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ठग लाइफ - 5

ठग लाइफ

प्रितपाल कौर

झटका पांच

इसके बाद क्या हुआ सविता को कुछ भी याद नहीं. सिर्फ देखने वाले बता सकते हैं कि उसने सर उठा कर देखा लेकिन आंसुओं से भरी उसकी आँखों को शायद कुछ दिखाई नहीं दिया. वह रोशनी में नहाए घबराए खरगोश की तरह खडी अकबकाई सी आंसुओं को रोकती, रुलाई के किनारे पर ठिठकी, टेढ़े हुए होटों से अपने सामने खड़े शख्स को देखती रही.

छह फूट ऊंचा बेहद दुबला पतला दबे हुए रंग का, नीली जीन्स और सफ़ेद टीशर्ट पहने वह शख्स भी उसे कुछ पल देखता रहा. जब उसे यकीन हो गया कि वह सविता ही है तो उसने आगे बढ़ कर हैरान परेशान सविता को कन्धों से पकड़ा तो वह मिट्टी के लौंदे की तरह उसकी बांहों में गिर पडी. उसकी छाती पर सर रख कर फफक-फफक कर रोने लगी.

बैंक में मौजूद लोग एक बारगी चौंक गए. सबने इस तरफ देखा और फिर नज़रें घुमा लीं. इन दोनों को एक दूसरे के साथ अकेला छोड़ दिया. उस शख्स ने सविता को कुछ देर रोने दिया. कुछ नहीं बोला. फिर उसके हाथ से पासबुक पकड़ी जो ढीली हो कर गिरने ही वाली थी. सविता का हैंडबैग भी कंधे से लटक कर पैरों तक सरक आया था. उसे भी उठाया. फिर एक हाथ से सविता के कंधे को लपेट कर सहारा देते हुए बाहर ले आया.

उसकी गाडी कुछ दूर खडी थी. उसने ड्राईवर को इशारा किया तो ड्राईवर गाडी को घुमा कर बैंक के पोर्च में लगाने के लिए आगे निकाल ले गया. जब तक गाडी आती तब तक सविता बदस्तूर रोती रही. लेकिन अब उसकी रोने में कुछ चैन भी था. जैसे रोता हुआ बच्चा माँ के आने पर तसल्ली से तो भर जाता है लेकिन फिर भी रह-रह कर सिसक उठता है. गाडी आयी तो पीछे की सीट पर सविता को बिठा कर दूसरी तरफ से वह भी गाडी में बैठ गया.

सविता तब तक कुछ संभल चुकी थी. उसकी रुलाई बंद हो गयी थी. उसका बैठा हुआ दिल कुछ आबाद हो गया था. सविता ने ज़िंदगी भर की अपनी हिम्मत, इरादे और अक्ल को इस्तेमाल कर के जो घर बनाया था. वो दरअसल उसकी सास का था इस बात का उसे पहले भी कई बार एहसास हुया था लेकिन परसों इस पर उसके अपने पति निहाल ने पुष्टि की मोहर लगा दी थी. उस घर से उसे बेईज्ज़त कर के निकाल दिया गया था. अब उसके सर पर छत नहीं थी.

ऐसे में यहाँ इस तरह बैंक में एक चेहरा यूँ इस तरह अचानक मिल जाना जो सविता को पहचान कर पुकार लगाए, कुदरत का एक करिश्मा ही लगा था सविता को. उसका भरोसा एक बार फिर किस्मत पर हो गया. डूबती हुयी सविता को एक जहाज़ मिल गया था. हालाँकि जानती थी कि यह सहारा दूर तक के लिए नहीं होगा. लेकिन इस वक़्त तो सविता की हालत उस भिखारी की तरह थी जिसे सिर्फ अगले वक़्त की रोटी की फ़िक्र होती है. वह मिल जाए तो वह तब तक कुछ नहीं सोचता जब तक कि पेट की आग फिर नहीं झुलसाती.

