मन कस्तूरी रे - 3 Anju Sharma द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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मन कस्तूरी रे - 3

मन कस्तूरी रे

(3)

इन दिनों एक कोर्स के सिलसिले में स्वस्ति को कुछ किताबों के लिए रोज मंडी हाउस जाना पड़ रहा था! उस लगता है, वहां से लौटते हुए मेट्रो से अधिक सुविधाजनक कोई और वाहन हो ही नहीं सकता! मंडी हाउस से चली मेट्रो जब राजीव चौक पर रुकी तो स्वस्ति मेट्रो से उतर गई। यहाँ से दूसरी मेट्रो लेनी है स्वस्ति को। ओह माय गॉड!!! राजीव चौक मेट्रो स्टेशन पर कितनी भीड़ थी आज। वही रोज का हाल है। हमेशा की तरह पूरा मेट्रो स्टेशन भरा पड़ा है। जहाँ देखो लोग ही लोग.... देखो तो तिल रखने की भी जगह नहीं। कितनी भीड़ और बेशुमार भीड़। मानो सारा संसार इस मेट्रो स्टेशन में समाने को तैयार है।

उसका दिल घबराता है इस भीड़ से पर क्या करे आदत डालनी पड़ती है। रोज का आना जाना है इस रूट पर। भीड़ कम हो तो आगे बढे स्वस्ति। आज भी दो मेट्रो मिस करनी पड़ी स्वस्ति को पर भीड़ अब भी उतनी ही थी। विशाल मानव समुद्र का रेला था स्टेशन पर। जिस और नज़र घुमाओ लोग ही लोग! और सबको कहीं न कहीं पहुँचने की जल्दी है, कोई कहीं ठहरना ही नहीं चाहता, वह सोच रही थी! मानो सबको आज इसी मेट्रो में जाना है। ये तो गनीमत थी कि इस तीसरी मेट्रो में वह लाइन में सबसे पहले खड़ी थी तो मेट्रो आते ही लपककर सवार हो गई।

मेट्रो में भी यही हाल था! वहां भी कम रश नहीं था। कुछ देर बाद एक सीट खाली हुई तो उसने चैन की साँस ली। बैग को संभाला। कुछ देर बाद मेट्रो के कोच की वातानुकूलता से वह सहज हो पायी! भीड़ से ऊबा उसका मन अब शांत होने लगा था! ये लेडिज कोच था! स्वस्ति ने गौर किया लगभग साथ प्रतिशत महिलाएं मोबाइल में व्यस्त थीं! जो युवा या युवतर थीं उनके कानों में इअरफोन लगे थे! पूरे कोच में बस एक लड़की किताब थामे हुए शब्दों में खोयी थी! उस एक लड़की को देखकर स्वस्ति को गहरी आश्वस्ति हुई! उसका मन हुआ वह भी बैग से किताब निकाल ले! अमूमन वह भी यही तो करती थी! मेट्रो के समय का इससे बेहतर सदुपयोग तो हो ही नहीं सकता! पर एकाएक उसका ध्यान मोबाइल के नोटिफिकेशन पर ध्यान गया। उसने नोटिफिकेशन का साउंड तो म्यूट किया हुआ था तो पता ही नही चला कब आया। ये रोशेल का मेसेज था। मेसेज में कभी शब्द वेस्ट नहीं करती ये लड़की। हमेशा की तरह संक्षिप्त और टू द पॉइंट मेसेज। बाकि खाएगी न मेरे कान अपनी बकबक से जब मिलेगी। रोशेल के ख्याल से मुस्कुरा दी स्वस्ति!

शाम को आ रही हूँ मेरी जान....इस वीकेंड ऋत्विक आउट ऑफ़ स्टेशन है तो बस मैं और तुम... फ्री रहना।

