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भाई चारे की तलब

भाई-चारा ढूढने की तलब....

किसी ने सच कहा है, भाई-चारा एक साथ ढूढने की चीज नहीं है|

या तो आप भाई ढूढ़ लो या भूखे हो तो चारा तलाश लो |

हम सत्तर सालो से, लगभग दोनों साथ ढूढने का प्रयास कर रहे हैं |

चुनाव-आयोग द्वारा चुनावी-तिथि घोषित करने के तुरन्त बाद, संभावित प्रत्याशी, टिकट बाटने वालों के सामने अपने भाई-नुमा चेहरे को लेकर प्रकट हो जाते हैं|

कुछ निरीह भाई, कुछ दबंगई वाले ....|

दबंगई वाले पूर्ण आश्वस्त होते हैं कि टिकट उनकी बपौती है |

निरीहों को, शंका के बादल घेरे होते हैं| उनकी पत्नियां घर घुसते ही दागती हैं, बात बनी ...?

वे सर झुकाए यूँ खड़े हो जाते हैं, जैसे क्लास में होमवर्क करके न गये हो.| मगर जैसे ही एहसास होता है कि इस घर के वे ही सर्वेसर्वा हैं, उनकी जुबान में धार लग जाती है, डॉट पिलाते हुए कहते हैं, कितनी बार कहा है....... |

पत्नी बिना उनकी बातों को सुने तानों की अपनी ढपली उठा लेती है | इनसे एक काम भी ढंग का नहीं होता | अपने तरफ सभी पत्नियां यूँ ही बड़बड़ा कर चुप हो जाती हैं| हिन्दुस्तानी पत्नियों को जाने क्यों लगता है कि उनके सुझाये नुखे पर अमल किया जाए तो ‘टिकट’ घर बैठे मिल सकती है |

वे सीक्रेट समझाने लगी, प्रेस-मीडिया को पकड़ो|

जाति पर, धर्म पर, पार्टी के वरिष्ठ नेता पर, या ऐसे विपक्ष के आला कमान पर, जहां इधर से दुत्कारे जाने पर उधर शामिल होने की जरूरत नहीं, अनर्गल ब्यान फटाफट दे डालो|

मगर 'डोबी'!....आजकल कोर्ट का आदेश है ऐसे बयान से पात्रता खत्म हो जायेगी ....|

-ठीक है आपको अंदेशा है तो बयान मैं दिए देती हूँ ...| केंडीडेट की सवाक पत्नी का बेबाक बयान भी उतना ही मायने रखता है | बस आप पेपर में छपवा दीजिये ..मीडिया अपने आप उठा लेगा ....| .

हुआ भी ऐसा ही, बयान बेअसर नहीं गया, दो दिनों में हवा, आंधी बन गई | टिकट घर बैठे मिल गई |

आज के जमाने में, आजकल यही हो रहा है"बातों का आतंकवाद" बड़े काम की चीज हो गई है| जहां भी धौस जमाना हो, कड़क लहजे में दो-चार जुमले उछाल दो, समझो मैदान मार लिया आपने | नुसेंस वेल्यु में गजब का सेन्स समा गया है | इसमें सबको साधने की क्षमता है | राम बिदक गये तो रहीम का वोट पक्का हो जाता है | बनिया-बाम्हन बिगड़े तो आरक्षण वाले आ मिलते हैं | आप किसी भी किस्म के खटारा-इंजन चेसिस वाले हों लोग धक्का देने का जुगाड़ कर ही देते हैं |

टिकट के बाद, अब समस्या होती है “भाई-चारा” टाइप साफ्ट छवि बनाने की|

चलो, पड़ौसियों से इसकी शुरुआत करते हैं|

और श्रीवास्तव जी, इधर कई दिनों से दिख नहीं रहे थे कहीं बाहर गये थे क्या ...? वे बोले हाँ भाई ...वीसा का चक्कर था ... अब बन गया है, अगले हप्ते, दो माह के लिए सपत्नीक लन्दन चले जाना है |

यानी.... इलेक्शन होते तक आप नहीं रहेंगे ...?

उनकी दो वोटों से बोहनी ही खराब हो गई|

वे एक अनजाने भय से घिर गये|

उम्मीदवार का भय से घिरना भी कमाल पैदा करता है | केन्डीडेट जब-जब भय से घिरता है तब-तब उनमे और ताकत समा जाती है|

अक्सर वे लोग मुगालते में आ जाते हैं जो अपने किसी ख़ास की शर्तिया उपाय आजमा बैठते हैं | भाईजान ....आप तो उधर देखो ही मत ....हमारे लोगो ने सब संभाल लिया है ...जबरदस्त लीड रहेगी | अपनी रैली ने वो समा बांधा है कि अगले की जमानत बच जाए वही गनीमत है |

अब इस हाई डोज संभावनाओं के सामने कोई गदगद होने के सिवा कर भी क्या सकता है .....?

