अपनी अपनी मरीचिका - 5

अपनी अपनी मरीचिका

(राजस्थान साहित्य अकादमी के सर्वोच्च सम्मान मीरा पुरस्कार से समादृत उपन्यास)

भगवान अटलानी

(5)

10 जून, 1950

आज एफ़ ० ए ० का परिणाम आया है। प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुआ हूँ। अंकों का प्रतिशत तो अंकतालिका आने के बाद ही पता लगेगा किंतु मेरे अनुमान के अनुसार 67 प्रतिशत अंक आने चाहिएं। भौतिकशास्त्र, रसायनशास्त्र और जीव विज्ञान में 70 प्रतिशत अंक होने चाहिएं। मेडीकल कॉलेज में 42 प्रतिशत पर दाखिला मिला था पिछले साल। इस हिसाब से मेडीकल कॉलेज में प्रवेश मिलने में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए। बाबा चाहते हैं, मैं खूब पढूं। डॉक्टर बनूँ। पढाई में जितना पैसा खर्च होता है, वे कहते हैं कि करेंगे। खर्चे के कारण पढने या न पढ़ने वाली बात मुझे नहीं सोचनी है। 100-150 रुपए महीना जितना भी लगेगा, वे लगाएँगे। यह बाबा का बड़प्पन है। मैं जानता हूँ कि बाबा की बचत 100-150 रुपया महीना नहीं है। मेडीकल कॉलेज में पढाई का खर्च यों भी इतना नहीं आना चाहिए। फीस और कपड़ों पर पैसे खर्च होंगे। आगे चलकर कुछ उपकरण भी खरीदने पड़ेंगे। पुस्तकें कुछ खरीद लूंगा और कुछ पुस्तकालय से लेकर या पुस्तकालय में जाकर पढूंगा। एफ़ ० ए ० करते हुए भी मैंने मैट्रिक के दो ट्‌यूशन पकड़ लिए थे। पचास रुपया महीना आ जाता था। उसमें एक ही दिक्कत हुई मुझे। परीक्षाओं की तारीखें एक-दूसरे से टकरा रही थीं। सारा साल ट्‌यूशन करने के बाद यह तो कहा नहीं जा सकता कि इन दिनों मेरी भी परीक्षाएं हैं इसलिए पढाने नहीं आऊँगा। यदि यह संकट नहीं होता तो मैं आश्वस्त हूं कि अब एफ ० ए ० में जितने भी अंक मिले होंगे उससे ज्यादा ही अंक मिलते। इस बार मालूम है कि बोर्ड या विश्वविद्यालय की परीक्षाओं से मेरी परीक्षाओं की टकराहट होगी। अब कोशिश करूँगा कि एफ ० ए ० प्रीवियस के छात्रों की ट्‌यूशन मिल जाए। उनकी परीक्षाएँ विश्वविद्यालय की परीक्षाओं के बाद होती हैं, इसलिए परेशानी नहीं होगी।

वैसे मेरा अनुमान है कि मुझे छात्रवृत्ति भी मिल जानी चाहिए। बाबा की आमदनी कम है। अच्छे अंकों से परीक्षा उत्तीर्ण की है। योग्यता नहीं तो योग्यता एवं आवश्यकता के आधार पर तो छात्रवृत्ति मिल ही जानी चाहिए। मेडीकल कॉलेज में शायद चालीस रुपए प्रतिमाह के हिसाब से छात्रवृत्ति मिलती है। छात्रवृत्ति की रकम सामान्यतः दिसंबर-जनवरी से पहले नहीं मिल पाती। इसलिए ट्‌यूशनें तो करनी पडे़ंगी। अगले साल फीस भरने में सुविधा हो जाएगी। कुछ किताबें, उपकरण भी खरीदे जा सकते हैं। संभव लगा और छात्रवृत्ति व ट्‌यूशन के पैसों से छात्रावास का खर्चा निकला तो मैं चाहूँगा कि वहाँ कमरा ले लूं। भोजन घर पर कर लूंगा। वहाँ रहने से पढाई ठीक प्रकार से हो सकेगी। घर में एकांत में बैठकर पढाई की जा सके, इतनी जगह नहीं है। एफ ० ए ० के दौरान भी दिक्कत होती थी। बाबा को सुबह जल्दी उठकर खरीदारी के लिए मंडी जाना पड़ता है। अम्मा भी जल्दी उठकर भजन गुनगुनाते हुए घर के काम में लग जाती है। इसलिए मैं भी सुबह चार बजे उठकर घूमने चला जाता था। लौटकर नौ बजे तक पढता था। दस बजे कॉलेज पहुँचना होता था। एक घंटे में तैयार होकर कुछ खा-पीकर कॉलेज चला जाता था। दूधवाला साढे पाँच-छः बजे दूध लेकर आ जाता है। मेरे विरोध के बावजूद सुबह-शाम आधा किलो दूध की बंधी सिर्फ मेरे लिए की हुई है। रात को भी मुझे आधा किलो दूध पीना पड़ता है। अम्मा और बाबा दूध न सुबह पीते हैं और न रात को। अम्मा और बाबा का मानना है कि मैं इतना समय पढता हूँ, दिमाग लगाता हूँ, ट्‌यूशन पढाकर माथा-पच्ची करता हूँ, दूध मेरे लिए जरूरी है। दूध नहीं पीऊँगा तो दिमाग कैसे काम करेगा?

मेरी इस दलील को न कभी अम्मा ने माना और न कभी बाबा ने माना कि शरीर से काम करते हुए भी हम दिमाग से काम कर रहे होते हैं। ग्राहक फल खरीदने आया है। उसके कपड़ों, बातचीत, व्यवहार, सज-धज और जिस वाहन से आया है उसके आधार पर बाबा अनुमान लगाते हैं कि उसकी आर्थिक हैसियत कैसी है? वह मोल-भाव करेगा या नहीं? करेगा तो उसकी सीमा कितनी होगी? जो भाव उसे बताना है वह बाजार भाव होगा या उससे अधिक? अगर हमेशा वह ग्राहक फल किसी और दुकानदार से खरीदता है और आज किसी फल विशेष को खरीदने के लिए या हमेशा वाले दुकान पर अच्छे फल न मिलने के कारण बाबा के पास आया है तो उसे तोड़ने के लिए बाबा जान-बूझकर कम भाव बोलेंगे। ग्राहक को स्थायी दुकानदार ने उसको पसंद न आने वाले फलों के जो भाव बताए थे, अच्छे फलों के भाव उससे भी कम सुनकर उसकी आस्था डगमगाएगी। इसमें क्या बाबा ने दिमाग काम में नहीं लिया? गोठ का कार्यक्रम है। वहां दो मन सेब जाने हैं। अच्छे सेब चाहिए, दाम कुछ भी हों लेकिन सेब किसी भी तरह खराब नहीं चाहिएं। बाबा के पास एक मन सेब हैं, खट्‌टे-मीठे कुल्लू के सेब। बाबा ग्राहक को बैठाते हैं। चाय मंगवाते हैं। अंदर से सेब लाने की बात कहकर दूसरे दुकानदार से पाँच-सात मीठे डिलीशियन सेब ले आते हैं। एक सेब सफाई के साथ काटते हैं और कागज पर रखकर खूबसूरती के साथ ग्राहक के सामने पेश करते हैं। ग्राहक सेब खाता है। सेब मीठा है। उसे अच्छा लगता है। भाव पूछता है। बाबा भाव नहीं बताते, कहते हैं, ‘‘आपका चेहरा, आपकी पसंद खुद ही बताते हैं साहब, कि आप पारखी हैं। आप तो पता बताइए। सेब पहुँच जाएँगे।''

