संत कबीर जी के इस दोहे को अक्सर लोग गलत समझ लेते हैं। वे सोचते हैं कि कबीर जी हमें डरा रहे हैं या जीवन से निराश कर रहे हैं कि “जब अंत में मिट्टी ही होना है, तो मेहनत क्यों करें?” लेकिन असल में यह निराशा की नहीं, बल्कि जीवन को सही ढंग से जीने की सबसे बड़ी प्रेरणा है। गहरे अर्थ की व्याख्या यहाँ मिट्टी और कुम्हार के माध्यम से समय के चक्र को समझाया गया है। कुम्हार मिट्टी को अपने पैरों से कुचलता है ताकि वह घड़ा बना सके। तब मिट्टी उसे याद दिलाती है कि आज वक्त तुम्हारा है, इसलिए तुम मुझ पर हावी हो। लेकिन वक्त हमेशा एक जैसा नहीं रहता। जब यह जीवन समाप्त होगा, तब तुम इसी मिट्टी में समा जाओगे और मैं तुम्हारे ऊपर आ जाऊँगी। कबीर जी यहाँ किसी को डरा नहीं रहे, बल्कि हमें अहंकार से दूर रहने की चेतावनी दे रहे हैं।

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अमृत वाणी - संत वाणी - 1

“माटी कहै कुम्हार सों, तू क्या रौंदे मोहि।इक दिन ऐसा होयगा, मैं रौंदूगी तोहि।।”संत कबीर जी के इस दोहे अक्सर लोग गलत समझ लेते हैं। वे सोचते हैं कि कबीर जी हमें डरा रहे हैं या जीवन से निराश कर रहे हैं कि “जब अंत में मिट्टी ही होना है, तो मेहनत क्यों करें?” लेकिन असल में यह निराशा की नहीं, बल्कि जीवन को सही ढंग से जीने की सबसे बड़ी प्रेरणा है।गहरे अर्थ की व्याख्यायहाँ मिट्टी और कुम्हार के माध्यम से समय के चक्र को समझाया गया है। कुम्हार मिट्टी को अपने पैरों से कुचलता है ताकि वह ...और पढ़े

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अमृत वाणी - संत वाणी - 2

संत रहीम दास जी का यह दोहा समाज में ऊंच-नीच के भेद को मिटाकर हर व्यक्ति का सम्मान करना है।“रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिये डारि।जहाँ काम आवै सुई, कहा करै तरवारि।।”अक्सर लोग इस दोहे को पढ़कर सोचते हैं कि क्या बड़े लोगों या बड़ी चीज़ों का कोई महत्व नहीं है? लेकिन रहीम जी यहाँ बड़े लोगों का अपमान नहीं कर रहे हैं, बल्कि वे हमें हर छोटी-से-छोटी चीज़ और छोटे व्यक्ति की अनूठी कीमत (Value) समझा रहे हैं।गहरे अर्थ की व्याख्या :इस संसार में जब किसी व्यक्ति को बड़ा पद, पैसा या प्रभाव मिल जाता है, तो ...और पढ़े

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अमृत वाणी - संत वाणी - 3

संत तुलसीदास जी की यह अमर चौपाई जीवन में सबसे बड़ा पुण्य और सबसे बड़ा पाप क्या है, इसे ही सीधे और तार्किक तरीके से समझाती है। इसे बिना किसी भ्रम और सटीक उदाहरण के साथ नीचे तैयार किया गया है:“पर हित सरिस धरम नहिं भाई।पर पीड़ा सम नहिं अधमाई।।”अक्सर लोग पुण्य कमाने के लिए कठिन व्रत, अनुष्ठान या दूर-दूर की यात्राएं करते हैं। लेकिन तुलसीदास जी ने इस चौपाई में पुण्य की एक बेहद सरल और व्यावहारिक परिभाषा दी है, जिसे हर आम इंसान अपने दैनिक जीवन में अपना सकता है।गहरे अर्थ की व्याख्यातुलसीदास जी कहते हैं कि ...और पढ़े

