मूक फिल्मों का शुरूआती दौर और ग्लैमर का तड़का Prabhu Jhingran द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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मूक फिल्मों का शुरूआती दौर और ग्लैमर का तड़का

मूक फिल्मों का शुरूआती दौर और ग्लैमर का तड़का

संवादरहित फिल्मों का प्रारम्भिक दौर बड़ा रोमांचक और विस्मय का गवाह रहा है दुर्भाग्य से इस दौरान बनी ज्यादातर फिल्में आज उपलब्ध नहीं हैं क्योंकि उस समय फिल्मों को सुरक्षित रखने के साधन लगभग नहीं के बराबर थे। अधिकांश फिल्मों के पूरी तरह से नष्ट हो जाने के साथ उस फिल्म से जुड़े हजारों मेहनतकश, रचनाशील कलाकारों की मेहनत और तकनीकी कुशलता के निशान भी हमेशा के लिए मिट गये।

राष्ट्रीय फिल्म अभिलेखागार के पास भी कुल 1313 मूक फिल्मों के विवरण उपलब्ध हैं। जबकि इस अवधि के दौरान हजारों फिल्में बनीं और प्रदर्शित हुईं।

सन्‌ 1912 में बनी तथा नाना भाई गोविन्द चित्रे द्वारा निर्देशित प्रथम भारतीय फिल्म 'पुण्डलीक' एक मराठी फिल्म थी। फाल्के की अगली फिल्म राजा हरिश्चन्द्र का विषय भी पौराणिक था। दरअसल शुरूआती दौर की ज्यादातर फिल्में धार्मिक कथानकों को आधार मानकर बनायी गयीं, इन फिल्मों के विषय आध्यात्मिक और धार्मिक रखने के कई कारण थे, एक—विषयों का कथानक जनसाधारण में लोकप्रिय होता था, दूसरे इस नये उद्योग में पैसा लगाने वाले सेठ किसी तरह का खतरा नहीं लेना चाहते थे, तीसरे विषय के आधार पर आमजन को सिनेमा से जुड़ने का एक माकूल सामाजिक बहाना मिल जाता था कि 'हम तो धार्मिक टाइप की फिल्म देखने जाते हैं।' इन दिनों बनी फिल्मों के कुछ नाम जैसे ध्रुवचरित्र, विष्णु अवतार, सती, लंका दहन, सत्य नारायण, पाण्डव वनवास, गुरू द्रोणाचार्य आदि, जैसे अनेकों शीर्षक इस दौरान बनी फिल्मों की विषयवस्तु की कहानी स्वयं बता देते हैं।

इन फिल्मों की अपार सफलता ने एक नये उद्योग के रास्ते खोल दिए थे और फिल्म निर्माता इस तथ्य को समझ चुके थे कि काले सफेद फीते का जादू दर्शकों के सिर पर चढ़कर बोलने लगा है। लेकिन चूंकि पौराणिक फिल्मों की विषय वस्तु अत्यन्त सीमित थी जिन्हें बार बार दोहराया नहीं जा सकता था और दर्शक को बड़े पर्दे पर कुछ ऐसा देखना था जो आम तौर पर उसकी जिन्दगी में देखने को नहीं मिल पाता।

धीरे धीरे विशुद्ध धार्मिक फिल्मों की जगह पारिवारिक विषयों पर आधारित कहानियां आकार लेने लगी और निर्माताओं ने पर्दे पर सौन्दर्य और ग्लैमर को परोसना शुरू कर दिया। इस क्रम में जांच पड़ताल करेंगे कुछ ऐसी अभिनेत्रियों की जिन्होंने फिल्मों को मांसल सौन्दर्य के प्रदर्शन का माध्यम बनने और बनाने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। आइए डालते हैं एक नजर................

रूबी मायर्स उर्फ सुलोचना (1907 — 10 अक्टूबर 1983) एक ऐसा ही नाम है। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि मूक फिल्मों की इस अभिनेत्री को उस जमाने में पारिश्रमिक के तौर पर तत्कालीन गवर्नर के वेतन से भी अधिक धनराशि दी जाती थी ?

