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लोहमार्गी कथाएँ

मैं मोहनलाल इस रेलवे स्टेशन पर कैंटीन चलाता हूँ। आज एक और कहानी सुनिए। बात १९८३ के आसपास की होगी। तब टीवी ने सारी जनता को सम्मोहित किया हुआ था। पहले आम जनता के लिए मनोरंजन का विकल्प सिर्फ रेडियो और अख़बारों तक सीमित था। टीवी ने लोगों को घर बैठे सस्ता, सामाजिक और नवीन अनुभव दिया। टीवी ने काफी सामाजिक परिवर्तन भी लाये। मोहल्ले या बस्ती में एक टीवी पर्याप्त होता था। सभी लोग उस एक घर में शाम को बिना बुलाये आ जाते थे। चित्रहार के समय एक कमरे में १० महिलाएं बिना एक शब्द बोले आधा घंटे बैठ सकती थी ये टीवी की अभूतपूर्व उपलब्धि थी। हमारी कहानी भी उसी वक़्त की है। हमारी रेलवे कॉलोनी में पहला टीवी आया स्टेशन मास्टर के घर १९८३ में जो था EC कंपनी का ब्लैक एंड वाइट। वैसे शायद रेलवे इंजीनियर और दूसरे बड़े अधिकारियों के पास उसके पहले से टीवी हो पर रेलवे कॉलोनी का सार्वजनिक टीवी स्टेशन मास्टर साहब का ही था। रेलवे कॉलोनी निवासियों के लिए कपिल देव ने १९८३ का विश्व कप इसी EC टीवी पर उठाया था। स्टेशन मास्टर बड़े अच्छे स्वभाव के थे। वे कभी किसी को टीवी देखने के लिए मना नहीं करते थे। रविवार को सुबह उनके घर लोगों का जमावड़ा लगा रहता था। बस शाम को ८:३० के बाद उनकी ये अपेक्षा रहती थी की लोग अपने-अपने घर जाएँ। लोग भी खाना बनाने और खाने के लिए ८:३० बजे वहां से चले आते। लोग रात के धारावाहिक खास कर "हम लोग" नहीं देख पाते थे। लेकिन फिर भी किसी को कोई शिकायत नहीं थी। चित्रहार, कृषि दर्शन से लेकर रविवार की 'फीचर फिल्म'; लोग इतने में खुश थे। स्टेशन मास्टर जी की पत्नी को लोगों की भीड़ से थोड़ी परेशानी तो होती थी पर वे भी खुश थीं। एक तो इसलिए की टीवी देखने आने वाले बच्चे उनके घर के काम ख़ुशी से कर दिया करते थे और दूसरे वे पूरी रेलवे कॉलोनी के महिला मंडल का केंद्रबिंदु बन गयी थी। कॉलोनी की सारी घटनाएँ टीवी देखने आयी महिलाएं उन्हीं के घर पर सब को बताती थी।

पर वक्त एक सा नहीं रहता। एक साल के बाद अस्सिटेंट स्टेशन मास्टर (ASM) साहब ने भी ब्लैक एंड वाइट टीवी खरीद लिया। उनके घर रात के ८:३० का बंधन भी नहीं रहता था तो धीरे-धीरे सारी भीड़ SM के यहाँ से ASM के यहाँ जाने लगी। लोग SM को कहते

"साहब अब हम लोग आपको तकलीफ नहीं देंगे, ASM साहब के यहाँ भी टीवी आ गया है।"

वैसे लोगों की भीड़ जाने से SM साहब और उनकी पत्नी को अच्छा ही लगा था। अब वे शांति से बिना किसी शोरगुल के टीवी देख सकते थे। लेकिन ASM के घर जमी भीड़ को देखकर उन्हें कहीं न कहीं जलन होने लगी। SM साहब की पत्नी को तो ये बिल्कुल अच्छा नहीं लगा की महिला मंडल का केंद्र अब श्रीमती ASM हो गयी हैं। SM साहब और ASM साहब वैसे तो काफी घनिष्ठ थे लेकिन इस मामले में कहीं ना कहीं SM साहब के अहंकार पर वार हुआ था।