सविता भी यही कर रही थी. घोर बदकिस्मती को झेलती सविता को ख्वाब में भी उम्मीद नहीं थी कि इस तरह अचानक अरुण कपूर उसे मिल जायेगा. वो भी उस वक़्त जब उसकी आँखों के सामने घनघोर अँधेरा था. राह सुनसान थी और कोई रास्ता सुझाई नहीं दे रहा था. इस वक़्त अरुण की गाडी में बैठे हुए सविता महफूज़ महसूस कर रही थी. उसे लगा अब कोई न कोई रास्ता निकल ही आएगा. कोई न कोई बंदोबस्त हो ही जायेगा. सर छिपाने का और अपनी ज़िन्दगी को आगे चलाने का.

गाडी में जब दोनों बैठ गए तो अरुण ने ड्राईवर से कनौट प्लेस चलने को कहा. फिर वह सविता की तरफ मुखातिब हुआ, "पहले हम कही चल कर खाना खा लें?"

सविता ने हाँ में सर हिलाया. अरुण ने सविता के हाल और उसके गले लग कर रोने से ही समझ लिया था कि सविता किसी मुश्किल में है. ड्राईवर के सामने वह कोई बात नहीं करना चाहता था. इसलिए इतना कह देने के बाद वह चुप ही रहा. हालाँकि वाचाल सविता ने एक दो बार कोशिश की कुछ कहने की लेकिन मुसीबत की मारी सविता की जुबान भी आज सविता के बस में नहीं आयी. खामोश हो कर उसे मुंह में ही दबा कर बैठी रही.

अरुण जानता है कि सविता और मुश्कलों का चोली दमन का साथ हमेशा रहा है. अरुण सविता की हॉस्टल के ज़माने की दोस्त नंदिनी कपूर का बड़ा भाई है. कई बार हॉस्टल से सविता नंदिनी के साथ आती थी और उनके घर हफ़्तों रहती थी. सविता के परिवार की हालत के बारे में कपूर परिवार ही क्या सारा हॉस्टल और सारा कॉलेज जानता था. सब को सविता से सहानुभूति भी थी. लेकिन जल्दी ही ये सहानुभूति कम होने लगती थी जब सविता के व्यवहार से लोगों का साबका पड़ता था.

बचपन से ही उपेक्षा और बदसलूकी की शिकार हुयी सविता की आदतें जल्दी ही उन लोगों को झेलनी मुश्किल लगने लगती थीं जो शुरू में उससे सहानुभूति रखते. सविता असुरक्षा की भावना से बुरी तरह ग्रस्त थी. ऐसी भावना जो उस बच्चे में होनी स्वाभविक ही है जिसे बचपन से ही माँ-बाप का प्यार-दुलार न मिला हो, घर न मिला हो और माँ- बाप के जिंदा, स्वस्थ और संपन्न होते हुए भी बचपन रिश्तेदारों के घरों और होस्टेल में गुज़ारना पड़ा हो.

इसी असुरक्षा के चलते वह हर चीज़ की अति करती थी. बोलती तो चुप होने का नाम नहीं. खाना खाने बैठती तो खाती चली जाती, यहाँ तक कि घर के बच्चों या बूढ़ों के लिए बनी खास चीज़ों पर भी हाथ साफ़ कर देती. बच्चों से उनकी मनपसंद चीज़ें छीन कर खा लेती. बचपन में तो रिश्तदार इन बातों को नज़र अंदाज़ कर देते, इसे बच्चों का स्वाभाविक झगडा मान कर. लेकिन जब उसकी ये आदतें बड़े होने, किशोर होने तक भी बनी रहीं तो वे परेशान हो उठे.

यही वजह थी कि नानी के गुज़र जाने के बाद एक वक़्त ऐसा भी आया कि एक-एक कर के सभी रिश्तेदार उसे रखने से कतराने लगे थे. उसे हॉस्टल से जब छुट्टियाँ होती तो कोई रिश्तेदार उसे दस दिन से ज्यादा नहीं रख पाता. जल्दी ही उसे आगे रवाना कर दिया जाता. बिना उसकी मर्जी या इच्छा पूछे हुए.