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अमृत वाणी - संत वाणी - 4

“जे का रंजले गांजले। त्यासी म्हणे जो आपुले।तोचि साधु ओळखावा। देव तेथेचि जाणावा।।”संत तुकाराम जी महाराज का यह अभंग ही सीधा, सरल और मन को छू लेने वाला है। वे यहाँ समझा रहे हैं कि जो व्यक्ति इस संसार के दुखी, गरीब और असहाय लोगों को अपना समझकर गले लगाता है, वही वास्तव में सच्चा संत है और ईश्वर साक्षात वहीं निवास करते हैं।संत तुकाराम जी स्वयं भगवान विट्ठल के बहुत बड़े भक्त थे। वे इस अभंग के माध्यम से हमें भक्ति का एक बहुत ही व्यावहारिक रूप दिखा रहे हैं।व्यावहारिक उदाहरणइसे हम एक बहुत ही सीधे उदाहरण से ...और पढ़े

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अमृत वाणी - संत वाणी - 5

“रहिमन ओछे नरन सो, बैर भलो न प्रीति।काटे चाटे स्वान के, दुहूँ भाँति विपरीत।।”रहीम जी का यह कालजयी दोहा समाज में जीने, इंसानी स्वभाव को पहचानने और व्यावहारिक जीवन (Social Wisdom) को कुशलता से चलाने का अचूक मंत्र देता है।रहीम जी स्पष्ट रूप से समझाते हैं कि जो लोग ओछे (संकीर्ण मानसिकता वाले), नकारात्मक, स्वार्थी या दुर्जन स्वभाव के होते हैं, उनसे न तो दुश्मनी (बैर) अच्छी होती है और न ही बहुत ज़्यादा गहरी दोस्ती (प्रीति)। ऐसे लोगों से हमेशा एक गरिमामय और मर्यादित दूरी (Healthy Boundary) बनाकर रखनी चाहिए, क्योंकि आप उनसे चाहे जैसा रिश्ता रखें, अंत ...और पढ़े

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अमृत वाणी - संत वाणी - 6

“विद्येविना मती गेली, मतीविना नीती गेली।नीतीविना गती गेली, गतीविना वित्त गेले।वित्ताविना शूद्र खचले, इतके अनर्थ एका अविद्याने केले।।”ज्योतिबा फुले कहते हैं कि शिक्षा (ज्ञान) के बिना बुद्धि चली जाती है। जब बुद्धि नहीं होती, तो इंसान की नैतिकता (सही-गलत की समझ) समाप्त हो जाती है। जब नैतिकता नहीं होती, तो जीवन की प्रगति (विकास) रुक जाती है। प्रगति रुकने से धन और समृद्धि चली जाती है। और धन-सम्मान के बिना इंसान पूरी तरह टूट जाता है। जरा सोचिए, ये सारे अनर्थ सिर्फ एक 'अज्ञानता' (शिक्षा न होने) के कारण होते हैं।अक्सर लोग इस वाणी को केवल एक सामाजिक भाषण ...और पढ़े

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अमृत वाणी - संत वाणी - 7

“क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः।स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति।।” –(श्रीमद्भगवद गीता - अध्याय 2, श्लोक 63)अक्सर लोग क्रोध को केवल एक क्षणिक भावना मानते हैं, लेकिन श्रीकृष्ण इस श्लोक में क्रोध के उस खतरनाक वैज्ञानिक चक्र को समझा रहे हैं जो पल भर में इंसान का पूरा जीवन बर्बाद कर सकता है।श्रीकृष्ण कहते हैं कि क्रोध से मनुष्य की बुद्धि में संमोह (मूढ़ता या अंधकार) पैदा होता है। बुद्धि में अंधकार छाने से उसकी स्मृति (याददाश्त और सही-गलत की समझ) भ्रमित हो जाती है। स्मृति भ्रमित होने से मनुष्य की बुद्धि का नाश हो जाता है। और जिस मनुष्य की बुद्धि का नाश ...और पढ़े