‘ग्राहक गद्‌गद्‌ हो जाता है, ‘‘फिर भी!''

‘‘आपसे ज्यादा भाव थोड़े ही लेंगे, साहब!''

‘‘चलिए, यह बताइए कि कितने रुपए देने हैं, समाज का काम है। आप जो रियायत कर सकें, देख लीजिएगा।''

‘‘आप पर्चा देख लीजिए। मेरा जो हक समझें, दे दीजिएगा।'' बाबा काँटे में लगे कागजों की ओर बढे हैं। ‘‘अरे छोड़िए, हमें कोई पर्चा-वर्चा नहीं देखना है। ये पचास रुपए लीजिए। घंटे-भर में मेरा आदमी आकर सेब ले जाएगा। उसे बता दीजिएगा, बाकी पैसे दे देगा।'

बाबा जानते हैं कि जीवन में पहली बार साहब संबोधन सुनने वाला आदमी साहब जैसा व्यवहार करने की चेष्टा करता है। मनमाना भाव लगाकर वे अपने पास रखे एक मन खट्‌टे-मीठे कुल्लू के सेब भी एक मन मीठे डिलीशियन सेबों में मिलाकर भिजवा देते हैं। बाबा ने यह सब क्या बिना दिमाग इस्तेमाल किए कर लिया? सुबह उठने के बाद प्राथमिकता-क्रम में घर के कौन-कौन-से काम करने चाहिएं? किस तरीके से बाबा की सीमित आमदनी में घर-खर्च चल सकता है? कोयलों की जगह कोयले की चूरी, चिकनी मिट्‌टी और गोबर के लड्‌डू जलाने से ईंधन का खर्च कम किया जा सकता है, ये बातें क्या अम्मा बिना दिमाग लगाए सोच लेती है? मैं तो उलटा उनकी तरह शरीर से कोई काम नहीं लेता हूँ। पढना दिमाग के लिए अतिरिक्त काम भला कैसे हो सकता है? अम्मा और बाबा मेरे तर्क सुनकर खुश ज़रूर होते हैं मगर मेरी बात का कोई असर उनके ऊपर नहीं होता है।

मेडीकल कॉलेज में कक्षाएँ सुबह आठ बजे से शुरू हो जाती हैंं। इसलिए केवल सुबह के समय पढाई करने से काम नहीं चलेगा। दिन-भर कॉलेज में रहना होगा। शाम को हॉस्पिटल भी जाना पड़ेगा। पहले साल नहीं तो दूसरे साल जाना पड़ेगा। पढाई रात को ही करनी पडे़गी। रात को बल्ब जलाकर पढूंगा तो अम्मा-बाबा की नींद में खलल पडे़गा। बिजली का खर्च बढेगा तो मकान मालिक चिल्ल-पौं मचाएगा। इन सब समस्याओं से मुक्ति छात्रावास ही दिला सकता है। देखें, छात्रवृत्ति मिलती है या नहीं? पढाई पर कितना खर्च होता है? छात्रावास में रहने, न रहने का निर्णय तो उसी के आधार पर लेना पडे़गा।

काका भोजामल उल्हासनगर में जम नहीं पाए। कारण कई थे। लेकिन सबसे महत्त्वपूर्ण कारण यह था कि किराने की जो दुकान उन्होंने खोली थी उससे होने वाली आमदनी काका भोजामल के परिवार के भरण-पोषण के लिए पर्याप्त नहीं थी। सुबह से लेकर देर रात तक दुकान खुली रहती थी। वीरू और मीनू की पढाई उन्होंने बंद करा दी थी। वीरू और काका भोजामल सुबह जाकर दुकान खोलते थे। उनके दोनों विवाहित लड़के नौ-साढे नौ बजे तक आते थे नाश्ता करके। काका भोजामल और वीरू का नाश्ता वे साथ ले आते थे। एक-डेढ़ बजे तक चारों दुकान पर रहते थे। ,इसके बाद वीरू और काका भोजामल घर जाते थे। भोजन करते थे। काका भोजामल थोडी देर आराम करते थे और वीरू दोनों भाइयों का भोजन लेकर तीन बजे तक दुकान वापस आ जाता था। काका भोजामल पाँच-साढे पाँच बजे तक लौटते थे। सात-साढे सात बजे वीरू दुकान छोड़ देता था। घर के लिए सब्जी, सौदा-सुलफ लाने का काम वही करता था। दुकान के लिए खरीदारी काका भोजामल करते थे। नौ बजे के आसपास काका भोजामल दुकान से उठते थे। कभी ग्यारह, कभी साढे ग्यारह और कभी-कभी बारह बजे दोनों भाई दुकान बंद करके घर आते थे। इसके बाद रात का भोजन करते थे। सोते-सोते दो बज जाते थे। परिवार के सभी पुरुष मन लगाकर हाड़-तोड़ मेहनत कर रहे थे। मगर मुनाफा फिर भी इतना नहीं हो रहा था कि पूरे परिवार का काम बखूबी चल सके। इस दुकान का काम बढा सकें, इसकी गुंजाइश नहीं थी। दूसरी दुकान चलाने के लिए उनके पास हाथ तो थे लेकिन पूँजी नहीं थी। वर्तमान दुकान के साथ दूसरी दुकान उपलब्ध नहीं थी। अन्यथा एक दुकान को दो में बदलना उनके लिए आसान हो जाता। लड़कों के साथ उन्होंने विचार-विमर्श करके बाबा को पत्र लिखा। जवाब में उन्हें बाबा ने जयपुर आने का सुझाव दिया। दुकान की कमाई से काका भोजामल के परिवार की आवश्यकताएँ चाहे पूरी न होती हों किंतु चलती दुकान को बंद करके आना उन्हें ठीक नहीं लगा। काका भोजामल ने फिर बाबा को पत्र लिखा और बाबा से सलाह माँगी। बाबा और काका भोजामल के बीच कुछ और पत्रों का भी आदान-प्रदान हुआ। अंत में काका भोजामल अकेले जयपुर आ गए। उनका परिवार उल्हासनगर में ही बना रहा।