सविता की ज़िन्दगी की डोर सविता की माँ ने अपने हाथ में लेने से इनकार कर के उसे दूसरों का मोहताज बना दिया था. ज़ाहिर है वे सब भी बेहद लापरवाही के साथ इस का निर्वाह करते थे. सविता घर के उस बुज़ुर्ग की तरह हो गयी थी जो बहुत बूढ़ा हो गया था और अब किसी को उसे रखने से कोई फायदा नहीं होता था सो सब एक दूसरे पर डाल देते थे. सविता तो बच्ची थी और जवान हो रही थी. ज़ाहिर है जवान लडकी की ज़िम्मेदारी लेने में सभी हिचकते थे.

इसी दौरान सविता को कई नए अनुभव भी हुये थे. उस वक़्त सविता की उम्र बारह साल की रही होगी जब वह गर्मी की छुट्टियों में मामी के घर हौज़ ख़ास आयी हुयी थी जो पहले उसकी नानी का घर था और जहाँ रह कर उसका बचपन बीता था. घर के चप्पे चप्पे से वह वाकिफ थी. मामी के छोटे बेटे से उसकी कुछ ख़ास पटती नहीं थी. वह उसे न तो अपने कमरे में आने देता ना ही उसके साथ कोई बातचीत करता.

अलबत्ता बड़ा बेटा सुवीर जो बारहवीं में था, सविता में काफी दिलचस्पी लेता, उसे अक्सर अपने कमरे में बुला लेता और तरह-तरह की बातें करता. उससे पूछता उसके दोस्तों के बारे में, उसके स्कूल के बारे में, उसके हॉस्टल के बारे में. कि वे लोग कैसे रहते हैं क्या करते हैं वगैरह. दोनों घंटों बैठे हँसते खिलखिलाते. लेकिन मामी को ये सब पसंद नहीं था.

कई बार मामी ने सख्त लहजे में सविता को टोका भी था. "निम्मी, तू लड़कों के कमरे में मत घुसी रहा कर. किचन में रामदेवी के साथ काम सीखा कर. हॉस्टल में तो ये सब नहीं सीख सकती ना."

लेकिन सविता अपनी आदत के मुताबिक मामी की बात एक कान से सुनती दूसरे से निकाल देती. मामा को सविता में कोई ख़ास दिलचस्पी नहीं थी. मामा निर्लिप्त रह कर घर का कारोबार देखते और जो दस- बारह दिन सविता उनके घर रहती एकाध दफा सविता से उसकी पढ़ाई आदि के बारे में औपचारिक पूछताछ कर लेते. इतने से ही उनकी ज़िम्मेदारी पूरी हो जाती.

अब सविता सोचती है तो लगता है मामा की इतनी तो ज़िम्मेदारी बनती ही थी कि वे अपनी छोटी बहन यानी सविता की माँ पर दबाव डाल कर उन्हें मजबूर करते कि वे अपनी बेटी का ख्याल रखें, उसे घर में बेटी का दर्जा मिले. वह भी घर में उसी तरह रहे जैसे उसका बड़ा भाई प्रतीक हक के साथ रहता था.

नानी जब तक जिंदा थी माँ साल में तीन बार सविता से मिलने आती ही थी, चाहे बेमन से ही सही. और स्कूल की छुट्टियों के दौरान आधे दिन सविता माँ-पापा के घर में रहती ही थी, चाहे उस दौरान माँ ने कभी प्यार से उसे गले न ही लगाया हो. लेकिन पापा कभी कभी उसे बाज़ार ले जाते, एकाध फिल्म भी दिखा देते.

मगर नानी के देहांत के बाद ये सिलसिला भी ख़त्म हो गया था. अब सविता छुटियों में भी सिर्फ एक ही हफ्ते के लिए घर रह पाती और जल्दी ही उसे दिल्ली या मेरठ भेज दिया जाता. दसवीं और ग्यारहवी के इम्तिहान के बाद तो वह हॉस्टल में ही छुटियाँ बिताने को मजबूर थी. माँ, पापा और भाई अमरीका बस गए थे. उस काण्ड के बाद मामा के यहाँ रहना भी संभव नहीं था.

