ईदन और बानो Ved Prakash Tyagi द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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ईदन और बानो

ईदन और बानो

यह बात साठ के दशक की है, उन दिनों गाँव में मनोरंजन के साधन स्वांग तमाशे ही हुआ करते थे। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में स्वांग तमाशे वालों की कई मंडलियाँ थी जो गाँव गाँव घूम कर अपनी कला का प्रदर्शन करते थे।

समाज में इन लोगों को वह सम्मान प्राप्त नहीं था जिसके वे हकदार थे क्योंकि ये तमाशे वाले हमारी पूरी संस्कृति और इतिहास का पाठ लोगों को नाटक के रूप में दिखाते एवं लोगों में देश प्रेम की भावना व धर्म के प्रति आस्था भरते रहते।

लोग उनके नाटक पसंद करते, उनके द्वारा बीच में गायी जाने वाली रागनिया गुनगुनाते, समय से पहले ही नाटक स्थल पर पहुँच कर अपने बैठने का स्थान सुनिश्चित कर लेते लेकिन फिर भी उन कलाकारों को भांड, मिरासी जैसे नामों से पुकारते।

ऐसे समाज में जिसमे पुरुष कलाकारों को ही हेय दृष्टि से देखते थे उसी समाज में ईदन और बानो नाम की दो महिलाओं ने भी अपनी नाटक मंडली बना रखी थी। पश्चिमी उत्तर प्रदेश खेती प्रधान है और यहाँ पर गन्ने की फसल ज्यादा होती है, चूंकि गन्ने की फसल को एक बार खेत में बो दिया जाए तो यह तीन वर्षों तक भरपूर फसल देता रहता है, अतः किसानो को बीच बीच में खाली समय भी मिल जाता था और उस समय में किसी भी स्वांग तमाशे वाली मंडली बुला ली जाती थी जो पूरे गाँव के साथ साथ आस पास के और भी पाँच सात गांवो का मनोरंजन करते थे।

मैं गाँव की प्राथमिक पाठशाला में तीसरी कक्षा में पढ़ रहा था, उसी वर्ष हमारे गाँव में ईदन और बानो की मंडली स्वांग तमाशा दिखाने के लिए आ गयी। गाँव के सभी बच्चों को उनके घर वालों का आदेश हुआ, “कोई भी ईदन और बानो का तमाशा देखने नहीं जाएगा, वे अच्छी औरतें नहीं।”

लेकिन बच्चों को तो जिज्ञासा रहती है कि जाकर देखें तो सही वहाँ पर क्या होगा और ऐसा क्या होगा जिसके लिए हमें रोका जा रहा है, कैसी होंगी वो दोनों औरतें जिनको देखने से हमे रोका जा रहा है।

शाम को चार बजे से शुरू होकर सात बजे तक स्वांग होता था जिसमे इतिहास के पन्नों से उठाकर किसी भी कहानी का नाटकीय रूपान्तरण दिखाते थे। गाँव के ज़्यादातर लोग मैदान में जमा थे, हमारे गाँव के पड़ोस के गांवों से भी लोग काफी मात्रा में आए हुए थे, मैदान खचाखच भरा था और हम सभी बच्चे भी वहाँ पहुँच कर खड़े हो गए।

तभी मंच का पर्दा धीरे धीरे सरकने लगा, सामने सरस्वती माँ और गणेश जी की बड़ी बड़ी मूर्तियाँ रखी थी, दोनों के सामने दिये जल रहे थे। सभी कलाकार गणेश पूजन और सरस्वती वंदना के लिए मंच पर उपस्थित हुए जिनमे मुख्य ईदन और बानो थी।

सबसे पहले ईदन और बानो ने गणेश जी की स्तुति गायी, मंत्रोचर किया और धूप दीप रोली मोली चन्दन चावल से गणेश की पूजा की, साथ बैठे सभी संगीतज्ञ अपने अपने वाद्य यंत्रो से मधुर धुन बजाकर भी गणेश भगवान को प्रसन्न कर रहे थे। तभी कानों में सरस्वती वंदना का संस्कृत में उच्चारण गीत रूप में किया जो संगीत की धुन के साथ सभी को मंत्रमुग्ध कर गया, बानो की आवाज भी बड़ी सुरीली एवं मधुर थी।