SM साहब ने इस समस्या का तोड़ निकाला। एक दिन दोपहर के भोजन के समय कैंटीन में जब ASM साहब और काफी स्टाफ मौजूद था, उन्होंने एक मिठाई का डब्बा मुझे दिया। फिर सभी को घोषणा करते हुए कहा की "भाई एक खुश-खबरी है। मैंने नया टीवी खरीद लिया है वो भी रंगीन। मोहनलाल सभी को मिठाई दो। " लोगों ने तालियां बजाई, मिठाईयां खाई। पर इससे पहले की लोग इस सोच में पड़े की अब टीवी देखने कहाँ जाया जाए , SM साहब ने एक और घोषणा कर दी।

"मेरे घर का पुराना ब्लैक एंड वाइट टीवी आज से प्लेटफॉर्म पर कैंटीन में रख दिया जायेगा, ताकि लोगों को टीवी देखने के लिए किसी के घर न जाना पड़े"

ये तो SM साहब ने कमाल कर दिया। १ तीर से ३ शिकार। पहला, इस कॉलोनी में मेरे जैसा टीवी किसी और के पास नहीं। दूसरा, टीवी प्लेटफॉर्म पर रहेगा तो उनके घर में भी शांति रहेगी और ASM साहब के घर का महत्व भी कम होगा। और तीसरा, लोगों को ये दिखा दिया की जो टीवी ASM के पास है वो तो मैं ऐसे ही दान कर सकता हूँ।

कैंटीन स्टेशन के यात्रियों की संख्या के हिसाब से काफी बड़ा था तो जगह की कमी का मुद्दा ही नहीं था। ASM साहब ने थोड़ा विरोध करते हुए ये कहा की कैंटीन में टीवी रखने से यात्रियों को तकलीफ होगी, लोग भीड़ लगा के रखेंगे और वेटर लोग व स्टेशन का अन्य स्टाफ अपना काम छोड़कर टीवी देखते रहेंगे। लेकिन बाकी का सभी स्टाफ टीवी के पक्ष में था इसलिए ये निर्णय हुआ की १ हफ़्ता टीवी कैंटीन में रखकर देखा जाए- अगर यात्रियों ने कोई शिकायत की, कुछ गड़बड़ हुई या कैंटीन की बिक्री में कमी आयी तो फिर टीवी हटा लिया जायेगा।

लेकिन हुआ इसके एकदम विपरीत। टीवी देखने के लिए यात्री कैंटीन में आने लगे और साथ में कुछ खाने को भी लेने लगे इससे कैंटीन की बिक्री बढ़ी। बाकी का स्टाफ जिसके लिए संभव था वो अपना काम जल्दी निपटा कर टीवी देखने आने लगे जिससे काम भी टाइम पर होने लगे। साथ में यात्रियों के लिए भी प्लेटफॉर्म पर प्रतीक्षा करते हुए टीवी देखना अलग अनुभव था इसलिए किसी ने कोई शिकायत भी नहीं की। कॉलोनी स्टेशन से बिल्कुल लग कर ही थी इसलिए सारे ऑफ ड्यूटी पुरुष और साथ में बच्चे टीवी देखने कैंटीन आने लगे। महिलाएं कलर टीवी देखने फिर से श्रीमती SM के घर जाने लगी इससे महिला मंडल में उनका वर्चस्व फिर से कायम हो गया।

कैंटीन में TV आया और कैंटीन का रंग ही बदल गया। आम तौर पर कैंटीन में दोपहर और रात का भोजन छोड़ दें तो बस ४-५ लोग रहते थे। लेकिन अब जब भी दूरदर्शन की कोई भी सभा होती कैंटीन भरा-भरा रहता। शर्मा जी (TC ) के पिताजी कॉलेज में प्रोफेसर थे और अब रिटायर्ड हो चुके थे। वे दोपहर को UGC (यूनिवर्सिटी ग्रांट कमिशन) के शैक्षणिक कार्यक्रम देखने अवश्य आते। पार्सल क्लर्क सुब्रमण्यम साहब तो रात को १० बजे के अंग्रेजी समाचार देखने के लिए आते थे। लेकिन सबसे ज्यादा भीड़ रहती थी चित्रहार के समय। बुधवार और शुक्रवार को शाम को ८ बजे किसी गाडी का टाइम नहीं होता था तो मानों सारा प्लेटफॉर्म और स्टाफ कैंटीन में ही आ जाते।

लेकिन असली मज़ा आया उस बुधवार को। वही चिंगारी थी जिससे आग भड़की और फिर अगले कई हफ्ते सुलगती रही। बात ऐसे थी की दयाशंकर कुली जो अमिताभ बच्चन का फैन था हर गाना शुरू होने के पहले "अगला गाना अमिताभ का ही आएगा" की रट लगाए रहता। १-२ हफ़्तों के बाद उसकी इस आदत से सब चिढ़ने लगे। उस दिन चित्रहार शुरू होने के पहले दयाशंकर फिर से बोला की पहला गाना अमिताभ का आएगा।

