भी बढ़ती जा रही थी। पता नहीं दोनों को अकेले छोड़ कर जा रही है, आपस में लड़ेंगे मरेंगे या एक दूसरे का सहारा बनकर करीब आ जाएंगे। एक बार को तो मन हुआ शालिनी को बोले छुट्टियां लेकर यहां आ कर रहे, लेकिन यह ठीक नहीं होगा। इस प्रकार शिखा कभी भी आत्मनिर्भर नहीं हो पाएगी। दोनों व्यस्क हैं अपना रास्ता स्वयं तलाशें यह बेहतर होगा। हां जब शिखा का नवा महीना प्रारंभ होगा तब शालिनी को कहेगी जितनी छुट्टियां लेकर आ सकती है यहां आ कर रहे। तब शिखा का अकेले रहना उचित नहीं होगा। सारा दिन भविष्य की यही योजना उसके दिमाग में घूमती रहती । स्वयं को पहली बार अमेरिका जाने की चिंता से भी अलग नहीं रख पा रही थी अपने आप को। कैसे इतने सामान के साथ इतनी लंबी हवाई यात्रा करेगी। उसका जाने का दिन निकट आता जा रहा था और उसकी दिमागी उथल-पुथल बढ़ती जा रही थी।

उस दिन रोहन की छुट्टी थी वह नीचे हॉल में बैठा अपने लैपटॉप पर काम कर रहा था। सेवक राम सफाई कर रहा था । वह शिखा को बुलाकर रोहन के कमरे में ले गया और बोला, " भाभी जी मुझे भैया के कागज छूते हुए डर लगता है, कृपया आप कागज़ और किताब संभाल लो, मैं झाड़ पोंछ कर लूंगा। "शिखा संभाल कर कुछ कागज उठाती, सेवक राम धूल झाड़ता और शिखा सामान वैसे ही रख देती। इस तरह से काफी देर लग गई पर धूल साफ हो गई । कुछ कागजों के ऊपर एक सुंदर सा कांच का पेपरवेट रखा था शिखा ने जब कागज उठाएं तो वह बहुत जोर से फिसल का फर्श पर गिर गया। गिरते ही टुकड़े-टुकड़े हो गया। शिखा को बहुत अफसोस हुआ इतना सुंदर पेपरवेट टूट गया। काम बढ़ गया सो अलग, कांच के टुकड़े समेटने का। अब रोहन की डाट भी सुननी पड़ेगी। बेकार ही रोहन के कमरे में आई। इतने में आवाज सुनकर रोहन कमरे में आया। शिखा ने मन में सोचा, अगर रोहन चिल्लाया तो खामोशी से सुन लेगी, गलती तो उसकी है उसकी इतनी महंगी वस्तु तोड़ दी। लेकिन रोहन की दहाड़ के स्थान पर नम्र स्वर सुनाई दिया । वह कह रहा था, " तुम्हें यह सब करने की कोई आवश्यकता नहीं है। तुम अपने कमरे में जाकर आराम करो। " शिखा को अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ इससे पहले कि कोई और करिश्मा होता वह खामोशी से अपने कमरे में चली गई।

सुषमा के जाने की सब तैयारी हो गई थी। रोहन ने भी एक जोड़ी कपड़े गाड़ी में रख लिए थे । मां के साथ वह भी दिल्ली जा रहा था सुषमा को अमेरिका की उड़ान में बैठा कर उसे वापस आना था । सुषमा जाते-जाते भी निर्देश दे रही थी । शिखा को अलमारियों की चाबी संभाल कर रखने को दे दी। शालिनी भी आई थी उसको विदा करने। शिखा ने झुककर जब सुषमा के पैर छूने की कोशिश की तो सुषमा ने उसे एकदम से रोक दिया । वह बोली, "ऐसे में झुकते नहीं है। " फिर रोहन से बोली, " अब इसकी सारी जिम्मेदारी तुम्हारे ऊपर है। उसकी हर बात का ध्यान रखोगे। घर पर एक गाड़ी ड्राइवर सहित हर वक्त रहनी चाहिए, किसी भी समय आवश्यकता पड़ने पर डॉक्टर के पास जा सके। " और भी न जाने क्या-क्या समझाती रही। रोहन सिर झुकाए सब सुनता रहा। सुषमा गाड़ी में बैठ गयी जाने के लिए। उसका मन अनमना सा हो रहा था‌। उसका निर्णय रोहन और शिखा को अकेले छोड़ कर जाने का सही है या गलत यह तो समय ही बताएगा। वह मन ही मन प्रार्थना कर रही थी, हे! भगवान दोनों बच्चों पर अपनी कृपा दृष्टि बनाए रखना।

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