माता पिता और बच्चे Monika Verma द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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माता पिता और बच्चे

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। हर इंसान किसी न किसी समाज से जुड़ा हुआ है। और यह समाज मिलकर बनता है एक देश।

बिल्कुल इसी में से एक समाज में एक 28 साल का युवक समीर अपने मात पिता कमल लाल और सवितादेवी के साथ रह रहा है। 

छोटा सा परिवार है। समाज में रहते हुए समीर की शादी प्रीती नाम की एक खूबसूरत और शुशील लड़की के साथ हो गई। 
सबकुछ अच्छे से चल रहा था। प्रीती भी ससुराल में अच्छे से घुल मिल गई। 

6 महीने अच्छे से बीत गए। फिर? फिर क्या था? जो हर घर में होता है। सवितादेवी और प्रीती के बीच में अनबन शुरू हो गई।


समीर प्रीती का पक्ष लेता तो सवितादेवी को बुरा लग जाता और सवितादेवी का पक्ष लेता तो प्रीती को बुरा लग जाता। 

एक और उसकी जन्मदाता है, जिसने समीर को पल पोष के बड़ा किया, खुद भूखी रहकर समीर की चिंता की तो दूसरी और वो जो समीर के लिए अपना घर, अपने माँ बाप छोड़ कर आई थी, जिसके साथ समीर को पूरी जिंदगी जीनी है। 

झगडे दिन-ब-दिन बढ़ते गए। अब कमललाल भी बोलने लगे। 1 दिन, दो दिन, हफ्ते, महीना, 2 महीने, 3 महीने, साल...
लेकिन कुछ सही नहीं हो रहा था। आखिर तंग आकर समीर ने सवितादेवी और कमललाल को वृद्धाश्रम में छोड़ दिया। 

क्या समीर ने यह सही किया? एक बेटा जो अपने मात-पिता का बुढ़ापे का सहारा बनना चाहिए, जिन माँ बाप ने खुद भूखे रह कर समीर को खिलाया, रात रात भर समीर के लिए जागे, समीर ने उसका यह उत्तर दिया? आप ही बताइए, समीर और प्रीती का यह करना उचित था? 

हर समाज में भी लोगो की बाते शुरू हो गई। कैसा बेटा है? माँ बाप को वृद्धाश्रम छोड़ आया। शादी के बाद से ही यह जोरू का गुलाम हो गया है। 

हम भी जरूर यही कहेंगे। हमने सिर्फ वही देखा जो हमें दिख रहा है, वो सच नहीं देखा जो देखना जरूरी है। 

इसके लिए हमें थोडा, थोडा ओर पीछे जाना पड़ेगा। तैयार है आप? जब समीर का जनम हुआ तो सवितादेवी और कमललाल बहोत खुश हुए। होना भी चाहिए। 

उसी समय उन दोनों ने समीर को ज़िन्दगी की सारी खुशिया देने का तय किया। हर माँ- बाप यही चाहते है। लेकिन कौन सी खुशियाँ। भौतिकी? या सच्ची ख़ुशी? 

सिर्फ भौतिकी। उसे संस्कार भी अच्छे बताए, सिर्फ बताए। जो वो चाहता उसे तुरंत वो चीज लाकर दी। जिसकी वजह से वो और चीजे मांगने लगा। क्यों? उसकी ख़ुशी के लिए। लेकिन क्या वो खुश हुआ? उसकी इच्छाए और बढ़ने लगी। जिसकी वजह से बचपन से ही समीर अपनी ख्वाइशों का गुलाम बन गया।

क्या ये सब जरूरी था? क्या उसे कभी जरूरत की चीजो के अलावा दी गई सुविधा के बिना जीना सिखाया? क्या उसे कभी दुनिया के दुःख से वकेफ करवाया? क्या उसे अपने दोस्तों के साथ मिलझुल कर रहना सिखाया? 