बाबा के फुटपाथ पर ठेला लगाने के बाद उनके आसपास कुछ और ठेले खड़े होने लगे थे। पुलिसवालों को बँधा-बँधाया रुपया हर महीने मिल जाता था, इसलिए ठेलों की संख्या बढने में ज्यादा समय नहीं लगा। कुछ ठेलों पर आलू-प्याज, कुछ ठेलों पर सब्जी और कुछ ठेलों पर फल बिकते थे। फुटपाथ का वह भाग छोटी-मोटी फल और सब्जी मंडी में बदल गया। नगरपालिका ने ठेले उस जगह से हटाने चाहे तो सबने मिलकर दुकानों के लिए जमीन देने की माँग की। वार्ताएँ चलीं। सिंधी समुदाय के वोटों पर कब्जा करने के इच्छुक राजनीति करने वालों ने नेतृत्व प्रदान किया। ठेला संगठन बना। शिष्टमंडल मुख्यमंत्री से मिल आया। अंततः फैसला हुआ कि नगरपालिका किराया लेकर फुटपाथ पर ही ज़मीन देगी। ठेलेवाले उस ज़मीन पर कच्ची थड़ियाँ बनाएँगे। फल और सब्जियाँ ठेलों की जगह उन थड़ियों में बिकेंगी। काम बढाने की दृष्टि से यह प्रस्ताव बहुत आकर्षक था। सबसे पहले ठेला बाबा ने लगाया था, इसीलिए सबसे पहला जमीन का टुकड़ा भी बाबा को मिलना तय था। थड़ियों में पहली और कोने वाली थड़ी कामकाज की दृष्टि से स्पष्ट रूप से लाभदायक थी। लेकिन बाबा के सामने एक बड़ी कठिनाई थी। ठेला था तो बाबा अकेले खरीदारी कर लेते थे। ठेले का दायरा छोटा था। एक किनारे पर खड़े-खड़े सारे फलों तक पहुँचा जा सकता था। खाली होने पर वे वहीं रखे स्टूल पर बैठ भी जाते थे। किंतु लगभग एक सौ वर्ग फीट जमीन पर बनी थड़ी में रखने के लिए माल खरीदना और उसे बेचना अकेले आदमी के लिए संभव नहीं था। नौकर रखा जा सकता था। किंतु कुछ समय के लिए अनिवार्यतः थड़ी नौकर के हवाले छोड़नी पड़ती। यह बात बाबा को ठीक नहीं लगती थी। मैं पढ रहा था। पढाई में ठीक भी था। इसलिए बाबा मेरी पढाई में व्यवधान डालना नहीं चाहते थे। वरना कॉलेज के बाद मैं दुकान पर चला जाता तो उनका काम चल जाता। सुबह मंडी से माल खरीदकर आने के बाद थड़ी पर माल को जमाने के लिए एक आदमी जरूरी था। मंडी से आनेवाले माल को थड़ी पर उतरवाने के लिए भी कोई अपना आदमी अपेक्षित था। कॉलेज से पहले एक-डेढ़ घंटा देकर मैं इन कामों को भी बखूबी कर सकता था। बाबा ने मुझसे तो इस संबंध में कुछ नहीं कहा लेकिन अम्मा से उन्होंने चर्चा की। अम्मा से मुझे पता लगा तो मैंने बाबा के सामने पढाई के साथ-साथ कुछ समय थड़ी पर काम करने का प्रस्ताव रखा। उनके इनकार में इतनी दृढता थी कि मैं बहस करने का साहस नहीं जुटा पाया।

तभी काका भोजाअल का पत्र आया। बाबा ने उन्हें जयपुर इसी इरादे से बुलाया था कि उनके सामने थड़ी में भागीदारी का प्रस्ताव रखेंगे। यद्यपि काका भोजामल को इस योजना के बारे में उन्होंने कुछ नहीं लिखा, लेकिन वे मानकर चल रहे थे कि जो कुछ वे सोच रहे हैं, कार्यरूप में परिणित हो जाएगा। जब काका भोजामल जयपुर पहुँचे तो जमीन आवंटित हो चुकी थी। बाबा थड़ी बनवा चुके थे। भागीदारी के लिए उनके पास एक और प्रस्ताव आया था जिसे उन्होंने विचार करने के आश्वासन के साथ अपने पास सुरक्षित रखा था। जिस व्यक्ति ने भागीदारी के लिए बाबा से बात की वह भी अकेला ही था। उसके सामने भी ठीक वही परेशानियां थीं जो बाबा के सामने थीं। ठेले पर वह अपना काम अकेला चला लेता था लेकिन थड़ी के लिए जगह मिलने के बाद उसे भी किसी के साथ की ज़रूरत थी। उसने बाबा के सामने प्रस्ताव रखा था कि जो टुकड़ा उसको थड़ी के लिए मिला है उसे किसी को बेचकर मिलने वाला रुपया आपस में आधा-आधा बाँट लेंगे। बाबा की थड़ी में दोनों का बराबर का रुपया लगेगा। इसके बदले में उसकी शर्त यह थी कि बाबा की थड़ी और जमीन पर दोनों भागीदारों का बराबर अधिकार होगा। बाबा को ये सारी बातें स्वीकार्य थीं। किंतु वे चाहते थे कि पहले भोजामल से बात हो जाए और उसी के अनुसार निर्णय लेकर भागीदारी करें। ताजा प्रस्ताव से अपनी जरूरत से ज्यादा, काका भोजामल की मदद करने की भावना बाबा के मन में प्रबल हुई थी।