वह घटना कभी भी सविता के ज़ेहन से पूरी तरह नहीं मिट पाई. दरअसल वह घटना तो सविता की ज़िंदगी का एक बेहद महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुयी.

उन दिनों वह मामी के यहाँ छुटियों के कुछ दिन काट रही थी. अगले दिन उसे मौसी के यहाँ भेजा जाना तय था. यहाँ सविता की उस बार आख़िरी शाम थी. वह कुछ उदास मन से लॉन में खडी थी जब सुवीर बाहर से आया और उसका हाथ पकड़ कर अपने साथ अपने कमरे में ले गया. कमरे में घुसते ही सुवीर ने दरवाज़ा बंद कर के कुंडी लगा ली थी और कस कर सविता को अपने आलिंगन में ले लिया.

सविता भी उदास थी. इस तरह सुवीर के गले लगाने से उसे बहुत राहत महसूस हुयी. नानी के जाने के बाद किसी ने भी उसे प्यार से सीने से नहीं लगाया था. आज सुवीर ने लगाया तो उसे भूला हुआ दुलार याद आ गया. उसे बहुत भला लगा और वह सोचने लगी कि सुवीर भी नानी की तरह उसे कितना चाहता है, उसके दुःख से सुवीर को दुःख होता है, आखिर है तो भाई ही, चाहे कजिन ही सही. वह भी सुवीर से कस कर चिपक गयी. दोनों इसी तरह आलिंगन में बंधे काफी देर खड़े रहे. सविता का ध्यान इस तरफ नहीं गया था कि सुवीर ने दरवाज़ा अंदर से बंद कर लिया था.

सविता अभी इस प्यार-दुलार से खुद को भिगो ही रही थे कि उसे अचानक अपने पेट पर किसी सख्त चीज़ का दबाव महसूस हुआ जैसे कोई सांप सर उठा कर डसने को तैयार होता है और सरकता हुआ शिकार की तलाश में लटपटाता है. वह कुछ समझ नहीं पायी. उसी तरह कस के सुवीर से लिपटी रही.

तभी उसने महसूस किया कि सुवीरं ने उसकी पीठ पर अपनी पकड़ ढीली कर दी है. वह भी आहिस्ता से बेमन से आलिंगन से आज़ाद हुयी लेकिन आज़ाद हो नहीं पायी. एक ही झटके में सुवीर ने उसकी स्कर्ट को ऊंचा उठा कर उसकी पैंटी में अपना दायाँ हाथ डाला और उसके गुप्तांगों को कुचल दिया. इसी पल में सुवीर ने दूसरा हाथ ऊपर उसकी छाती पर डाला और उस बच्ची के ज़रा ज़रा से उभरे हुए एक स्तन को इतनी जोर से मरोड़ा कि दर्द के मारे सविता बेतरह चीख पडी. सविता की चीख निकलनी थी कि सुवीर बुरी तरह घबरा गया.

सांप जो अभी तक सविता को लपेटे में लेने को तैयार था अगले ही पल अपने बिल में दुबक गया. सुवीरं ने अपने दोनों हाथों से सविता को आज़ाद किया. लपक कर दरवाज़े की कुंडी खोली और सविता को धक्का दे कर कमरे से बाहर फ़ेंक दिया. सविता लडखडा कर गिरते गिरते बची लेकिन उसकी दांयी बांह दीवार से बुरी तरह रगड़ खा गयी. कराहते हुए उसने एक और चीख मारी.

लेकिन जब तक वह संभलती और लपक कर सुवीर को दो चार हाथ जड़ती, सुवीर ने दरवाज़ा बंद कर लिया था. सविता ने उसका दरवाज़ा पीटना शुरू कर दिया. शोर शराबा सुन कर मामी वहां आयीं तो सविता को बदहवास सुवीर का दरवाज़ा पीटते, रोते और अस्पष्ट शब्दों में गालियाँ देते सुना तो भड़क उठीं.

