अपनी अपनी मरीचिका - 16

अपनी अपनी मरीचिका

(राजस्थान साहित्य अकादमी के सर्वोच्च सम्मान मीरा पुरस्कार से समादृत उपन्यास)

भगवान अटलानी

(16)

12 मार्च, 1959

दुनिया का चक्र अपनी रफ्तार से चल रहा है। न तेज, न धीरे। सम गति से। परिस्थितिवश हमें ही लगता है कि समय वहुत तेजी से या बहुत धीरे-धीरे गुजर रहा है। भौतिक और सांसारिक दृष्टि से सब कुछ करते हुए भी मन व्यग्र बना रहता है। ऊपर से कुछ भी असामान्य नहीं लगता लेकिन सचमुच एक बेचैन लावा अंदर-ही-अंदर खौल रहा होता है। चेहरे को भंगिमाओं से नहीं, यदि मन की हलचल को सीधा पढने का कोई तरीका होता तो दुनिया का नक्शा कोई दूसरा रूप ग्रहण कर चुका होता।

मीनू के तलाक के बाद मैं चाहता था कि समय की रफ्तार तेज हो जाए। चतुर्थ तथा अंतिम वर्ष एम.बी.बी.एस. का बाकी बचा डेढ साल इंटर्नशिप के छः महीने और एम ० डी ० के तीन साल आँख झपकते गुजर जाएँ। घड़ी के स्िंप्रग की तरह दाएँ-बाएँ करके समय को तेजी से निकल जाने दिया जाए। समय की रफ्तार मेरे चाहने से न बदलनी थी, न बदली। एम ० डी ० की परीक्षाएँ देर से होने के कारण पाँच साल बढकर, सवा पाँच साल हो गए। अंतिम तीन माह पढाई के भारी दबाव के बावजूद कैसे गुजारे हैं, मैं ही जानता हूँ। हर काम करते हुए मीनू की याद बनी रहती थी। जिस तरह रेलगाड़ी में चौबीस घंटों का लंबा सफर करने के बाद अंतिम दो-तीन घंटे गुजारने मुश्किल हो जाते हैं, उसी तरह अंतिम तीन महीने मैंने एक-एक दिन गिनकर गुजारे हैं।

छात्रसंघ महासचिव के रूप में अर्जित प्रतिष्ठा के कारण अंतिम वर्ष एम.बी.बी.एस. तक महासचिव का चुनाव वही लड़के जीत पाए, जिनका मैंने समर्थन किया। चुनाव जीतने वाले लड़के महत्त्वपूर्ण फैसले लेने से पहले मुझसे सलाह-मशविरा करते रहे। मैंने प्रत्यक्ष रूप से और हमारी मंडली ने परोक्ष रूप से समर्थन दिया था इसलिए महासचिव की गतिविधियों पर हम लोग नजर रखते रहे। जहाँ लगता था कि महासचिव की दिशा ठीक नहीं है, वहाँ हम लोग हस्तक्षेप करते थे। छात्रों के आपसी झगड़ों को सुलझाना, बाहुबल से समस्या हल करने पर अड़े हुए लड़कों को समझा-बुझाकर विकल्प देना, प्रतिनिधि मंडलों में शामिल होकर महासचिव को सक्रिय सहयोग देना, ध्यान देने योग्य छात्र समस्याओं पर महासचिव से बात करना, उन अनेक कायोर्ं का एक छोटा सा हिस्सा थे जिनमें से कुछ मैं स्वेच्छा से करता था और कुछ किसी-न-किसी कारण से मुझे करने पड़ते थे। रैगिंग के विकल्प के रूप में प्रारंभ की गई चाय-पान की परंपरा, भारतीय संस्कृति की प्रतिष्ठा के लिए कोई-न-कोई प्रयोग, मूल्यों के प्रति लगाव छात्र-संघ की गतिविधियों के साथ मिलकर मुझे वर्ष-भर व्यस्त रखते थे। पढाई और अस्पताल मैं किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ता था। व्यवहार में महासचिव के रूप में अत्यधिक व्यस्त दिन एवं रात्रि चर्या जैसी व्यस्तता वाली स्थिति बनी रही।

इंटर्नशिप के छः माह में मैं जिस वार्ड में भी गया, लोगों को लगता था जैसे रजिस्ट्रार को मुक्त करके मुझे ही वार्ड की जिम्मेदारी सँभालनी है। सुबह और शाम निर्धारित समय पर तो अनिवार्यतः वार्ड में रहता ही था। लौटते समय भी देख लेता था कि वार्ड का सारा काम निपट गया है। भले ही देर हो जाए लेकिन कोशिश रहती थी कि दोपहर को या रात को वार्ड रजिस्ट्रार के साथ छोड़ूं। मरीजों से जीवन-भर वास्ता पड़ेगा। उनके ऊपर ध्यान देकर सीखने का यही अवसर है। ऐसे अवसर फिर नहीं मिलेंगे। कुछ इंटर्न मानते थे कि ये छः महीने मौज-मस्ती करने के लिए मिलते हैं। काम करने के लिए सारी जिदगी सामने पड़ी है। मेरे और उनके सोच में विलोमार्थक अंतर था। इसलिए मेरे और उनके व्यवहार में भी विपरीत ध्रुवों जितनी दूरी थी। रजिस्ट्रार भी कहते रहते थे, ‘‘यार, इंटर्नशिप में हमने भी कभी काम मन लगाकर नहीं किया। सब लोगों को मस्ती करते देखकर काम में मन लगता ही नहीं था।''

एम ० डी ० के तीन साल तो वार्ड और कॉल दोनों ही मेरे ऊपर थे। वरिष्ठ डॉक्टरों के आने से पहले पहुँचकर वार्ड में राउंड लेने से दिन की शुरुआत होती थी। कभी वरिष्ठ डाक्टरों को राउंड दिलाना, कभी जाँच के लिए पर्चियाँ बनाकर मरीजों को भेजना, कभी नए मरीजों को बिस्तर देकर उनकी हिस्ट्री लेना, कभी दवाएँ लिखना, कभी इंजेक्शन और दवाओं का नियमित इस्तेमाल देखना, कभी ब्लड प्रेशर देखना, कभी ड्रिप लगाना, कभी कंपाउंडर या नर्स को मरीज विशेष के संदर्भ में निर्देश देना, कभी सामने खड़े रहकर इंट्रावीनस इंजेक्शन लगवाना, कभी मरीज के परिचारक को उसके मरीज के बारे में, खाने-पीने की चीजों के बारे में बताना, वार्ड में सैकड़ों काम थे जो मेरे सिर पर थे।