ये सुनते ही उसका साथी कुली हज़ारी प्रसाद चिढ कर बोला "दया बहुत सुन लिया तेरा। अब अगर पहला गाना अमिताभ का नहीं आया तो मुझे चाय पिलानी पड़ेगी। "

दया मान गया। पहला गाना "तू गंगा की मौज़ मैं जमुना का धारा" था तो हज़ारी शर्त जीत गया।

पहला गाना खत्म होने के पहले आदतानुसार दया फिर से बोला "अगला गाना पक्का अमिताभ का आएगा"।

हज़ारी ने फिर से उसे उकसाया "नहीं आया तो मुझे सुबह का नाश्ता करवाना पड़ेगा"

अगला गाना "ज़िन्दगी एक सफर है सुहाना" था। हज़ारी फिर जीत गया।

अगले गाने के पहले दया फिर बोला "अगला गाना तो पक्का ही अमिताभ का आएगा"

अब हज़ारी का उत्साह भी बढ़ गया था वो बोला "और अगर नहीं आया तो मुझे ५ रूपए देना पड़ेंगे। "

दया मान गया और ५ रूपए भी हार गया। अगला गाना "बाबूजी धीरे चलना" था।

अब दया को होश आया की हज़ारी उसे मूर्ख बना रहा है।

इस बार दया हज़ारी का बोला के "हज़ारी अब तू बता अगला गाना कौन सा होगा। "

" मेरे को नहीं मालूम" हज़ारी मुस्कुराते हुए बोला।

"ऐसे नहीं चलेगा, तेरे को भी अंदाज़ा लगाना पड़ेगा वरना चाय नाश्ता और पैसे भूल जा। "

"नहीं ऐसे नहीं!! शर्त तो ऐसी नहीं लगी थी दया, हमने तुझे कहाँ बोला था की तू अगला गाना किसका आएगा ये बता। "

और फिर दोनों की तू-तू मैं-मैं शुरू हो गयी। लोगों को चित्रहार में शोरगुल पसंद नहीं आया और उन्होंने दोनों को चुप रहने को या बाहर जाकर लड़ने को बोला।

और अगला गाना अमिताभ का आ गया "रोते हुए जाते हैं सब। "

ये देख कर दया कहने लगा की "मैं जीत गया। "

हज़ारी बोला "नहीं ऐसा थोड़े ही होता है तूने इस बार कहा बोला था कि अगला गाना अमिताभ का होगा। "

इस पर दोनों एक दूसरे से भिड़ गए। दोनों को लोगों ने कैंटीन के बाहर किया।

सुबह हज़ारी और दया दोनों मेरे पास आये और मुझसे कहा की इस बात का फैसला करें की हज़ारी को चाय, नाश्ता और पैसे मिलने चाहिए या नहीं। मैंने हज़ारी से कहा देख भाई वैसे तो तू शर्त जीता है लेकिन बेचारे दया के बारे में सोच वो अमिताभ का भक्त है इसलिए उसने ऐसा बोला। उसकी भावना को समझ और उसे बेवकूफ मत बना। शर्त लगनी है तो दोनों तरफ से लगनी चाहिए।

"ठीक है, तो कल शुक्रवार का चित्रहार आएगा उसमें राजेश खन्ना का १ गाना ज़रूर होगा अगर नहीं आया तो मैं दया को २ रूपए दूंगा।" हज़ारी राजेश खन्ना का भक्त था ये मुझे तब पता चला।

"ठीक है हज़ारी, अगर कल अमिताभ का १ भी गाना नहीं आया तो मैं तुझे २ रुपये दूंगा"।

"मुझे तुझ पर विश्वास नहीं दया, तू २ रुपये निकाल के मोहनलाल जी को दे दे, मैं भी देता हूँ। शर्त ऐसे पक्की होगी"।

दया मान गया और दोनों ने मुझे २-२ रूपए निकल कर दे दिए।

शुक्रवार के चित्रहार में राजेश खन्ना का "कोरा कागज़ था ये मन मेरा" गाना आया और अमिताभ का कोई गाना नहीं आया। मैंने चित्रहार खत्म होने के बाद हज़ारी ४ रूपए दे दिए।