जैसे ही थोडा बड़ा हुआ उसे स्कूल भेज गया। स्कूल में जो भी चीजे जरूरत होती थी वो सब दी गई। हर माँ बाप का फ़र्ज़ है यह। उन्हें ख़ुशी भी मिलती है इन सब में। 

हर बच्चों से आगे बढ़ने की सिख दी। बहुत लाड दुलार दिया। एक ही तो बेटा है न। क्या उसे गरीब और अनाथ बच्चों से मिलाया? कैसे जीते है वो लोग। उनकी मदद करना सिखाया? दुसरो के गम बाँटना सिखाया? जब वो किसी और का दर्द नहीं समझ पाया, किसी को मदद करने की ख़ुशी का अनुभव नहीं किया, तो अपनी जवानी के समय आपका दर्द कैसे समझेगा? क्या कभी उसने कुछ गलत किया तो एक थप्पड़ या डाँट लगाई? जो उसे भी पता चले की दर्द क्या होता है। 

दुसरो से रूपए, पढाई की स्पर्धा में कैसे जीतते है ये सिखाया, लेकिन किसीका दिल कैसे जीतते है ये सिखाया? 

कभी मौका मिला दूसरे की हेल्प करने का, तो कमललाल कहते खुद का कोई नुकसान न हो तो दूसरे की हेल्प करो। वर्ना खामखा अपना वख्त ऐसे लोगो पे बरबाद न करो जिनका कोई मोल नहीं। तो आज उसके लिए उसकी जीवनसाथी का मोल है, वो दोनों तो वैसे ही लाचार है। वो अपना फर्ज कैसे समझेगा?

जब कोई बुरी सोबत में फसाँ, या बुरे दोस्त बने तो कभी उसे रोका, या समझाया? नहीं । बेटे की उम्र है मोज करने के, करने दो। 

कभी भी अपने देश, या अपनी धरती माँ इस प्रकृति के लिए अपने मोज शोख छोड़ कर सही जिंदगी जीना सिखाया? जीवन का मूल्य समझाया?

अब बात आई प्रीति की। प्रीती को पसंद किसने किया? प्रीती बेटी है, एक लड़की। क्या हाल है हमारे समाज में लड़कियो का। अगर उसके साथ कुछ गलत होता है तो किसी और की गलतियों के बावजूद हमारा समाज सिर्फ लड़कियो को दोष देता है। लड़के तो होते ही ऐसे है कह कर लड़कियो के सपने तोड़ते है, उन्हें घर में बिठा देते है। प्रीती को भी बचपन में सिर्फ अपना देखने के लिए सिखाया गया। नई नई ब्याह के घर में आई तो उसका कोई नहीं था। उसने प्यार से सारे परिवार को अपनाया। लेकिन उसका अपना कौन था? पति? सास? ससुर? वो तो फिर भी पराई रही। गलती प्रीती की है, लेकिन क्या उसे कभी भी कही से अपनापन मिला? 

मै यह नहीं कहती की कोई भी मात पिता गलत है। हर माता पिता अपने बच्चों के लिए अच्छी से अच्छी जिंदगी देना चाहते है। 

लेकिन उन्हें भौतिक नहीं आंतरिक सुख दीजिए। जो सच्चे दिल से काम करने पर मिलता है। ईमानदारी, इंसानियत , देशभक्ति और धर्म का मार्ग दिखाइए। जो मंदिर मस्जिद चर्च या गुरुद्वारा में जाने से नहीं मिलती। लेकिन एक दूसरे की मदद करके, प्रकृति में जी कर मिलती है। पर्यावरण, और सभी जीवो का महत्व और कद्र करना सिखाना है। पैसे से नहीं दिल से अमीर कैसे बनते है यह सिखाना है। सुखी रोटी खाकर भी खुश कैसे रहते है यह सिखाना है। संयम से काम कैसे करते है, स्त्री और पुरुष दोनों की इज्जत करना सिखाना है। 

यदि इस हो गया तो, न कोई वृद्धाश्रम रहेगा, न भ्रष्टाचार, न जातिवाद, न ही कोई अधिक समस्या। 

मुश्किलें तो हर किसी के जीवन में आती है। लेकिन मुश्किलो से भागना नहीं, उससे लड़ते कैसे है यही सिखाना है। 

मेरा मगशद किसी की भी भावनाओ को ठेश पहुचाना नहीं है। लेकिन अगर बचपन से ही बच्चों को वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना विकसित की जाए तो हर कोई एक दूजे का सहारा बन सकता है। नाम कमाने के लिए किसी का अपमान नहीं , मान मर्यादा और संयम चाहिए। हो सके तो इतना जरूर कीजिएगा।