रोशेल, उसके कॉलेज के दिनों से उसकी दोस्त थी। सबसे करीबी दोस्त रोशेल। उसके मात्र दो दोस्तों में ये दूसरी थी जो उसके सारे नाज़-नखरों यानि ट्रेंट्रम्स के बावजूद उसकी दोस्ती को निभाए हुए थे। उसके अपने शब्दों में वह इन दोनों के लिए झेलेबलबनी हुई थी तो दोस्ती भी अभी तक कायम थी। वरना तो वह और उसके मूड्स!!! स्वस्ति का दोस्त होना बहुत चेलेंजिंग है भई, बहुत मुश्किल है स्वस्ति से दोस्ती निभाना। ऐसा वह खुद नहीं उसके दोनों दोस्त बोलते हैं। क्या भरोसा उसके मूड का। जाने कब उसका मूड बदले और उसे अपने पसंदीदा, प्यारे एकांत की बाँहों में रहने का मन हो आये। ऐसी ही तो है स्वस्ति। पल में तोला पल में माशा। नहीं बोलेगी तो घंटो बस अपने में डूबी रहेगी। मन हुआ तो दिन भर किताबों में सर झुकाए खोये रहेगी। ऐसे में न उसे दीन से मतलब न दुनिया से। अब ऐसी बोरिंग लड़की भी क्या किसी की दोस्त होती है।

पर दोस्त भी हैं और दोस्ती भी है और बाकायदा निभ भी रही है। बमुश्किल पांच फुट की ठिगने कद और गोल कद काठी की रोशेल जो शायद ही कभी इर्द-गिर्द देखती थी। एक वक्त स्वस्ति ही की तरह जाने किस सोच में डूबी रहती थी ये लड़की, सब यही कहते थे। पर सब दिन एक से कहाँ होते हैं और ये जो यौवन है न, यह दबे पाँव वसन्त की तरह जिन्दगी में आ जाता है। मन का मौसम बदल जाता है। तमन्नाएँ जाग उठती हैं। दिल के द्वार पर लगे ताले खुल जाते हैं। कामनाएं अंगड़ाई लेने लगती हैं। पोर-पोर इस मौसम के रंग में रंग जाता है। कुछ ऐसे ही रोशेल के जीवन में हुआ था। इधर जीवन में प्रेम की एंट्री हुई और उधर रोशेल सर से पांव तक खिल गई। चुप्पी की चादर कहीं दूर छूट गई है, खूब बतियाती है इन दिनों रोशेल। उसी की तरह किताबों में डूबी रहने वाली रोशेल अब उसी की तरह इन दिनों प्रेम में थी।

कैसा सुखद अहसास था न कि दोनों के जीवन में लगभग एक समय पर ही प्यार ने दस्तक दी। एक सी उम्र, एक समय पर प्रेम और एक साथ ही प्रेमिल अहसास। लेकिन इस प्रेम में बड़ा फर्क है। बंद कली सी खुल गई है रोशेल। उसके पास प्रेमी के सान्निध्य के अनेक किस्से हैं। कुछ महीनों बाद ही दोनों लिव इन में रहने लगे थे। जीवन खुले फूल की मानिंद खिल उठा। अब कुछ दबा ढका नहीं। कोई परदा नहीं है। प्रेम और प्रेमी रोशेल के मनपसन्द विषय रहे हैं। वह इन्ही विषयों पर घंटो बतियाती है! इधर उसके मनपसंद विषयों में सेक्स भी एंट्री हुई है। जब से उसकी दोस्ती ऋत्विक से हुई है उसे अपने लडकी होने का अहसास होना शुरू हुआ है। स्वस्ति से कोई परदा नहीं! वह दिल खोलकर रख देती है स्वस्ति के सामने।

प्रेम में डूबी रोशेल के लिए प्रेम निरा अहसास नहीं है, प्रेम देह भी है, प्रेम कामना है, प्रेम इच्छा है और इच्छा की प्राप्ति भी है। किसी भी नौजवान जोड़े की तरह इस प्रेम में बंदिशें नहीं, रास्ते हैं। दूरियां नहीं, बेइंतिहा नजदीकियां हैं, साथ बिताएं लम्हे हैं जो कब बिस्तर तक पहुँच जाते हैं इसकी चिंता न रोशेल को है और न ही ऋत्विक को है। वे दोनों आज के जमाने के प्रेमी हैं। नए जमाने से कदम से कदम मिलाकर चलने वाले प्रेमी। दोनों एक दूसरे के साथ क्वालिटी टाइम बिताते हैं और प्रेम को भरपूर जीते हैं। उनके प्रेम का खुलापन शब्दों के जरिये अक्सर किस्सों में स्वस्ति तक पहुँचता रहता है जब भी रोशेल उससे मिलती है।

