अपनी अपनी मरीचिका - 11

अपनी अपनी मरीचिका

(राजस्थान साहित्य अकादमी के सर्वोच्च सम्मान मीरा पुरस्कार से समादृत उपन्यास)

भगवान अटलानी

(11)

25 सितम्बर, 1952

गुलाल से सराबोर, थकान से चूर, विजय से उल्लसित और नवप्रदत्त दायित्वों के बोझ से दबा कुछ देर पहले घर लौटा हूँ। अम्मा और बाबा के चरण स्पर्श करके उन्हें महासचिव पद का चुनाव जीतने की सूचना दी तो दोनों ने बाँहों में लेकर मेरा मस्तक चूम लिया। मेरे सिर और बालों में अटा गुलाल अम्मा और बाबा को भी रंगीन बना गया। हम तीनों ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगे। विभाजन के केवल पाँच साल बाद बेटा समाज के बुद्धिमान तबके की भावी नाक माने जाने वाले समूह का सिरमोर बनकर आया है, यह इबारत मैं बाबा की आँखों में भली भाँति पढ़ पा रहा था। अम्मा की आँखें, उसका मुखमंडल, उसका अंग-अंग शुद्ध प्रसन्नता से दमक रहा था, किंतु बाबा की आँखों में प्रसन्नता से अधिक गौरव था।

मुझे लगा, अम्मा और बाबा की आकांक्षाओं, उनकी अपेक्षाओं, उनके देखे हुए सपनों की परछाइयाँ नजर आ रही हैं उनकी आँखों में। मेरे विषय में जो कुछ प्रतीतियाँ दोनों ने अपने-अपने ढंग से गढी हैं, दोनों की आँखों में उतर आई हैं वे प्रतीतियाँ ज्यों-की-त्यों। अम्मा ने शायद मेरी खुशी के अतिरिक्त कुछ नहीं चाहा है। जीवन में हर तरह के सुुख, हर तरह की खुशियाँ मुझे मिलें, अम्मा की तपश्चर्या का लक्ष्य यही है शायद। उसने सपना नहीं देखा है मेरे समृद्ध भविष्य में भागीदारी का। उसने अपेक्षा नहीं रखी है मेरी शादी में आने वाले दहेज की। उसने नहीं चाहा है मेरी पत्नी की सेवा का सुख भोगना। मेरा समृद्ध भविष्य, मेरा सुखपूर्ण विवाहित जीवन, मेरे खूबसूरत बच्चे देखने की आकांक्षा जरूर है अम्मा की, लेकिन अपना स्वार्थ नहीं जोड़़ा है उसने इन आकांक्षाओं के साथ। इसलिए मुझे सम्मान मिलने की सूचना से उसका संबंध केवल प्रसन्नता के रूप में साकार हुआ है। खालिस प्रसन्नता, जिसमें दूसरी किसी ख्वाहिश की कोई मिलावट नहीं है।

बाबा ने शायद अपने अधूरे सपनों की पूर्ति मुझमें देखी है। उन्होंने सिंध में स्वतंत्रता आंदोलन के लिए अपने आपको खपाया। विभाजन के बाद उनका मोहभंग हुआ तो उन्होंने दूसरे छोर को पकड़़ा। पहले अपने लिए उनका कुछ नहीं था। सब कुछ देश के लिए था। तन भी, मन भी और धन भी। अपने लिए कुछ भी करते हुए उन्हें लगता था, देश के साथ विश्वासघात कर रहे हैं। मगर शायद एक अज्ञात अपेक्षा उन्होंने देश से की थी। उन्हें अचेतन में लगता होगा कि स्वतंत्रता के बाद देश उनके लिए इतना कुछ करेगा कि अपने लिए कुछ न करने का गम उन्हें नहीं रहेगा। अचेतन में बैठी अज्ञात अपेक्षा की पूर्ति के स्थान पर जब उन्हें दर-ब-दर होना पड़़ा तो जो उथल-पुथल उनके अंदर हुई उसने उन्हें ऐसे व्यक्ति में बदल दिया जो सब कुछ अपने लिए करता है, अपने लिए सोचता है और अपने लिए बोता-काटता है। कृतित्व के इस छोर को पकड़ने के बाद मुझे, अपने एकमात्र पुत्र को, डॉक्टर बनाकर उन्होंने समाज में, देश में सम्मानजनक स्थान प्राप्त करने का सिंध में देखा सपना पूरा करना चाहा होगा। यही कारण है कि उस सपने की पूर्ति के संकेत पाकर खुशी के साथ ये गौरव-भाव से भर गए हैं।

