देहाती समाज - 9 Sarat Chandra Chattopadhyay द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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देहाती समाज - 9

देहाती समाज

शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय

अध्याय 9

ताई जी के घर से लौटते-लौटते रमेश का सारा गुस्सा पानी हो गया। वह अपने मन में सोचने लगा - कितनी आसान बात थी! आखिर मैं गुस्सा करूँ भी, तो किस पर करूँ? जो अपनी जहालत में अपना-पराया, अपनी भलाई-बुराई का भी ज्ञान नहीं कर सकते, जो भलाई में बुराई का संशय करते हैं, जो अपने घरवाले, अपने पड़ोसी से ही लड़ने में अपनी बहादुरी समझते हैं, चाहे बाहरवाले के सामने भीगी बिल्ली ही बने रहें - और यह वे जान-बूझ कर नहीं करते, बल्कि उनका ऐसा स्वभाव ही बन गया है, तो फिर ऐसे लोगों पर भी क्या गुस्सा होना! किताबों में कितना गलत वर्णन होता है - गाँव की स्वच्छता का, आपसी भाईचारे का! पड़ोसी का दुख देख कर पड़ोसी दौड़ आता है, इस तरह से उसकी सहायता में तत्पर रहता है; किसी के घर में खुशी होती है तो सारा गाँव खुशी में फूला नहीं समाता। पर उसने जो कुछ किताबों में पढ़ा था, उसका नितांत उलटा पाया इन गाँवों में! जितना आपसी द्वेष-वैमनस्य गाँवों में उसे मिला, उतना शहरों में नहीं। इन्हीं सारी बातों को सोच-सोच, उनका सारा शरीर अजीब सिहरन से भर उठा। किताबों में पढ़ी धारणा के बल पर ही, जब कभी शहर के कोलाहलपूर्ण भागों में उसे बुराई दीख पड़ती, तभी उसका दिल अपने गाँव भाग चलने को व्याकुल हो उठता। पर अब जब नियति ने उसे गाँव में ला कर पटक दिया, तो उसकी सारी धारणा एक दिन में धूल में मिल गई; और आज गाँव का जो स्वरूप उसके सामने आया, वह अपने घोर विकृत रूप में - जो निरंतर पतन के गङ्ढे की तरफ ही अग्रसर होता जा रहा है। सबसे बड़ी विडंबना तो यह है कि अपने धर्म और समाज के इसी स्वरूप को ये सर्वांगीण सुंदर मानते हैं, और शहर के धर्म और समाज को निकृष्ट! उसी में वे परम संतुष्ट हैं।

आँगन में पैर रखते ही, रमेश ने एक अधेड़ स्त्री को, एक दस-ग्यारह वर्ष के लड़के के साथ, सहमी-सी एक कोने में बैठे देखा। रमेश को आया देख, वह उठ कर खड़ी हो गई। उस लड़के की दयनीय दशा देख कर, बिना कुछ जाने ही रमेश का दिल रो उठा। गोपाल सरकार चंड़ी मंडप के बरामदे में बैठे, लिखा-पढ़ी में लगे थे। उन्होंने वहाँ से उठ कर रमेश के पास आ कर कहा - 'दक्षिणी मुहाल में इसका घर है। पिता का नाम द्वारिका पण्डित है, आपसे कुछ विनती करने आई है।'

रमेश ने समझ लिया कि विनती का मतलब भिक्षा है! और तभी उसे फिर गुस्सा हो आया। झुँझला कर बोला - 'सारे गाँव में मैं ही दानी बचा हूँ? और कोई घर में नहीं है क्या?'

'बात भी ऐसी ही है, बाबू! बड़े बाबू के समय में, द्वार पर आया व्यक्ति कभी खाली हाथ नहीं लौटा। उसी आस में आज भी लोग यहीं दौड़ कर आते हैं।' बेचारी स्त्री को देख कर उसने कहा - 'कामिनी की माँ! जब वह जीता था, तब उसका प्रायश्‍चित क्यों नहीं कराया? भला यह गलती नहीं है लोगों की? अब लगे दौड़ने! घर में मुर्दा पड़ा है। क्या कुछ बरतन-भाँडे नहीं हैं इसके पास?'