अंतर इतना ही था कि अन्य रजिस्ट्रार, हाउस सर्जन झल्लाते, झींकते और शिकायतें करते हुए ये सारे काम करते थे, जबकि मैं मुसकराते हुए अपने काम निपटाता रहता था। किसी मरीज या उसके परिचारक को दरगुजर नहीं करता था। सबसे प्यार से बात करता था। अधिकांश रजिस्ट्रार काम के बोझ से परेशान रहते थे। बोझ मेरे ऊपर भी उतना ही या उनसे ज्यादा ही था, मगर मैं हँसते हुए खुशनुमा ढंग से काम करता था।

उनसे ज्यादा काम मेरे पास इसलिए होता था क्योंकि उनके वाडोर्ं में बिना फीस दिए भरती होने वाले मरीजों की तरफ ध्यान नहीं दिया जाता था। पैसे या पहुँच के आधार पर मरीजों की चिंता की जाती थी। मैं अपने वार्ड में निर्धन मरीजों की भी उतनी ही तत्परता के साथ देखभाल करता था जितनी तत्परता मैं वरिष्ठ डॉक्टरों के भरती किए हुए मरीजों के मामले में दिखाता था। वार्ड में भरती लगभग पचास प्रतिशत मरीज अतिरिक्त रूप से मेरी चिंता के दायरे में आते थे। इन मरीजों की परवाह क्योंकि वरिष्ठ डॉक्टर नहीं करते थे इसलिए उन्हें अन्य मरीजों के बराबर सुविधाएँ देने की दृष्टि से मुझे अधिक मेहनत करनी पडती थी। निर्धन मरीजों के प्रति मेरे मन में लगाव और सहानुभूति अधिक थी इसलिए अपनी मेहनत हमेशा मुझे सार्थक लगती थी।

दोपहर के समय वार्ड से फारिग होकर मैं घर आता था। भोजन करके थोड़ी देर लेटता था। शाम को घर से ही अस्पताल चला जाता था। रात को अस्पताल से निकलकर मैं घर नहीं जाता था। वार्ड से किसी भी समय बुलावा आ जाता था। इसलिए छात्रावास में सोता था। छात्रावास के भोजनालय में रात का भोजन किया। देर रात तक थीसिस पर काम करता रहा या पढता रहा। इस बीच कॉल आया तो टेलीफोन पर या स्वयं जाकर कार्यवाही कर ली। एक-डेढ़ बजे सोता था। सुबह छः बजे उठकर घूमने और व्यायाम करने निकल जाता था। लौटकर नहा-धोकर छात्रावास में ही नाश्ता करके अस्पताल चला जाता था। सोने के बाद अस्पताल से बुलावा आए तब भी, सुबह उठने का समय आगे-पीछे नहीं होता था। दिन के समय थोड़ी देर सो लेता था, इसलिए रात को थोड़ा-बहुत समय अधिक जागना पड़ा तो परेशानी नहीं होती थी।

कोशिश करता था कि शाम को अस्पताल में पहुँचकर कुछ समय स्वास्थ्य जागरण ट्रस्ट के कार्यालय में बैठूं और इसके बाद वार्ड में जाऊँ। किसी दिन दोपहर को घर लौटने में देर हो गई, शाम को अस्पताल जल्दी पहुँचना संभव नहीं हो सका तो रात को वार्ड से मुक्त होने के बाद आधा घंटा, पौन घंटा जितना समय निकल पाया, स्वास्थ्य जागरण ट्रस्ट के कार्यालय जाता था। दिन में, रात में जब भी गुंजाइश हो एक बार स्वास्थ्य जागरण ट्रस्ट के कार्यालय में मैं जरूर जाता था। शाम के समय जाने का अधिक लाभ मिलता था। उस समय मरीज से मिलकर उसके परिजन, अपने परिजन नहीं तो वार्ड के किसी अन्य मरीज के परिजन वापस लौटते थे। पाँच बजे तक मरीजों के परिजनों को अस्पताल में आकर मिलने की सुविधा मिलती है। दवाओं की जरूरत की सूचना सामान्यतः उस समय आती थी कार्यालय में। मैं सक्रिय रूप से अस्पताल के काम-काज के साथ जुड़ा हुआ था। स्वास्थ्य जागरण ट्रस्ट का काम भी सक्रियता के साथ करता था। इसलिए विभिन्न वाडोर्ं में भरती मरीजों के बारे में जानकारी लेता रहता था। अधिकांश मामलों में गरीब मरीजों की दवाओं की माँग का फैसला हाथों-हाथ हो जाता था। जिन मरीजों के बारे में मुझे जानकारी नहीं होती थी, लौटते समय मैं संबंधित वार्ड में होता हुआ चला जाता था। ट्रस्ट के कार्यालय को टेलीफोन पर बता देता था। दवाओं की आपूर्ति सूचना आने के एक घंटे में हो जाती थी। शाम को ट्रस्ट कार्यालय में न जाने की स्थिति में सारा काम कर्मचारियों को करना पड़ता था। दवाओं की आपूर्ति में समय अधिक लग जाता था।

ट्रस्ट कार्यालय में दिन-भर की गतिविधियों का लेखा-जोखा करता था। दवाओं की आपूर्ति के वाउचर और माँग-पत्र नजर से निकालता था। स्वास्थ्य शिक्षा के कार्यक्रम के सुचारु संचालन की दृष्टि से विभिन्न बिंदुओं की जाँच करता था। मरीजों के लिए खून की आपूर्ति सुनिश्चित करता था। दानदाताओं को पत्र लिखवाकर या उनसे टेलीफोन पर बातचीत करके प्रगति का विवरण देकर संपर्क सुदृढ करता रहता था।

सीनियर रजिस्ट्रार सामान्यतः वार्ड में रुचि लेना कम कर देते हैं। एक हाउस सर्जन और रजिस्ट्रार वार्ड का काम करने के लिए होते हैं। सीनियर रजिस्ट्रार तीसरा व्यक्ति हो जाता है। एम ० डी ० अंतिम वर्ष की तैयारी भी उसे करनी पड़ती है। इसलिए वरिष्ठ डॉक्टरों से संपर्क बनाए रखने, भरती मरीजों और उनकी बीमारियों की जानकारी रखने के उद्‌देश्य से सीनियर रजिस्ट्रार वार्ड में आते हैं। वरिष्ठ डॉक्टरों के कहने पर या इच्छा व्यक्त करने पर वार्ड के दैनिक काम भले ही कर लें किंतु बहुत रुचि लेकर वे वार्ड के काम में हाथ नहीं डालते हैं। मैं सीनियर रजिस्ट्रार के रूप में भी वार्ड में उसी तरह काम करता रहा जिस तरह रजिस्ट्रार या उससे पहले, हाउस-सर्जन के रूप में करता था। वार्ड का काम करने वाले दो के स्थान पर तीन लोग थे। इसलिए काम जल्दी हो जाते थे। पढने का समय घंटा-दो-घंटा ज्यादा मिल जाता था। मेरी जरूरतें इससे ज्यादा थीं भी नहीं।