खुशी तो अम्मा और बाबा दोनों को हुई है, किंतु बाबा की आँखों में खुशी के साथ घुला-मिला गौरव देखकर मुझे अच्छा नहीं लगता। महासचिव का चुनाव जीतकर मैंने कोई बड़ी उपलब्धि अर्जित की हो तब भी बाबा को अपनी पीठ क्यों थपथपानी चाहिए? प्रजनन कर्म भले ही माता-पिता के सहयोग से संभव हुआ हो किंतु बालक माता-पिता की बनाई हुई कलाकृति, तैयार की हुई रचना या गढी हुई जीवित मूर्ति नहीं होता। उसके सुकृत्यों और कुकृत्यों का कारण केवल माता-पिता नहीं होते। उसके निर्माण में घर के वातावरण के अतिरिक्त अनेक पक्ष काम करते हैं। जिन बच्चों के साथ बालक खेलता है, जिन दोस्तों के साथ खाता-पीता-घूमता है, जिस स्कूल-कॉलेज में पढ़ता है, अपनी खुली और बंद आँखों से जिन्हें देखता है, जिस हवा में सांस लेता है, जिस वातावरण से प्राणवायु ग्रहण करता है, उसके निर्माण में उनकी भी महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। बालक की उपलब्धियों का छोटा-बड़़ा अंश इनमें से किसी एक गुणक के हिस्से में आ जाए, यह तो संभव है, किंतु इनमें से कोई एक गुणक बालक की सभी उपलब्धियां अपने नाम कैसे लिख सकता है? कैसे एक स्कूल या कॉलेज कह सकता है कि अमुक व्यक्ति अमुक विशिष्ट स्थान पर इसलिए पहुँचा क्योंकि यह इस स्कूल या कॉलेज में पढा? कैसे एक बाल सखा दावा कर सकता है कि बचपन से खेल-खेल में जो कुछ उसे सिखाया उसी के कारण वह विशेष उपलब्धियां अर्जित कर सका? कैसे एक पिता गौरव से सीना फुला सकता है कि उसकी रचना, उसका अंश होने के कारण बेटा इतना ऊपर उठ सका है?

मैं छात्रसंघ के महासचिव का ना-कुछ चुनाव जीतकर आया हूँ तो बाबा को वे सुविधाएँ, वे उपदेश, वे संस्कार, वे हितपोषक निर्देश याद आ गए हैं, जिनके कारण उन्हें लगता है कि मैं कुछ हो गया हूँ। कल डॉक्टर बनकर लौटता हूँ, परसों ऐसा कुछ करता हूँ जिससे अन्य डॉक्टरों की तुलना में मेरी यश-पताका ऊँची हो जाती है, नरसों कोई राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार जीतता हूँ। तो क्या इसके पीछे अकेले बाबा होंगे? अम्मा की अनबोली चिंताएँ, मीनू की खामोश मंगलकामनाएँ, मित्रों की दीर्घ सदेच्छाएँ कहीं नहीं होंगी? मेरी उपलब्धि बाबा के लिए मेरे ऊपर गर्व करने का प्रेरक तत्त्व तो बन सकती है, किंतु मुझे परिदृश्य से निकालकर बाबा को अपने ऊपर गर्व करने का कारण नहीं बन सकती। यदि आज बाबा मेरी उपलब्धि का कारण स्वयं को मानकर अभिभूत होते हैं तो कल जो अपेक्षाएँ वे मुझसे रखेंगे, अपरिमित होंगी। न मैं उतनी अपेक्षाओं को पूरा कर सकूंगा और न मेरी भरसक कोशिश के बाद भी वे संतुष्ट महसूस करेंगे।

