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संवेदना

मध्यमवर्गीय परिवार के रितुराज संगीत सीखने के दिवाने थे , आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण विधिवत संगीत सीखने से वंचित रह गए । आवाज उनकी खुली-साफ थी क्योंकि उनके पिता अच्छे गवैय्या थे, यह आवाज़ उन्हे उनके पिता से मिली थी । एक टैलेंट हंट प्रतियोगिता में अपने इतने से ज्ञान से इंट्री ज़रूर पा गए थे किंतु दूसरे ही राउंड में एक से एक सिद्धहस्त गायकों के आगे टिक न सके और दौड़ से बाहर हो गए । उस दिन फिल्मी दुनिया के सह्रदय सुपरस्टार श्याम भी कार्यक्रम में मौजूद थे । रितुराज प्रतियोगिता से बाहर होने की ख़बर पाकर स्टेज पर ही फूट-फूटकर रोने लगे। अभिनेता श्याम यह देखकर बहुत द्रवित हो गए और स्टेज पर पहुँचकर उसे ढाँढस बँधाने लगे " यह कोई आखिरी प्रतियोगिता नहीं है, मन लगाकर रियाज़ करो तुम ज़रूर सफ़ल होगे । श्याम के यह शब्द रितुराज के लिए बहुत बड़ा सहारा थे , किंतु अपनी मजबूरी और हालात मे यह संभव नही बताने पर अभिनेता श्याम ने बस इतना ही कहा, कि " ठीक है जब कभी मेरी ज़रूरत पड़े तुम मेरे पास आना , मैं कुछ न कुछ तुम्हारे लिए ज़रूर करूँगा "।

हारे हुए रितुराज के घर लौटते ही स्वागत तो दूर उल्टे पिता ने उन्हे लापरवाह , गैरजिम्मेदार और न जाने क्या-क्या सुनाया, " चार पैसे कमाओ तो घर के खर्च में मेरा हाथ बँटाओ ! गाने बजाने से रोटी नही चलती "। रोज-रोज के इन्ही तानों से तंग आकर रितुराज ने अपना मन मारकर प्राईवेट नौकरी कर ली । कुछ ही समय में शादी के बंधन में बंधने के बाद तो इस इच्छा की इति ही हो गई । जल्दी ही तीन बच्चों के बाप बन गए । तीन बच्चों में लड़की सबसे बड़ी थी : गंभीर, कुशाग्र बुद्धि , पढ़ाई में अव्वल और बेहतरीन आवाज़ की धनी । कहावत है न कि ' माँ पर पूत पिता पर छोरी, नाय बहुत तो थोड़िन-थोरी ' यही असर उसपर था । महंगाई से परेशान , तीन बच्चों की पढ़ाई का खर्च, घर-खर्च आदि चलाना अब मुश्किल होता जा रहा था । पिता की असमय मृत्यु के बाद भाइयों का भी किनारा कर लेने से बची-खुची उम्मीद भी खत्म हो चुकी थी । पत्नी के बार-बार बाहर जाकर कमाई करने की ज़िद के कारण आखिर एक दिन मन बना ही लिया । महिने भर के घर खर्च का इंतज़ाम उधार लेकर किया और चल पड़े मुंबई। एक मात्र उम्मीद अभिनेता श्याम से थी , लेकिन सशंकित भी थे कि अब पहचाने न पहचाने क्या मालूम? यह सोचकर ट्रेन मे बैठे कि एक महिने तक ही वहाँ रहूँगा, यदि काम न बना तो घर वापस आ जाऊँगा । मुंबई में एक मित्र का पता पास में था , जो किसी दुकान पर नौकरी करता था, सोचा उससे मिलकर काम ढूंढने जाऊँगा ।