वार्ड में सक्रिय रूप से काम करते रहने के कारण, स्वास्थ्य जागरण ट्रस्ट से जुड़े होने के कारण अस्पताल में भरती सभी प्रकार की बीमारियों के मरीजों की जानकारी मुझे रहती थी। शार्ट केस हों या लाँग केस, अस्पताल में कुछ भी मुझसे छिपा हुआ नहीं था। एम ० डी ० की परीक्षा में इसके अलावा कुछ विशेष था नहीं। किताबें पढता था। क्लिनिक कक्षाओं में जाता था। स्पेशल क्लिनिक सेशन में सक्रियता से प्रश्न पूछता था। एम ० डी ० की तैयारी के नाम पर वार्ड में काम न करने की बात मुझे कभी समझ में नहीं आई।

ये सभी काम करते हुए व्यस्तता बनी रहती थी। व्यस्तता परीक्षा में विलंब के बाद भी उसी तरह बनी रही। मगर पाँच साल गुजर जाने के बाद लगता था कि मीनू से बात करने के लिए मजबूरी में की गई टाल-मटोल वैसे ही बहुत हो चुकी है। तीन महीने लगने का अर्थ है, नब्बे दिन। एक-एक गुजरता हुआ दिन मुझे भारी महसूस होता था। मुझे लगता था कि पाँच साल तक मीनू के प्रति किया गया अत्याचार तीन महीने और करूँगा तो यह दुष्कृत्य की श्रेणी से निकलकर महादुष्कृत्य की श्रेणी में आ जाएगा। मीनू से चर्चा नहीं की थी। मेरे एम ० डी ० हो जाने या नौकरी मिलने का इंतजार वह नहीं कर रही थी। इसलिए एकांतिक प्रतीक्षा में तीन महीने की वृद्धि मुझे और भी अखरती रही। मेरी व्यस्तता देखकर, पहले की तरह मुझे सक्रिय देखकर किसी को महसूस चाहे न हुआ हो, किंतु सच्चाई यह है कि ये तीन महीने, इससे पहले बिताए पाँच वषोर्ं से भी लंबे लगते रहे मुझे।

1956 में इंटर करने के बाद मीनू ने पढना बंद करके कपड़ों की सिलाई का एक कारखाना शुरू किया। घर में यद्यपि उसको किसी से शिकायत नहीं थी किंतु सारी उम्र एक बच्ची के साथ पिता या भाइयों पर आश्रित रहना उस जैसी लडकी के लिए संभव नहीं था। दूसरे विवाह के लिए काकी और अम्मा ने अलग-अलग और संयुक्त रूप से मीनू से बात की थी। दुःख-सुख, हारी-बीमारी, बच्ची की शिक्षा, उसका पालन-पोषण और सबसे बढकर शरीर के तकाजे। मीनू चुपचाप सुनती रहती थी। अंत में हर बार एक ही बात कहती थी, ‘‘आप मेरी चिंता मत करिए। मैं शादी नहीं करूँगी।''

बच्ची साथ थी। नौकरी पता नहीं कब मिले? पता नहीं कहाँ मिले? पता नहीं कैसी मिले? काका भोजामल और काकी नहीं चाहते थे कि मीनू उनकी आँखों से दूर हो जाए। सब कुछ सोचकर घर के पास में एक कमरा लेकर दो सिलाई मशीनें खरीदकर काका ने रेडीमेड कपड़ों की दुकान से काम की व्यवस्था की। सिलाई, कशीदा, रसोईघर के सारे काम सिंधी परिवारों में लड़कियों को बचपन से ही सिखाना शुरू कर देते हैं। मीनू के लिए सिलाई समस्या नहीं थी। इस काम में सिलाई की समझ जरूरी थी, स्वयं मशीन पर बैठकर सिलाई करने की जरूरत नहीं थी। कपड़ा नमूने के अनुसार काटकर मीनू कारखाने में बैठकर काम करने वाली महिलाओं को सिलाई के लिए देती है। . महिलाएँ कारखाने में आकर उससे कटे हुए कपडे़ ले जाती हैं। तैयार माल को मीनू जाँचकर देखती है। कमी होती है तो दुरुस्त कराती है और दुकानदार को दे देती है। प्रारंभ में काका भोजामल स्वयं दुकानदार से कपड़ा लाने और सिलाई हो जाने के बाद पहुँचाने का काम करते थे। दुकानदार से लेन-देन भी वही करते थे। कारखाने में या अन्यथा काम करने वाली महिलाओं को जितनी सिलाई उन्होंने की, उसके आधार पर भुगतान करके मीनू कापी में लिख लेती थी। बाद में जिद करके दुकानदार के पास कपड़ा लेने, सिले हुए कपड़े पहुँचाने और पैसों का हिसाब करने भी मीनू जाने लगी। काम शुरू किए दो वषोर्ं से ज्यादा हो गए हैं। आमदनी ठीक है। काका भोजामल, काकी और स्वयं मीनू संतुष्ट हैं। आर्थिक दृष्टि से किसी पर बोझ बने रहने की चिंता अब मीनू को नहीं है। सब लोग यह जरूर चाहते हैं कि मीनू पुनर्विवाह करने के लिए तैयार हो जाए। मैं समझता हूँ, उनकी यह इच्छा भी जल्दी पूरी हो जाएगी।