हज़ारी ने मुझे उसमे से २५ पैसे दिए और कहा "आप भी रखो थोडे। "

दूसरे कुलियों और स्टाफ ने इस पैसे के लेनदेन के बारे में पूछताछ की और फिर इस विषय पर काफी गपशप भी हुई ।

अगले बुधवार को चित्रहार शुरू होने से पहले मेरे पास २० रूपए थे और साथ ही १० हीरो के नाम नाम थे। जिस -जिस के बताये गए हीरो के गाने आएंगे उस उस को मुझे ४ देने थे और बचा हुआ सारा पैसा मेरा। उस दिन मुझे १४ रूपए देने पड़े और ६ रूपए मेरी जेब में गए। एक दो हफ़्तों ऐसे ही चलता रहा और मुझे पता भी नहीं चला की कब मैं इस स्टेशन प्लेटफॉर्म पर चित्रहार का सट्टा चलाने लगा था। कैंटीन के काउंटर पर मैं १ छेद वाला बक्सा रखने लगा, लोग अपना नाम और हीरो का नाम एक कागज़ पर लिखते और उस कागज़ के अंदर पैसे रख कर कागज़ मोड देते और डब्बे में डाल देते। जिसके हीरो का गाना आता उसे मैं दुगुने पैसे देता। शुरू-शुरू में ये खेल मज़े के लिए चल रहा था पर बाद में लोग उसे पैसे कमाने का जरिया समझने लगे। कभी-कभी कोई १०-२० रूपए भी लगा देता। मुझे इस खेल में हर बार कम से कम १० रूपए का फायदा होता। बाद में लोगों ने अभिनेत्रियों के नाम लिखना भी शुरू किया वो भी मैंने मंज़ूर किया। लेकिन फिर एक दिन मुझे "मोहम्मद रफ़ी" और "लता मंगेशकर" की चिट्ठियां मिली और चूंकि इन दोनों के गाने तो चित्रहार में आते ही थे मुझे काफी पैसे देने पड़े। फिर मैंने सिर्फ अभिनेता और अभिनेत्रियों के नाम ही स्वीकार करना शुरू किया। पहले लोग अपने पसंदीदा कलाकार पर पैसे लगाते थे लेकिन बाद में लोग पैसे कमाने के लिए प्रसिद्ध अभिनेता और अभिनेत्री पर पैसे लगाने लगे। सबसे ज्यादा पैसे राज कपूर, धर्मेंद्र, जीतेन्द्र, अमिताभ और राजेश खन्ना पर लगते थे। जब किसी के हीरो का गाना आता तो वो ख़ुशी से शोर मचाने लगता। कभी-कभी लोग झगडे भी करते थे। एक बार एक धर्मेंद्र की चिट्ठी वाला आदमी मुझसे पैसे मांगने लगा क्योंकि "ख़ामोशी" फिल्म का "तुम पुकार लो" गाना आया था। मैंने कहा मुझे तो धर्मेंद्र की शक्ल नहीं दिखी तो उसका कहना था की गाने में धर्मेंद्र को पीछे से ही दिखाया गया है लेकिन है धर्मेंद्र ही। कुल मिला के चित्रहार धीरे-धीरे गानों का आनंद लेने की बजाये जुआ खेलने का साधन बन गया। और जो लोग संगीत प्रेमी थे उन्होंने SM के पास इसकी शिकायत की। SM साहब मेरे काफी परिचय के थे। उन्होंने मुझे ये सब बंद करने को कहा, मैंने उन्हें आश्वस्त किया की ये सब बंद हो चुका समझिये। लेकिन मुझे भी इस काम में मज़ा आने लगा था और पैसा भी मिलने लगा था, तो मैंने ये सट्टा चालू ही रखा। बस लोगों को कहा की चित्रहार के समय सारे गाने लिख लिए जायेंगे और पैसे का हिसाब अगले दिन सुबह होगा। अगर किसी ने चित्रहार के समय ज़रा भी शोर मचाया तो उसके सारे पैसे जब्त माने जायेंगे और उसे इस खेल से हमेशा के लिए बाहर कर दिया जायेगा। किसने किस पर पैसे लगाए हैं और कौन कितना जीता है ये भी सब को नहीं बताया जायेगा। लोग भी इस खेल में काफी डूब चुके थे तो उन्होंने भी मेरा साथ दिया। हर चित्रहार पर कम से कम २० चिट्ठियां आती थी तकरीबन ५० रूपए लगते थे। मुझे ३० से ४० रुपये देना पड़ते थे ।

