जुगाड़ बिना सब सुन! Arvind Kumar द्वारा हास्य कथाएं में हिंदी पीडीएफ

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जुगाड़ बिना सब सुन!

जुगाड़ बिना सब सून

पूरे तीन महीनों तक अपनी साँसे अटकाने और तमाम देवी देवताओं, मजारों, मठों, पीर-पैगम्बरों और गुरुद्वारों को चढ़ावा चढ़ाने की मन्नत मानने के बाद भी जब न तो उनकी अपनी मनपसंद वाली यानि कि पुरानी पार्टी के पुराने गठबंधन वाली सरकार बनी और न ही सेकेण्ड च्वाइस वाली हरी, नीली, पीली, लाल, गुलाबी और सुरमई रंग की पार्टियों के संभावित गठबंधन के पांव सरकारी कुर्सी तक फटक पाये, तो मोटी मोटी तोंदों और गंजी खोपड़ियों वाले अफसर भाई लोग पहले तो गश खाकर धरती पर धड़ाम से लेटायमान हो गए। फिर जब पानी-वानी छींट-छांट कर घर वाले और उनको मातहत उनको किसी तरह से होश में ले आये, तो इयुरेका इयुरेका की स्टाईल में बदहवास होकर वे अपने स्टडी रूम में घुस गये। और टेलेफोन और मोबाईल लेकर नयी सरकार में भी अपनी घुसपैठ बनाने के लिए ताबड़-तोड़ जुगाड़ रत हो गये।

कोई केन्द्रीय सचिवालय में फोन मिलाने लगा, तो कोई सरकारी पार्टी के हेडक्वार्टर में। कोई पार्टी के अध्यक्ष को खटखटाने लगा, तो कोई चुनाव प्रभारी को। कोई मीडिया हाउसेज के अपने बन्दों को ऑनलाइन लेने लगा, तो कोई बाबा रामदेव और योगी आदित्यनाथ की चौखट पर अपना सिर रगड़ने की तैयारी के लिए बोरिया बिस्तर बांधने लगा। और हर महकमें, हर दफ्तर में और हर अधिकारी के घर पर बस एक ही चर्चा होने लगी कि उनके विभाग का मंत्री कौन बन रहा है? सचिव या मुख्य सचिव कौन बनेगा? अरे वो? वो तो बड़ा खड़ूस है। अच्छा खैर छोड़ो, उससे किस तरह से लिंक निकला जा सकता है? वगैरह-वगैरह।

साहब तो साहब आजकल मेमसाहब लोग भी काफी चिंतित और परेशान हैं। हर शादी, हर फंक्शन, हर मेल-मुलाकात और यहाँ तक कि हर किटी पार्टी में भी उनकी बस एक ही चिंता भरी चर्चा कि इस नयी सरकार में घुसपैठ हो, तो किस तरह से? कहीं से कोई ऐसी राह मिले कि पीएमओ तक सीधी पहुँच हो जाये। वे नहीं तो उनके पिताजी, पिताजी नहीं तो उनके कोई खास रिश्तेदार, पड़ोसी, धोबी-ड्राईवर और नहीं तो उनके कुत्ते से ही कोई जान-पहचान निकल आये ताकि अगले पांच साल तक फिर से मौज की जिंदगी जी जा सके। कोई ऐसा जुगाड़ कि सत्ता का हाँथ बस फिर से पीठ पर आ ही जाये।

पीठ पर पड़े हाँथ का ही तो जमाना है। पीठ पर हाँथ नहीं, तो रुतवा नहीं। रुतवा नहीं तो शानो-शौकत नहीं। और अगर शानो-शौकत नहीं, तो फिर जी कर क्या करेंगे? इसलिए हर हाल में सत्ता में घुसपैठ होना मांगता। यह ऊपरी कमाई, मातहतों की हड़काई और जनता से उगाही का सफेदपोश काम घुसपैठ और सत्ता के गलियारों की सरपरस्ती में ही तो फलता-फूलता है। ये बड़ी-बड़ी गाड़ियाँ, ये लेटेस्ट मोबाइल्स, ये टैब्स, ये मैक बुक्स, ये नोट-बुक्स, बीबी की ये ज्वेलरीज़, बच्चों के ये ब्रांडेड कपड़ेज़, कई-कई एटीएम और क्रेडिट कार्ड्स और ये काले-सफ़ेद धन का अँधा-अम्बार भी तो सत्ता कनेक्शन से ही परवान चढ़ता है।

