ठग लाइफ - 2 Pritpal Kaur द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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ठग लाइफ - 2

ठग लाइफ

प्रितपाल कौर

झटका दो

रेचल ने देखा है कई बार औरतें ग़लत आदमी का चुनाव कर लेती हैं और फिर ज़िन्दगी भर अपमान के घूँट पीती हुयी मरती रहती हैं तिल-तिल कर के. लेकिन यहाँ तो माजरा ही कुछ और है. सविता के लिए रमणीक एक टिकेट है बेहतर ज़िन्दगी का. उस ज़िन्दगी का जो एक जगह ठहर गयी है. मर्द के न होने से. आर्थिंक आधार पर भी और शारीरिक ज़रूरतों के मद्देनज़र भी. उसे रमणीक में अपना उद्धारक नज़र आता है.

जबकि रेखा के लिए रमणीक सामाजिक सम्मान का एक मज़बूत स्तम्भ है. जिसे वह किसी भी सूरत में हाथ से नहीं निकलने दे सकती. उसके अलावा पारिवारिक दबाव भी होते हैं. मर्द, औरत सभी पर. परिवार की इकाई को बनाये रखने के. सामाजिक दायित्वों को निभाते चले जाने के. फिर चाहे उनके मन उसमें लगें न लगें. वैसे ज़्यादातर स्त्री पुरुष दोनों ही इस तरह की ज़िंदगी को मज़े मज़े में निभा ले जाते हैं, खुशी-खुशी. और जीवन के संध्या काल में अपनी सफल ज़िंदगी की मिसाल युवा जोड़ों को देते हैं.

रेचल ने सोचा तो लगा रमणीक और रेखा भी अक्सर अपने सुखी दाम्पत्य की मिसाल देते होंगें अपने आस-पास के लोगों को. खुद सविता ही अक्सर रमणीक के घर होने वाली पार्टियों की चर्चा करती है. ज़ाहिर है सविता उन पार्टियों में नहीं होती. तो ज़ाहिर है उसे इनके बारे में रमणीक ही बताता है.

सविता जब भी रमणीक का नाम लेती है. अपनी ऑंखें अजीब तरीके से गोल कर लेती है और होंठ सेल्फी मोड में आ जाते हैं. रेचल को उसकी ये सारी बातें बड़ी रोचक लगती हैं. उसे लगता है जैसे वह कोई कहानी की किताब पढ़ रही हो. सो जब सविता बोलती है तो रेचल सिर्फ और सिर्फ सुनती है.

अभी सविता चुप है. उसके साथ खासा बड़ा हादसा हुआ है. उसे तसल्ली चाहिए. उसने अपने आंसू पोंछे और रेचल से पूछा, "रेचल क्या सचमुच ये औरत मुझे मरवा सकती है? यार, मेरा तो कोई ऐसा सीन भी नहीं है रमणीक के साथ. तुम तो मुझे जानती हो. मैं क्यूँ किसी के पति को फसाऊंगी?"

रेचल के पास इन सवालों का कोई तसल्ली-बक्श जवाब नहीं था. वह चुप रही. अलबत्ता कुछ दिन पहले की एक शाम उसे याद आ गयी थी. सविता तैयार हो कर आयी थी रेचल के घर, ये बताने के लिए कि वह साउथ दिल्ली के मशहूर डिस्को 'घुंघरू' जा रही है दोस्तों के साथ और अगले दिन शाम तक वापिस आयेगी.

रेचल उस वक़्त अपना एक असाइनमेंट पूरा करने में व्यस्त थी. शाम की दस बजे की डेडलाइन उसे क्लाइंट ने दे रखी थी. वह तल्लीनता से सविता की बात नहीं सुन सकी. लेकिन सविता थी कि लगातार बोले चली जा रही थी.

"मैं कितने दिनों के बाद जा रही हूँ घुंघरू. वी आर गोइंग टू हैव रियल फन. रमणीक और उसके तीन दोस्त आ रहे हैं. बाद में हम उसके दोस्त के गेस्ट हाउस में रुकेंगें. एंड यू नो, आई ऍम गोइंग टू हैव माय लिटिल फ्लिंग. अब मैंने सोच लिया है किसी के साथ ज्यादा नहीं जुड़ना है. बस फ्लिंग तक ठीक है. मैंने अपनी ब्लैक नाईटी भी रख ली है. सी! "

और सविता ने अपने शोल्डर बैग से निकाल कर ब्लैक नाईटी दिखाई थी. काफी खूबसूरत लौन्जरी थी. देख कर रेचल ने सोचा था वह भी एक खरीदेगी किसी दिन. फ्लिंग के लिए या फिर इश्क के लिए. सोचा जाएगा. जो हो जाए.