"मरजानी, पीछा छोड़ मेरे बेटे का. तेरे जैसी फाहिशा लड़कियां ही होती हैं जो घर तबाह कर देती हैं. तुझे तभी तो तेरी माँ ने छोड़ रखा है. क्यूँ पीछे पडी है मेरे बेटे के. चल उधर, जा यहाँ से. मर जानी."

मामी ने गुस्से में लाल-पीली हुयी दरवाज़ा पीटती सविता को खींच कर अपने साथ ले जाते हुए दो थप्पड़ कस के जड़ दिए. सविता बौखला गयी. पहले बेटे के हाथ बेईज्ज़त हुयी, पिटी और अब उसकी माँ भी उसे ही दोषी ठहरा रही थी, पीट रही थी. उसने और भी जोर-जोर से रोना शुरू कर दिया था.

मामी ने उसे डपटा. फिर एक थप्पड़ और लगा दिया. "चुप कर बदजात. शुक्र है तेरे मामा घर पे नहीं हैं वर्ना काण्ड हो जाना था यहाँ पर. चुप कर बदजात. छोड़ मेरे बेटे को."

मामी घसीट कर उसे अपने कमरे में ले गयी. ले जा कर बिस्तर पर पटक दिया. सविता चिल्ला चिला कर रो रही थी. सुवीर दुबका रहा अपने कमरे में. और कोई भी उस वक़्त घर में नहीं था.

मामी ने दो तीन और थप्पड़ सविता को रसीद किये और और कहा,"क्या चाहती है छिनाल मेरे बेटे से? उस को क्यूँ बिगाड़ रही है."

अब सविता को समझ आया कि मामी क्या सोच रही है. उसे लगा कि सच बताएगी तो मामी की सहानुभूति उसे मिलेगी. वह रोते हुए बोली, "मामी मैंने कुछ नहीं किया. सुवीरं ने ज़बरदस्ती की मेरे साथ. मेरी छाती को मसला, मेरी पैंटी में हाथ डाला. वो तो मेरा भाई है. क्यूँ किया उसने ऐसा. आप मारो उसको. मुझे क्यूँ मार रहे हो?"

मामी का पारा सातवे असमान पर चढ़ गया. "हरामजादी, तू मेरे बेटे पर इलज़ाम लगाती है. सब जानती हूँ मैं तेरे जैसी लड़कियों को. साली तेरा भाई है वो. डोरे डालती है अपने भाई पर? तेरी जो आग है ना उसके लिए नहीं है मेरा बेटा. बदजात खबरदार अब कभी हमारे घर आयी तो. अब चुपचाप अपने कमरे में पडी रह. सुबह रवाना हो यहाँ से. तेरा मुंह नहीं देखूंगी आज के बाद."

सविता का तो मानो खून ही बहना बंद हो गया. उसका दिल एक बार जोर से धड़का ऐसे जैसे मुंह में से निकल कर बाहर गिर ही जाएगा. और फिर चुप हो गया. धडका ही नहीं. सांस रुक गयी. मुंह लाल हो गया. उसे लगा वह मर जायेगी. कुछ पल ऐसी ही बीते थे कि मामी ने उसे हाथ से घसीट कर उठाया और उसी तरह घसीटते हुए उसके कमरे की तरफ ले गयी.

सविता की सांस लौटी तो उसकी आवाज़ गुम हो गयी. अब उसे कुछ कुछ समझ आया कि उसकी गलती ये थी कि वो अपनी माँ की ऐसी बेटी थी जिसे माँ ने स्वीकार नहीं किया था. अब उसे समाज में कोई स्वीकार नहीं करेगा. उसे जो भी हासिल करना है अपने ही बूते पर करना होगा. अपने रूप, गोरी रंगत, अपनी चाल-ढाल, अपनी चालाकी, अपनी काबिलियत और अपने यौवन से.

