स्वाभिमान - लघुकथा - 35 Sandhya Tiwari द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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स्वाभिमान - लघुकथा - 35

खरपतवार

भइया ने माँ के पैर छुए तो माँ स्नेह विगलित स्वर में बोलीं ;

" अच्छे रहो, सुखी रहो, तरक्की करो।"

पापा के पैर छूने पर पापा ने कहा; " जुग जुग जियो बेटा । चिंरजीवी हो। यशस्वी हो।"

ताई, चाची, बुआ ने भी कुछ न कुछ आशीर्वचन कहे ।

मेरे अन्दर कुछ दरक़ गया, मैंने माँ से कहा " मैं जब आप सबको नमस्ते करती हूँ तो प्रतिउत्तर में आप सब नमस्ते ही करते हो कोई आशीर्वचन नहीं देते, और भइया के अभिवादन् के उत्तर में आशीर्वचनों की झड़ी लगा देते हो, ऐसा क्यों?

क्या मेरे लिए कोई आशीर्वाद नहीं बना? "

"अरे ! तुझे तो तेरी ससुराल में आशीर्वाद मिलते ही रहते होगें,"

चाची ने मुझे कोहनी मारते हुए कहा

"हाँ मिलते तो हैं, सुहाग बना रहे । दूधो नहाओ पूतों फलो ।

भगवान करे लल्ला हो।"

बुआ, चाची, ताई, माँ सब हँस पड़ीं

और उनकी हँसी से मेरा जी जल उठा।

मैं मन ही मन सोच रही थी, मुझे कोई नहीं कहता- जुग जुग जियो, चिरंजीवी हो, यशस्वी हो।

मेरा मन खिन्न हो गया।

मुझे उदास देख माँ बोलीं " देख शिखा हम औरतें तो वह घास हैं जो बिन बोये बिन सींचे ही ऊंची ऊंची अटृटालिकाओं, कंगूरों पर लहरातीं हैं हमें किसी कवच की क्या आवश्यकता...।

***

थूक

घृणा से उन दोनों को देखते हुये उसने थूक निगल लिया । काश... वह इनके उजले चेहरों पर थूक पाता।

लेकिन कहाँ वह केवल एक अदना सा ट्यूशन मास्टर और कहाँ वे दोनों ।

एसी कारो में घूमने वाले।

सगे भाई हैं तो क्या, भाग्य तो नहीं है एक सा।

लौट आया वह अपने मृतप्राय नवजात पुत्र और सद्यः प्रसूता पत्नी के पास। पत्नी ने करूण लेकिन आशान्वित दृष्टि से उसे देखा।

परन्तु वह उससे नज़रें नहीं मिला पाया। पीठ करके खड़ा हो गया ।

वह दोनों भी अजनबी की तरह उसके पास ही आकर खड़े हो गये।

एक बार फिर अपना पूरा सम्मान इकट्ठा करके वह उनके सामने गिड़गिड़ाया ;

" भाई भाई के काम आता है, तुम इस आडे़ वक्त में मेरी मदद नहीं करोगे तो कौन करेगा। मैं तुम्हारी पाई-पाई चुकता कर दूँगा । मेरे बच्चे को बचा लो । आखिर तुम दोनों भी तो उसके कुछ लगते हो ।

कहाँ से लौटाओगे तुम । जैसे तैसे तो ट्यूशन पढ़ा कर तो गुजारा चलाते हो। खाने को है नहीं.... पैसे चुकायेंगे...

हुंह...

जी तो दोनों का कर रहा था, यह सब कह दें ।

लेकिन प्रत्यक्षतः बोले ; " नहीं भाई इस समय बिल्कुल भी पैसे नहीं हैं ।बहुत तंगी चल रही है । होते तो क्या अपने भतीजे को मरने देते । और कुछ कहो हम करने को तैयार है ।"

"नहीं तुम दोनों नहीं आओगे मेरे साथ । अब हमारा रिश्ता केवल थूक का है ।"

सपाट चेहरे से उसने कहा और मृत शिशु को गोद में दबा कर आगे बढ़ गया।

***

चप्पल के बहाने

टूटी चप्पल आगे बढाते हुये मनोज ने कहा; "चल भइ! इस चप्पल को जल्दी से टांक दे। फैक्ट्री का लंच टाइम है।देर हो रही है। जरा जल्दी कर दे।"

यह शुगर फैक्ट्रियां भी कस्बों में ही खुलती हैं। जहां न बिजली न पानी और न ढंग की सडकें।

अब चप्पल टूट गयी। बड़बड़ाता मनोज मोची को देख रहा था।

"अभी लेऊ बाबू जी।" कहकर उसने अपना जूता चप्पल गांठने वाला डिब्बा खोला। डिब्बे के ढक्कन की अन्दरूनी साइड में "विवेकानन्द "के गुरु "स्वामी राम कृष्ण परमहंस" उनकी पत्नी "शारदा देवी" और "देवी काली" का चित्र लगा हुआ था।

"यह क्या है? किसका चित्र है?"

मनोज ने भगवान का ऐसा स्थान देखा तो आपा खो बैठा और मोची को हड़काने लगा।

"जि जि बाबू जी ।" चप्पल गांठता हुआ वह मिनट भर के लिये हकला गया ।

"क्या तुम्हें पता है, ये हमारे भगवान है? तुमने इन्हें जूते गांठने के डिब्बे में लगा रखा है?

हम लोगों का कुछ नहीं हो सकता। मरगिल्ली, कायर कौम के हैं हम । अपने भगवान को कहां बिठाना है जब ये तक नहीं सोच सकते, तो और क्या सोचेंगे खाक, ,,,?"

मनोज गुस्से से लगभग उबल ही पड़ा था।

" दस रूपिया साब ।"

"हटाओ अभी के अभी। हटाओ ये चित्र इस डिब्बे से ।"

मनोज ने आदेशात्मक लहजे में कहा

" जी साब हटा देंगे । इमे कौन बडी बात, लेकिन हम सुने रहे, एक संत रैदासऊ रहे पहिले। उनकी चमड़ा भिगोन वाली कठौती में साछात गंगाजी आयीं रहीं । तो ई तौ केवल गांठने वाला डब्बाइ है, औ महाराज सच्च पूछौ, तो इहे कौम ठीक से समुझि पाई, कि ईसुर कहां नहीं है।"

कहकर उसने बड़े इत्मीनान से अपना डिब्बा बन्द कर लिया।

डाॅ सन्ध्या तिवारी

पीलीभीत