रोशेल कुछ भी नहीं छुपाती और स्वस्ति को रोशेल का हर अनुभव अलग तरह से छूता है, कभी डराता है तो कभी खीज और चिंता से भर देता है। पर ये भी सच है कि रोशेल के ये गरमागरम किस्से बहुत से अहसास भी जगाते हैं स्वस्ति के दिल में। तब स्वस्ति के दिल में एक इच्छा जाग उठती है, उसके मन में भी कुछ कुछ होता है। देह में एक औरत अंगड़ाइयाँ लेने लगती है, अरमानों को इस एक लम्हे में जैसे पंख लग जाते हैं। वही रोशेल आज कई दिनों बाद आ रही है स्वस्ति के घर। बेशक खूब पकाएगी वह स्वस्ति को अपनी सो-काल्ड बेडरूम स्टोरीजसे, तो भी ये सोचकर राहत मिली स्वस्ति को कि चाहे कुछ देर को ही सही पर उसके एकांत में सेंध लगाने कोई उसके जैसा होगा उसके पास।

जब वो मुझे चूमता है न स्वस्ति, यहाँ चेहरे पर, गर्दन पर. और....हर जगह....तो उसकी बाँहों में ही मर जाने को जी चाहता है। उसका प्यार, प्यार नहीं जादू है जो मुझे अपनी गिरफ्त में लेकर मेरे मैं को तबाह कर देता है। मैं जैसे मैं नहीं रहती। और उसके प्यार करने का तरीका बिल्कुल अलग है, बिल्कुल अनोखा। उसे पाकर लगता है स्वस्ति, उसके बाद जैसे कोई ख्वाहिश बाकी बची ही नहीं। ये सब बोलते हुई रोशेल के चेहरे पर संतुष्टि से भरा यह विचित्र भाव स्वस्ति के मन में अजीब सी खलिश जगाता है। वह भी ऑंखें बंद कर कल्पना करना चाहती है। शेखर और उसके उन्मुक्त प्रेम की कल्पना। किसी भी रोक टोक से परे, किसी उलझन से परे, अबाधित और निरंतर उन्मुक्त प्रेम। ओह, आँखे खोल दीं स्वस्ति ने। शायद वह खुद से ही शर्मा गई थी।

कभी-कभी इस उन्मुक्तता से डर जाती है, घबरा जाती है स्वस्ति। क्या यह ठीक है रोशेल के लिए। उससे रोशेल की चिंता होने लगती है। पर रोशेल को कोई चिंता नहीं। क्या प्रेम में लोग इस कदर बदल जाते हैं। जूलिएट, सोहणी, हीर, लैला सबने प्रेम के वश प्रेम में हर जोखिम उठाया तो क्या इतने साहस से भर देता है प्रेम? शायद हाँ.... स्वस्ति खुद भी तो एक बेमेल रिश्ते में बंधे रहने का जोखिम उठा ही रही है न!

ओह ...कम ऑन....प्रीकाशन ले रही हूँ डिअर। डोंट वरी....प्रेग्नेंट नहीं होना है मुझे। आई ऍम अवेयर ऑफ़ इट.....एंड आई नो हाउ टू हैंडल इट। बट आई वांट टू एन्जॉय माय लाइफ एंड हिज लव.... ओह आई ऍम हैप्पी आई ऍम इन लव!!! उसके चिंता जताने पर लापरवाही से हँसते हुए, एक आंख दबाकर बोली थी रोशेल तो स्तब्ध रह गई थी स्वस्ति। ये शुरुआती दिनों की बात है। आजकल स्वस्ति स्तब्ध रह जाने से उबर चुकी है। जानती है कि रोशेल को समझाने का कोई फायदा नहीं। रोशेल में आये इन परिवर्तनों को स्वीकार करना सीख लिया है स्वस्ति ने। शायद ज़माने के साथ ताल से ताल मिलाकर चलना इसी को कहते हैं। और स्वस्ति? वह तो शायद कहीं बहुत पीछे छूट गई है। कितना पीछे ठीक से नहीं मालूम। शायद बीस साल पीछे। हद है न, ये बीस का आंकड़ा उसका पीछा क्यों नहीं छोड़ता।

पीईंईईईईईईई ....