रात भर वह अपमान के साथ साथ अपनी योनी में गड़े सुवीर के नाखूनों के दर्द को झेलती पडी रही, उसके वक्ष पर भी सुवीर के पंजो के निशान काले काले नील के रूप में चमक रहे थे. उसके अलावा बाजू पर दीवार से लगी खरोंच अलग टीस रही थी. मामी ने जो थप्पड़ और धौल उसकी पीठ पर बिना गिनती किये रसीद किये थे उनके घाव तो सीधे उसकी आत्मा पर लगे थे.

रोती रही थी सविता पूरी रात. सोती और जागती रही. दर्द और अपमान से रुलाई छूटती और थक कर नींद आ जाती. फिर वही दर्द नींद से जगा देता और टीस टीस उठता. वो रात बारह साल की मासूम और अकेली सविता के लिए क़यामत की रात थी.

सविता कभी समझ ही नहीं पायी कि उसे किस बात की सजा मिली थी. बहुत सोचने के बाद वो इस नतीजे पर पहुँची कि उसे लडकी होने और अपनी माँ के नक्षत्र में पैदा होने की सजा मिल रही थी. अलबत्ता इन दोनों अपराधों में उसका कोई योगदान नहीं था. वह न तो लडकी हो कर और ना ही अपनी माँ के नक्षत्र में पैदा होना चाहती थी. लेकिन अब जब ये सब हो ही गया था तो उसे ज़िंदगी को तो जीना ही था.

एक बात उस रात अकेलेपन और घोर अँधेरे में सविता को समझ आने लगी थी कि जिस जिस्म के चलते आज उसे ये शर्मिंदगी उठानी पडी है वही जिस्म उसे आगे का रास्ता भी दिखाएगा. बारह साल की कच्ची उम्र में ये बात साफ़ तो समझ नहीं आयी थी लेकिन इस समझ की नींव उसी दिन पडी थी सविता के मन में. एक और बात उस दिन सविता के मन में बस गयी थी कि उसे किसी से दया नहीं मिलेगी. उसे सब कुछ खुद के लिए लड़ कर या छीन कर ही हासिल करना होगा जैसे वह खाना हासिल करती है. अब उसे ज़िंदगी के लिए ज़रूरी दूसरी चीज़ें भी इसी तरह छीन कर हासिल करनी होंगी. इज्ज़त, दौलत, शोहरत, अपनापन, दोस्त और रिश्तेदार सभी.

उस रात मामी ने उसे कमरे में बाहर से बंद कर दिया था. खाना दे दिया था. सुबह भी नाश्ता देने के लिए दरवाज़ा ज़रा सा खोला था. जब मेरठ जाने का वक़्त हुआ और टैक्सी आ गई तो सीधे उसे उसके सामान के साथ ले कर मामी टैक्सी में बैठ गयी थी. हर बार उसे छोड़ने मामा जाते थे. इस बार मामी खुद गयी थी.

रास्ते भर कठोर तीखी नज़रों से मामी सविता को घूरती रही. सविता शर्म, गुस्से, लाचारी से हारी हुयी आँखें बंद किये बैठी रही. उसका दिल किया वह टैक्सी से कूद कर कहीं दूर भाग जाए लेकिन जानती थी भाग जाने के लिए भी और फिर कहीं पहुँच कर रहने के लिए भी पैसे और ठिकाने की ज़रुरत होती है. जो बारह साल की सविता के पास नहीं थे.

अपनी उम्र से ज्यादा समझ सविता को तब भी थी. वैसे देखा जाए तो घर से भाग जाने या निकाल दिए जाने, दोनों ही सूरतों में ढेरों ढेर पैसे की, हिम्मत और सहारे की ज़रुरत होती है. जो सविता के पास न बारह साल की उस कच्ची उम्र में थे और न ही आज, जब कि उसके बैंक में दो लाख तीस हज़ार रुपये हैं. वो जानती है इतने पैसे से ज़िंदगी का रास्ता दूर तक तय नहीं किया जा सकता.