एम ० डी ० की परीक्षा और परिणाम के बीच में जो चौदह दिन मिले, उसमें से अधिकांश समय मैंने स्वास्थ्य जागरण ट्रस्ट के कार्यालय में काम किया। स्वास्थ्य शिक्षा के लिए जो सामग्री ट्रस्ट में थी, उसे संशोधित करके तैयार करने की जरूरत काफी दिनों से महसूस होती थी। कुछ नए पैंफलेट, ब्रोशियर लिखने थे। प्रचार सामग्री, पोस्टरों का स्वरूप बदलना था। टीकाकरण, घर और शरीर की सफाई, कपड़ों की धुलाई, बीड़ी व तंबाकू का प्रयोग, पानी का शुद्धिकरण, कुंओं का रख-रखाव, गर्भवती की देखभाल, विभिन्न आयु वर्ग के शिशुओं की सार-सँभाल, बच्चे को स्तनपान कराने की विधि, पर्याप्त मात्रा में पानी का इस्तेमाल, चोट लगने पर टिटनेस का इंजेक्शन जैसे विषयों पर तुरंत संदर्भ-पुस्तिका तैयार करनी थी। प्राथमिक चिकित्सा के लिए प्रशिक्षण शिविर आयोजित करने का सघन कार्यक्रम प्रस्तावित था। उसके लिए पृष्ठभूमि सामग्री तैयार करनी थी। उन चौदह दिनों में मैंने यह सारे काम निपटाए।

निदेशक, स्वास्थ्य एवं चिकित्सा विभाग में नौकरी के लिए आवेदन-पत्र पहले ही दे दिया था। आशा है कि एम ० डी ० का परिणाम आते-आते नौकरी के आदेश आ जाएँगे। शहर के किसी अस्पताल में काम करना या निजी क्लिनिक खोलकर बैठना मुझे पसंद नहीं है। मैं चाहता हूँ कि ग्रामीण क्षेत्र में जयपुर से दूर कहीं काम करने का अवसर मिले।

पिछले तीन सालों में जयपुर के इर्द-गिर्द के गाँवों में वहीं के निवासियों के सहयोग से स्वास्थ्य शिक्षा के कार्यक्रम चलाने की कोशिश की है। कुछ गाँवों में व्यवस्था जम गई है। कुछ गाँवों में अपेक्षित ढंग से ढाँचा खड़ा नहीं हुआ है। मैं स्वयं बहुत कम किसी गाँव में जा पाया हूँ किंतु ट्रस्ट के कार्यकर्ता गाँवों में जाते रहे हैं। गाँव के किसी समझदार, प्रतिष्ठित, वरीयतः पढे-लिखे एक व्यक्ति का चुनाव करके ट्रस्ट की ओर से स्वास्थ्य शिक्षा से संबंधित सारी सामग्री उसे सौंप दी जाती है। उस सामग्री को पढकर गाँव के लोगों से वह उसकी चर्चा करता रहता है। इस काम के लिए किसी से अतिरिक्त समय देने के लिए नहीं कहा जाता है। चौपाल पर बातचीत में, खेत की मेढ पर सुस्ताते समय, तैयार खेत की रखवाली के दौरान, शादी-विवाह में, किसी उत्सव या मेले में वह व्यक्ति अपना अर्जित ज्ञान दूसरों को देने की चेष्टा करता है। स्वास्थ्य की दृष्टि से किस स्थिति में क्या करना चाहिए, वह सलाह देता है।

दाई से कहता है कि जापे के बाद नाल या तो ब्लेड को पानी में उबालकर उससे काटो या चाकू को पानी में उबालकर काम में लो। फावड़ा, खुरपी जैसी चीजों का इस्तेमाल नाल काटने में मत करो। कुत्ते या साँप ने काटा है तो ओझा बुलाकर झाड़ा भले ही डलवाओ, लेकिन शहर के अस्पताल में भी दिखा दो। शहर के अस्पताल में आकर वे सीधा ट्रस्ट के कार्यालय में संपर्क करते हैं। अपनत्व के साथ रास्ता दिखा दिया जाए, इससे ज्यादा कुछ चाहते कहाँ हैं वे लोग? मैं चाहता हूँ कि ग्रामीण क्षेत्र में नौकरी करते हुए गाँवों में रहने वालों की चिकित्सा संबंधी जरूरतों की देखभाल करूँ ताकि शहर के अस्पताल में वे तभी आएँ जब बहुत जरूरी हो। स्वास्थ्य शिक्षा कार्यक्रम का क्षेत्र में ढाँचा खड़ा करके मैं ठीक प्रकार से चलाता रहूँगा। विवाह के तुरंत बाद मीनू शहर से निकल जाएगी तो मानसिक दृष्टि से उसके लिए भी ठीक रहेगा।

स्वास्थ्य जागरण ट्रस्ट के मुख्य ट्रस्टी और ट्रस्टी पहले भी कहते रहे थे, मगर एम ० डी ० की परीक्षा हो जाने के बाद उन्होंने जोर देकर सरकारी नौकरी न करके मुझे ट्रस्ट में नौकरी करने के लिए कहा है। काम मेरी रुचि का है। ट्रस्ट की स्थापना मेरे प्रयासों से हुई है। ट्रस्ट के कार्य-कलाप प्रभावशाली ढंग से चलें, यह बात मैं संपूर्ण हृदय से चाहूँगा। शहर में रहना, न रहना मेरे लिए महत्त्वपूर्ण नहीं है। प्रस्ताव है कि मैं ट्रस्ट के निदेशक के रूप में काम कर सकता हूँ। गाँवों में स्वास्थ्य शिक्षा के साथ स्वास्थ्य सेवा की योजना भी बनाई जा सकती है। मुख्यालय शहर में रखूंगा या किसी गाँव में, यह मेरी मरजी पर निर्भर करता है। वेतन जो मैं माँगूँगा, वेतन-वृद्धियाँ मैं जिस तरह से तय करूँगा और भत्ते जो मैं लेना चाहूँगा, ट्रस्ट दे देगा।

काम सचमुच मेरी रुचि का है। वेतन, व्यावसायिक संतोष, सोद्‌देश्यता समाज-सेवा सभी दृष्टियों से प्रस्ताव अच्छा है। मगर भविष्य में आने वाले दायित्वों की बात सोचता हूँ तो लगता है कि सरकारी नौकरी करना ट्रस्ट की नौकरी करने से ज्यादा ठीक रहेगा। ट्रस्ट के साथ आज ताल-मेल अच्छा है। कल किसी कारण से संबंध खराब हो जाते हैं। नौकरी छोड़नी पड़ती है तो अपनी जिम्मेदारियाँ किस तरह निभाऊंगा? ट्रस्ट में नौकरी करूँगा तो ट्रस्ट के माध्यम से जो कुछ करना चाहता हूँ, उसे तेज गति से कर सकूंगा। सरकारी नौकरी करूँगा तब भी यथाशक्ति ट्रस्ट के उद्‌देश्यों की पूर्ति के लिए प्रयत्नशील रहूँगा। मेरे ऊपर जो पैसा ट्रस्ट खर्च करेगा, उसका उपयोग कहीं अन्यत्र हो सकेगा। यदि दायित्वों के तकाजे न होते तो मैं ट्रस्ट की नौकरी सरकारी नौकरी के मुकाबले ज्यादा पसंद करता। अनबन होने पर नौकरी छोड़ने की नौबत आ सकती है, इस खतरे के बाद भी ट्रस्ट की नौकरी का चुनाव करता। अम्मा-बाबा को आर्थिक दृष्टि से मेरी तरफ देखने की जरूरत नहीं है। आवश्यकता हो चाहे न हो किंतु हर एक माता-पिता की यह इच्छा होती है कि बेटा कमाकर रुपया उन्हें लाकर दे। अम्मा-बाबा भी इसके अपवाद नहीं हैं। मगर मैंने कुछ नहीं दिया, तब भी उनको किसी परेशानी का सामना नहीं करना पड़ेगा। विवाह करूंगा। उसके बाद मीनू और उसकी बच्ची को किसी प्रकार की तकलीफ न हो यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी तो मेरी है।