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अमृत वाणी - संत वाणी - 8

“प्यार और विनम्रता ही जीवन के सच्चे आभूषण हैं, बाकी सब केवल बाहरी दिखावा है।”यह विचार आज के इस और दिखावे के युग के लिए एक बहुत बड़ा जीवन-मंत्र है, जहाँ लोग बाहरी सुंदरता को ही सब कुछ मान बैठे हैं।गहरे अर्थ की व्याख्यासंत तिरुवल्लुवर जी कहते हैं कि मनुष्य का असली मूल्य इस बात से तय नहीं होता कि उसने कितने महंगे कपड़े पहने हैं या उसके पास कितनी बड़ी गाड़ी है। मनुष्य का वास्तविक सौंदर्य उसके ‘चरित्र’ से झलकता है। जिसके भीतर हर जीव के प्रति ‘प्यार’ (Love) है और जिसके व्यवहार में ‘विनम्रता’ (Humility) है, ईश्वर ...और पढ़े

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अमृत वाणी - संत वाणी - 9

“वैष्णव जन तो तेने कहिए जे पीर पराई जाणे रे।पर दुःखे उपकार करे तोये मन अभिमान न आणे रे।।”गहरे की व्याख्यानरसी मेहता जी इस भजन में कहते हैं कि ईश्वर का सच्चा भक्त या धार्मिक इंसान (वैष्णव) केवल वही है जो ‘पीर पराई जाणे’ अर्थात दूसरों के दुःख, दर्द और पीड़ा को अपनी पीड़ा समझता है, वह दुखी और असहाय लोगों की मदद करता है, और सबसे महत्वपूर्ण बात—दूसरों पर उपकार या उनकी मदद करने के बाद भी उसके मन में रत्ती भर भी घमंड (अभिमान) नहीं आता कि “मैंने किसी की मदद की है।”व्यावहारिक उदाहरणइसे आप चिकित्सा या ...और पढ़े

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अमृत वाणी - संत वाणी - 10

“हर जीव के भीतर साक्षात नारायण का वास है, इसलिए किसी भी प्राणी को छोटा या अछूत समझना ईश्वर अपमान है।”शंकरदेव जी ने 15वीं-16वीं शताब्दी में असम में एक महान सांस्कृतिक और आध्यात्मिक क्रांति की शुरुआत की थी। उन्होंने ‘एकशरण नाम धर्म’ का प्रचार किया, जिसका मूल आधार ही यही था कि परमेश्वर एक हैं और उनकी बनाई इस दुनिया में सभी बराबर हैं।गहरे अर्थ की व्याख्यामहाप्रभु शंकरदेव जी कहते हैं कि परमात्मा केवल मंदिरों की मूर्तियों या आसमान में ही नहीं बैठे हैं। वे इस संसार के हर एक जीव—चाहे वह एक अमीर व्यक्ति हो, एक गरीब मजदूर ...और पढ़े

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अमृत वाणी - संत वाणी - 11

“अजगर करै न चाकरी, पंछी करै न काम।दास मलूका कहि गए, सब के दाता राम॥” — संत मलूक दासअक्सर इस दोहे को सतही तौर पर पढ़कर बहुत बड़ी गलतफहमी का शिकार हो जाते हैं। वे सोचते हैं कि मलूक दास जी हमें आलसी बनने, कामधंधा छोड़ने या भाग्य के भरोसे हाथ पर हाथ धरकर बैठने की सलाह दे रहे हैं। लोग सोचते हैं कि “अगर भगवान को ही सब देना है, तो हम मेहनत क्यों करें?” लेकिन असल में यह दोहा आलस का नहीं, बल्कि मानसिक तनाव से मुक्ति और ब्रह्मांड की व्यवस्था पर ‘परम विश्वास’ का सबसे बड़ा ...और पढ़े

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अमृत वाणी - संत वाणी - 12

हम अक्सर अपनी असफलताओं के लिए अपनी किस्मत या अपनी मेहनत को दोष देते हैं। लेकिन क्या आप जानते कि आपके आस-पास मौजूद लोग और विचार आपके जीवन की दिशा तय कर रहे हैं? संत तुलसीदास जी ने इस बात को प्रकृति के एक बेहद खूबसूरत उदाहरण से समझाया है :“कदली, सीप, भुजंग मुख, स्वाति एक गुन तीन।जैसी संगति बैठिए, तैसो ही फल दीन॥” — संत तुलसीदास(स्वाति नक्षत्र की बूंद तो एक ही होती है, लेकिन अलग-अलग संगति के कारण उसके तीन रूप हो जाते हैं। यदि वह केले के पेड़ पर गिरे तो कपूर, सीप में गिरे तो ...और पढ़े