वापिस आते वक़्त दांत पीसते हुए फुसफुसा कर मामी ने कहा था, "मेरे घर के दरवाजे तेरे लिए अब बंद हैं. कभी अपनी मनहूस सूरत मत दिखाना."

गुस्ताखी मामी के बेटे ने की थी सजा सविता को दी थी मामी ने. सविता का कसूर था कि वो लडकी थी. लेकिन मामी भी तो लडकी ही थी. सविता कई बार ये बात सोचती लेकिन उसे इसका जवाब नहीं समझ आता था. आज तक नहीं आया.

उसके बाद शादी ब्याह में मामी से कभी-कभार सामना हो जाता था तो लोक लाज के चलते औपचारिक बातचीत कर लेती थी. तभी एक बार आज भी सविता के मन में ख्याल आया था कि शायद वह कुछ दिन उनके घर रह सकेगी. लेकिन अगले ही पल पापा की बात और ये हादसा याद आ गया था.

उस हादसे के बाद भी कई हादसे सविता की ज़िंदगी में आये. बेघर लडकी लगभग सभी मर्दों को लुभाती थी. जो भी चाहता उसका फायदा उठाने की कोशिश करता. थोडा बहुत लालच, कुछ प्यार और लुभावने शब्द. सविता थोड़े में ही पसीज उठती.

पन्द्रह साल की उमर में रिश्ते के एक फूफा ने तो अमरीका भेजने के नाम पर उसका कौमार्य ही भंग कर डाला था. अपने से बीस साल बड़े इस मर्द के साथ पहली बार शारीरिक सम्बन्ध बनाते वक़्त सविता को सिर्फ दर्द होने का डर लगा था. उसके अलावा लोक-लाज, गर्भ का डर, पकडे जाने का भय, बुआ को पता चलने की शर्म कुछ भी उसके रास्ते में रूकावट नहीं बने थे. वह इन सारे झंझटों से आज़ाद हो चुकी थी मामी और उनके बेटे वाले हादसे के बाद.

उनके साथ सविता के सम्बन्ध कई हफ़्तों तक चले. इस दौरान सेक्स को लेकर उसके सारे भ्रम भी टूट गए. जो एक कोमल भावना मन में रहती थी वह सिरे से नदारद हो गयी. मर्द के जिस्म को लेकर जो तिलिस्म मन में था वो फूफा के बेढब जिस्म को पूरी तरह देख कर और भोग कर ख़त्म हो गया. एक मासूमियत जो अक्सर इस उम्र की लड़कियों में होती है, वह तो सविता के हिस्से में थी ही नहीं, इस सम्बन्ध ने सविता के अंतर्मन को और कठोर बना दिया.

जब कुछ दिनों में उसे पता लगा कि फूफा ने उसका इस्तेमाल करने के लिए झूठ बोला था तो दिल के एक कोने में जो थोड़ी बहुत कोमल भावनाएं छिपी हुयी थीं वे भी जल कर राख हो गयीं. समाज और रिश्तेदारों से उसका यह पहला मोह भंग नहीं था. लेकिन जिस्म की ताकत पर जो उसका भरोसा था वह भी सिरे से ख़ारिज हो गया था.

वह एक ऐसी ज़मीन पर आ खडी हुयी थी जहाँ पैरों के नीचे कुछ भी नहीं था. आसमान तो उसका कभी हुया ही नहीं था. पाताल की गहरायी नापने की उसकी ये शुरुआत बहुत छोटी उम्र में ही हो गयी थी. उस वक़्त सविता अधर में लटकी एक कठपुतली की तरह थी जिसे अपने अगले एक घंटें की भी खबर ना हो कि उसके साथ क्या होने वाला है. असुरक्षा की भावना उसमें चरम पर थी.

ज़िंदगी और खुद के हालात से बेतरह निराश सविता ने जब देखा कि अमरीका का वीसा दिलाने का फूफा का वादा नकली था तो सविता ने जम कर गाली-गलोज की, मार-पीट भी की और रिश्तेदारी में तमाशा भी खड़ा किया. सोलह साल की होने से पहले ही सविता ने शैतान बन कर बुआ का घर तोड़ कर ही दम लिया.