भूरी आंखों वाली रूबी मायर्स का जन्म सन्‌ 1907 में पुणे में हुआ था। रूबी एक कंपनी में टेलीफोन आपरेटर के तौर पर काम करती थी जब कोहिनूर फिल्म्‌स कम्पनी के मालिक मोहन भवनानी की नजर उस पर पड़ी। मोहन ने रूबी को कोहिनूर फिल्म्‌स के बैनर तले बनने वाली फिल्मों में काम करने के लिए प्रस्ताव दिया पर प्रस्ताव पहले दौर में उन्हीं करणों से ठुकरा दिया गया जिनकी चर्चा की जा चुकी है। मोहन भवनानी अन्ततः रूबी को अभिनय के लिए मनाने में सफल रहे। फिल्म एक्टिंग का अनुभव न होने के बावजूद रूबी अपनी पहली फिल्म 'सिनेमा क्वीन (1926)' के प्रदर्शन के साथ समूचे फिल्म उद्योग में चर्चा का विषय बन गईं। कुछ समय बाद उनकी लोकप्रियता को देखते हुए इम्पीरियल फिल्म कम्पनी ने विशाल धनराशि पर रूबी को अपनी फिल्मों के लिए अनुबंधित कर लिया और वे देश के सर्वाधिक पारिश्रमिक वाली मूवी स्टार बन गयी। इसी वर्ष उनकी तीन और फिल्में रिलीज हुई, टाइपिस्ट गर्ल (1926), बलिदान (1927), और वाइल्ड कैट ऑफ बॉम्बे (1927)।

आने वाले दो साल जैसे रूबी के ही थे। इस दौरान आर0 एस0 चौधरी के निर्देशन में रूबी की तीन सुपरहिट रोमांटिक फिल्में माधुरी (1928), अनारकली (1928) तथा इन्दिरा बीए (1929) ने रूबी को मूक फिल्मों की सर्वाधिक आकर्षक अभिनेत्री के शिखर तक पहुंचा दिया। रूबी का नाम फिल्मों के लिए सफलता की गारंटी माना जाने लगा।

रूबी ने उस समय के महिला कलाकारों को एक रूतबा दिलाने की दिशा में बडा काम किया, इस बीच बोलती फिल्मों का दौर शुरू होने पर रूबी के कैरियर के सामने एक बड़ी समस्या आ खड़ी हुई। रूबी को हिन्दी बोलना लगभग नहीं आता था और उसका उच्चारण दोषपूर्ण था जबकि बोलती फिल्मों के लिए हिन्दुस्तानी बोल—चाल का आना बेहद जरूरी हो गया था। रूबी ने एक वर्ष के लिए हिन्दी भाषा सीखने के लिए फिल्मों से सन्यास ले लिया लेकिन इसके बाद 1932 में जब 'माधुरी' फिल्म के सवाक्‌ संस्करण का आगमन हुआ तो जैसे फिल्म उद्योग में आग सी लग गयी। इतना ही नहीं निर्माताओं ने रूबी की कई मूक फिल्मों के सवाक्‌ संस्करण जारी कर डाले जिसमें इन्दिरा एमए (1934)(मूक फिल्म का शीर्षक था इन्दिरा बीए), अनारकली (1935) तथा बॉम्बे की बिल्ली (1936) शामिल है। रूबी मायर्स को लोगों की कल्पना से परे 5000 रुपए प्रतिमाह वेतन मिलने लगा। उस समय की सबसे महंगी कार शेवरलेट—1935 कार की सवारी औैर मूक फिल्मों के दौर के सफलतम अभिनेता डी0 बिलीमोरिया और रूबी की जोड़ी पूरी मुंबई में प्रसिद्ध हो गयी। रूबी मायर्स के प्रभाव को इसी एक तथ्य से आंका जा सकता है कि उनकी लोकप्रियता को भुनाने के लिए निर्माताओं ने 'सुलोचना' के नाम से भी एक फिल्म बनायी।

एक ऐसा भी वक्त आया जब रूबी और डी0 बिलीमोरिया के रोमांस को विराम लग गया, यहीं से रूबी का कैरियर भी धीरे धीरे समाप्ति की ओर बढने लगा क्योंकि अब फिल्म उद्योग में नयी और युवा महिला कलाकारों की एक नई खेप तेजी से अपनी जगह बनाने लगी थी। 1953 में रूबी ने अनारकली फिल्म के तीसरे संस्करण में सलीम की मां की भूमिका स्वीकार करके वक्त के आगे आत्मसमर्पण कर दिया। वर्ष 1983 में लाखों लोगों के दिलों पर राज करने वाली रूबी मायर्स उर्फ सुलोचना इस दुनिया को छोड़ कर चली गईं। सुलोचना ने 1930 में अपने फिल्म स्टूडियो 'रूबी पिक्चर्स' की स्थापना भी की थी। अर्से बाद 1973 में रूबी मायर्स को उनके जीवन पर्यन्त प्रदर्शन के आधार पर दादा साहब फाल्के पुरस्कार से नवाजा गया।