एम ० डी ० का परिणाम घोषित होने के दो दिन बाद, कल ही नियुक्ति-पत्र मिला है। एम ० डी ० का परिणाम परीक्षा की समाप्ति के साथ ही संकेत देकर बता दिया गया था, इसलिए औपचारिक घोषणा ने उतना रोमांच नहीं दिया जितना एम ० बी ०, बी ० एस ० के दौरान परिणाम की घोषणा से मिला था। नौकरी के आदेश ने वह रोमांच जरूर दिया है। चित्तौड़गढ़ जिले के एक छोटे गाँव में सी ० ए ० एस ० के रूप में नियुक्ति मिली है। चित्तौड़ से दो बसें बदलकर कोई दो फलार्ंग पैदल चलकर उस गाँव में पहुँचा जा सकता है। ऐसे ही किसी शहर से पूरी तरह कटे, चिकित्सा सेवाओं से अब तक महरूम रहे छोटे गाँव में मैं नियुक्ति चाहता था। रोगियों की सेवा का बेहतरीन सुख और स्वास्थ्य शिक्षा का सघन काम, मेरी ये दोनों इच्छाएँ जिस जगह पूरी हो सकती हैं, ऐसे ही गाँव में नियुक्ति हुई है। .

मीनू से विवाह की बात करने का सवा पाँच साल पहले लिया हुआ संकल्प पूरा करने का समय आ गया है। अब मीनू से बातचीत करने के लिए अम्मा को काका भोजामल के घर भेजने की जरूरत नहीं है। मीनू रेडीमेड कपड़ों की सिलाई का कारखाना चलाती है। सिलाई करने वाली महिलाओं से काम कराती है। उनको हिसाब करके काम का भुगतान करती है। दुकानदार से कपड़ा लेकर आती है। दुकानदार को सिले हुए कपड़े देकर आती है। मोल-भाव करती है। अपने काम का पारिश्रमिक लेती है। मीनू अब घर में कैद रहने वाली काका भोजामल, काकी, अपने भाइयों और भाभियों पर निर्भर एक तलाकशुदा औरत मात्र नहीं है। उसका स्वतंत्र अस्तित्व है अब।

मैं मिठाई लेकर कल शाम को ही काका भोजामल के घर गया। काकी के पाँव छूकर एम ० डी ० में उत्तीर्ण होने और नौकरी मिलने की खबर दी। फिर डिब्बा खोलकर मिठाई का टुकड़ा उनके मुँह में डाला। गाँव में नियुक्ति की बात सुनकर काकी को अच्छा नहीं लगा। कहने लगीं, ‘‘इतना पढ़-लिखकर, बड़ा डॉक्टर बनकर भी अगर इकलौता लड़का गाँवों में धक्के खाता रहेगा तो क्या फायदा हुआ इतना पढने से? इससे अच्छा तो यह होता कि तू यहीं अपना दवाखाना खोल लेता। भाऊ क्या कहते हैं?''

‘‘फिलहाल होकर आता हूँ काकी। ये बातें बाद में देखते रहेंगे। मीनू तो कारखाने में होगी?'' मैंने काकी की बात को टाल दिया।

‘‘हाँ वहीं है। तू कुछ खा-पी ले तो ले चलती हूँ।''

‘‘खाना-पीना क्या है, काकी? आप उठिए।''

‘‘अरे, कैसी बातें करता है तू? खुशखबरी लेकर आया है, मुँह भी मीठा नहीं करेगा?''

वे उठकर गईं और दस मिनट में समोसे और बरफी लेकर लौट आईं। प्लेटों में डालकर मेरे सामने रखते हुए काकी ने पूछा, ‘‘तू चाय पीएगा या सोडा?''

‘‘काकी, आपका मन रखने के लिए थोड़ा-बहुत खा लेता हूँ। पीऊंगा कुछ भी नहीं।''

काकी ने बहुत आग्रह किया लेकिन मैंने बरफी की एक चक्की खाकर पानी पीया और चलने के लिए उठकर खड़ा हो गया।

‘‘तूने समोसों को तो हाथ ही नहीं लगाया?''

‘‘आपने मुँह मीठा करने की बात कही थी न! समोसे से तो मुँह नमकीन हो जाएगा।'' मैंने मजाक में उनकी बात को उड़ाया, ‘‘अब आप जल्दी उठिए।''

कतरनों, सिले हुए कपड़ों और कटिंग के लिए फैले थानों से घिरी मीनू मुझे कारखाने में देखकर चाैंक गई, ‘‘तुम? तुम कैसे आए यहां?''

‘‘काकी के साथ आया हूँ।'' मैं मुसकराया।

हड़बड़ाहट में पूछे गए सवाल और मेरे जवाब पर वह भी मुसकराई। उसने इधर-उधर देखा। कारखाने में कुरसी नहीं थी। दो स्टूल थे जिन पर बैठकर दो औरतें सिलाई कर रही थीं। एक औरत को उसने स्टूल से उठने का इशारा किया और स्टूल उठाकर अपने तख्त के पास रखते हुए बोली, ‘‘आओ, बैठो।''

‘‘बैठूंगा नहीं। बताने आया था कि एम ० डी० भी हो गया हूँ और नौकरी भी मिल गई है।''

‘‘बधाई हो। इतनी अच्छी खबर लेकर आए हो, एक नहीं एक साथ दो-दो। फिर बैठोगे क्यों नहीं?''

‘‘बैठूंगा इसलिए नहीं क्योंकि कल तुम्हें हमारे घर आना है। वहीं बातें करेंगे।''

‘‘कोई खास बात है कल?''