फिर सविता कुछ देर बैठी रही थी ये बताते हुए कि किस तरह रमणीक ने उसका बहुत ख्याल रखना शुरू कर दिया है. कि रमणीक ही एक ऐसा मर्द है जो सविता को और उसकी ज़रूरतों को समझता है. कि सविता ने कॉलेज के ज़माने में उसे लिफ्ट न दे कर बहुत बड़ी गलती की है. कि रमणीक कॉलेज के टाइम से ही उस पर मरता था. कि रमणीक उसकी ज़िंदगी में होता तो आज सविता कितनी बेहतर स्थिति में होती. वगैरह वगैरह.

ऐसी ही बातों के दौरान एक बार पहले भी रेचल ने सवाल किया था सविता से कि रमणीक का रुतबा और पैसा, जिसका ज़िक्र सविता अक्सर करती है, उसकी बीवी रेखा के बड़े बाप की बेटी होने की वजह से है. तो सविता के साथ होने से रमणीक क्या उस स्थिति में होता जिसमें आज वो है?

इस पर सविता गोल-मोल बात बनाने लगती कि रमणीक के पिता भी बड़े अफसर रहे हैं. उसके पिता और सविता के पिता बहुत अच्छे दोस्त भी थे. और अब भी रमणीक सविता के पिता का बहुत आदर करता है. वगैरह, वगैरह.

रेचल को सविता की कई बातें समझ नहीं आतीं. वह उनमे तारतम्य नहीं पाती. अक्सर सविता एक दिन एक बात कहती और दूसरे ही दिन उसके उलट कोई और बात कहती और दोनों ही बार उसका दावा होता कि वह सच बोल रही है. रेचल चाहे तो फलां फलां से उसकी तस्दीक करवा सकती है.

रेचल हंस कर टाल जाती. लेकिन एक बात तो थी. रेचल को सविता का साथ पसंद था. सविता के रहते उसे ताज़ा मनोरंजन की कमी महसूस नहीं होती थी. रेचल ने इसी साल गोवा से यहाँ शिफ्ट किया था, उसके पिता के देहांत के बाद उसकी माँ ने गुडगाँव के एक प्राइवेट कॉलेज में प्रिंसिपल का पद संभाला था. इस वजह से रेचल के स्कूल कॉलेज के सभी दोस्त गोवा में छूट गए थे सो अकेलेपन की दवा बन कर जब से सविता उसकी ज़िन्दगी में आयी थी रेचल की शामें अच्छी गुजरने लगी थीं.

एक और बात रेचल को बहुत मज़ेदार लगती थी सविता की. वह अक्सर हफ्ते में एक या कभी कभी दो बार रेचल को बातों बातों में बाहर खाने के लिए राजी कर लेती थी. हालाँकि शुरुआत बिल को डच किये जाने पर होती थी लेकिन बिल जब आता तो अक्सर सविता या तो रेस्ट रूम में होती या फिर वह पर्स में वॉलेट रखना भूल गयी होती.

अफ़सोस करती और बार-बार कहती कि घर जाते ही पैसे दे देगी. लेकिन सविता का वादा कभी पूरा नहीं हुआ. रेचल खुले दिल की लड़की थी. फिर भी दो-तीन बार के बाद उसे खासा बुरा लगा. उसने सोच भी लिया कि सविता से कन्नी काट लेनी है क्यूंकि सविता उसे यूज़ कर रही है. लेकिन फिर सोचने पर उसने पाया कि वह तो सविता को अपना साथ देने की फीस अदा कर रही है. इस विचार के आते ही उसके दिल से इस बात को लेकर रंज जाता रहा.

वैसे पांच छ: दफा के बाद एक बार जिद कर के सविता पूरा बिल अदा भी करती. तब रेचल सोचती कि शायद सविता की आर्थिक स्थिति वाकई काफी खराब है और अपने महंगे शौक वह खुद पूरे नहीं कर पाती, इसलिए रेचल का सहारा लेती है. सो उसे सविता पर दया आने लगती.

सविता उम्र के उस पड़ाव पर थी जहाँ वह नया कोई काम नहीं सीख सकती थी. उसके मिजाज़ में मेहनत थी ही नहीं. उसे बैठे-ठाले कुछ भी न करते हुए ऐश से रहने की आदत थी. उसका गुज़ारा जैसे-तैसे चल जाता था. ये रेचल देख सकती थी. कुछ पैसे उसके पिता भेजते थे. कुछ प्रॉपर्टी उसने बना रखी थी. कैसे? ये रेचल अब तक नहीं जान पायी थी. कुछ वह लोगों को टोपियाँ पहना कर बना लेती थी. ये भी रेचल देख चुकी थी.

गूगल के सहारे लोगों के होरोस्कोप बनाती और भविष्यफल देख कर उन्हें उपाय बताती. टैरो कार्ड करती. योग सीखती सुबह पार्क में जा कर फ्री क्लास में और शाम को उसी योगा को कुछ लोगों को उनके घर जा कर सिखाती. किसी की शौपिंग कर देती तो उसमें से अपने लिए कुछ ले लेती.