ईदन लंबी तगड़ी साँवले रंग की और बानो गोरी चिट्टी खूबसूरत महिला थी। ईदन के चेहरे पर तेज और आँखों में रौब था, आवाज इतनी कड़क कि अगर अचानक किसी के सामने बोल पड़े तो वह डर ही जाए।

गाँव के मौलवी अचानक खड़े हो गए और बोले, “अरे!! तुम तो मुसलमान हो, फिर यह हिंदुओं के देवी देवता की पूजा क्यों कर रहे हो?”

ईदन का चेहरा एकदम तमतमा गया लेकिन उसने स्वयं पर नियंत्रण रखते हुए कहा, “बड़े मियां बैठ जाओ और आराम से बैठ कर हमारा आज का तमाशा देखना जो शहीदों के जीवन को दर्शाता है, रही बात देवी देवताओं के पूजन की तो सुन लो ये ज्ञान के देवी देवता हैं लेकिन तुम लोगों की समझ में ज्ञान की बातें कहाँ आएंगी, ज्ञान विज्ञान से तो तुम्हारा दूर दूर का भी वास्ता नहीं, तुम लोग तो कुरान भी ढंग से नहीं समझ पाते, अब बैठ जाओ और आराम से नाटक देखना, अगर नहीं देखना तो यहाँ से जा सकते हो।”

उस दिन उस नाटक मंडली ने अपनी अभिनय कला से उन शहीदों के ऐसे दर्शन कराये कि पूरे खचाखच भरे मैदान में पत्ता गिरने की भी आवाज सुनाई नहीं दे रही थी।

हम सभी बच्चों को उस दिन ज्ञात हुआ कि कैसे कैसे वीर शहीदों ने इस देश की आजादी के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिये, वीर भगत सिंह, वीर राजगुरु और वीर सुखदेव हँसते हँसते फांसी के फंदे पर झूल गए। फांसी के फंदे तक जाने से पहले उनका गाया हुआ वह गीत, “मेरा रंग दे बसंती चोला” और भगत सिंह का अपनी माँ से यह कहना, “मत रो कि तू है भगत सिंह की माँ,” और भगत सिंह की माँ के रूप में ईदन का अभिनय इतना हृदय विदारक था कि भगत सिंह की माँ तो रोई नहीं लेकिन मैदान में खचाखच भीड़ को रुला गयी।

बानो ने उसमे क्रांतिकारियों की भाभी का अभिनय किया जिसमे वह वास्तव में क्रांतिकारियों की भाभी ही लग रही थी।

अमर शहीद चंद्र शेखर आज़ाद को जब अंग्रेज़ो की पुलिस ने घेर लिया और वह आखिरी दम तक मुक़ाबला करते रहे, आखिर में बस एक ही गोली बची थी उनके पास और उनका प्रण था कि जीते जी अंग्रेज़ो के हाथ नहीं आऊँगा, पुलिस ने उनको चारों तरफ से घेर लिया तब अमर शहीद चंद्र शेखर आज़ाद ने कहा, “मैं आज़ाद था, आज़ाद हूँ और आज़ाद ही रहूँगा, तुम लोग मुझे जीते जी गिरफ्तार नहीं कर सकते,” इतना कहकर वीर चंद्र शेखर आज़ाद ने अपनी कनपटी पर पिस्टल रख कर गोली चला दी, अंग्रेज़ देखते ही रह गए, आज़ाद आज़ाद ही रहा।

नाटक समाप्त हुआ पर्दा बंद हो गया, फिर सभी कलाकार मंच पर आए और ‘भारत माता की जय’ का नारा लगाकर उस दिन के लिए सब से विदा ली। कलाकारों के साथ साथ तमाशा देखने आए सभी लोगों ने भी भारत माता की जय का उद्घोष इतने ज़ोर से किया कि उनकी आवाज पड़ोस के सात गांवों में भी पहुँच गयी। अगले दिन नेताजी सुभाष चंद्र बोस पर नाटक प्रस्तुत करने की उद्घोषणा हो गयी और हम सब बच्चे भी वहाँ से अपने अपने घर पहुँच गए।