‘‘हां, खास बात है तभी तो कह रहा हूँ।''

‘‘कल कब आना है?''

‘‘समय तुम बताओ।''

‘‘दुकानदार के पास सुबह ग्यारह बजे जाना है। उससे पहले आ जाऊँगी। ठीक है?''

‘‘ठीक है। आओ काकी, चलें।'' मैं दरवाजे की तरफ मुड़ गया।

काकी को महसूस हुआ शायद कि दूसरे दिन आने की बात मैंने केवल मीनू से ही क्यों कही? उनसे क्यों नहीं कही? कारखाने से बाहर निकलते ही काकी ने पूछ लिया, ‘‘कल घर में कोई कार्यक्रम रखा है क्या?''

‘‘नहीं, मीनू कई दिनों से घर आई नहीं है। इसलिए कह दिया उसे आने के लिए।'' काकी के मन के संशय को पहचानते हुए मैंने स्पष्ट किया।

घर लौटकर मैंने अम्मा को सारी बात बताई। ‘‘कल मीनू को क्यों बुलाया है? कोई काम है उससे?''

‘‘है, उससे शादी के बारे में बात करना चाहता हूँ। तुम तरीके से सब इंतजाम कर देती हो अम्मा। इसलिए उसको यहीं बुला लिया।'' मैंने मुसकराते हुए कहा।

जवाब में अम्मा भी मुसकराई, ‘‘कब आएगी?''

‘‘यही कोई ग्यारह बजे।''

‘‘ठीक है। शादी के बारे में तेरी कल मीनू से बात हो जाए तो अच्छा है। नौकरी पर जाने के बाद तेरे आने-जाने का कोई पता नहीं रहेगा।''

आज अपने बताए हुए समय के अनुसार करीब ग्यारह बजे मीनू आई थी। मुश्किल से दस मिनट अम्मा साथ बैठी हाेंगी। इसके बाद यह कहते हुए अम्मा उठ गई कि ज्यादा देर तो तू बैठ नहीं सकेगी, तेरे लिए कुछ ले आऊँ। मीनू, अम्मा को रोकती रह गई मगर उसकी तरफ ध्यान न देकर अम्मा तुरंत घर से निकल गई। अम्मा के जाते ही मैंने मीनू से पूछा, ‘‘काम-काज कैसा चल रहा है?''

‘‘मेहनत जरूर करनी पड़ती है, लेकिन यह सोचकर संतोष होता है कि मैं अब किसी के ऊपर बोझ नहीं हूँ।''

संयोगवश पहले ही औपचारिक प्रश्न ने मुझे बात का रुख अपनी तरफ मोड़ने का अवसर दे दिया, ‘‘जिसे तुम बोझ कहती हो उसे क्या अधिकार में नहीं बदला जा सकता?''

मीनू ने मेरी आँखों में देखा। मेरे प्रश्न को वह समझ गई थी, ‘‘तुमसे तो मैंने कुछ भी नहीं छिपाया है, फिर यह सवाल क्यों पूछ रहे हो?''

‘‘मुझसे कुछ नहीं छिपाया है, यह सवाल इसीलिए पूछ रहा हूँ।'' मैं मुसकराया। मेरी बात का निहितार्थ मीनू की समझ में नहीं आया।

‘‘आज से पाँच साल चार महीने पहले अपने तलाक के बारे में बताते हुए तुमने कहा था कि हम इस जन्म में नहीं मिल सके तो क्या हुआ, दूसरे जन्म में मुझे पाने का अधिकार तुम छोड़ना नहीं चाहतीं। कहा था न?''

‘‘हाँ, कहा था।''

‘‘अब भी तुम वैसा ही सोचती हो?''

‘‘हाँ।'' मीनू के स्वर में दृढता थी।

‘‘उसी दिन मैं तुम्हारे पति से बात करने गया था, तुम जानती हो।''

‘‘हां।''

‘‘उन्होंने तुम्हारे बारे में जब मुझसे बात नहीं की तो उस दिन मैंने एक फैसला किया था।'' मीनू निगाहों में प्रश्न भरकर मेरी ओर देखती रही। ‘‘मीनू, उस दिन मैंने तय किया था कि पाँच साल बाद तुम्हारा और मेरा अगला जन्म हो जाएगा।''

‘‘तुम्हारी बात मेरी समझ में नहीं आ रही है।''

‘‘मुझे मालूम था कि पाँच साल बाद एम ० डी ० करके नौकरी मिल जाएगी। वह समय आ गया है। अब तुम्हें किसी के ऊपर बोझ बनकर रहने की जरूरत नहीं है। मैं तुमसे विवाह करूँगा। हमारा पुनर्जन्म आज होगा।''

‘‘तुम्हें याद हो तो उसी दिन मैंने यह भी कहा था न, कि तुम्हारे ऊपर तोहमत लगे, यह बात मैं बरदाश्त नहीं कर सकती?''

‘‘लोग कहते हैं तो कहते रहें। हमारी चिंता जब दुनिया नहीं करती तो हम दुनिया की चिंता क्यों करें?''

‘‘दुनिया की चिंता करती तो तलाक से बचने के लिए कुछ और हाथ-पांव मैं भी मारती। मुझे दुनिया से ज्यादा चिंता तुम्हारी है, तुम्हारे सम्मान की है।''

‘‘तुमसे विवाह करके मेरा सम्मान कम नहीं होगा, मीनू। मुझे नौकरी दूर-दराज के गाँव में मिली है। वहाँ तुम्हें और मुझे कोई नहीं जानता। हम आज विवाह करते हैं और कल यहाँ से निकल चलते हैं।''

‘‘मेरे तलाक के लिए तुम दोषी नहीं हो। सारी दुनिया चाहे तुम्हें दोषी ठहरा दे लेकिन मैं जानती हूँ कि तुम्हारे कारण मेरा तलाक नहीं हुआ है। मुझसे शादी करके मेरे तलाक का दोष तुम अपने सिर पर उठा लो, यह मुझसे नहीं होगा। मुझे कमजोर मत समझो। तुम्हें पाने के लिए एक जन्म में तपस्या करने की सामथ्य मुझ में है।''

मीनू उठ खड़ी हुई। धीरे-धीरे चलती हुई दरवाजे पर आकर रुकी। भरपूर नजर डालकर कुछ क्षण मुझे देखती रही। उसकी आँखों में प्यार का सागर ठाठें मार रहा था। फिर वह चली गई। अम्मा अभी तक बाजार से लौटी नहीं थीं।