इस संबध और इसके बाद हुए हंगामे ने सविता की प्रतिष्ठा में चार चन्द लगा दिए थे. रिश्ते के लड़कों में उसकी खासी पूछ थी. हर कोई उसे पाने को ललचाया रहता. लड़कियां उसकी छाया से भी दूर भागती. अभिभावक इस कोशिश में रहते कि सविता का साया भी उनके बच्चों पर न पड़े.

इसके बाद कई मर्द उसकी ज़िंदगी में आये और गए. जो थोडा बहुत उनसे मिला उससे सविता की रोजाना की छोटी-मोटी ख्वाहिशें तो पूरी होतीं जो पापा द्वारा भेजे गए बंधे बंधाये रुपये नहीं कर पाते थे. लेकिन कोई मज़बूत सहारा सविता को हासिल नहीं हुआ.

कई घरों और हॉस्टल में बंटी हुयी ज़िंदगी काटती हवा में उडती सविता को एक ठोस सहारे और घर की शिद्दत से दरकार थी. उसी की तलाश में वह सम्बन्ध बनाती और जल्दी ही मोह भंग होने पर तोड़ भी देती. एक एक बाद एक. उसे ये समझाने वाला कोई नहीं था कि संबंधों की ठोस ज़मीन तैयार करने में मिट्टी, पानी, तूफ़ान, ज़लज़ले, शांति सभी की ज़रूरत होती है.

इसी तरह की उठापटक के बीच सविता ने बी. ए. कर लिया था. तभी निहाल सिंह उसकी ज़िन्दगी में आया था. सविता तब तक ज़िंदगी की काफी उंच-नीच समझ चुकी थी. उसने अपना नया दांव खेला. जल्दी ही गर्भवती हो गयी. इज्ज़तदार खानदान के ज़िम्मेदार निहाल ने अपना वादा पूरा किया और सविता को घर मिल गया.

लेकिन सविता जिस तरह की मिट्टी से बनी थी, जिन हालात से गुज़री थी और जिस तरह की असुरक्षा की भावना उसके अन्दर घर कर चुकी थी, वही उसकी सबसे बड़ी दुश्मन बनी. वह ससुराल के परिवार में अपनी जगह नहीं बना पायी और इसी के चलते एक दिन निहाल के दिल से भी उतर गयी.

अपनी समझ से सविता ने जो एक घर बसाया था वो भी उसके हाथों से एक ही झटके में छिन गया था. पति गया तो बच्ची भी हाथ से निकल गयी और अब अकेली सविता जवान और खूबसूरत सविता, दिल्ली की रंगीन ज़िंदगी में फिर से दाखिल हो रही थी. वो ज़िंदगी जो उसने किशोर होते वक़्त दूर से देखी थी लेकिन भोग नहीं पायी थी.

अब इस वक़्त अरुण की बगल में उसकी कार में बैठ कर दिल्ली के दिल की चिकनी सड़कों पर घुमते हुए उसे अचानक ख्याल आया कि अब वह उसी ज़िन्दगी को पास से देख कर जी सकती है. बशर्ते कोई मज़बूत सहारा उसे मिल जाए. उसे अरुण में अपना उद्धारक नज़र आ रहा था. नंदिनी उसके दिमाग या खयाल में कहीं नहीं थी.

नंदिनी जो कि अरुण की बहन थी और अरुण ने इसी वजह से सविता को बैंक में पहचाना था कि सविता नंदिनी की दोस्त थी. इस वक़्त सविता को सिर्फ और सिर्फ अरुण दिखाई दे रहा था. अरुण की निजी ज़िंदगी या और किसी भी बात से सविता को कोई वास्ता नहीं था. उसने मन में सोच लिया कि किसी भी तरह अरुण को अपने पक्ष में करना है ताकि आने वाले दिन सविता के लिए आसान हो जाएँ.

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