पहला प्यार

पहला प्यार

 

नैना से मेरी मुलाकात उन दिनों हुई जब मैं नवभारत टाइम्स में नौकरी करता था। मैं रोज बहादुर गढ़ से शिवाजी पार्क ट्रेन से जाया करता था उसी ट्रेन में नैना भी जाया करती थी। वह मेरे डिब्बे में बैठा करती। हमेशा कानों में लीड लगाए या फिर कुछ पढ़ते हुए। वह मुझे पहली ही नजर में भा गई। जिस दिन वह नहीं आती मैं बेचैन हो जाता मेरी आँखें उसे ही ढूँढ़ा करती। मेरी बहुत लड़कियाँ दोस्त थी पर मुझे किसी से बात करने में कभी डर नहीं लगा जितना डर नैना से बात करने में लगता था। इस बात को लगभग छह महीने बीत गए मैंने नैना से कोई बात नहीं की। वह तिलक ब्रिज उतरा करती एक दिन हिम्मत करके मैं शाम को तिलक ब्रिज चला गया और जहाँ पर वह ट्रेन का वेट कर रही थी। मैं भी वही जाकर बैठ गया। मैंने उससे पूछा आप नैना हो न तो वह कुछ न बोली, मैंने कहा आपका नाम कुछ और है क्या, आपका नाम जो कुछ भी हो आप मुझे बहुत अच्छी लगती हो। मेरी बात सुनकर वह बहुत गुस्सा हुई व कहने लगी हाँ मेरा नाम नैना पर मुझे आपसे बात करने में कोई दिलचस्पी नहीं है अगली बार मेेरा रास्ता रोका तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा। तभी ट्रेन आ गई और वह उसमें चढ़ गई। अगले दिन ने वह मुझे उस डिब्बे नजर नहीं आई लगभग एक हफ्ते तक वह मुझे मेरे डिब्बे में नजर नहीं आई तो एक दिन मैं सुबह ही तिलक ब्रिज चला गया मैंने देखा कि वह लेडिज डिब्बे से उतर रही है उसके साथ मेरी बचपन की दोस्त नेहा भी है तो मुझे बहुत खुशी हुई। अगले दिन संडे था मैं नेहा के घर पहुँचा मुझे अचानक वहाँ देखकर नेहा वेफ मम्मी-पापा बहुत खुश हुए मैंने उन्हें नमस्ते किया और उन्होंने मुझे गले से लगा लिया। बोले, क्षितिज तुम इतने दिनों बाद आए आज कैसे याद आ गई हमारी। मैंने कहा नहीं ऐसी कोई बात नहीं मैं तो आपको हमेशा ही याद करता हूँ। आज मन किया आप लोगों से मिलने का तो आ गया। तभी किसी ने पीछे से आकर मेरी आँखें बंद की तो मैं झट से बोल पड़ा नेहा की बच्ची तू अभी भी नहीं बदली। तो वह कहने लगी नेहा तेरे लिए कभी नहीं बदलेगी आखिर हम बचपन के दोस्त जो ठहरे तू ये आज तुझे अचानक मेरी याद कैसे आ गई, कोई काम होगा तुझे या कहीं फँस रहा होगा बच्चू। चल बोल जल्दी से उसकी बात सुनकर मैं बोला तू मुझे कितना समझती है, बचपन से ही तू मेरी मदद करती है तू सच में मेरी बेस्ट फ्रैंड है मुझे इस तरह बोलता देख वह कहने लगी चल-चल मक्खन मत लगा काम बोल तभी अंकल-आँटी कहने लगे तुम दोनों बातें करो हम बाजार से होकर आते हैं। बचपन में जब कोई बात बताते हुए मुझे डर लगता तो मैं नेहा का हाथ पकड़कर उसे अपने मन की बात कहता मैंने उसका हाथ पकड़ लिया बोला आई एम इन लव नेहा। तो वह मेरी बात सुनकर हैरान हो गई पूछने लगी कौन है वह लड़की मैंने कहा उसका नाम नैना है, तू भी उसे जानती है अच्छा नैना श्रीवास्तव तो तुझे वह पसंद है। देख क्षितिज वो ऐसी-वैसी लड़की नहीं है बहुत अच्छी है। अगर तूने उसे हर्ट करने की कोशिश की तो मैं भूल जाऊँगी कि तू मेरा दोस्त है। अरे नेहा मैं सच कह रहा हूँ मैं उससे बहुत प्यार करता हूँ। मुझे उसके बारे में सब पता है यह भी पता कि एक बार उसकी सगाई टूट गई है। वह लड़कों से नफरत करती है। मेरी बात सुनकर नेहा बोली, ‘‘क्या बात है बेटा तूने तो उसकी कुंडली ही निकाल ली।’’ चल तू चिंता मत कर मैं कोशिश करती हूँ। अच्छा तुझसे इक बात कहनी थी एक लड़का मुझे बहुत परेशान करता है, मैं तुझे फोन करने वाली थी। पता नहीं उसे किसने मेरा नंबर दे दिया वह मुझे कैसे-कैसे मसैज करता है। मैंने नेहा के मैसेज पढ़े तो मेरे गुस्से का ठिकाना न रहा, मेरा मन कर रहा था कि उस लड़के का सर फोड़ दूँ। मैंने तुरंत नेहा के मोबाइल से नं. लिया उसी समय उसे फोन किया तो वह कहने लगा नेहा तेरी लुगाई है के, मैंने कहा मेरी बहन है समझा तू आगे से तूने मेरी बहन को परेशान किया तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा। मेरी बात सुनकर नेहा मेरे गले लग गई और बच्चों की तरह रोने लगी मैंने उसके सर पर हाथ रखकर कहा, ‘‘नेहा तू मेरी दोस्त होने के साथ-साथ मेरी बहन भी है।’’ मुझे चैन कहा था मैं उसी दिन शाम को उसी लड़के के घर पहुँचा और मैंने उस लड़के के बाप से कहा अगर मेरी बहन को इसने कुछछ कहा तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा।
उस दिन नेहा का जन्मदिन था उसने मुझे कनाट प्लेस बुलाया नैना भी उसके साथ थी उसे देखकर मेरी आँखों में चमक आ गई मैंने नेहा को विश किया तो कहने लगी मेरा गिफ्ट कहाँ है मैंने कहा घर जाकर दे दूँगा। तू हमेशा ऐसे ही करता है- क्षितिज। तू मुझे कुछ नहीं देगा। अब मैं बच्ची नहीं हूँ समझा। नैना हम दोनों को यूँ लड़ता देख हँस पड़ी। तो नेहा बोली, कम-से-कम तू हँसी तो। चल तुझे मिलाती हूँ नैना यह है मेरे बचपन का दोस्त क्षितिज, क्षितिज यह है मेरी सहेली नैना। पता है नैना क्षितिज के बाद एक तू मेरी दोस्त बनी है। तो नैना कहने लगी तुम लोग बहुत अच्छे दोस्त हो। इस पर नेहा झट से बोली पड़ी दो नहीं तीन समझी। उस दिन के बाद नैना से अकसर मुलाकात हो जाया करता। नेैना अब खुश रहने लगी थी। वह लैकचरर बनना चाहती थी पर उसके घरवाले जल्द-से-जल्द से उसकी शादी कर देना चाहते थे।
अब नेहा और नैना मेरे ही डिब्बे में बैठ जाया करते थे हम तीनों ट्रेन में बातें करते हुए जाया करते थे। नैना की झिझक भी अब थोड़ी कम हो गई थी। वह मुझसे अब बहुत बातें करती थी। नैना के साथ एक साल कैसे बीत गया पता ही नहीं चला इस बीच मैंने बहुत बार नैना को प्रपोज करने की कोशिश की पर कर ही नहीं पाया। वह बहुत अच्छी लड़की थी जितना उसे मैंने जाना उसके लिए प्यार बढ़ता गया मुझे तो उसमें कोई कमी नजर नहीं आती थी। उसने मुझे बताया कि बचपन में उसे पोलियों हो गया था इस वजह से उसका एक पैर खराब है। मैंने तुरंत उससे कहा, दाग तो चाँद में भी होता है तो क्या वह सुंदर नहीं है। तुम बहुत सुंदर हो नैना।