मैं जानता हूँ, बाबा जान-बूझकर ऐसा नहीं कर रहे हैं। आज तो वे यहां तक तैयार हैं कि डॉक्टर बनने के बाद शादी करके पत्नी के साथ मैं उ़नसे अलग रहूँगा। मजाक में वे कहते भी हैं कि शादी के तुरंत बाद इसके अलग रहने का इंतजाम कर देंगे। यह आगे बढकर कहेगा कि साथ रहना है तो सोचेंगे, वरना सजे-धजे मकान की चाबी देकर कहेंगे, इसे हमारी तरफ से दहेज मानना। चाहे शब्दशः वे ऐसा न कहें जैसा कहते हैं लेकिन किसी बिंदु पर यदि मैंने चाहा कि अलग रहना चाहिए तो वे मना भी नहीं करेंगे।

मना नहीं करेंगे, ठीक है। आज वे कहते हैं कि शादी के तुरंत बाद इसकी गृहस्थी अलग कर देंगे, यह भी ठीक है। किंतु क्या हृदय से स्वीकार करेंगे वे इस स्थिति को? मेरी उपलब्धियाँ जिस तरह अपने प्रति गौरव-भाव से भरती हैं उन्हें उससे तो ऐसा बिलकुल नहीं लगता। मैं कृतसंकल्प हूँ कि जीवन-भर अम्मा, बाबा के लिए वह सब करूँगा जो मेरे वश में है। अपेक्षाओं की अमरबेल को खाद-पानी की जरूरत नहीं होती है। वह अपनी रफ्तार से बढती है। उसका बढना पेड़़ के लिए कष्ट का कारण होता है। मैं नहीं चाहता कि किसी समय बाबा अपेक्षाओं की स्वपल्लवित अमरबेल से आहत हों।

इस बार छात्रसंघ के चुनावों में हमारे पैनल के सभी छात्र और छात्राएं विजयी रहे हैं। प्रारंभ में मैंने प्रस्ताव रखा था कि हमारे पैनल का कोई भी प्रत्याशी चुनाव जीतने के लिए कोई प्रयत्न न करे। विजिटिंग कार्ड, पोस्टर, बैनर, जुलूस, व्यक्तिगत संपर्क, टोलियां बनाकर संपर्क, मित्रों के माध्यम से मत के लिए अनुरोध कुछ भी न किया जाए। चुनाव लड़़ने वाले प्रत्याशियों के भाषणों का एक सत्र रखने की मेडीकल कॉलेज में परंपरा है। सारा कॉलेज ऑडीटोरियम में इकट्‌ठा होता है। मुख्य चुनाव अधिकारी की देख-रेख में सभी प्रत्याशियों को मंच पर आकर बात कहने के लिए पाँच-पाँच मिनट का समय मिलता है। विभिन्न गुट अपने प्रत्याशियों के समर्थन और समर्थ विरोधी प्रत्याशियों के विरोध में जाकर नारे लगाते हैं। हूटिंग होती है। वक्तृत्व कला में पारंगत प्रत्याशी ही प्रभावशाली ढंग से श्रोताओं तक अपनी बात पहुँचा पाते हैं। शेष प्रत्याशी या तो स्वयं निराश हो जाते हैं या हूटिंग के शिकार हो जाते हैं। मेरा प्रस्ताव था कि हमारे पैनल के प्रत्याशी सारे कॉलेज की साधारण सभा में प्रभावशाली तरीके से बोलने के अतिरिक्त कुछ न करें।

इस प्रस्ताव के अनेक लाभ थे। किसी प्रकार का प्रयत्न न करके हम सिद्ध करते कि चुनावों में विजय का संबंध हमारे स्वार्थ से नहीं है। छात्रों का हित देखने वाले प्रतिनिधि कौन हो सकते हैं, यह फैसला मतदाता छात्रों को करना है। विभिन्न माध्यमों से प्रचार करके मतदाता पर प्रकारांतर से प्रत्याशी अपने पक्ष में दबाव डालता है। दबाव वही प्रत्याशी डालना चाहेगा जिसे अपनी विजय से किसी प्रकार का लाभ मिलने की आशा हो। छात्रों की सेवा जब हमारा एकमात्र उद्‌देश्य है तो हम उस प्रक्रिया को क्यों चुनें जो ऐसे प्रत्याशियों द्वारा अपनाई जाती है जिनका चुनाव जीतना किसी स्वार्थपूर्ति की भूमिका होता है।

इस प्रस्ताव से सबसे बड़़ा नुकसान यह था कि मतदाता के अहम्‌ को हमारे व्यवहार से चोट पहुँचती। चुनाव जीतने की दृष्टि से हमारी गंभीरता भी इस तरह संदिग्ध हो जाती थी। मतदाता को हम यह सोचने का अवसर देते कि जब अभी से कन्नी काटी जा रही है तो बाद में क्या होगा?