ज़मीन के आवंटन, थड़ी के निर्माण, सहयोगी की आवश्यकता और अन्य ठेलेवाले के प्रस्ताव की पृष्ठभूमि स्पष्ट करते हुए बाबा ने काका भोजामल से कहा कि वे चाहें तो बाबा के साथ भागीदारी कर सकते हैं। जमीन और थड़ी पर मालिकाना हक बाबा का रहेगा। कभी नगरपालिका इस थड़ी के बदले पक्की दुकान आवंटित करती है तो मिलने वाली दुकान पर बाबा के हक होंगे। दुकान का आवंटन बाबा के नाम से होगा। काका भोजामल अचल संपत्ति में पगड़ी या बाजार दर को ध्यान में रखते हुए हिस्सेदार नहीं होंगे। धंधे में होने वाले नफे-नुकसान में दोनों की बराबर की भागीदारी होगी। दुकान में पेटियों, खोखों, टोकरों और माल के ऊपर जो लागत है, काका भोजामल उसका आधा पैसा देंगे। काका भोजामल अगर अपने हिस्से की लागत का रुपया तुरंत देने की स्थिति में न हों तो बारह आने सैकड़ा के हिसाब से वे तब तक बाबा को ब्याज देंगे जब तक उसकी पूर्ति नहीं कर देंगे। माल की खरीदारी की जिम्मेदारी बाबा की होगी। काका भोजामल गद्‌दी पर बैठेंगे। यह कार्य-विभाजन मोटे तौर पर रहेगा। अन्यथा सभी काम दोनों भागीदार करेंगे। दोनों में से किसी को कोई शिकायत हो तो उसे मन में नहीं रखेंगे। बात करेंगे, मगर तभी जब दोनों अकेले हों। दूसरे का पक्ष समझकर, अपना पक्ष समझाकर मिल-जुलकर जिस निर्णय पर पहुँचेंगे उसका दोनों ईमानदारी से पालन करेंगे। हर महीने तीस तारीख को नफे-नुकसान का हिसाब लगाएँगे। इसके लिए रोकड़ बही लिखने की जरूरत होगी। रोकड़ बही बाबा लिखेंगे। बीच में कितनी भी बार, किसी भी समय धंधे की स्थिति को ध्यान में रखते हुए अधिकतम साढे सात सौ रुपए प्रतिमाह तक दोनों भागीदार ले सकेंगे। इसके बाद जो अतिरिक्त बचत होगी, माह के अंत में दोनों में बँट जाएगी। बाबा ने सारी स्थिति और शर्तें काका भोजामल के सामने रख दीं। उन्होंने एक दिन का समय काका भोजामल को दिया ताकि वे भागीदारी की शर्तों पर विचार कर सकें और यदि उनमें कोई परिवर्तन, परिवर्द्धन या संशोधन करना चाहें तो बता सकें। काका भोजामल को बाकी सब शतेर्ं तो ज्यों-की-त्यों मंजूर थीं लेकिन जमीन और थड़ी पर मालिकाना हक में वे हिस्सेदारी चाहते थे। बाबा ने स्पष्ट किया, ‘‘भोजामल, यह ठेला इस जगह जोड़-तोड़ करके खड़ा करने में मैं कामयाब रहा केवल इसी कारण से थड़ी लगाने के लिए ज़मीन का टुकड़ा मिला है। उस समय क्योंकि हम दोनों भागीदार नहीं थे इसलिए इस आवंटन में तुम्हारी भागीदारी न्यायसंगत नहीं लगती।''

‘‘अब तक वाली बात तो ठीक है किंतु जगह की कीमत इसलिए बढती है क्योंकि वहाँ काम होता है। भविष्य में थड़ी की पगड़ी या कीमत में वृद्धि के पीछे हम दोनों होंगे। इसलिए उसका लाभ भी हम दोनों में बँटना चाहिए। इसी तरह नई पक्की दुकान अगर मिलती है तो उसका कारण भी यही होगा कि हम मिलकर काम कर रहे हैं।''

‘‘तुम्हारी बात ठीक मालूम होती है भोजामल, लेकिन यह थड़ी ठेले के कारण मिली है और ठेला मैं चला रहा था। अब तक इसका मालिक अकेला मैं हूं। अगर तुम्हारी हिस्सेदारी तय होती है तो अब तक जो मेरा था, उसका क्या होगा?''

‘‘इसका एक तरीका हो सकता है। अगर इस थड़ी को आज की तारीख में बेचते हैं तो क्या मिलेगा?''

‘‘कुल मिलाकर लगभग छः हजार रुपए।''

‘‘अगर आज की कीमत का आधा हिस्सा तुम मुझसे ले लोे, फिर तो भविष्य के लिए थड़ी पर हम दोनों का बराबर का मालिकाना हक हो सकता है।''

‘‘ठीक कहते हो भोजामल, तुम्हारी बात मुझे मंजूर है।''

काका भोजामल हँसे, ‘‘मेरी बात तुम्हें मंजूर है लेकिन मुझसे यह भी तो पूछो कि मैं इतने रुपए एक साथ तुम्हें दे भी सकता हूँ या नहीं?''

‘‘तुम्हारी बात मुझे मंजूर है, बाकी बातें तुम जानो।'' बाबा ने भी हँसते हुए जवाब दिया। .

विचार-विमर्श के बाद निश्चित हुआ कि काका भोजामल जब भी आधा पैसा देने की स्थिति में होंगे, उस समय की बाजार दर के अनुसार बाबा को रकम दे देंगे; तब तक थड़ी बाबा के नाम से चलेगी और उनका ही मालिकाना हक कायम रहेगा। अगर भागीदारी निभती है तो काका भोजामल अपनी सुविधा से जब चाहें बाबा को रुपया देकर मालिकाना हक में हिस्सेदार बन जाएँगे।

काका भोजामल अकेले आए थे। फिलहाल उनका अकेले ही रहने का विचार था। वे चाहते थे कि जब तक काम-धंधा ठीक तरह से समझ में नहीं आता, आमदनी का पता नहीं लग जाता, तब तक परिवार के शेष लोगों को न बुलाया जाए। उल्हासनगर में जैसे भी हैं, लेकिन एक दुकान है। उस दुकान से कम या ज्यादा, लेकिन आमदनी होती है। उस आमदनी से कोर कसोरकर सही, लेकिन परिवार का गुजारा हो जाता है। पूरा परिवार जयपुर बुलाने का अर्थ है, उस दुकान को समेटना। माल, फर्नीचर घाटे में बेचना पडे़गा। कुछ खोकर सब लोग यहाँ आएँगे। यहाँ भी लड़कों को अलग काम शुरू करना पड़ेगा। किसी गली, कूचे में दुकान लेकर किराने का काम किया जा सकता है। किंतु फ़ल की थड़ी पर बाबा के साथ भागीदारी से कमाई हो तो यह सारी उठा-पटक की जाए। जब तक काका भोजामल का परिवार आए, बाबा ने उनसे आग्रह किया कि वे हमारे साथ ही रहें। काका भोजामल ने भी बाबा के इस आग्रह को सरलता से मान लिया।