विवाह से इनकार करके मीनू मेरा अपराध-बोध बढा गई। मेरी तरफ अँगुली उठाने का अवसर वह किसी को देना नहीं चाहती। इसलिए मुझसे विवाह नहीं करती। मुझसे प्यार करती है। जन्म-जन्माँतर से मुझसे पति-पत्नी का संबंध मानती है। इसलिए पुनर्विवाह की बात स्वीकार नही करती। दूसरे जन्म में मुझे पति के रूप में पा सके, इसलिए इस जन्म में तपस्या करना चाहती है। जन्म-जन्माँतर से पति-पत्नी के रिश्ते को लेकर जो विश्वास उसके मन में है, वह वहम है या सच, मुझे नहीं मालूम। एक जन्म के बाद पुनर्जन्म होता भी है या नहीं, मुझे नहीं मालूम। किंतु इतना समझ सकता हूँ कि उसके कष्टों का कारण मैं हूँ। मुझसे विवाह नहीं करती है, तो मेरे कारण। किसी दूसरे से विवाह नहीं करती है, तो मेरे कारण। पति ने चाहा था कि राखी बाँधकर संदेह समाप्त करने का प्रयास करे। इस बात को उसने स्वीकार नहीं किया, तो मेरे कारण। अगला जन्म होगा तो मीनू और मैं दुनिया के किस कोने में किस रूप में जन्म लेंगे? एक-दूसरे से मिलेंगे या नहीं? सभी प्रश्नों के उत्तर अनिश्चित हैं। अनिश्चित दूसरे जन्म के लिए निश्चित रूप से हुए इस जन्म को बूंद-बूंद कर गला देना चाहती है मीनू, केवल मेरे कारण। मुझे उसकी अवधारणा पर न पूरा विवास है ओर न पूरा अविश्वास। किंतु उसे दृढ विश्वास है कि पुनर्जन्म होगा। पूर्व जन्मों की तरह मैं उसे पति के रूप में मिलूँगा। मैं स्वयं जब विश्वास और अविश्वास के झूले में झूल रहा हूँ तो उसके दृढ़ विश्वास को चुनौती देने का साहस कहाँ से लाऊँ?

अपने वहम के कारण या अपने विश्वास के कारण मीनू जो जीवन जीने के लिए अभिशप्त है, उसका एक मात्र कारण मैं हूँ। पति ने उसे तलाक दिया, यह शायद बहाना है। मीनू को इसलिए तलाक का कोई अफसोस नहीं है। विवाह हुआ। एक वर्ष पति के साथ रहना पड़ा। पति के साथ शारीरिक संबंध बने। बच्ची को जन्म दिया। मीनू एक दुर्घटना के रूप में लेती है इन बातों को। स्वाभाविक रूप से जो होना चाहिए था, नहीं हुआ। अस्वाभाविक रूप से प्रयत्नपूर्वक जो हुआ, वह चल नहीं पाया। इस जन्म में वियोग भाग्य में लिखा था। दुःखी मन से स्वीकार करने की बजाय नियति के लिखे को खुशी से मानते हुए दूसरे जन्म का इंतजार करने के लिए दृढ़ प्रतिज्ञ है मीनू। कल माता-पिता नहीं रहेगे। भाई-भाभियां उपेक्षा और तिरस्कार कर सकते हैं। मीनू किसी के ऊपर बोझ बनकर नहीं रहना चाहती। पूरा जीवन इसी तरह गुजारने का निर्णय उसका अपना है। अच्छा या खराब, भला या बुरा जैसा भी, उसके विश्वासों की नींव पर खड़ा है यह निर्णय। जीवन में कभी किसी को इस निर्णय की भर्त्सना करने का अधिकार नहीं देना चाहती मीनू।

विश्वास के वजीर की इतनी मजबूत किलेबंदी की है मीनू ने। आयु का, शिक्षा का, रुपयों का, विश्वास का कोई हथियार जिस मीनू के पास नहीं था, उसने पाँच वषोर्ं में एक ऐसे दुर्ग की रचना कर ली है जो अभेद्य है। जिसका दरवाजा तब तक नहीं खुलेगा, जब तक वह नहीं चाहेगी। उसके विश्वास के वजीर का प्राण मैं हूँ। एम० डी ०। समर्थ। योग्य। मेधावी। सरकारी नौकरी का नियुक्ति-पत्र मेरी जेब में है। मीनू के विश्वास के वजीर का प्राण होते हुए भी मीनू ने किले की दीवारें चुनते समय मेरी एम ० डी ०, मेरी सामर्थ्यों मेरी योग्यता, मेरी मेधा, मेरी नौकरी से कोई मदद नहीं ली। मैंने अपनी ओर से सब कुछ देना चाहा था उसे। लेकिन उसने लिया नहीं। अपने बूते पर बनाए किले में बैठकर विश्वास के वजीर की जीवन-भर रक्षा करेगी मीनू। उस विश्वास के वजीर की, जिसका प्राण मैं हूँ।

मीनू इतने कम साधन होते हुए भी इतना कठिन काम करने का संकल्प ले सकती है। मेरे कारण ले सकती है। तो क्या मेरा कोई दायित्व नहीं है? मीनू जीवन-भर यज्ञ की अग्नि को प्रज्वलित रखने के लिए तिल-तिल समर्पित होती रहेगी और मैं उसकी आँच में हाथ तापकर सुख प्राप्त करता रहूँगा। मुझे जिस अप्रतिम विश्वास का केंद्र बनाकर वह अगले जन्म की प्रतीक्षा करने को प्रस्तुत हुई है, उसकी रक्षा क्या मुझे नहीं करनी चाहिए? तपस्विनी बनकर वह जिस पुनीत लक्ष्य की प्राप्ति के लिए साधना करने निकल पड़ी है, उस लक्ष्य को मीनू की तपस्या का प्रतिदान क्या बिलकुल नहीं देना चाहिए? वह कहे या न कहे, वह चाहे या न चाहे, वह स्वीकार करे या न करे किंतु उसकी तपस्या मेरी भी तपस्या है। उसकी साधना मेरी भी साधना है। उसकी अग्नि मेरी भी अग्नि है। उसकी चिंता मेरी भी चिंता है। मीनू से अलग करके में अपने आपको देख नहीं सकता। उसकी गति में हो मेरी गति है।

करनी ही है तो तपस्या अकेली मीनू क्यों करे? जन्म-जन्माँतर के संबंधों वाला सूत्र भले ही उसका हो किंतु चाहता तो मैं भी हूँ उसे। उसकी आँखें अगर मुझे देखकर अगाध प्रेम से परिपूर्ण हो जाती हैं तो मेरा हृदय भी उसके लिए प्यार से छलकता रहता है। क्या हुआ अगर हमने प्रेम को शब्द नहीं दिए? क्या हुआ अगर हम एक-दूसरे के शरीरों को अपना नहीं कह सकते? मन के रिश्ते क्या रिश्ते नहीं होते? ताली हो या चुटकी, बजाएंगे तो दो हाथ या दो अँगुलियां मिलकर ही। मैं पहला या दूसरा आदमी तो हो सकता हूँ लेकिन तीसरा आदमी कैसे हो सकता हूँ?