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अमृत वाणी - संत वाणी - 13

हम अक्सर जिंदगी में उन चीजों को हासिल करने के लिए दिन-रात दौड़ रहे हैं, जिन्हें हम मरने के साथ नहीं ले जा सकते। इस अंधी दौड़ में हम बाहर से तो बहुत अमीर या कामयाब दिखते हैं, लेकिन अंदर से उतने ही अकेले और बेचैन होते हैं। गुरु नानक देव जी ने इस मानवीय स्वभाव को एक बेहद सरल और गहरे सत्य से समझाया है:“मनुख बिनु बूझे बिरथा आया।कचहु कंचनु कहु की कीआ, निहचलु कछु न पाइआ।” — श्री गुरु ग्रंथ साहिब (गुरु नानक देव)इस वाणी को पढ़कर लोग अक्सर यह गलत मतलब निकाल लेते हैं कि गुरु ...और पढ़े

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अमृत वाणी - संत वाणी - 14

हम इंसानों की एक बहुत अजीब आदत है। हम उस कल के बारे में सोच-सोचकर आज घुटते रहते हैं, अभी तक आया ही नहीं है। हमारा आधा जीवन उन मुसीबतों के बारे में चिंता करने में बीत जाता है, जो असल में कभी हमारे जीवन में आती ही नहीं। हम अपने विचारों के पिंजरे में खुद ही कैद हो जाते हैं। इस मानसिक बीमारी को बहुत गहराई से समझते हुए कबीर जी कहते हैं:“चिंता ऐसी डाकिनी, काटि करेजा खाय।वैद बिचारा क्या करे, कहां तक दवा लगाय॥” — संत कबीरदासइस बात को पढ़कर लोग अक्सर एक गहरे विरोधाभास में उलझ ...और पढ़े

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अमृत वाणी - संत वाणी - 15

हम अक्सर किसी व्यक्ति के बाहरी ठाट-बाट, महंगे कपड़ों, सोने के गहनों या उसकी मीठी-मीठी चिकनी बातों को देखकर बहुत महान और अच्छा इंसान मान लेते हैं। लेकिन कई बार उस चमक-दमक के पीछे एक बहुत ही कड़वा, कपटी और स्वार्थी स्वभाव छिपा होता है। इसके विपरीत, एक सच्चा और ईमानदार इंसान बाहर से बहुत सीधा और साधारण दिख सकता है। इस इंसानी स्वभाव के अंतर को संत वेमना ने प्रकृति के अद्भुत उदाहरण से समझाया है:“सोना टूटे तो जुड़े, सौ बार जुड़े सहर्ष।कनककुंभ सौ कनक के, माटी घट एक कर्ष॥”( यानी: सोना सौ बार भी टूटे तो अपनी ...और पढ़े

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अमृत वाणी - संत वाणी - 16

हम सब जीवन में ज्ञान पाना चाहते हैं, ईश्वर को खोजना चाहते हैं, और मन की शांति चाहते हैं। लिए हम मोटी-मोटी किताबें पढ़ते हैं, बड़े-बड़े प्रवचन सुनते हैं और खुद को बहुत ज्ञानी समझने लगते हैं। लेकिन इतना सब करने के बाद भी हमारा गुस्सा, हमारा लालच और हमारी बेचैनी वैसी की वैसी ही बनी रहती है। इस खोखले ज्ञान और आंतरिक सच्चाई के अंतर को संत रामकृष्ण परमहंस जी ने एक बहुत ही सुंदर उदाहरण से समझाया है:“किताबों के भीतर ‘पंचांग’ (कैलेण्डर) तो होता है, और उसमें लिखा भी होता है कि इस साल इतनी भारी बारिश ...और पढ़े