थड़ी बन चुकी थी। अगला दिन थड़ी के लिए एक तख्त, रात को फल रखने के लिए तीन बड़ी पेटियाँ, खोखे, टोकरियां, चमकीले कागज़ और इसी तरह की दूसरी चीजें खरीदने में लगा। बाबा और काका भोजामल ने रात भर जुटकर थड़ी में सामान व्यवस्थित किया। थड़ी को चमकीले कागज के झाड़-फानूस और झंडियों से सजाया। बैठने की जगह को खोखा लगाकर ऊँचा करके उसके ऊपर चकरी रखी। तख्त के चारों ओर खोखे लगाकर उनके ऊपर टोकरे रखे। टोकरों में चमकीले कागज बिछाकर उनमें फल रखने की तैयारी कर ली। ठेले में जो फल बचे हुए थे, उन्हें सजाया। बैठने की जगह के सामने स्टेंड वाली एक तराजू स्थापित की। ठेले पर काम में आने वाली तराजू को अतिरिक्त रूप से इस्तेमाल के लिए बाटों सहित थड़ी के अगले भाग में खोखे के ऊपर एक चादर बिछाकर रखा। सुबह नहा-धोकर बाबा मंडी गए ओर थड़ी के लिए फल खरीदकर भिजवाते गए। नौ-साढे नौ बजे तक बाबा भी थड़ी पर आ गए। पंडित जी से तय समय के अनुसार मुहूर्त हुआ। गुरुद्वारे में भोग लगाकर लाया हुआ कड़ाह प्रसाद बाँटा गया और थड़ी पर विधिवत्‌ रूप से काम शुरू हो गया। काका भोजामल अच्छी तरह जानते थे कि बाबा घर में रहने, खाने-पीने, कपडे़-लत्ते की धुलाई की एवज में उनसे कुछ नहीं लेंगे, इसलिए उन्होंने बाबा से इस विषय में कुछ नहीं कहा। नियम से घर के लिए सब्जी लाने का काम काका भोजामल ने अपने ऊपर ले लिया। प्रारंभ में बाबा दोपहर का भोजन करने के लिए घर जाते समय सब्जी खरीदने की चेष्टा करते थे। किंतु काका भोजामल सुबह ही सब्जी खरीदकर थैली अपने पास रख लेते थे। इस समय बाबा मंडी में होते थे। थड़ी सजाने, झाड़ने-फूूंँकने का काम काका भोजामल करते थे। ग्राहक सुबह अपेक्षाकृत कम होते थे। इसलिए सब्जी खरीदने में काका भोजामल को परेशानी नहीं होती थी। थड़ियों की कतार के तुरंत बाद फुटपाथ पर बोरी बिछाकर सब्जी बेचने वाली औरतें बैठ जाती थीं। औरतें स्वाभाविक रूप से थड़ी वालों का लिहाज करती थीं। आर्थिक दृष्टि से, धंधे के परिमाण की दृष्टि से थड़ी वालों की हैसियत बोरी बिछाकर सब्जी बेचने वाली औरतों के मुकाबले कई गुना ज्यादा अच्छी थी। इस बात का मनोवैज्ञानिक लाभ सभी थड़ीवालों को मिलता था। मंडी से टोकरे लाते समय कुछ मजदुरिनें फल और सब्जी चुराकर रख लेती थीं। फल तो लेने नहीं पड़ते थे किंतु इन मजदूरिनों से सब्जी सस्ती मिल जाती थी। कहीं बोरी बिछाकर बैठे, इतनी न सब्जी होती थी इनके पास और न सुविधा। टोकरे ढोना उनका मुख्य काम था; इसलिए बीच के खाली समय में घूम-घूमकर वे फल और सब्जियां बेचती थीं। अवसर मिलने पर काका भोजामल इन मजदूरिनों से भी सब्जियाँ खरीद लेते थे। क्योंकि वे लगातार थड़ी पर बने रहते थे, इसलिए इस तरह की खरीदारी करने में उन्हें कठिनाई नहीं होती थी। उनकी कोशिश रहती थी कि जितना पैसा बाबा को उनके कारण अतिरिक्त रूप से खर्च करना पड़ता है, किसी-न-किसी प्रकार से उसकी पूर्ति कर दें।

बाबा फायदे में तब रहते जब आमदनी ठेले के मुकाबले कम-से-कम दुगुनी होती। भविष्य में अधिक लाभ की अपेक्षा के साथ कम-से-कम इतनी आमदनी तो बाबा को होनी ही चाहिए जो ठेले से होती थी। काका भोजामल के लिए इस बात का कोई महत्त्व नहीं था। आमदनी जितनी भी होगी, काका भोजामल को बहुत अंतर नहीं पड़ेगा। परिवार के भरण-पोषण के लिए आवश्यक मुनाफा मिल जाए, अतिरिक्त बचत चाहे कुछ भी न हो, काका भोजामल संतुष्ट रह सकते थे। इस नाते बाबा और काका भोजामल की अपेक्षाओं में अंतर था। फिर बाबा को अपने परिवार के लिए खर्च मिलना जरूरी था। मकान का किराया उन्हें देना ही था। परिवार के सदस्यों को भोजन करना ही था। मेरे लिए दूध आना ही था। काका भोजामल के ऊपर ऐसा कोई दायित्व नहीं था। वे प्रयोग कर रहे थे। सफलता और असफलता दोनों में ही उनके पास खोने को कुछ नहीं था। सफलता चाहे जितनी भी मिले, उन्हें कुछ-न-कुछ दे जाएगी। असफलता मिलने पर वे लौटकर उल्हासनगर जा सकते हैं। उनकी कोई लागत नहीं है। लागत की आधी पूँजी पर ब्याज जरूर देते हैं, किंतु एक तो ब्याज बहुत कम है और जितना है वह भी कमाई में से देना है।