इस भाति जो वन-साइडेड धुआधार केम्पेन की खुशबु सुघ लेता है उसे सब तरफ वही महक आते रहती है | ये महक, बदबू में, रिजल्ट के दिन जब धीरे-धीरे तब्दील होते दिखती है तो सबसे पहले, डूबते जहाज से जैसे चूहे कूद जाते हैं, वैसे ही दावेदार नदारद मिलता है|

ऐसे चापलूसों से बच के रहने की हिदायत, चुकी घरेलू आलाकमान से पा चुके थे | सो किसी के झांसे में न आने की ठान ली थी |

बहरहाल वे भय को दिमाग के उपरी माले से निकालने में कामयाब हो गए |

टिकट मिलने के उत्साह और बधाइयों के ताँता लगने में जैसे सभी पिछ्ला भूल जाते हैं, उनके साथ भी वैसा ही हुआ | वे अपने यार दोस्तों और टिकट मिलने के बाद जबर्दस्ती घुसे सैकड़ों कार्य कर्ताओं से घिर गये | उत्साह का अतिरेक चारों तरफ फैल सा गया | पर्दे के पीछे वाली, चाय की बड़ी पतीली और नाश्ते की व्यापक व्यवस्था कब कर डाली पता नहीं लगा|

"नत्थू भाई आगे बढ़ो हम तुम्हारे साथ हैं " जैसे नारो ने मनोबल के थर्मामीटर को नार्मल में स्थिर कर दिया | दहशत, आवेग के हाई टेम्प्रेचर तक पहुचने की नौबत ही टल गई| सैकड़ों भाइयों ने कंधे से कंधा मिला लिया था|

आगे की समस्या पर, नत्थू ने पत्नी के सुझाव आमंत्रित किये, ये सब तो चलो जुट गए, अब इनके चारे की क्या व्यवस्था है ....?

कार्यकर्ता, तुम तो जानती हो खूब खाते हैं, या यूँ कहो अच्छा खाने और मुफ्त की गाडी में घुमने के जबर्दस्त शौकीन होते हैं | इन्हें खिलाने का जुगाड़ है भी या यूँ ही टिकट मखौल में ले लिए ?

वो झल्लाई .... किसने कहा था आपसे नेतागिरी करने को ...? नहीं सम्हलता तो घर बैठे होते| मै कहती हूँ चारा डालने वाले, एक ढूढो हजार मिलेंगे| इशारा करो ... प्रतिष्टित पार्टी का टिकट तो अल्लादीन का चिराग होता है|

नत्थू ने नासमझी की 'भौ' की, या दिनों को साथ मिला कर कहे तो अचरज में भौके ... ये अल्लादीन कहाँ से आ टपके ....

बीबी उवाच !, देखो आपको जो टिकट मिली है, कल वो यहाँ की रूलिंग पार्टी बनेगी| उसी रूलिंग पार्टी के आप, यानी हमारे बुद्धू पतिदेव, अपनी अर्धागिनी की बदौलत ऊँचे पद पर प्रतिष्टित होंगे | मैं तो आपको अभी से शपथ लेते भी देख रही हूँ .....| तो रही बात इन कार्यकर्ताओं को चारा बाटने -खिलाने की, तो मुझ पे छोड़िये | आप इन लोगों के साथ दौरा कीजिये बस ....|

और हाँ, हेलीकाफ्टर वगैरे का शौक हो तो बताते जाइये ....|

नत्थू ने पढ़ी-लिखी मगर देहातन बीबी के साथ सात फेरे लेते वक्त कल्पना भी नहीं किया था, कि एक दिन वो ही उसे कामयाबी के इतने ऊँचे शिखर तक ले जायेगी |

मैनेजमेंट में एम बी ए डिग्री भले न हो मगर अच्छे-अछे, इनके सामने, कोई पासंग का नहीं ठहरेगा |

लगातार कई रोज से भाई लोगों, मजदूरों, झंडे- दरी- चादर उठाने वालों को चारा खाते देखने में व्यस्त नत्थू की हलक कब सूखने लगी पता नहीं, वे पानी पीने के नाम पर हडबडा कर उठ बैठे|, उधर न पोस्टर न बेनर न चारा सूतते हुए कार्यकर्ता..... घर के सामने का मैदान खिड़की से सपाट दिख रहा था उसने देखा पत्नी खर्राटे भरते गहरी नींद सो रही है | उसे अपनी बीबी पर अनजाने में थैंक यु टाइप बहुत प्यार छलक आया |

सुशील यादव

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