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अमृत वाणी - संत वाणी - 17

हम अक्सर सोचते हैं कि पवित्रता केवल सुबह नहा-धोकर मंदिर जाने, ग्रंथों को छूने या ऊंचे सामाजिक बंधनों को में है। हम बाहर से तो बहुत साफ-सुथरे और शुद्ध बन जाते हैं, लेकिन हमारे भीतर समाज के कमजोर लोगों के प्रति छुआछूत, भेदभाव और कड़वाहट बनी रहती है। इस खोखली शुद्धता को तोड़ते हुए एकनाथ महाराज ने समझाया कि असली पवित्रता बाहर के छुआछूत में नहीं, बल्कि मन की करुणा में है। उनका एक बहुत ही सुंदर और प्रसिद्ध विचार है:“जिसके हृदय में दया, क्षमा और शांति का वास है, साक्षात परमात्मा वहीं निवास करते हैं। ईश्वर को ढूंढने ...और पढ़े

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अमृत वाणी - संत वाणी - 18

हम अक्सर सोचते हैं कि हमारे जीवन में दुख इसलिए है क्योंकि हमारे पास साधनों की कमी है। लेकिन हम ईमानदारी से अपने मन की जांच करें, तो हमें पता चलेगा कि हम अपने दुखों से उतने दुखी नहीं हैं, जितने दूसरों के सुखों को देखकर दुखी होते हैं। पड़ोसी की नई गाड़ी, दोस्त का नया प्रमोशन या सोशल मीडिया पर किसी की चकाचौंध देखकर हमारा मन अंदर ही अंदर सुलगने लगता है। इस मानसिक बीमारी को संत सुंदरदास जी ने बहुत ही करारे शब्दों में समझाया है:“पर सुख देखि न सकत जिय, जरि-बरि होवत छार।सुंदर ऐसे मनुष को, ...और पढ़े

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अमृत वाणी - संत वाणी - 19

हम सब दिन-रात इस तलाश में भाग रहे हैं कि कहीं से हमें थोड़ा सुख और मन का सुकून जाए। हम सोचते हैं कि जब बहुत सारा पैसा आ जाएगा, बड़ा घर मिल जाएगा या बड़ी गाड़ी आ जाएगी, तब हम खुश होंगे। लेकिन सच यह है कि जैसे-जैसे बाहरी चीजें बढ़ती हैं, हमारे मन की भूख और ज़्यादा बढ़ती जाती है। इस अंतहीन दौड़ और असली सुख के रहस्य को संत तुकाराम जी ने बहुत सरलता से समझाया है:“तुका म्हणे सुख संतापाचे मूळ।चित्त समाधान नाही ज्या पाशी॥” — संत तुकाराम(अर्थ: तुकाराम जी कहते हैं कि जब तक तुम्हारे ...और पढ़े

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अमृत वाणी - संत वाणी - 20

हम पूरी जिंदगी इस कोशिश में बिता देते हैं कि समाज में हमारा एक बड़ा नाम हो, लोग हमसे करें, और हमारे सगे-संबंधी हमेशा हमारे अनुकूल रहें। लेकिन इस दुनिया का एक बहुत कड़वा नियम है—यहाँ हर रिश्ता किसी न किसी शर्त या स्वार्थ पर टिका होता है। जब तक आप दूसरों की उम्मीदों पर खरे उतरते हैं, सब आपके साथ हैं; जिस दिन परिस्थितियाँ बदलती हैं, सब अपनी राह पकड़ लेते हैं। इस सांसारिक अकेलेपन के बीच जो आत्मा को कभी न छूटने वाला सच्चा सहारा दे, वही असली सत्य है। मीराबाई जी ने इसे बहुत ही निडरता ...और पढ़े

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अमृत वाणी - संत वाणी - 21

हम अक्सर सोचते हैं कि बहुत बड़े-बड़े धार्मिक अनुष्ठान कर लेना, शरीर पर विशेष तरह के तिलक लगा लेना, दिन-भर केवल मंदिर-मस्जिद के चक्कर काट लेना ही सबसे बड़ी भक्ति है। हम बाहर से तो बहुत बड़े भक्त दिखाई देते हैं, लेकिन हमारे भीतर दूसरों के लिए नफरत, ईर्ष्या, लालच और गुस्सा वैसा का वैसा ही बना रहता है। इस बाहरी दिखावे और असली आंतरिक भक्ति के अंतर को संत सिंगाजी ने अपनी मालवी/निमाड़ी मिश्रित भाषा में बहुत ही सीधे शब्दों में समझाया है:“मन कूं न रंगाया, रंगाया तुम चोला।कहैं सिंगाजी सुनो भाई साधो, तुम तो मुख से राम-राम ...और पढ़े