ठेले से बाबा की औसत आमदनी सात-आठ सौ रुपए प्रतिमाह थी। घर खर्च के लिए भी बाबा को इतने ही रुपयों की जरूरत पड़ती थी। यही कारण था कि ज़रूरत पड़ने पर अधिकतम साढे सात सौ रुपए प्रतिमाह उठाने की बात उन्होंने काका भोजामल के साथ तय की थी। डेढ हजार रुपए महीने की निश्चित आमदनी होगी, यह निहितार्थ स्पष्ट था। काका भोजामल को भी इससे आमदनी की निम्नतम रेखा का संकेत मिल गया था। दोनों पूरी मेहनत और लगन के साथ काम कर रहे थे। काका भोजामल के लिए यह काम नया था। कुछ दिनों में बाबा से पूछ-पूछकर, बाबा को देख-देखकर उन्होंने सारी बातें समझ ली थीं। महीना बीतते-न-बीतते काका भोजामल भी काम की बारीकियों में पूरी तरह रम गए थे। कौन सा फल कितने समय में पक जाएगा? किस फल को जल्दी पकाने के लिए क्या करना होता है? जिस फल के खराब होने या सड़ने का खतरा हो, उसे बेचने के लिए कौनसे गुर काम में लिये जा सकते हैं? टोकरों में सजाते समय कौनसे फल सबसे नीचे और कौनसे फल सबसे ऊपर रखने चाहिएं? कौन-सा कच्चा फ़ल पके हुए फल के साथ रखने मात्र से जल्दी पक जाता है? रात को रखने के लिए बनवाई गई बड़ी-बड़ी पेटियों में फल किस क्रम में रखने चाहिएं? रात को बंद करते समय कौनसा सामान कहाँ छोड़ना चाहिए? दिन-भर में बिक्री से आया पैसा किस तरीके से घर साथ ले जाना चाहिए ताकि चोर-उचक्के की नज़र आसानी से उसके ऊपर न पड़े। कौनसे ग्राहक के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए? किस ग्राहक को माल उधार बेचना है और किस ग्राहक को माल उधार नहीं बेचना है, मगर किस तरह उससे पुरानी उधार वसूलने के लिए नाटक करना है? कौनसा खरीदार कौनसे सेठ का नौकर है और निश्चित प्रतिशत में उसे कमीशन देनी होती है? कौनसा व्यक्ति किसी होटल या छात्रावास के भोजनालय के लिए फल खरीदने आता है और उसकी क्या अपेक्षाएँ होती हैं? मोटे ग्राहकों से संपर्क बनाए रखने के लिए क्या करना होता है? दूसरे थड़ीवाले के ग्राहक को कैसे बिगाड़ते हैं? अपना ग्राहक दूसरा थड़ी वाला तोड़ ले तो उसे कैसे लौटाया जा सकता है? यद्यपि ये सारी बातें अनुभव और अभ्यास से संबंध रखती थीं फिर भी काका भोजामल ने इन मंत्रों को सीखने, समझने और करने की दृष्टि से कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी। पहले महीने में आमदनी दुगुनी तो नहीं हुई लेकिन दुगुनी से कुछ ही कम चौदह सौ रुपए हुई। बाबा को लगा कि भागीदारी के बावजूद उनकी आमदनी या तो पूर्ववत्‌ रहेगी या बढेगी। काम बढाने की दृष्टि से कुछ दरवाजे थे जो अकेले होने के कारण पहले बाबा खटखटाने की कोशिश नहीं करते थे। शहर में कुछ होटल, कुछ छात्रावास और कुछ संस्थाएँ ऐसी हैं, जिनमें टेंडर भरकर साल-भर फलों की सप्लाई का ठेका लेना होता है। टेंडर पास कराते समय तरकीब से काम करना पडता है, कहीं लेना-देना पड़ता है किंतु इसके बाद साल-भर यदि संबंधित खरीद के लिए जिम्मेदार व्यक्ति से तालमेल बैठाए रखा जाय तो कई प्रकार से लाभ होता है। फल तोल के हिसाब से बिकते हैं। जहाँ उनका इस्तेमाल संख्या के हिसाब से होता है वहाँ कम तोल में संख्या की पूर्ति कर दी जाती है। छोटे-छोटे नग बड़े नगों की तुलना में उसी वजन में अधिक संख्या में तुलेंगे। प्रभारी के पास हिस्सा पहुँचता रहे तो यह काम धड़ल्ले से होता रहता है। होटलों में, जहां बहुधा फलों का इस्तेमाल काटकर किया जाता है, अच्छे फलों के साथ थोड़े-बहुत दागी या ज्यादा पके या थोड़े-बहुत सड़े और खराब फल भी चल जाते हैं। कटकर, किसी खाद्य पदार्थ में मिलकर, जब फ़ल ग्राहक के सामने पहुँचते हैं तो उसे पता ही नहीं लगता कि वह कोई ऐसी-वैसी चीज खा रहा है। फ्रूट-सलाद, फ्रूट रायता, फ्रूट आइसक्रीम, फ्रूट जैली, फ्रूट कस्टर्ड जैसी चीजों में फल इस तरह घुल-मिल जाते हैं कि खाते समय फलों की गुणवत्ता का पता लग ही नहीं पाता है। फौजी छावनियों में तो गड़बड़ करने में बिल्कुल कठिनाई नहीं होती है। दोपहर के भोजन के बाद सेब की जगह नारंगी और नारंगी की जगह केला बाँटना बहुत सामान्य बात है। ठेका किसी और चीज का है, बिल ठेके के अनुसार बन रहे हैं, ऊपर के अधिकारियों के पास निर्धारित फ़ल पहुँच रहे हैं किंतु लंगर में फल बदल जाता है। ठेका सरकारी अस्पताल का हो तो महीने में पंद्रह दिन दस-बीस प्रतिशत फल और पूरा बिल भेजने से भी काम चल जाता है। बाबा जानते थे कि इस तरह की हेराफेरी करके वे अनैतिकता और भ्रष्टाचार फैलाने की दृष्टि से सक्रिय सहयोग करते हैं, सहयोग ही नहीं सहभागिता भी होती है उनकी। किंतु वे यह भी जानते थे कि इस काम को उन्होंने नहीं किया तो कोई और करेगा। होना इसी काम को है। फ़ल कम जाते रहेंगे। फ़ल खराब, सड़े-गले और घटिया जाते रहेंगे। एक फ़ल के नाम पर दूसरा फल भेजा जाता रहेगा। अंतर इतना ही होगा कि उनकी जगह इस काम को दूसरा कर रहा होगा। जब गलत काम होना ही है तो यह वहम पालने से क्या फायदा कि कम-से-कम मैं तो गलत काम नहीं करता हूँ।