आखिरकार मुंबई पहुंच गए पर दोस्त का पता ढूंढने मे नाकाम रहे , वह रात पार्क में लेटकर गुज़ारी । अगले दिन दोस्त का पता ठिकाना तो मिल गया पर वह दूर था , लेकिन यह ज़रूर पता चल गया कि अभिनेता श्याम का बंगला आसपास ही है । अभिनेता श्याम के बंगले पर पहुँचे तो गार्ड ने बताया साहब शाम तक आते हैं , तब आकर मिल लेना । रितुराज ने अपना नाम-पता , मिलने का कारण कागज पर लिखने के बाद उससे काफ़ी अनुनय विनय की तो बड़ी मुश्किल से वह राज़ी हुआ । इस दौरान रितुराज ने गार्ड को खुश रखने के लिए क्या-क्या नहीं किया, उसे जूस लाकर पिलाया, चाय लाया, मसाला-तंबाकू भी दिया और पूरे दिन आसपास ही फटकता रहा । आखिरकार शाम के समय गार्ड ने इशारे से उसे बताया कि साहब आने वाले हैं, इशारे में ही रितुराज ने पर्ची देने का आग्रह किया, गार्ड द्वारा मुस्करा कर "हाँ" करने पर उसे कुछ तसल्ली हुई ।

अभिनेता श्याम आज भी निर्माता-निर्देशकों की पहली पसंद बने हुए थे, पंद्रह-बीस वर्षों से लगातार सफलता का स्वाद चख रहे इस अभिनेता का अभिनय के अलावा एक उम्दा इंसान के रूप में फिल्म इंडस्ट्री में बड़ा नाम था । जाने-अनजाने किसी भी व्यक्ति की हरसंभव मदद करने में इनका कोई सानी नहीं था । आखिरकार गेट खुला और चहल-पहल तेज़ हो गई, सभी सुरक्षा कर्मी मुश्तैद हो गए , एक काली कार ने अंदर प्रवेश किया । गार्ड कृष्णा दौड़कर कार के दरवाज़े पर पहुँचा धीरे से कार का गेट खोला, अभिनेता श्याम ने बाहर निकलकर कृष्णा से हाल-चाल पूछा , जो उनकी हमेशा की आदत थी । कृष्णा ने "हाँ" में सर हिलाकर कुछ कहा और साथ-साथ चलते हुए अपनी जेब से एक पर्ची निकालकर उनके हाथ में थमा दी और वापस आकर फिर गेट पर बैठ गया । बाहर के लोगों को यह सब साफ-साफ दिख रहा था, रितुराज ने नज़र मिलते ही गार्ड से आँखों ही आँखों में कुछ पूछा , कृष्णा ने भी इशारे से ही "हाँ" में जवाब दिया तो उसे चैन मिला ।

एक घंटा बीत जाने के बाद रितुराज पर निराशा छाने लगी , उसे अपने दोस्त के घर लौटना भी था वरना वह आज रुकता कहाँ ? कल रात भी उसे पार्क में कई बार पुलिसवालों की डाँट सुननी पड़ी थी, बड़ी मुश्किल से रात कटी थी । भीड़ छँट चुकी थी , अचानक कृष्णा की आवाज़ और इशारे से बुलाने पर उसका ध्यान टूटा । दौड़कर पास पहुँचा तो कृष्णा ने गेट खोलकर अंदर बुला लिया और साहब से मिलवाने चल पड़ा । इतनी सी दूरी तय करने में उसके मन में हज़ारों अच्छे-बुरे ख्याल आते-जाते रहे और इसी दरम्यान वह कृष्णा के सवालों का जवाब भी देता रहा । सामने श्याम को बैठा देखकर उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि किस्मत इतनी जल्दी उस पर मेहरबान हो जाएगी । श्याम द्वारा बैठने के लिए कहने पर उसने उनके पैर छुए और सामने बैठकर अपना सारा हाल सुनाया । श्याम ने उसे अपने पास नौकरी करने और नये खुले स्टूडियो की देख-रेख का जिम्मा सौंपा तो उसने सहर्ष स्वीकार कर लिया । इतनी बात के अलावा कोई और बात नहीं हुई । हाँ, गार्ड से अपने रहने, खाने का इंतज़ाम देख लेने को ज़रूर कहा श्याम ने और वह अंदर चले गए । कृष्णा के पास खुशी से पहुँचते ही सबसे पहले उसने पाँव छुए और गले लगकर उसे बहुत-बहुत धन्यवाद दिया ।