कामिनी की माँ उस लड़के की पड़ोसिन थी, उसने उत्तर दिया - 'जो विश्‍वास न आता हो मेरी बात का, तो आप खुद ही चल कर देख लें। होता, तो क्या मरे बाप को घर में छोड़ कर, इस तरह भीख माँगने आता? क्या तुमने नहीं देखा कि जो कुछ मेरे पास था, सब कुछ खर्च कर दिया मैंने इन्हीं लोगों पर, पिछले छह महीनों में ही। सोचा था कि ब्राह्मण है, वहीं इसके बच्चे भूखों न मरने लगें।'

रमेश की समझ में अब कुछ-कुछ आया। गोपाल सरकार ने सारी बात विस्तार से कही - 'इस लड़के के बाप द्वारिका चक्रवर्ती को छह महीने से दमा हो गया था। आज सवेरे उनके प्राण निकल गए। बंगाल में दमा और इसी प्रकार के कई रोगों के संबंध में प्रायश्‍चित करना पड़ता है। मगर जो होना चाहिए था, वह नहीं हुआ; तभी लाश घर में पड़ी है, उसे कंधा लगाने कोई भी नहीं गया। अब भी प्रायश्‍चित नहीं होगा तो लाश यों ही पड़ी रहेगी। कामिनी की माँ ने ही छह माह से इसकी सहायता की थी और उसी में अपना भी सब कुछ लगा बैठी - अब इसके पास भी कुछ नहीं रहा। तभी लड़के को लेकर, आपके पास विनती करने आई है।'

थोड़ी देर मौन रह कर रमेश ने कहा - 'इस समय दो बजे हैं। प्रायश्‍चित न करने पर, क्या वास्तव में लाश वैसे ही पड़ी रहेगी?'

'जी! यह शास्त्र का नियम जो ठहरा! मुर्दा न पड़ा रहे, इसलिए बेचारी भीख माँगने निकली है। क्यों कामिनी की माँ, कहीं और भी गई थी क्या?'

लड़के ने अपनी मुट्ठी में बँधे पाँच आने पैसे दिखा दिए और कामिनी की माँ बोली - 'मुकर्जी के घर से चवन्नी मिली है, और हवलदार ने दिए हैं चार पैसे। पर प्रायश्‍चित में तो लगेंगे सवा दो रुपए! इससे कम में तो हो ही नहीं सकता! यदि बाबू की कृपा हो जाए तो...।'

'और अब कहीं भटकने की जरूरत नहीं, घर जाओ! मैं आदमी भेज कर सारा प्रबंध करा दूँगा।'

वे लोग चले गए। गोपाल सरकार की तरफ अत्यंत दु:खित नेत्रों से देख कर रमेश बोला - 'क्यों सरकार जी, इस गाँव में भला कितने घर इस तरह के गरीब होगें?'

'दो-तीन होंगे। ये लोग भी खाते-पीते थे। पर एक पेड़ के पीछे सनातन हजारी से उन्हें द्वारिका का मुकदमा चला, और नौबत यहाँ तक आ गई कि बस उजड़ ही गए! दाने-दाने को मोहताज हो गए! यहाँ तक हालत न भी बिगड़ती।' - वह स्वर धीमा करके बोले - 'हमारे वेणी बाबू और गोविंद गांगुली ने बढ़ावा दे-दे कर, इस दशा को पहुँचा दिया इन बेचारों को!'

रमेश बोला - 'और वेणी बाबू के ही यहाँ इनकी मिलकियत गिरवी होती चली गई, और पिछले साल मूल में सूद मिला कर, कौड़ी के दाम सारी जायदाद उन्होंने खरीद ली! धन्य है यह कामिनी की माँ, जो इस बेचारे की दीनावस्था में सहायता करके, मानवता का सही धर्म निभाया!'

फिर रमेश ने एक दीर्घ निःश्‍वास, गोपाल सरकार को उसका सब प्रबंध करने को भेज दिया और मन-ही-कहा - 'ताई जी, आपकी आज्ञा मेरे सिर-माथे पर! अब मेरे प्राण भी यहाँ निकल जाएँ तो मुझे दु:ख न होगा; पर इस गाँव को छोड़ कर अब कहीं नहीं जाने का!'

***