एकाएक डोरबेल की आवाज़ ने स्वस्ति का ध्यान भंग कर दिया। लौट आई है अपने ख्यालों की दुनिया से स्वस्ति। उसका अनुमान गलत नहीं था! दरवाजे के उस ओर प्रेम की नई मदमस्त और इरोटिक कहानियां लिए उसकी प्यारी दोस्त रोशेल ही थी।

शाम हो गई है और अब रात का गहराता अँधेरा शाम को बाँहों में लिए धीरे-धीरे उसे चूम रहा है। और उसके प्रेम में बांवरी शाम भी अपने महबूब अँधेरे के आगोश में कहीं गुम हो रही है। एक नन्हा सा तारा आसमान टिमटिमाने लगा है! थोड़ी देर में उसका अनुसरण कर तारों की बारात आकाश के आंगन को रोशन कर देगी! हवा की सरगोशियाँ धीरे धीरे बढ़ने लगी थी! स्वस्ति ने धीमी आवाज़ में एक गज़ल लगा दी जो आहिस्ता आहिस्ता माहौल में घुलकर उसे खुशनुमा बना रही थी!

दोनों मिलते ही कुछ इस तरह शुरू हुई कि जैसे परीक्षार्थी जल्दी जल्दी अपने सब सवालों हो हल करने की जुगत में जुट जाता है, बिना एक पल भी जाया किये!

तो बताओ रोशेल क्या खाना पसंद करोगी डिनर में?” माँ ने जब किचन से पूछा तो दोनों की बातचीत में थोड़ा व्यवधान आ गया।

नहीं, कुछ नहीं माँ हम लोग आज पिज्ज़ा आर्डर करने वाले हैं और हाँ, आपके लिए एक प्लेट रेड सॉस पास्ता भी। कुछ और लेंगी आप?

नहीं, बेटा आज मेरा खाने का बिल्कुल मन नहीं। लंच भी बहुत देर से किया था! तुम लोग जो चाहे मंगा लो। मेरी जरूरत हो तो बुला लेना। मैं जा रही हूँ अपने कमरे में...गुड नाईट। माँ ने किचन की लाइट बंद करते हुए कहा और अपने कमरे में चली गईं।

आज शनिवार की रात है। रोशेल आज रात स्वस्ति के पास रुकेगी। कल रविवार साथ बिताकर वह दोपहर बाद या शाम को अपने रूम पर लौट जाएगी जहाँ वह और ऋत्विक लिव इन में रहते हैं। जब वे लोग साथ पढ़ती थीं तब भी कभी-कभी एक दूसरे के साथ रात या वीकेंड बिताती थीं और अब तो ये काफी दिन से नहीं हुआ। रोशेल का परिवार गोवा में रहता है। वह छुट्टियों में ही जा पाती है अपने घर। इस शहर में स्वस्ति का घर उसका दूसरा घर है। ऋत्विक से मिलने से पहले से उसकी एक आंटी और स्वस्ति ही उसके अपने थे इस शहर में।

आज दोनों ने अपनी पसंद का खाना ऑनलाइन आर्डर किया और माँ को आज खाने से छुट्टी दे दी। बात दरअसल ये थी कि खाना बनाने में टाइम वेस्ट करने से बेहतर उन्हें लगता था एक दूसरे के साथ क्वालिटी टाइम स्पेंड करना जो कब से ड्यू था और जिसके लिए दोनों ही सहेलियाँ बहुत उत्साहित थीं।

डिलीवरी बॉय पिज़्ज़ा लेकर आ गया था। दोनों ने बतियाते हुए खाना खाया और कॉफ़ी लेकर बिस्तर में आ बैठीं। कितना कुछ था एक दूसरे के पास बताने को। दो जवान लड़कियां अगर प्रेम में हों तो उनके पास सुनाने को अनंत किस्से होते हैं और बताने को ढेर सी बातें। स्वस्ति को जब भी शेखर के बारे में बात करनी होती है वह केवल रोशेल से ही कर पाती है। शेखर को लेकर वह न तो कार्तिक के साथ सहज हो पाती है और न ही माँ के साथ। इन दोनों के अतिरिक्त वह किससे अपने मन की बात करे वह नहीं जानती। फोन पर इतना सहज नहीं रह पाती इसलिए उसे इस शाम का इंतज़ार कई दिनों से था। वह तो कब से प्रतीक्षा कर रही थी कि रोशेल उसे मिले। आज वह जब मिली तो रात भर बातों के दौर चले।