मतदाता से सीधा संपर्क करके उससे मत मांगने में बुराई क्या है? प्रत्याशी चुनाव लड़ रहा है। अपनी योजनाएँ और उन योजनाओं की पूर्ति की दृष्टि से अपना व्यक्तित्व साथ लेकर उसे मतदाता के सामने जाना चाहिए। मतदाता प्रत्याशी को पहचान और समझ सके, यह अधिकार उसे नहीं है क्या? सभी छात्रों की साधारण सभा में विचार व्यक्त करना खुली संसद में बोलने की तरह है। उससे व्यक्ति की भाषण क्षमता की जानकारी तो मिलती है किंतु उसके व्यक्तित्व की कमियाँ और खूबियां मतदाता के सामने जाहिर नहीं हो पाती हैं।

मेरा प्रस्ताव एक भी समर्थक नहीं पा सका। हम लोगों ने कॉलेज और अस्पताल की दीवारें, सड़कें लिखावटों और पोस्टरों से पाट दीं। पैनल के छात्रों की झंड़ियों की बंदनवारें और बैनर कलात्मक ढंग से सजाए। इत्र में डूबे विजिटिंग कार्ड मतदाता को देतेे हुए टोलियाँ बनाकर कॉलेज में, छात्रावासों में, घरों पर जाकर हमने सघन संपर्क किया। पैनल के नाम वाले पैंफलेट प्रत्येक मतदाता तक पहुँचाए। मुकाबला प्रत्येक पद के लिए था किंतु ऐसा माना जा रहा था कि महासचिव पद के लिए मुकाबला सबसे कम है। फिर भी प्रयत्नों की दृष्टि से महासचिव के चुनावों पर पूरा ध्यान देते हुए हम लोग अन्य पदों के लिए उसके साथ-साथ प्रचार कर रहे थे। विजय की संभावनाएँ सर्वाधिक हैं, यह समझते हुए भी हमारे प्रचार का केंद्र महासचिव का पद था।

ऑडीटोरियम में मेडीकल कॉलेज की साधारण सभा के सामने हमारे पैनल के प्रत्याशियों की स्थिति भी अन्य प्रत्याशियों से बहुत अच्छी नहीं रही। निराशा और घबराहट के कारण हकलाने लगना, अपनी बात को ढंग से न कह पाना, गुस्से में उबल पड़ना और हूटिंग में उखड़़ जाना। अधिकांश प्रत्याशी इनमें से किसी-न-किसी कारण से श्रोताओं पर अपना प्रभाव नहीं छोड़ पाए। मेरा नाम पुकारा गया तो मैं धेर्यपूर्वक उठा और धीरे-धीरे चलता हुआ मंच पर माइक के सामने खड़़ा हो गया। नाम के साथ ही पक्ष और विपक्ष में नारेबाजी शुरू हो गई थी। मैं खामोशी से नारे सुनता रहा और मंद-मंद मुस्कराता रहा।

कुछ इस कारण से कि नारे लगाने वाले अधिकांश छात्र मेरे पक्षधर थे और कुछ इस कारण से कि वाद-विवाद प्रतियोगिताओं का स्थापित वक्ता होने का लाभ मुझे प्राप्त था, वातावरण जल्दी ही शांत हो गया। ऑडीटोरियम में पूरी तरह खामोशी हो जाने तक मैं मुस्कराता हुआ चुपचाप खड़ा रहा। फिर मैंने कहना शुरू किया, ‘‘इस मंच पर मिले पांच मिनट हमारे पैनल के सामर्थ्य को रेखांकित करने के लिए उतने ही कम हैं जितनी कम इस ऑडीटोरियम की छत की ऊंचाई मेडीकल कॉलेज के छात्रों के नारों के लिए है।''