नैना ने एक दिन नेहा को रोते-रोते फोन किया कि मुझे आज फिर लड़के वाले देखने आए थे और मना कर गए कहने लगे कि आपकी अपाहिज लड़की से कोई शादी नहीं करेगा। करनी है तो अपनी छोटी बहन की कर दो। मुझे बहुत बुरा लगा नेहा। मैं क्या करूँ, मैं मर क्यों नहीं जाती। नैना की बात सुनकर मुझे बहुत दुख हुआ। मैंने अपने मम्मी-पापा को सारी बात बताई और अगले दिन अपने मम्मी-पापा के साथ रिश्ता लेकर नैना के घर पहुँच गया। मैंने उसके पापा से बोला, अंकल मैं नैना से बहुत प्यार करता हूँ। इससे शादी करना चाहता हूँ तो मेरी बात सुनकर नैना की मम्मी बोली बेटा क्यों हमारे साथ मजाक कर रहे हो। मेरी बेटी के भाग इतने अच्छे नहीं हैं कि किसी अच्छे लड़के से उसकी शादी हो जाए। उनकी बात सुनकर मेरे मम्मी-पापा कहने लगे, बहनजी अगर लड़का एक जैसा नहीं होता तभी नैना चाय लेकर आ गई मुझे वहाँ देखकर हैरान हो गई और कहने लगी तुम भी आ गए क्षितिज मेरा मजाक बनाने। कम-से-कम तुमसे तो ऐसी उम्मीद नहीं थी, नैना, मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ, तुम जानती भी हो पर मानती नहीं। मेरी बात सुनकर वह कहने लगी तो आ गए दया करने। चलो अपाहिज नैना पर उपकार कर देते हैं खुश हो जाएगी। नैना की बात सुनकर नेहा को गुस्सा आ गया उसने एक नैना को एक थप्पड़ मार दिया और बोली पिछले तीन साल से तेरे पीछे घूम रहा है तू कह रही है कि क्षितिज तुझसे प्यार नहीं करता दया कर रहा है। क्यों उसके प्यार की खिल्ली उड़ा रही है। नेहा की बात सुनकर नैना बोली सारी नेहा तू सब जानती है न मेरे साथ-साथ क्या-क्या हुआ है? उसकी बात सुनकर नेहा कहने लगी चल पका मत अपना हाथ आगे बढ़ा क्षितिज तूझे रिंग पहनाएगा। जैसे ही मैंने रिंग पहनाने के लिए नैना का हाथ पकड़ा तो मेरी धड़कने तेज हो गई। उसके स्पर्श से मेरा रोम-रोम पुलकित हो गया। मन कर रहा था कि नैना को अपनी बाँहों में भर लूँ, उसका हाथ पकड़कर उसे देखता रहूँ, उसकी धड़कनों को महसूस करूँ। मैं अपनी सोच में डूबा तभी मेरे कानों में माँ की आवाज सुनाई दी कि क्षितिज बेटा नैना को रिंग पहना। माँ की बात सुनकर नेहा बोली, आँटी जी थोड़ा रूको तो सही मैं अभी नैना को तैयार करके आती हूँ। लगभग एक घंटे बाद जब नेहा नैना को लेकर आई तो मैं उसे एकटक देखता रह गया। गुलाबी लहँगे में वह किसी परी से कम नहीं लग रही थी। हमने एक-दूसरे को रिंग पहनाई। मैं बहुत खुश था मैंने जिसे चाहा वह मुझे मिल गई थी। मेरा पहला प्यार पूरा हो गया। मुझे मेरी नैना हमेशा के लिए मिल गई।

आशा रौतेला मेहरा
कविता काॅलोनी

***

रेट व् टिपण्णी करें

गौरव गुर्जर 4 महीना पहले

Harshad Savani 4 महीना पहले

Jaya Agarwal 4 महीना पहले

Darshana 4 महीना पहले

himanshu Kumar 4 महीना पहले

शेयर करें