भाई लोग सोच रहे हैं और सोच-सोच कर दुबले हुए जा रहे हैं। चिंतित, परेशान और तनावग्रस्त। पिछली सरकार में बड़ी मुश्किल से तो जोड़-तोड़ करके मलाईदार पोस्ट पर पहुंचे थे। उन्हें लगता है कि या तो इस सरकार में उनका पत्ता कट जायेगा या उनको फिर से उतना ही या शायद उससे भी ज्यादा चढ़ावा चढ़ाना पड़ेगा, जितना कि पिछली सरकार में चढ़ाया था। सुना है, उन्होंने अभी से थैलियाँ भी भर कर तैयार कर ली हैं। पर अगर इस सरकार में उनकी दाल नहीं गली तो? कहीं पिछली सरकार के गुडबुक में रहना इस बार उनके लिए बैडबुक में रहना साबित हो गया तो? वे अन्दर ही अन्दर बुरी तरह से डरे हुए हैं। क्या उनको अब मूंगफली के दानों वाली सिर्फ सरकारी तनख्याह से सूखी दाल-रोटी ही खा कर एक आम आदमी की तरह दिन गुजारना पड़ेगा? हे भगवान! इस आम आदमी के देश में एक आम आदमी बन कर जीने से तो बेहतर है कि नौकरी छोड़ छाड़ कर स्मगलिंग कर ली जाय या कंठी माला लेकर सन्यास ले लिया जाय या फिर आत्महत्या करके इहलीला समाप्त कर ली जाये।

ऐसा नहीं है कि पिछली सरकार में जम कर चांदी काटने वाले ही परेशान हैं। आजकल वे भी बहुत परेशान हैं जिनकी दाल पिछली सरकार में कत्तई नहीं गली थी। वे भी कमर कसे हुए हैं। और अपने सताये और प्रताड़ित किये जाने का रोना रो-रो कर नयी सरकार को इमोशनली लपेटने के जुगाड़ में हैं। चाहे जो हो जाये, अबकी बार तो कोई मौका छोड़ना ही नहीं है। ये भी आजकल या तो राजधानी के चक्कर लगा रहे हैं या बहुत ही सतर्क व सुरक्षित रहते हुए अपने लोगों के ज़रिये टोह ले रहे हैं कि पीछे का कौन सा दरवाज़ा कब और कैसे खोला जा सकता है? कहीं ऐसा तो नहीं कि पिछली सरकार के बैडबुक में रहना उनका परमानेंट बैडलक साबित हो जाये? और यह सिर्फ हांफ-हांफ कर चलने वाले डायबटीज, ब्लड-प्रेशर व प्रोस्टेट बढ़े हुए अफसरों का ही हाल नहीं है, सरकारी पार्टी की दूसरी कतार के छुटभैये नेता और कोटा-परमिट पाने के इच्छुक बिजनेस मैन भी इसी जुगाड़ में लगे हुए हैं कि उनका भी ऐसा कोई सौलिड जुगाड़ हो जाये कि यह ससुरी पांच साल तो मजे में कटे, बाद की बाद में देखी जायेगी। वे भी आजकल तन-मन-धन से नयी बनी सरकार के इर्द-गिर्द बड़े भक्तिभाव से परिक्रमा कर रहे हैं।

कुछ लोग तो जन्म से ही चतुर सुजान होते हैं। परले दर्जे के स्मार्ट और जुगाड़बाज़। वे मौके की नज़ाकत को समझते हैं। वे हवा का रुख हवा चलने से पहले ही भांप लेते हैं। और सरकार का रंग बदलने से पहले ही फौरन जुगाड़ भिड़ा कर संभावित सरकारी पाले में कूद जाते है। ऐसे लोगों के हाँथ-पांव और सिर पहले वाली सरकार में भी कढ़ाई में होते हैं। और नयी सरकार में भी। और आगे भी रहेंगे। समय और ज़माने का दस्तूर भी यही है। आज की राजनीति भी हमें बार-बार यही सिखाती है कि मौका देखते ही मौके को पकड़ कर दुह लेने में ही होशियारी है। जुगाड़म कृत्वा मौजम करेत। इसीलिये तो कुछ नेतागण जुगाड़ करके हर बार हर पार्टी की सरकार में मंत्री बन जाते हैं। और आराम से लाल बत्ती और धन-धान्य का जीवन पर्यंत आनंद उठाते हैं।