ऑडीटोरियम ठहाकों ओर तालियों से गूँज उठा। ‘‘मेडीकल कॉलेज में पढ़ने वाले विद्यार्थी के पास बुद्धिबल और बाहुबल के साथ भारी गलाबल भी है। इन तीनों का रचनात्मक इस्तेमाल करने का संकल्प हमारे पैनल का है। महासचिव पद के लिए मैं आपके सामने खड़ा हूँ। किंतु यदि आप चाहते हैं कि बंद मुट्‌ठी का सच हमारा सच बनना चाहिए, हमारी बुद्धि और आवाज़ को खुला आकाश मिलना चाहिए, भावी नस्लों को याद आना चाहिए कि 1952 में हमारे पूर्वजों ने अमुक सौगात दी थी इस मेडीकल कॉलेज को, तो अकेला महासचिव पंगु साबित होगा। महासचिव के हाथ-पाँव मेरे पैनल के साथी हैं। जब तक आपके मत के हकदार सभी नहीं बनते तब तक ये उद्‌देश्य प्राप्त नहीं किए जा सकते। सुभाषचंद्र बोस ने कहा था ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा।' मैं अनुरोध करता हूँ - तुम मुझे मत दो, मैं तुम्हें ताकत दूंगा। और याद रखिए, मेरा मैं-मेरे पैनल के बिना अधूरा है।''

मैंने अपने भाषण में किसी की निंदा नहीं की थी। किसी के खिलाफ गाली गलौज वाली भाषा में बात नहीं की थी। निर्धारित समय का पूरा उपयोग मैंने बोलने के लिए नहीं किया था। सूत्र रूप में अपने इरादे जाहिर किए थे। एकाधिकार की धारणा को तिलांजलि देकर सामूहिक नेतृत्व पर जोर दिया था। बहुत देर तक बजती तालियाँ, ऑडीटोरियम में रही खामोशी, किसी प्रकार की फब्ती या नारेबाजी का अभाव मेरे भाषण के प्रभाव का मूल्यांकन करने के लिए काफी थे।

मंच से मैं अपने पाँवों से नहीं, अपने साथियों के पाँवों से उतरा था। उत्साह के साथ नारे लगाते हुए मुझे कंधों पर उठाकर मेरे साथी ऑडीटोरियम से बाहर निकल आए। वहां भंगड़़ा और नारों का जो तूफान उठा, उसमें ऑडीटोरियम से निकल-निकल कर लड़के शामिल होते गए। प्रत्याशियों को सुनने के लिए रह गए उनके मुट्‌ठी भर कट्‌टर समर्थकों को छोड़कर सभी लड़के-लड़कियाँ बाहर निकल आए। मैंने अपने पैनल के साथियों से हाथ मिलाकर एक रिंग बनाई थी, उसी के बीच में नाच चल रहा था। तालियों की तालबद्ध आवाजें, स्वरबद्ध नारे, भंगड़़ा नाचते लड़़के और उनको घेरकर चक्कर लगाता हमारा पैनल। थोड़ी देर ऑडीटोरियम के बाहर नाचने के बाद उसी स्थिति में हम लोग पूरे कॉलेज में घूम आए।

भाषण और भाषण के बाद बने वातावरण से मेरे साथी और हमारे पैनल के छात्र बहुत खुश थे। सबका मानना था कि मैदान तो हम लोगों ने आज ही मार लिया है। अब तो मतदान और परिणामों की औपचारिकता पूरी होनी है। अपनी विजय के प्रति आशान्वित तो पहले ही थे, उस शाम के बाद आशा, विश्वास में बदल गई।

हमारा विश्वास गलत नहीं था। हमारा पूरा पैनल केवल विजयी नहीं हुआ है, अच्छे मतों से विजयी रहा है। अपेक्षा के अनुसार सबसे अधिक मत मुझे मिले हैं। मुझे चार सौ नब्वे मत मिले हैं और पचासी मत महासचिव पद का चुनाव लड़़नेवाले तीन उम्मीदवारों में बँटे हैं। हमारे पैनल का सबसे कम मत लेकर विजयी रहा छात्र सांस्कृतिक सचिव है। किंतु मिले उसे भी तीन सौ बीस मत हैं। मेडीकल कॉलेज के छात्र-छात्राओं ने जितना विश्वास हमें दिया है, उससे मेरे मन में जिम्मेदारी का अहसास बढ गया है।