सिर्फ सात दिन वह मंडली हमारे गाँव मे रही, प्रत्येक दिन उन्होने देशभक्त वीर शहीदों की गाथाओं का मंचन किया और उन सात दिन में हमारे गाँव के बच्चे से लेकर बूढ़े तक देशभक्ति के रंग में ऐसे रंग गए थे कि लगता था अगर उन दिनों में कोई अंग्रेज़ हमारे गाँव में आ जाता तो शायद जिंदा बचकर नहीं जा पाता।

ईदन और बानो ने समाज को बहुत कुछ दिया, बच्चों को वह सब दिया जो ज्ञान उनके शिक्षक या घर के बड़े नहीं दे पाते लेकिन फिर भी समाज ने उनको तिरस्कार ही दिया, हमेशा हेय दृष्टि से देखा उनके बारे में उल्टे सीधे शब्द प्रचलित किए लेकिन फिर भी वे दोनों अपने पथ से जरा भी विचलित नहीं हुई और अपने आखिरी समय तक इसी तरह जन जागरण का कार्य करती रहीं।

ईदन एक संभ्रांत परिवार की उच्च शिक्षित लड़की थी जिसे उसके प्रेमी ने धोखा दिया और धोखे से एक कोठे पर बेच कर चला गया। वहीं पर उसने गाना बजाना सीखा, महापुरुषों की जीवनियाँ पढ़ी, शहीदों के बारे में पढ़ा। कोठे की बाकी लड़कियां भी ईदन का सम्मान करती थीं, बानो तो ईदन को अपनी बड़ी बहन मानती थी। एक दिन ईदन ने सभी लड़कियों को साथ लेकर कोठा मालकिन के विरुद्ध विद्रोह कर दिया एवं सबको उस नर्क से निकाल सीधी पुलिस थाने पहुँच गयी।

सभी लड़कियां आज़ाद हो गयी थी, ईदन भी बड़ी खुश थी और खुशी खुशी जब अपने गाँव पहुंची तो घर वालों ने घर में नहीं घुसने दिया। बड़े ही हृदय विदारक अपशब्द बोले गए और घर के बाहर से ही दुत्कार कर भगा दिया। ईदन को बड़ा दुख हुआ लेकिन वह अंदर से टूटी नहीं और पूरी ताकत के साथ स्वयं को संभालने की कोशिश करने लगी।

कोठा टूट चुका था, वहाँ की मालकिन को सजा हो गयी थी उसके साथ में और भी कई लोगों को सजा हो गयी थी लेकिन कोठे पर साज बजाने वाले सभी साज़िंदे खाली हो गए थे। ईदन ने उन सबको इकठ्ठा किया और अपनी नाटक मंडली बनाई, बानो भी उसके साथ आ गयी। ईदन स्वयं ही सारे नाटक लिखती और एक निर्देशक की भांति सबको उनके डाइलॉग समझाती, उनसे बुलवाती और अभिनय के बारे में बताती।

धीरे धीरे ईदन की मंडली पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश एवं सीमा से सटे हरयाणा में प्रसिद्ध हो गयी। उसके पास इतना काम था कि कोई दिन खाली नहीं जाता था।

समाज से तो ईदन और बानो को हमेशा तिरस्कार ही मिला लेकिन उसके कार्य की, उसकी कला की उत्तर प्रदेश सरकार एवं हरियाणा सरकार ने कद्र की और कई बार उनको सम्मानित किया। आखिर में केंद्र सरकार ने भी उसकी कला को सम्मानित करते हुए उसको पदम श्री प्रदान किया एवं नई दिल्ली में रहने के लिए एक घर भी आवंटित किया। वृदधावस्था में उसको सरकार की तरफ से दी जाने वाली पेंशन उसके गुजरे के लिए काफी थी, दोनों मुंह बोली बहने जीवन पर्यन्त एक साथ रहीं और अपने जीवन से सिखा गईं, “अपनों के या समाज के दुतकारने से जीवन समाप्त नहीं होता, जीवन अपना है अपनी तरह से जीने के लायक बनाना ही श्रेष्ठता है।”

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