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अमृत वाणी - संत वाणी - 22

हम अक्सर समाज में रहने के लिए दूसरों को खुश करने की कोशिशों में लगे रहते हैं। लोग हमारी सी झूठी तारीफ या चापलूसी कर देते हैं, तो हम फूले नहीं समाते और उनके मानसिक गुलाम बन जाते हैं। इसके विपरीत, यदि कोई हमारी आलोचना करता है, तो हम अंदर से टूट जाते हैं। हमारा रिमोट कंट्रोल दूसरों के हाथों में चला जाता है। इस मानसिक गुलामी और विवेक की कमी को दूर करते हुए समर्थ रामदास स्वामी कहते हैं:“शब्दांचे गौरव बहुत मानिती।अंतरींचे गुज काहीच न जाणती॥” — समर्थ रामदास स्वामी (दासबोध)(अर्थ: जो लोग केवल बाहरी मीठे शब्दों, झूठे ...और पढ़े

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अमृत वाणी - संत वाणी - 23

“जे जे भेटे भूत, ते ते मानिजे भगवंत।हा भक्तीचा पैं गा गाभा, जाणिजे सर्वथा॥” — संत ज्ञानेश्वर (ज्ञानेश्वरी)( अनुवाद: चराचर संसार में तुम्हें जो भी जीव या प्राणिमात्र मिले, उसे साक्षात ईश्वर का ही रूप मानो। संत ज्ञानेश्वर जी कहते हैं कि संसार के हर छोटे-बड़े जीव के प्रति मन में आदर और सम्मान का भाव रखना ही सच्ची भक्ति का असली मर्म (सार) है।”)संत ज्ञानेश्वर जी के इस क्रांतिकारी विचार को अक्सर लोग बहुत सतही ढंग से समझ लेते हैं। वे सोचते हैं कि ज्ञानेश्वर जी हमें संसार के व्यावहारिक नियम छोड़कर हर अच्छे-बुरे इंसान के सामने बस ...और पढ़े

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अमृत वाणी - संत वाणी - 24

संत कबीरदास जी का यह दोहा समाज में ज्ञान और व्यवहार के गहरे अंतर को समझाकर जीवन को पूरी पारदर्शी और सच्चा बनाना सिखाता है।“कथनी मीठी खांड सी, करनी विष की लोय।कथनी तजि करनी करे, विष से अमृत होय।।”गहरे अर्थ की व्याख्यासिर्फ मुंह से मीठी-मीठी बातें करना या दूसरों को ज्ञान की बातें सिखाना शक्कर (खांड) की तरह बहुत अच्छा और सुखद लगता है, लेकिन उन बातों को अपने खुद के व्यवहार में न लाना जहर की एक छोटी सी गोली की तरह नुकसानदेह होता है। जो व्यक्ति दूसरों को उपदेश देना और बड़ी-बड़ी बातें करना छोड़ देता है, ...और पढ़े

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अमृत वाणी - संत वाणी - 25

संत गुरु नानक देव जी की यह वाणी किसी भी प्रकार के अन्याय और लालच को छोड़कर अपनी ईमानदारी मेहनत से जीवन जीने का सच्चा मार्ग सिखाती है।“हक पराया नानका, उस सूअर उस गाय।गुरु पीर हामा ता भरे, जा मुरदार न खाय।।”(अर्थ : गुरु नानक जी कहते हैं कि किसी दूसरे के हक की कमाई को छीनना, धोखा देना या किसी की मजबूरी का गलत फायदा उठाना मुसलमान के लिए सूअर का मांस खाने के समान और हिंदू के लिए गाय का मांस खाने के समान घोर पाप है। आपके गुरु, पीर या पैगंबर ईश्वर के दरबार में आपकी ...और पढ़े

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