प्रारंभ में आर्थिक व्यवस्था हमारे लिए सबसे बड़़ा संकट थी। अब तक पैसा जुटाने के लिए एक गलत तरीका अख्तियार किया जाता था। एक या अधिक टोलियों में लड़के बाज़ारों में जाकर दुकानदारों से चंदा लेते थे। चंदा न देने वाले दुकानदारों से लड़ाई-झगड़ा, मार-पीट करते थे। उनकी दुकानों में नुकसान, तोड़़-फोड़़ करते थे।. भयभीत दुकानदार जाते ही लड़कों को चंदा दे देते थे। किसी की चंदा कम देने की हैसियत होती थी और लड़के ज्यादा चंदा माँगते थे, तो उनसे गिड़़गिड़़ाकर अनुरोध करके दुकानदार छूट हासिल करता था। जितने पैनल चुनाव लड़ते थे, उतनी बार दुकानदारों को चंदा देना पड़ता था। चुनावों को शहर का व्यापारी वर्ग भयातुर दृष्टि से देखता था।

मैंने चंदा माँगकर चुनावों के लिए पैसा इकट्‌ठा करने वाली बात का डटकर खुला विरोध किया। मैं जब खुलकर किसी मुद्‌दे के पक्ष या विपक्ष में खड़़ा हो जाता हूँ तो मेरे साथी असहमति के तेवर छोड़ देते हैं। आर्थिक संसाधनों की चुनावों में जितनी अधिक जरूरत पड़ती है, उसे सब जानते थे। बिना पैसे के चुनाव जीतना लगभग असंभव काम था। मैंने अड़ जाने वाले ढंग से विरोध किया था तो रास्ता भी मुझे ही निकालना था। वैसे तानाशाही तरीके से जिद पर उतरकर बात तभी कहता हूँ, जब कोई ऐसा सैद्धांतिक पहलू मेरे मस्तिष्क में होता है जिसके बारे में कोई समझौता मैं नहीं कर सकता। चुनाव हम लड़ें, पैसा दुकानदार दें। क्यों? क्योंकि हमारे पास संगठित शक्ति है। हमारे पास ताकत है। बीस रुपए नहीं दोगे तो दो सौ रुपए का नुकसान कर देंगे, दो हज़ार की तोड़-फोड़़ कर देंगे, बीस हजार की बेइज्जती कर देंगे। अपना भला चाहते हो तो बीस रुपए दे दो। यह चंदा है? नहीं, यह डाका है जो हर साल चुनावों के समय मेडीकल कॉलेज के लड़के डालते हैं। मेडीकल कॉलेज में पढ़ने वाले लड़़के डाके डालें, गुंडागर्दी करें, यह मुझे स्वीकार्य नहीं था। किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं था।

हम चंदा नहीं लेंगे, ठीक है। लेकिन दूसरे लड़कों को कैसे रोकेंगे? हमारे अतिरिक्त, दूसरे पैनल बनाकर भी चुनाव लड़ रहे हैं लड़के। वे चंदा माँगने बाज़ारों में जरूर जाएँगे। धमकाएँगे भी और ज़रूरत पड़ी तो मारपीट, तोड़़-फोड़़ भी करेंगे। उसको डाका नहीं कहोगे तो क्या कहोगे? वह डाका भी मेडीकल कॉलेज के लड़के डालेंगे। उसे कैसे स्वीकार लोगे?

मानता हूँ कि इस साल मैं दूसरे लड़कों को चंदा लेने से नहीं रोक सकता। किंतु हम यदि चंदा माँगने नहीं जाते हैं तो एक टोली घटेगी। जो भार मेडीकल कॉलेज के चुनावों के कारण विपत्ति की तरह दुकानदारों के ऊपर टूटकर पड़ता है, उसमें कमी आएगी। इस साल इतना ही सही।