मुझे अहसास है कि अम्मा-बाबा मेरे फैसले से दुखी होंगे। उनका एक मात्र पुत्र यदि विवाह नहीं करता तो उनके सपने टूट जाएँगे। वंश की बेल आगे नहीं बढेगी तो उन्हें लोक-परलोक व्यर्थ अनुभव होंगे। मुझे अहसास है कि मीनू भी मेरे फैसले को पसंद नहीं करेगी। संभव है वह मुझे फैसला बदलने के लिए कहे। वह दलील देगी कि मुझसे जन्म-जन्माँतर के संबंधों की बात उसका अपना विश्वास है। इस सोच को संपूर्ण आस्था के साथ मैं नहीं मानता। जिस धारणा पर पूरा विश्वास नहीं है, उसके लिए मैं विवाह न करूँ, यह अनुचित है। अपने विश्वास की नाव वह खे रही है। ऐसा करने का उसे नैतिक अधिकार है। मैं किस अधिकार से उसका साहचर्य निभाना चाहता हूँ? उसके साथ दलीलों में उलझने की मुझे कोई जरूरत नहीं है। मैं स्पष्ट हूँ कि ये पैमाने मीनू के लिए और मेरे लिए अलग-अलग नहीं हो सकते। मेरे लिए यदि मीनू की जिंदगी यज्ञ की समिधा बन सकती है तो उसके लिए मेरी जिंदगी को यज्ञ की समिधा बनना ही होगा। नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों की अवज्ञा मैं नहीं कर सकता।

अब सरकारी नौकरी करने की भी कोई सार्थकता नहीं है। सरकारी नौकरी की सुरक्षा का वरण मैं किसके लिए करूँ? अम्मा-बाबा को मेरे पैसों की जरूरत नहीं है। फिर भी जो बन पडे़गा, समर्पित करके उनकी अपेक्षाओं को पूरा करने की चेष्टा सरकारी नौकरी न करके भी कर सकता हूँ। अपनी आजीविका के लिए मुझे कितना चाहिए? एम ० डी० हूँ। कहीं भी बैठकर इतना कमा सकता हूँ कि मेरी जरूरतें पूरी हो जाएँ। कहीं जगह न मिले तो अम्मा-बाबा के साथ रह सकता हूँ। सुरक्षा-असुरक्षा का क्या महत्त्व है अब मेरे लिए? जब तक जीऊँगा, काम करूँगा। रोगियों की सेवा करने की पात्रता मुझ में है। स्वास्थ्य जागरण ट्रस्ट मेरी मानस संतति है। पाल-पोसकर उसको आगे बढाऊँगा। मीनू के विवाह से इनकार का सबसे बड़ा लाभ शायद इसी में निहित है।

मीनू मानती है कि इस जन्म में दुर्घटनावश उसका और मेरा मिलन नहीं हुआ। मैं भी मान लेता हूँ कि मेरा यह जन्म स्वास्थ्य जागरण ट्रस्ट के लिए हुआ है। नौकरी करते हुए मैं ट्रस्ट को पूरा समय नहीं दे पाता। विवाह होता। बच्चे होते। गृहस्थी के, समय और पैसे की दृष्टि से तकाजे होते। दायित्वों से भागने की आदत नहीं है। बच्चों की, गृहस्थी की जरूरतें पूरी करने के लिए, संभव है स्वास्थ्य जागरण ट्रस्ट का काम करने के लिए पर्याप्त समय मैं नहीं निकाल पाता। आज सोचता हूँ गाँवों में रहकर मरीजों की सेवा के साथ स्वारथ्य-शिक्षा पर ध्यान दूंगा। कल बच्चों की शिक्षा का प्रश्न खड़ा होता। उनकी हारी-बीमारी, उनके सुख-दुःख, उनकी सुविधा-असुविधा का प्रश्न खड़ा होता। संभव है, मैं शहर की तरफ भागता। वही सब करने लगता जिसे देख-देखकर आज चिढ़ता हूँ। अब रिथर चित्त से ग्रामीण क्षेत्रों में मरीजों की सेवा और स्वास्थ्य शिक्षा का काम करता रहूँगा। एक मीनू का यह जन्म सुखी बनाने के लिए अनेक लोगों के सुखों की बलि ले लेता। सेवा और व्यक्तिगत सुख-दुःख अलग रहें तो अच्छा है।

विवाह न करके मैं मीनू के प्रति अपने कर्त्तव्य का निर्वाह करूँगा। यह मेरा व्यक्तिगत सरोकार होगा। विवाह न करके मैं ग्रामीण क्षेत्र के मरीजों की सेवा करूँगा। स्वास्थ्य जागरण ट्रस्ट के उद्‌देश्यों को पूरा करने के लिए काम करूँगा। यह मेरा सार्वजनिक और सामाजिक सरोकार होगा। कुल मिलाकर विवाह न करके मैं व्यक्तिगत, सार्वजनिक और सामाजिक सभी सरोकार पूरे करूँगा। अविवाहित जीवन के सुख-दुःख और शरीर की माँग जितना मीनू को सताएँगे उससे कुछ कम ही सताएँगे मुझे। मीनू के सामने ललचाई नजरों से अपने आपको बचाकर जीने की अतिरिक्त चुनौती है। अर्थोपार्जन की सामर्थ्य मीनू में मुझसे कम है। मीनू को एक बच्ची का जीवन सँवारना है। नारी होने के नाते अनेक अधिकार समाज मीनू को नहीं देता। सच यह है कि विवाह न करके भी मैं मीनू के साथ आधे-आधे की नहीं, तीन चौथाई-एक चौथाई की हिस्सेदारी निभाऊंगा।

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Rajend Mishra 1 महीना पहले

DK Pandey 2 महीना पहले

S Nagpal 2 महीना पहले

Bhagwan Atlani 2 महीना पहले

आदर्शवाद का उच्चतम रूप।