रितुराज ने दिल लगाकर मेहनत और ईमानदारी से काम करना शुरू कर दिया । खुशी के मारे वह फूला न समा रहा था और जल्द से जल्द अपने परिवार को यह खुशखबरी सुना देना चाहता था । कृष्णा ने एक दिन उसकी बात उसके घरवालों से करा ही दी । कई तरह की पाबंदियों का निर्वाह उसे करना था, इसलिए वह अपने परिवारवालों को वहाँ नहीं बुला सकता था। एक माह काम करने के बाद श्याम ने सबको तनख्वाह बाँटने के बाद दस हज़ार घर भेजने और पाँच हज़ार अपने पास रखने के लिए रितुराज को दिए और कहा "यह कम नहीं हैं, आगे से और बढ़ाकर मिलेंगे "। रितुराज के लिए यह रकम उम्मीद से ज़्यादा थी क्योंकि छोटी जगहों पर खर्चे भी सीमित ही रहते हैं । वैसे तो जितना ज़्यादा हो कम ही रहता है ।

सालों बीत गए काम करते । साल में एक बार एक हफ़्ते के लिए गाँव जाने का मौका मिलता था रितुराज को । बच्चे पढ़ रहे थे, घर-खर्च आराम से चल रहा था , बड़ी बेटी संगीत सीख रही थी, अपने पापा का अधूरा सपना पूरा करने के लिए । स्टूडियो के काम-काज भी सीख गया था, श्याम के प्रोडक्शन में बनी फ़िल्मों में सहायक के तौर पर उसका भी नाम होता था । इतनी खुशियाँ उसे श्याम के कारण ही मिलीं थीं इसलिए वह कहीं भी श्याम का नुकसान नहीं होने देता था । उसकी इसी ईमानदारी का श्याम भी कायल था और लगभग सारी जिम्मेदारी उसी पर डाल दी थी। काम की अधिकता के कारण अब रितुराज भी गाँव नहीं जा पाता था । फ़ोन पर बात करके ही हालचाल जान लेता था । इधर दो-तीन वर्षों से तो वह सिर्फ मैसेज और पैैैसे भेजकर ही उनके संपर्क था ।