अगले साल चंदा माँगने के लिए लड़के जाएँ इससे पहले दुकानदारों के संगठनों से बातचीत करेंगे। चंदा लड़कों की शर्तों पर नहीं दुकानदारों की शर्तों पर दिया जाएगा भविष्य में। याचक और डाकू का फर्क मिटाने की लड़कों की मुहिम में दुकानदारों को शरीक नहीं होना है। याचक डाकू बनना चाहे तो उसका मुकाबला करना है। मेडीकल कॉलेज छात्रसंघ का महासचिव चुना जाता हूँ तो निश्चय करके कमर कसने के लिए जरूरी बल दुकानदारों को सरलता से मिल जाएगा। इसके बाद ज़रूरी हुआ तो सक्रिय रूप से लड़कों की डाकू प्रवृत्ति का सामना करेंगे। इस वर्ष इतना समय बाकी नहीं बचा है कि ठोस उपाय करके इस विकृति को रोका जा सके। लड़कों को चंदे के लिए निकलने से मना करें। वे यदि इनकार करते हैं तो जबरदस्ती रोकें लड़ाई-झगड़े करें। सीधा इलजाम लगेगा कि व्यापारियों से पैसा लेकर उनसे मिल गया है। चुनाव उसी पैसे से लड़़ा जा रहा है। दूसरे लड़कों को चंदा नहीं मिलेगा तो पैसे की कमी के कारण ढंग से चुनाव नहीं लड़ पाएंगे। इस तरह अपनी विजय सुनिश्चित करना चाहता है। अगले साल इस तरह का आरोप या तो कोई लगाएगा नहीं और यदि लगाएगा तो कोई विश्वास नहीं करेगा।

अपनी आवश्यकताएँ पूरी करने की दृष्टि से हम लोगों ने एक उपाय सोचा। मिट्‌टी के पाँच गुल्लक खरीदे। जन-संपर्क और प्रचार के लिए जो टोलियाँ हमने बनाईं, उनको एक-एक गुल्लक दे दिया। ये टोलियाँ जब जिससे मिलें, सारी बातचीत के बाद श्रद्धानुसार चुनाव के लिए दान देने का अनुरोध करें। कितना और इतना का आग्रह किसी से नहीं करना है। प्रतिदिन जो पैसा इकट्‌ठा होगा, शाम को एक लड़़के को सौंप दिया जाएगा। वही चुनाव के हर एक मद पर किए जाने वाले खर्च का हिसाब-किताब रखेगा।

दान देने की शुरुआत हम लोगों ने स्वयं की। हमारी कक्षा के प्रत्येक छात्र और छात्रा ने अपनी हैसियत के अनुसार अधिक-से-अधिक दान देने की चेष्टा की। अकेली हमारी कक्षा के दान का गुल्लक तोड़ा गया तो उसमें पाँच सौ से अधिक रुपए निकले। प्रथम वर्ष, द्वितीय वर्ष, चतुर्थ वर्ष, अंतिम वर्ष, स्नातकोत्तर छात्र, अध्यापक, किसी को भी हमने छोड़ा नहीं। सबसे अनुरोध किया। हँसी-खुशी के साथ देने और न देने वालों, कम और ज्यादा देने वालों, बहस करके और आसानी से देने वालों का आभार मानते हुए हम जनसंपर्क भी करते रहे और दान भी लेते रहे। इस तरह पैसा एकत्र करने से हमारी आवश्यकताओं की पूर्ति तो हुई ही, एक लाभ हमें और भी हुआ। यह संदेश मेडीकल कॉलेज से संबंधित प्रत्येक छात्र के पास पहुंचा कि चुनावों के लिए हम दुकानदारों जैसे असंबद्ध लोगों के पास नहीं जा रहे हैं। छात्र अपने संघ के चुनाव लड़ रहे हैं, इसलिए उसमें जो कुछ खर्च होता है उसे भी छात्र वहन करेंगे। अपनी, अपने माता-पिता की, अपने संरक्षक की जेब सुरक्षित रखकर दूसरों की जेब काटने का काम नहीं किया जा रहा है इस बार।

मेरे वश में यह बात थी नहीं अन्यथा मैं कहता, माता-पिता या संरक्षक का पैसा भी दान के रूप में चुनावों के लिए देने का कोई अधिकार नहीं है तुम्हें। कैंटीन में एक महीने तक समोसा मत खाना। उससे जो पैसा बचे, चुनाव फंड में दान में दो। यदि बस, रिक्शा या स्कूटर से कॉलेज आते हो तो एक महीना पैदल आओ। पैसा बचाकर इसके बाद दान दो। छात्रसंघ से तुम्हारा संबंध तभी आत्मीयता पूर्ण होगा जब तुम अपनी व्यक्तिगत ज़रूरतें कम करके छात्रसंघ के चुनावों के लिए पैसा दान में दोगे। घरवालों से माँगकर दान में दी हुई बड़ी रकम भी छात्रसंघ के प्रति मोह पैदा नहीं करेगी तुममें।