उन्होंने तुम्हे छुआ कभी? आई मीन क्या अब तक.....?” रोशेल से सवाल पर सकपका गई थी स्वस्ति।

तुम भी न रोशेल!! इस अप्रत्याशित सवाल पर लजा गई थी स्वस्ति! उसे जवाब देते नहीं बना! पर ये सवाल उसके जेहन में खलबली मचाने में पूरी तरह कामयाब रहा!

छुअन?? शेखर के स्पर्श के कई अदृश्य निशान है उसके हाथों पर उसके माथे पर और उसके मन पर भी लेकिन वह जानती है जिस “स्पर्श भरे” किस्से की उम्मीद रोशेल की आँखों में है उसे आज भी निराश ही होना पड़ेगा। शेखर और स्वस्ति के बीच के स्नेहिल रिश्ते में प्रेम है, स्नेह है, सम्मान भी है पर वह रिश्ता देह के रास्ते पर उन क़दमों कभी चला ही नहीं जिसे आज के प्रेमी लव मेकिंग कहते हैं। स्नेह और प्रेम में भरकर जब भी कभी शेखर उसे बाँहों में भरते हैं थरथरा जाती है स्वस्ति की देह। उसने स्नेहिल, कोमल स्पर्श में बिल्कुल वैसा ही अहसास है जैसे कोई पंखों से उसे छूकर गुज़र जाये। वहां उत्तेजना या दैहिक आवेग की उपस्थिति बिल्कुल नहीं है यह जानती है स्वस्ति। वह भी जब उनसे लिपटकर उनके कंधे पर अपना सिर रखती है तो वे हौले से थपथपा देते हैं उसका गाल।

अभी पिछले ही महीने की बात है, वह उस दिन कॉलेज के बाद शेखर के घर गई थी। बड़ा ही सुंदर और सुरुचिपूर्ण घर है शेखर का। एकदम स्वस्ति की पसंद का घर! उनका साफ़ सुथरा घर जहाँ किसी स्त्री की उपस्थिति का कोई चिन्ह न होते हुए भी एक खास तरह की सौम्यता का वास है! उनका बड़ा सा स्टडीरूम और उनकी शानदार लाइब्रेरी आनेवाले व्यक्ति को अपने प्रभाव में ले लेते हैं पर स्वस्ति के लिये वे महज शेखर सरतो नहीं। वह उनसे प्रभावित भी है उनके व्यक्तित्व की दीवानी भी है पर वह उनके प्रेम में है! उनके साथ एकांत के उन लम्हों में उनके करीब बैठी उनके हाथों से खेलती, उनके कांधे पर सिर रखे म्यूजिक सुनती स्वस्ति के लिए ‘लौटना’ मुश्किल था! पर सच तो ये था कि उसे लौटना था!

बिना कुछ हासिल किये लौटने जैसा था यह सफर! फिर वह इस सफर पर कब तक अकेले चली जा सकती थी। जानती है वह उस सफर पर वह अकेली थी, शेखर तो जैसे आगे बढ़े ही नहीं। छूट गये थे कहीं किसी मोड़ पर पीछे। स्वस्ति को लौटना ही पड़ा वरना आज उसके पास भी रोशेल को सुनाने के लिए एक किस्सा जरूर होता।

खैर दोनों ने उस रात जीभर बातें कीं! चाँद अपना सफर करता रहा और उनकी बाते थीं कि खत्म ही होने पर नहीं आती थीं! प्रेमी, प्रेम, सेक्स, कपड़े और फैशन के अतिरिक्त दोनों ने किताबों पर भी जीभर बातें कीं! ये बातें खत्म नहीं होती पर रात तो अपने सफर पर मुसलसल चलती रहती है और उसे चलते रहना होता है ताकि सुबह आ सके। तो उस दिन भी यही हुआ और दोनों सहेलियाँ मीठी नींद के आगोश में खोकर सो गयीं।

क्रमशः