श्वेता ने हाईस्कूल की परीक्षा बहुत अच्छे नम्बरों से पास कर ली थी । संगीत के कार्यक्रमों , प्रतियोगिताओं में भी हिस्सा लेती रहती थी । पाँच-छह साल का रियाज़ ख़ूब काम आ रहा था । एक बड़े मंच पर उसे अपना टैलेंट दिखाने का मौका भी मिल गया । उस कार्यक्रम को फिल्मी दुनिया के प्रसिद्ध संगीतकार और गायकों का एक पैनल जज कर रहा था, यह कार्यक्रम संगीत के साथ-साथ उसके प्रतियोगियों को उनकी किसी इच्छा की पूर्ति भी करवाने के लिए प्रसिद्ध था । बड़े ही नाटकीय अंदाज़ में किसी प्रतियोगी की इच्छा पूछते थे और उसके बताने के दौरान ही स्टेज के पीछे से वह कार्य संभव करा देते थे, अचानक अपने सामने अपनी विश को मौजूद देखकर अथवा पाकर प्रतियोगी की खुशी से ज़्यादा जजों के पैनल को खुशी मिलती थी । श्वेता भी एक-एक राउंड पारकर आगे बढ़ रही थी । अगले राउंड में श्वेता के प्रदर्शन को आग लगा देने वाला परफ़ार्मेंस बताकर जजों ने उससे भी उसकी विश पूछी । श्वेता ने बताया कि, " आज मैं इस स्टेज पर हूँ तो अपने माता-पिता की वजह से , लेकिन मैं अपने पापा से पाँच वर्षों से नहीं मिलीं , वह मुंबई में अभिनेता श्याम के पास काम करते हैं । हर महीने खर्चा भी भेजते रहते हैं, इधर पाँच साल से गाँव नहीं आए । वह खुद गायक बनना चाहते थे पर आर्थिक तंगी के कारण आगे न बढ़ सके । उन्होंने मुझे ज़रूर संगीत की शिक्षा दिलवाई जिस कारण मैं यहाँ तक पहुँची, यदि वह मुझे सुनने यहाँ आते तो मैं शायद ज़्यादा खुश होतीं । मेरी माँ ने इस सफ़र में मेरा पूरा साथ दिया है, पर पापा का साथ तो सोने पर सुहागे जैसा है "। " सोने पर सुहागा ही होगा ", अभिनेता श्याम की चिर-परिचित आवाज़ स्टेज के पीछे से आई तो दर्शकों, प्रतियोगियों के साथ-साथ जजों को भी घोर आश्चर्य हुआ, क्योंकि अक्सर प्रतियोगियों को बताये बिना ही वह उनके परिवार वालों को स्टेज पर पीछे से प्रगट करवाकर उन्हे सरप्राइज गिफ़्ट देते थे । आज तो जज खुद सरप्राइज थे, उन्हे यह सब पहले से मालूम नहीं था । श्वेता के सिर पर हाथ फेरकर श्याम ने उसे आशिर्वाद दिया, और उसकी माँ को स्टेज पर बुलाया । श्वेता ने उनके पाँव छुए और माँ को ऊपर आने का इशारा किया । श्वेता के साथ-साथ उसकी माँ एवं जजों, प्रतियोगियों, दर्शकों, सभी को यह क्या हो रहा है , समझ नहीं आ रहा था । श्याम ने माइक लेकर बोलना शुरू किया, " भाइयों, इसके पिता रितुराज मेरे ही पास काम करते थे । पूरी ईमानदारी और लगन से उन्होंने मेरा प्रोडक्शन संभाला, मैं उनका बहुत-बहुत आभारी हूँ ।" श्वेता और उसकी माँ को श्याम का " करते थे, संभाला हुआ था, आभारी हूँ " कहना सशंकित कर रहा था । किसी अनहोनी की आशंका ने उनके दिलों में घर कर लिया था । श्याम ने बताया, " दो वर्ष पूर्व वह हमको छोड़कर चला गया । एक दिन वह काम करते समय बेहोश हो गया था, हमने उसका बहुत इलाज करवाया फिर भी डॉक्टर उसे बचा नहीं सके क्योंकि उसे काफ़ी पुरानी ब्रेन ट्यूमर की बीमारी थी । वह जाने से पहले अपने परिवार को यह खबर न देने का आग्रह एवं कसम लेकर गया। उसने कहा था उसकी कच्ची गृहस्थी है, सब यह खबर सुनकर टूट जायेंगे , बिखर जायेंगे । जब तक वह मज़बूत न हो जाऐं, उनको यह बात मत बताना । काम का बहाना बनाकर मैसेज देकर भ्रम में रखे रहा । मैं हर माह बढ़ाकर खर्चा भेजता हूँ और समय-समय पर मैसेज भी करता रहता हूँ । " श्याम रोये जा रहे थे, साथ-साथ श्वेता और उसकी माँ के आँसू तो थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे । पूरा हाॅल सिसकियों से गूँज रहा था, जज भी अपने आँसुओं को रोक नहीं पा रहे थे । " कल कार्यक्रम के प्रस्तुतकर्ता द्वारा रितुराज को भेजने के आग्रह पर मैं खुद परेशान हो गया , परंतु उसकी बेटी का नाम सुनकर मैंने यहाँ प्रस्तुत होने का निर्णय लिया । सच्चाई बताने के लिए यह स्थान उचित नहीं था, पर यह बताने के लिए इससे अच्छा स्टेज भी कोई नहीं था कि श्वेता मेरी अगली फिल्म के सारे गाने अब गाने वाली है, जो अगले माह फ्लोर पर जा रही है । इसी तरह शायद मैं अपने ईमानदार, मेहनती रितुराज को श्रद्धांजलि दे सकूँ "। रोंगटे खड़े कर देने वाले इस दृश्य को देखकर दर्शकों के साथ-साथ जज भी स्टेज पर चढ़ आए, अश्रु मिश्रित खुशी सभी की आँखों में थी । हर बार जज प्रतियोगियों को बिना बताये उन्हे सरप्राइज देते थे, इस बार चैनल वालों ने श्याम को बुलाकर जजों को सरप्राइज दे दिया था । श्याम अपने साथ रितुराज पर एक डाक्यूमेंट्री फिल्म बनाकर भी लाये थे, जिसमें उनका काम के प्रति लगाव, ईमानदारी और मेहनत को दर्शाया गया था । वह फिल्म भी उस दिन चलाई गई । श्वेता और उसकी माँ की आँखों में आँसू थे, लेकिन यह रितुराज के प्रति सम्मान और उसके समर्पण के आँसू थे, अभिनेता श्याम की इंसानियत के प्रति प्रतिबद्धता के आँसू थे । श्याम के पैरों को छूने वाले हाथ शायद महात्मा गांधी के पैरों को छूने हाथों से बाद दूसरे नंबर पर थे ।

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