लेकिन एक बुधवार को गज़ब हुआ। रामचंद्र गैंगमैन जो अभी तक इस खेल से बाहर ही था उसने १०-१० रुपये की ५ चिट्ठियां डाली। उसने हर नाम के आगे एक संख्या भी लिखी थी।

१. प्रदीप कुमार २. विश्वजीत ३. नादिरा ४. सुनील दत्त ५. वहीदा रहमान

और उस दिन के चित्रहार में ये गाने आये।

१. जो वादा किया वो निभाना पड़ेगा।

२. पुकारता चला हूँ मैं।

३. आगे भी जाने ना तू।

४. ना मुह छुपा के जियों

५. पिया तोसे नैना लागे रे.

रामचंद्र के सारे अभिनेता अभिनेत्री के गाने आये थे और वो भी उसी क्रम में जो उसने सोचे थे। मुझे उसे १०० रुपये देने पड़े। उस दिन पहली बार मुझे इस खेल में ४० रुपये का नुकसान हुआ था।

मैंने रामचंद्र से पूछा की भाई क्या राज़ है, तूने कैसे ये सारे अभिनेता पहचाने और वो भी क्रम में। इस पर रामचंद्र मुस्कुराता हुआ चला गया।

अगले दिन याने शुक्रवार को रामचंद्र ने २०-२० रुपये की छह चिट्ठियां डाली और फिर से सारी चिट्ठियों के अभिनेताओं के गाने आये और वो भी उसी क्रम में। और खास बात ये की उसने ६ चिट्ठियां डाली और चित्रहार में इस बार ६ गाने आये थे। मुझे इस बार १०० रुपये का नुक़सान हुआ था और अब मैं ये खेल बंद करने की सोच रहा था। लेकिन मुझे इस बात का कुतूहल था की रामचंद्र इतना सटीक अंदाज़ा कैसे लगा लेता है।

मैंने रविवार को रामचंद्र को घर पर दावत पर बुलाया और काफी शराब पिलाई और फिर से उसका राज़ पूछा। उसने बताने को मना कर दिया। फिर मैंने उसे समझाया की मैंने ये खेल बंद कर दिया है और अब उसे कोई फायदा नहीं होने वाला। और भी काफी मिन्नतें करने के बाद रामचंद्र अपनी बात बताने को राज़ी हुआ। रामचंद्र ने जो कहा वो सुनकर मैं अवाक रह गया। उसने बताया की ये चिट्ठियां और पैसे उसे स्टेशन मास्टर देते थे और सुबह दुगुने पैसे वो मास्टर को दे कर आता था उसे इस काम के बदले १० रूपए दिए जाते थे।

सोमवार को सुबह मैंने वो पैसे डालने वाला बक्सा कैंटीन के टेबल से हटाया और टेबल पर १ कागज़ पर बड़े अक्षरों में लिखा "आज से सब बंद"। दोपहर के खाने के वक्त स्टेशन मास्टर कैंटीन में आये लेकिन मेरी उनकी तरफ देखने की हिम्मत नहीं हुई । दोपहर के बाद जब उनके ऑफिस में कोई नहीं था मैं स्टेशन मास्टर से मिलने गया।

"आओ-आओ मोहन कैसे आना हुआ " मास्टर जी ने पूछा।

"साहब आपको तो सब मालूम ही है" मैंने मुंह लटका के जवाब दिया।

"तो रामचंद्र ने तुम्हें बता ही दिया। अब बताओ ये खेल बंद करना है या नहीं। "

"क्यों शर्मिंदा कर रहे हैं साहब, अब ये सब बिलकुल बंद"

"ऐसा तुमने पहले भी कहा था"।

"नहीं साहब हम तो सिर्फ खेल-खेलते थे, अब इस स्टेशन में दिन भर के काम के बाद लोगों का दिल लगा रहे इसलिए थोड़ी सी मस्ती तो चाहिए न साहब। सोचिये ये सारा स्टाफ सालों से रोज यहाँ आता है वही काम रोज करता है और घर चला जाता है। इनकी ज़िन्दगी में कोई नयी चीज़, कोई नई उत्तेजना ही नहीं थी। आप देखिये पिछले २ महीने से सारा स्टाफ पहले से ज्यादा उत्साहित दिखता है। आदमी को जीने के लिए कोई स्वप्न, कोई संघर्ष, कोई पहेली चाहिए होती है इसके बिना आदमी की ज़िन्दगी बेजान होती है। हमारे इस गाँव में खेल का कोई साधन नहीं, कोई नाटक नहीं होते ऐसे में ये लोग अपना दिल यहाँ लगा लें तो कौन सी बड़ी बात हो गयी?"