हर एक गुल्लक भर जाने पर पाँच-सात लड़कों की उपस्थिति में वह लड़का तोड़़ता जो चुनाव व्यय के लिए जिम्मेदार नियुक्त किया गया था। कितनी गुल्लकें भरीं और तोड़ी गईं, यह हिसाब वह लिखता जाता। जो खर्च पोस्टर बनवाने पर, बैनर बनवाने पर, पैंफलेट छपवाने पर या चुनाव संबंधी किसी भी कारण से किया जाता, उसे भी वह लिखता जाता। चुनाव से दो दिन पहले तक हम लोगों ने दान स्वीकार किया। और चुनाव से एक दिन पहले आखिरी बार हमने आय-व्यय का हिसाब छात्रसंघ के सूचना-पट्‌ट पर लगा दिया। आखिरी बार इसलिए क्योंकि उससे पहले हर दूसरे या तीसरे दिन अपनी सुविधा को ध्यान में रखते हुए हम लोग आय-व्यय का विवरण छात्रों की जानकारी के लिए सूचना-पट्‌ट पर लगवाते थे। इस तरह हम ईमानदार, अपनी ईमानदारी जग जाहिर करते थे। ईमानदारी का सच जब तक लोगों को मालूम नहीं हो जाता, ईमानदार का सच परदे में बना रहता है। मुझे लगता है, आदर्श को जब तक इस व्यावहारिकता से नहीं जोड़ा जाएगा तब तक आदर्श अस्वीकार्य महसूस होता रहेगा।

मैंने अपनी मंडली के सामने घोषित रूप से कहा था कि यदि मैं महासचिव का चुनाव जीतता हूं तो ऐसे काम हाथ में लेना चाहूँगा जो लीक से हटकर हाेंगे। वे काम मैं अकेला नहीं कर सकता। अकेला मैं उन्हें करना भी नहीं चाहूँगा। साथियों का सहयोग जब तक नहीं मिलेगा तब तक उन कार्यों को कर पाने की बात मैं सोचूँगा ही नहीं। मैं चाहूँगा कि समस्याओं को युक्ति और बातचीत से सुलझाया जाए। सिनेमा हॉल में फिल्म चालू होने के आधे घंटे के बाद मेडीकल कॉलेज के दस छात्र पहुँचते हैं। मैनेजर से कहते हैं, फिल्म रीवाइंड कराओ। हम यह फिल्म शुरू से देखना चाहते हैं। मैनेजर धर्म-संकट में है। बात स्वीकार करता है तो हॉल में बैठे हुए दर्शक कुरसियाँ तोड़़ते हैं और बात स्वीकार नहीं करता है तो मेडीकल कॉलेज के लड़के सिनेमा हॉल का नक्शा बदलते हैं। मैं चाहूँगा कि लड़के मर्यादा में रहें। ताकत के बूते पर ऐसा कुछ भी करने के लिए किसी को विवश न करें जो अनुचित है। अनुचित को सहन न करें और उचित का तिरस्कार न करें। बिना हिंसा किए स्वस्थ वातावरण बनाना मेरी पहली पसंद होगी।

हर साल पिकनिक होती है। खा-पीकर, मौज-मस्ती करके हम लौट आते हैं। हर साल सांस्कृतिक सप्ताह का आयोजन होता है। मेडीकल कॉलेज के लड़़के विभिन्न वाद्य बजाते हैं। शास्त्रीय और सुगम संगीत का ज्ञान रखते हैं। फिर भी गाने वाले छात्रों के साथ बजाने के लिए वाद्यमंडली बाहर से किराए पर आती है। हम क्यों नहीं अपने वाद्ययंत्र खरीदकर अपने कॉलेज के छात्रों को कॉलेज वाद्यमंडली बनाने के लिए प्रोत्साहित करते? एक साल हम पिकनिक नहीं मनाएँगे। उस साल के बाद हर साल वाद्यमंडली को दिया जाने वाला किराया बचेगा।

मैं ये काम करूंगा तो तूफान खड़़ा हो जाएगा। मैं तूफान से नहीं डरता लेकिन केवल तब, जब साथी मेरे इर्द-गिर्द होंगे।

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JaI Veer 3 महीना पहले

S Nagpal 3 महीना पहले

Bhagwan Atlani 3 महीना पहले

आदर्शों की व्यावहारिक प्रस्तुति!

Manjula 3 महीना पहले