सविता की रोज़मर्रा की ज़िंदगी भी रेचल को किसी रहस्य से कम नहीं लगती थी. तीन-तीन दिन पहले की रखी हुयी रोटियाँ खा लेती. लेकिन साथ ही मीठे की शौक़ीन अक्सर हलवाई की दूकान से कोई न कोई मिठाई ज़रूर ला कर फ्रिज में रखती. सविता के विरोधाभासों से भरे जीवन को देख कर कई बार रेचल अचंभित भी होती.

रेचल को सविता एक मुक्कमिल औरत लगती. ज़िन्दगी को भरपूर जीती हुयी औरत, जिसकी ज़िन्दगी पर किस्मत ने कई पैन्बंद लगा रखे थे और वह उन्हीं पैबन्दों को ढकती छिपाती मन भर कर खाती और जी भर कर जीती.

रमणीक के साथ सविता का सम्बन्ध या सविता के अपने ही लफ़्ज़ों में 'फ्लिंग' ऐसी ही भरपूर ज़िंदगी को आधे-अधूरे तरीके से जीने की एक धोखे भरी कोशिश थी. और अब इस धोखे को रमणीक की पत्नी ने उसके ड्राईवर रोशन लाल के ज़रिये पकड़ लिया था तो रमणीक तो ज़ाहिर है चुप हो कर घर बैठ गया था. लेकिन सविता की शामत आ गयी थी.

आज रेचल और सविता गुडगाँव के ही एक महंगे रेस्तरां में लंच कर रही थी. मौका था रेचल की नयी नौकरी का. वैसे इनकी दोस्ती हुए चार-पांच महीने ही हुए हैं. दोनों एक ही सोसाइटी के एक ही टावर में ऊपर नीचे के फ्लैट्स में रहती हैं. सो लिफ्ट में आते-जाते जान-पहचान हो गयी और फिर जल्दी ही रेचल के घर सविता का आना-जाना काफी बढ़ गया.

रेचल फ्रीलान्स काम करती है घर से ही. वह ग्राफ़िक डिज़ाइनर है. उसकी माँ हेलेना बिस्वास एक कॉलेज में प्रिंसिपल हैं सो वे बहुत बिजी रहती हैं. पिता का दो साल पहले कैंसर से देहांत हो गया था. इस वजह से भी हेलेना खुद को व्यस्त रखती हैं ताकि अकेलेपन के एहसास से जितना हो सके बच सके.

सो बची छबीस साल जल्दी ही पूरे करने वाली रेचल. वह ग्रेजुएशन के बाद ग्राफ़िक डिजाईन में डिप्लोमा कर के नौकरी की तलाश में फ्रीलान्स काम कर के जेब खर्च कमा रही है साथ ही टाइम का सदुपयोग कर रही है. नौकरी का इंतजार इस हफ्ते ख़त्म हो गया था. उसे एक मल्टीनेशनल कंपनी में जूनियर डिज़ाइनर की नौकरी मिल गयी है. अगले हफ्ते पहली तारीख से वह ऑफिस जाने लगेगी.

सविता पचास के ऊपर है. लेकिन अपने रख-रखाव से चालीस के आस-पास लगती है. कपडे बेहद चुस्त, अक्सर मिनी स्कर्ट या शॉट्स, या टाइट जीन्स जिनके ऊपर अक्सर क्रॉप टॉप्स या टीशर्ट होते हैं. बालों में कई रंगों के स्ट्रीक्स होते हैं. सविता अपने बारे में बहुत सी बातें तफसील से बता चुकी है रेचल को. शुरू से लेकर आज तक.

बीस की उम्र में घरवालों को बताये बगैर विजातीय लड़के से शादी की. शादी चली नहीं. पति एक दिन चुपचाप जर्मनी के लिए उड़ान भर गया, जो फिर नहीं लौटा और वहीं से किसी तरह सविता को तलाक भी दे दिया. यह मामला अदालत में चल रहा है. सविता ने तलाक को चुनौती दी है और गुज़ारे भत्ते की मांग की है. साथ ही पति की गिरफ्तारी की दरख्वास्त भी लगा रखी है.

उसका मानना है कि एक दिन भारत सरकार उसके पति निहाल सिंह को जर्मनी से उठा कर भारत लायेगी और सविता की ज़िन्दगी बर्बाद करने की सज़ा देगी. वैसे उसकी एक बेटी जसमीत भी है जो पिता के साथ जर्मनी में ही रहती है और अपनी पढ़ाई पूरी कर रही है. पति के चले जाने के बाद सविता बेटी को उसके दादा-दादी के पास छोड़ आयी थी. वहीं से उसका पिता उसे बचपन में ही जर्मनी ले गया था. सविता के साथ बेटी या बेटी के पिता की कोई बोल-चाल नहीं है.

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