"देखो मोहनलाल मुझे पता है की तुम पढ़े लिखे और समझदार हो। तुम चतुर भी हो और बोलते भी अच्छा हो लेकिन इससे ये मत समझना की बुरे को अच्छा साबित करने में सफल हो जाओगे। अगर सिर्फ खेल ही चल रहा था तो पिछले हफ्ते पैसा हारने के बाद आज तुमने "आज से सब बंद" का नोटिस क्यों रखा है? आज जब तुम्हें नुकसान हुआ तब तुम्हें ये खेल बुरा लगने लगा। कभी सोचा है की अभी तक हर हफ्ते जब-जब तुमने पैसा कमाया है किसी ना किसी ने गंवाया है। ये लोग मेहनत करके पैसा कमाते हैं वो क्या इस तरह जुए में उड़ाने के लिए? कैंटीन में टीवी मनोरंजन के लिए रखा था जुआ खेलने के लिए नहीं। और जहाँ तक जीवन के उद्देश्य, उत्साह या स्वप्न की बात है, लोगों के पास हमेशा अच्छे और सकारात्मक विकल्प होते हैं लेकिन वो थोड़े मुश्किल होते हैं। लोगों को संघर्ष चाहिए, पहेली चाहिए लेकिन आसान पहेली, ऐसे संघर्ष जिनको सरलता से जीता जा सके। तुम कहते हो की लोगों को स्पर्धा, संघर्ष चाहिए और यहाँ खेल की सुविधाएँ नहीं है। तो "खेल की सुविधा ना होना" इसे तुम समस्या या पहेली क्यों नहीं मानते। क्या हमारे गाँव में खेल की सुविधाएँ तैयार करना एक संघर्ष, एक उद्देश्य, एक ध्येय नहीं हो सकता? एक बात और सुनो। ये खेल नहीं हो रहा था ये व्यसन था। और हर व्यसन के पीछे ध्येय की कमी ये ही बहाना होता है फिर वो जुआ हो, शराब हो या तम्बाकू। लोग इस तरह के व्यसन आसानी ने पैसे खर्च करके खरीद लेते हैं और जीवन के असली संघर्ष और ध्येय की उपेक्षा करते हैं। फिर व्यसन ही इन लोग को ध्येय उद्देश्य और आखिर में संघर्ष बन जाता है। "

"साहब मुझे माफ़ कर दीजिये, सच में "आज से सब बंद। " मैंने अपराधी भावना से कहा।

" ठीक है जाओ"।

"लेकिन साहब वो..... " मैं कुछ बोलने की कोशिश कर रहा था।

"मोहन तुम्हें तुम्हारे हारे हुए पैसे नहीं मिलेंगे" साहब ने हँसते-हँसते कहा।

"नहीं साहब पैसे नहीं चाहिए पर ये तो बताइये की आपने सही अभिनेताओं की चिट्ठियां कैसे बनाई" असल में मुझे पैसे ही मांगने थे पर मैंने चतुराई से बात पलटते हुए कहा।

"वो तो बहुत आसान बात है कोई भी सोच सकता है, मेरा भतीजा दूरदर्शन में काम करता है और फ़ोन के बारे में तुमने सुना ही होगा" साहब मुझे चिढाते हुए बोले।

"ठीक है साहब" मैं उदास होकर जाने लगा।

"रुको मोहन ये लो १५० रूपए जो मैंने २ दिन में जीते हैं और इनसे हमारी कॉलोनी का ग्राउंड साफ़ करके समतल करवाओ और स्पोर्ट्स क्लब शुरू करो। एक फुटबाल और एक वॉलीबॉल भी खरीदो, तुम्हारे इस खेल के सभी खिलाडियों को आवश्यक रूप से वहां शामिल होना होगा। इससे लोगों का संघर्ष और प्रतिस्पर्धा बाहर आएगी और थोड़ी चर्बी भी कम होगी। और मैं भी २ दिन तुम्हारे खेल का खिलाडी रहा हूँ तो अब से मैं भी रोज शाम को वहीं आऊंगा टीवी रात को १ घंटे ही ठीक है।"

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