रूबी 1974 में स्माइल मर्चेंट की शार्ट फिल्म 'महात्मा एण्ड द मैड ब्वाय' में आखिरी बार देखी गईं।

रूबी जैसे अनेक नाम हैं जिन्होंने हिन्दुस्तान में सिनेमा की शैशवावस्था में हुस्न के जलवे बिखेर कर सिने संसार में ग्लैमर का तड़का लगाया। गौरतलब है कि मुम्बई के परंपरावादी मराठी, गुजराती और पारसी परिवारों की लड़कियां फिल्मों में काम करने से गुरेज करती थीं लेकिन सिनेमा का जादू चल चुका था और भारतीय मानस के लिए शायद मनोरंजन का सबसे सहज साधन बनने में सिनेमा को देर नहीं लगी। ग्लैमर को भुनाने के लिए अब पौराणिक फिल्मों की जगह घर परिवार की कहानियों और पारिवारिक मनोरंजन पर जोर दिया जाने लगा। अब इसके लिए एक अदद धांसू नायिका की सख्त जरूरत थी, ऐसे में एंग्लो इण्डियन और विदेशी बालाओं की तलाश की जाने लगी। ऐसी ही कुछ रूपसियों का जिक्र किए बगैर सिनेमा के शुरूआती दौर की कहानी अधूरी रह जायेगी।

ऐसा ही एक नाम है सीता देवी का जिनका असली नाम रिमी स्मिथ था। मूक सिनेमा के युग में सीता देवी (1912—1983) का पदार्पण भी हलचल भरा रहा।

स्ीता प्रख्यात फिल्म निर्माता हिमांशु राय की खोज थीं, जिन्होंने अपनी फिल्मी पारी की शुरूआत हिमांशु की फिल्म 'प्रेम सन्यास' जो अपने अंग्रेजी शीर्षक 'द लाइट ऑफ एशिया' के नाम से ज्यादा जानी गयी, से की। फिल्म सुपर हिट रही और सीता भी स्टार बन गईं। बाद में सीता ने बड़े ऑफर के चलते 'मटन थिएटर्स' ज्वाइन कर लिया। सीता की तीन बेहद सफल फिल्मों, 'द लाइट ऑफ एशिया', 'शिराज', और 'प्रपंचपाश' जर्मन फिल्म डायरेक्टर फ्रेंज ऑस्टेन तथा भारतीय निर्माता हिमांशु राय की साझेदारी में बनी थीं। उक्त तीनों ही फिल्मों की विषय वस्तु तीन अलग धर्म और भारतीय माइथोलॉजी पर आधारित थी। 'द लाइट ऑफ एशिया' महात्मा बुद्व के जीवन दर्शन पर आधारित थी, जबकि शिराज फिल्म का ताल्लुक ताजमहल के निर्माण को लेकर था, तथा 'प्रपंचप्राश' महाभारत की एक कथा पर आधारित थी। सीता देवी उक्त तीनों फिल्मों में लीड रोल में थीं। सीता की तीन और बेहद सफल फिल्में — 'दुर्गेशनंदिनी', 'कपाल कुंडला' और 'कृष्णाकतेर बिल' बंकिम चन्द्र चटर्जी के लोकप्रिय उपन्यासों पर आधारित थीं।

सीता उर्फ टिनी स्मिथ ने ऐसे समय में भारतीय चित्रपट पर अपने सौंदर्य से दर्शकों को मोहित किया जब फिल्मों को लोकप्रिय बनाने के लिए नायिकाओं का अकाल था। आगे के अंकों में ऐसी ही कुछ अनजानी नायिकाओं की चर्चा जिनके ग्लैमर ने मध्य वर्ग के आम आदमी को सिनेमाघर की टिकट विण्डो की लाइन में लाकर खड़ा कर दिया।