मैं जानता हूँ कि भ्रष्ट और अनैतिक रास्तों का अंत कहीं नहीं होता। इन रास्तों पर जितना आगे जाएँगे, मंजिल या अंतिम छोर उतना ही आगे खिसकता जाएगा। यही कारण है कि चोरी-छिपे परदे के पीछे रहकर अत्यंत सावधानी के साथ भ्रष्टाचार करने या रिश्वत लेनेवाले लोगों के इस रास्ते पर सफर की शुरुआत भले ही इस तरह होती हो, धीरे-धीरे वे खुले में आने लगते हैं। किसी मातहत के माध्यम से रिश्वत लेने वाला अफसर सीधी सौदेबाजी करने लगता है। मेज के नीचे से रिश्वत लेनेवाला लिपिक मेज के ऊपर से रिश्वत लेने लगता है। और-तो-और, लोग चैक से रिश्वत लेने में भी परहेज नहीं करते। छठे-छमाही कोई एक व्यक्ति दस-बीस रुपए की रिश्वत लेते पकड़ा जाता है, मामला संचार माध्यमों और समाचार-पत्रों में उछलता है तो रिश्वत लेनेवाले कुछ दिनों के लिए सतर्क हो जाते हैं। अन्यथा लेन-देन का व्यवहार बदस्तूर चलता रहता है। बाबा ने भी जिस दिन थानेदार को डाली देकर और पुलिसवाले का महीना बाँधकर इस क्षेत्र में पहला कदम रखा था, मैं उसी दिन समझ गया था कि शुरुआत भले ही विभाजन से जुड़े संत्रास से हुई हो, मगर वे इस रास्ते पर क्रमशः बढते जाएँगे, रुकेंगे नहीं। फुटपाथ पर थड़ियों के लिए ज़मीन का आवंटन उन्होंने इसी तरीके से कराया था। इस काम में मदद के लिए वोट का लालच तो था ही किंतु इसी अमोघ अस्त्र का प्रयोग करके राजनीतिबाजों को तैयार किया था उन्होंने। वे टेंडर भरेंगे। उनका ही टेंडर स्वीकार किया जाएगा। ठेका उनको ही मिलेगा, वे हेरा-फेरी करके रुपया बनाएँगे। अगली बार हो सकता है, उनकी टक्कर में खड़ा होकर टेंडर भरने और उसे पास कराने का साहस कोई कर ही न सके। सभी स्थानों पर चाहे उनका जादू न चले किंतु वे ही कहाँ चाहेंगे कि उनके टेंडर हर जगह स्वीकार कर लिये जाएँ? सब स्थानों पर तो वे फल पहुँचा भी नहीं सकेंगे।

बाबा ने टेंडर के माध्यम से ठेका देनेवाली संस्थाओं से संपर्क करना शुरू कर दिया। संबंधित व्यक्ति के बारे में जानकारी लेकर वे संस्थाओं में जाते। मंडी से लौटने के बाद दो-तीन घंटे इधर-उधर जाने से ग्राहकी पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता था। टेंडर भरवाने का हर संस्थान का अलग समय होता है। उस समय की जानकारी लेते, प्रभारी से संकेतात्मक या स्पष्ट भाषा में उसके हित-पोषण की बात करते और धीरे-धीरे उससे संबंध विकसित करते। एक पब्लिक स्कूल के लड़कियों के छात्रावास में फलों का ठेका उन्हें मिल भी गया है। जिस योजनाबद्ध तरीके से वे ठेके प्राप्त करने के प्रयास में लगे हैं, उसे देखते हुए दावे के साथ कहा जा सकता है कि कुछ और ठेके भी उन्हें मिल जाएँगे। ठेके मिलने का अर्थ है उनकी आमदनी में वृद्धि, और यही बाबा चाहते हैं।

अपनी हर एक गतिविधि और योजना के बारे में बाबा काका भोजामल से विचार-विमर्श जरूर करते हैं। इस तरह बाबा की योजना या कार्य-पद्धति में कोई कमी होती है तो उसमें परिष्कार हो जाता है। काका भोजामल तो कभी सिद्धांतों के लिए लड़े़ और अड़े़ ही नहीं हैं। हालाँकि बाबा ने कभी इस तरह के काम नहीं किए, किंतु कुशाग्रबुद्धि होने के कारण नस को जल्दी पकड़़ लेते हैं। फिर सिंध में आदर्शवादी होने के कारण काका भोजामल बाबा की जाल बुनने की निपुणता को लेकर संदेहग्रस्त रहते हैं। विचार-विमर्श के बाद काका भोजामल आश्वस्त हो जाते हैं। बाबा की अनुपस्थिति में कोई ठेके से संबंधित ग्राहक या उसका प्रतिनिधि थड़ी पर आता है तो विस्तृत बिंदुवार जानकारी के अभाव में काका भोजामल ऊक-चूक न हो जाएँ, विचार-विमर्श के बाद इसकी संभावनाएँ भी निरस्त हो जाती हैं। एक बात और भी है। इस पर शायद काका भोजामल का ध्यान कभी न गया हो, मगर बाबा के दिमाग में यह बात जरूर रही होगी विचार-विमर्श करते समय। आए दिन बाबा तीन-चार घंटे थड़ी पर नहीं होते। संपर्क विकसित करने की प्रक्रिया में चाय आदि पर जो खर्च वे करते हैं, उसे थड़ी देती है। कभी काका भोजामल के मन में यह गलतफहमी भी तो पैदा हो सकती है कि बाबा पता नहीं कहां चले जाते हैं? या कि बाबा जो पैसा खर्च के नाम पर थड़ी से लेते हैं क्या सचमुच उतना खर्च होता है? विचार-विमर्श के बाद इस प्रकार की संभावनाएँ निरस्त चाहे न हो जाती हों किंतु नगण्य तो हो ही जाती हैं। संबंधित व्यक्ति स्वयं यदि थड़ी पर आ जाता है तो बाबा उसे काका भोजामल से इस तरह मिलाते हैं जैसे उन दोनों में कोई अंतर न हो।

बाबा की संपर्क विकसित करने के लिए की जाने वाली गतिविधियों में इसलिए काका भोजामल पूरी तरह शामिल होते हैं। हर समय सामने न होकर भी हर समय, हर जगह परछाई की तरह बाबा के साथ महसूस करते हैं।

दूसरे महीने आमदनी और बढी। ठेके मिलने के बाद थड़ी से होनेवाली कमाई में कई गुना वृद्धि होने की आशा थी। बाबा संतुष्ट थे। उन्हें लगता था कि भागीदारी करके उन्होंने सही कदम उठाया है। यद्यपि काका भोजामल से किसी भी स्तर पर बाबा के कभी आर्थिक संबंध नहीं रहे, किंतु उनसे भागीदारी करने के बाद वे महसूस करते थे कि काका भोजामल से बेहतर भागीदार का मिलना शायद संभव नहीं है। काका भोजामल ने थड़ी से प्रतिमाह सौ रुपए लिये थे। बाकी मुनाफे को उन्होंने थड़ी आदि पर बाबा द्वारा की हुई लागत के आधे हिस्से के रूप में समायोजित किया था। इससे एक तरफ उनके ऊपर ब्याज का बोझ, थोड़ा ही सही लेकिन कम हुआ था और दूसरी तरफ बाबा की दृष्टि में ईमानदार व खरे आदमी के रूप में उन्होंने अपनी साख जमा ली थी। लागत का हिस्सा देने से यह भी स्पष्ट था कि काका भोजामल को सब कुछ ठीक लग रहा है। पैसा भले ही इसी काम से कमाया हो लेकिन उसे फंसाकर वे इस धंधे में बने रहने के अपने इरादों की अनकही घोषणा कर रहे थे।

तीसरे महीने बाबा की सहमति से काका भोजामल उल्हासनगर गए। वे तय करके गए थे कि सारे परिवार को जयपुर ले आएँगे। किराए का मकान लेकर सारा परिवार रहेगा। उल्हासनगर वाली दुकान धीरे-धीरे समेटना शुरू करेंगे। माल बेचेंगे ज्यादा, खरीदेंगे कम। दुकान और उसका फर्नीचर देने की दृष्टि से किसी खरीदार की तलाश चलती रहेगी। जब तक दुकान सिमटे, दोनों विवाहित लड़के, उनकी पत्नियाँ, बच्चे और वीरू उल्हासनगर में ही रहेंगे। दो महीनों तक उन लोगों ने अपने बूते पर दुकान चलाई है तो अब उसे समेट भी अपने बूते पर लेंगे। काका भोजामल काकी और मीनू को जयपुर साथ ले आएँगे। दोनों स्थानों पर परिवार जैसी स्थितियाँ होंगी। लडकों को किसी तरह की तकलीफ नहीं होगी। खाने-पीने, पहनने-ओढ़ने की चिंता उन्हें नहीं करनी पड़ेगी। काका भोजामल भी परिवार में रह लेंगे। वैसे अम्मा ने उन्हें कभी कोई परेशानी नहीं होने दी है, फिर भी परिवार के साथ उठते-बैठते आदमी जितना उन्मुक्त अनुभव करता है, उस पर तो पाबंदी लगी हुई थी ही। खाना-पीना, आना-जाना, तीज-त्योहार अपने परिवार के साथ ही आनंद देते हैं। जाने से पहले किराए का मकान उन्होंने इसलिए तय नहीं किया क्योंकि वे चाहते थे कि इतना महत्त्वपूर्ण निर्णय सबकी सहमति से किया जाए।

आठ दिन बाद काका भोजामल, काकी और मीनू जयपुर आ गए। अपने साथ गृहस्थी चलाने के लिए कम-से-कम जो सामान लाया जा सकता है, वे लेकर आए हैं। दो बिस्तर, पहनने के कपड़े, बहुत कम बरतन। अम्मा ने घूम-घूमकर उनके लिए मकान तलाश करना शुरू किया। काका भोजामल चाहते थे कि जब तक उल्हासनगर से सब लोग आएँ, बड़ा मकान न लिया जाए। बड़े मकान का अधिक किराया न जाने कितने समय तक देना पडे़गा। अम्मा उनके लिए इतना ही बड़ा मकान तलाश कर रही थी जितना हमारे पास था। डेढ कमरा, जिसमें रसोईघर और स्नानघर शामिल थे। काका भोजामल, काकी और अम्मा तीनों की यह भी इच्छा थी कि उनका मकान हमारे मकान के आसपास हो।

सिंधी परिवार सामान्यतः बड़े-बड़े थे। संयुक्त परिवार होने के कारण स्वाभाविक रूप से सदस्यों की संख्या अधिक होती थी। बड़े मकान ले सकें, आर्थिक दृष्टि से ऐसी स्थिति नहीं थी। दो-एक कमरों में आठ-दस सदस्यों के परिवार का निवास सामान्य बात थी। शोर-शराबा ज्यादा होता था। गंदगी ज्यादा फैलती थी। लोगों को लगता था कि सिंधी समुदाय जोर-जोर से बोलता है। न स्वयं साफ-सुथरा रहता है और न अपने मकान की सफाई की चिंता करता है। एक तरफ़ मेहनती व्यक्ति की छवि, दूसरी तरफ असभ्य किस्म के इनसान की छवि। यद्यपि रहने के लिए पर्याप्त स्थान और सुविधाएँ दी जातीं तो सिंधी परिवार से भी इस तरह की शिकायत किसी को नहीं होती, किंतु परिस्थितियों के वशीभूत विपरीत छवि को पुख्ता करने के लिए सिंधी समुदाय विवश था। इस छवि के कारण काका भोजामल को भी मकान मिलने में कठिनाई हो रही थी। आखिर अम्मा ने किसी तरह उनके लिए एक कमरे की व्यवस्था कर ली। कमरा हमारे घर के बिल्कुल निकट तो नहीं था, लेकिन ज्यादा दूर भी नहीं था। पांच दिन लगातार प्रयत्न करने के बाद यह कमरा मिला था।

जीवन में यह पहला अवसर था जब मुझे मीनू के साथ एक छत के नीचे रहने का मौका मिला। मकान में जगह जितनी थी, उसी में गुजारा करना था। रात को मेरी चारपाई रसोईघर में लगती थी। बाबा और काका भोजामल एक-एक चारपाई पर सोते थे। काकी, अम्मा और मीनू दोनों चारपाइयों के बीच में बिस्तर लगा लेती थीं। जब काका भोजामल अकेले हमारे साथ रहते थे तो अम्मा चारपाई पर रसोईघर में सोती थीं और मैं दोनों चारपाइयों के बीच जमीन पर बिस्तर लगाकर सोता था। पढना क्योंकि सुबह जल्दी उठकर होता था और बाबा व काका भोजामल अँधेरे मुँह क्रमशः मंडी और थड़ी के लिए निकल जाते थे, इसलिए मेरे कार्यक्रम में काका भोजामल के कारण कोई व्यवधान नहीं पड़ा। काकी और मीनू के आने के बाद जरूर मुझे सुबह कठिनाई हुई थी। मैं रसोईघर में सोता था। रसोईघर इतना ही बड़ा था कि किसी तरह उसमें चारपाई आ जाए। अम्मा के उठने के बाद चारपाई खड़ी करनी आवश्यक थी। मैं घूमकर लौटता तो काकी उठी हुई मिलती थीं। बाबा और काका भोजामल काम पर जा चुके होते थे। लेकिन मीनू जमीन पर सोई रहती थी। मीनू हालांकि चादर ओढकर सोती थी किंतु उसकी उपस्थिति का अहसास मुझे एकाग्रचित्त होकर पढने नहीं देता था। किताब सामने होती थी किंतु मन भटकता रहता था। यों यह मीनू सिंध वाली मीनू अगर नहीं थी तो उल्हासनगर वाली मीनू भी नहीं थी। अब वह केवल मुसकरा-भर नहीं देती थी, ठहाका मारकर हँसती थी। हमेशा गंभीर नहीं बनी रहती थी, हँस-बोल लेती थी। सिंध, उल्हासनगर और जयपुर में जो परिवर्तन मैंने मीनू में देखे, मैंने उससे उनका कारण जानना चाहा था। उल्हासनगर में एकांत न मिलने के कारण जो मैं उससे पूछना चाहता था, वह प्रश्न मैंने अब पूछा। मगर वह मुसकराकर टाल गई।,

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Disha Bawa 4 महीना पहले

Yashwant Kothari 4 महीना पहले

JaI Veer 4 महीना पहले

Balkrishna patel 4 महीना पहले

S Nagpal 4 महीना पहले