संत गुरु नानक देव जी की यह वाणी किसी भी प्रकार के अन्याय और लालच को छोड़कर अपनी ईमानदारी की मेहनत से जीवन जीने का सच्चा मार्ग सिखाती है।
“हक पराया नानका, उस सूअर उस गाय।
गुरु पीर हामा ता भरे, जा मुरदार न खाय।।”
(अर्थ : गुरु नानक जी कहते हैं कि किसी दूसरे के हक की कमाई को छीनना, धोखा देना या किसी की मजबूरी का गलत फायदा उठाना मुसलमान के लिए सूअर का मांस खाने के समान और हिंदू के लिए गाय का मांस खाने के समान घोर पाप है। आपके गुरु, पीर या पैगंबर ईश्वर के दरबार में आपकी सिफारिश और मदद तभी करेंगे, जब आप दूसरों का हक मारकर कमाई गई इस अपवित्र दौलत (मुर्दार) से पूरी तरह दूर रहेंगे।)
अक्सर लोग इस वाणी को सुनकर सोचते हैं कि क्या इस आधुनिक युग में धन कमाना, व्यापार करना या जीवन में अमीर बनना गलत बात है? लेकिन गुरु नानक देव जी यहाँ तरक्की करने या धन कमाने का विरोध नहीं कर रहे हैं, बल्कि वे हमें यह समझा रहे हैं कि अगर हमारी दौलत के पीछे किसी गरीब के आंसू, बेईमानी या किसी का शोषण छिपा है, तो वह धन हमें कभी आत्मिक सुख नहीं दे सकता। इस संसार में जब कोई व्यक्ति बहुत सारा पैसा कमा लेता है, तो वह अक्सर सोचता है कि इस पैसे से उसने सब कुछ हासिल कर लिया है। नानक जी कहते हैं कि दूसरों का हक मारकर अमीर बनना बहुत आसान है, पर अपनी ईमानदारी की कमाई पर संतोष रखना ही असली मूल्य (Value) तय करता है।
गहरे अर्थ की व्याख्या
सिर्फ बाहरी रूप से धन इकट्ठा करना और उस पैसे से बड़े-बड़े दान करना मन को एक झूठी संतुष्टि देता है। लेकिन जब तक हमारी कमाई का जरिया साफ और ईमानदार नहीं होता, तब तक वह सारा पुण्य खोखला और बेअसर रहता है। जो व्यक्ति समाज में दूसरों का हक छीनकर या भ्रष्टाचार करके पैसा कमाता है और फिर उसी पैसे से धार्मिक स्थलों पर लंगर, भंडारे या बड़े दान-पुण्य करवाता है, उसकी वह भक्ति परमात्मा के दरबार में कभी स्वीकार नहीं होती। जब मनुष्य लालच और बेईमानी को छोड़कर अपनी नेक कमाई से जीवन जीता है और उसमें से दूसरों की मदद करता है, तभी उसके घर में सच्ची बरकत और शांति का वास होता है।
व्यावहारिक उदाहरण
इसे आप एक बहुत ही सरल और दैनिक जीवन के उदाहरण से समझ सकते हैं। आपके पास एक ऐसा बड़ा बिल्डर या ठेकेदार आता है जो अपने गरीब मजदूरों से दिन-रात कड़ी धूप में काम करवाता है, लेकिन जब उन्हें मजदूरी देने का समय आता है, तो वह उनके पैसे काट लेता है या महीनों तक उनकी तनख्वाह रोक कर रखता है। वही ठेकेदार शाम को किसी बड़े धार्मिक उत्सव में जाकर लाखों रुपए का दान देता है और मुख्य अतिथि की कुर्सी पर बैठता है। उसका यह बाहरी दान उसकी उस बेईमानी को कभी छुपा नहीं सकता। लोग और उसका खुद का जमीर उसके इस दिखावे के पीछे छुपे उस पाप को तुरंत पहचान लेते हैं और उसका यह आचरण उसकी धार्मिकता को झूठा साबित कर देता है।
ठीक इसी तरह, इतिहास में खुद गुरु नानक देव जी का ‘सच्ची साखी’ का एक बहुत ही सुंदर प्रसंग आता है। जब वे अपनी यात्राओं के दौरान ऐमनाबाद पहुंचे, तो उन्होंने एक गरीब और निम्न जाति के बढ़ई ‘भाई लालो’ के घर सूखी कोदों की रोटी खाई। वहीं उस शहर का एक बहुत बड़ा, जाति का ऊंचा और अमीर अधिकारी ‘मलिक भागो’ था, जिसने अपने घर पर एक बहुत बड़े भोज का आयोजन किया था। जब गुरु नानक जी उसके महल में नहीं गए, तो मलिक भागो ने इसे अपना अपमान समझा और उन्हें जबरदस्ती बुलवाया। उसने पूछा कि आपने एक गरीब के घर की सूखी रोटी क्यों खाई और मेरे घर का छप्पन भोग क्यों ठुकरा दिया? गुरु नानक जी ने मुस्कुराते हुए अपने एक हाथ में भाई लालो की सूखी रोटी ली और दूसरे हाथ में मलिक भागो का पूड़ा लिया। जब उन्होंने दोनों को एक साथ दबाया, तो भाई लालो की रोटी से दूध की धारा निकली क्योंकि वह ईमानदारी की मेहनत की कमाई थी, और मलिक भागो के पूड़े से खून की बूंदें टपकीं क्योंकि उसने गरीबों का हक मारकर और उनका खून चूसकर वह धन कमाया था। इसे ही कर्म की सच्ची शुद्धता कहते हैं।
विरोधाभास का समाधान
यहाँ मन में यह शंका आ सकती है कि क्या फिर हमें इस प्रतियोगी युग में बड़ी सफलता या धन पाने की इच्छा बिल्कुल छोड़ देनी चाहिए? नानक जी पुरुषार्थ करने या मेहनत से अमीर बनने से मना नहीं करते। वह सिर्फ यह समझा रहे हैं कि आपकी सफलता तब तक अधूरी है, जब तक वह ईमानदारी की बुनियाद पर न खड़ी हो। सफल होने का मतलब दूसरों को लूटना या उनका हक मारना नहीं है। असली सफल व्यक्ति वह है, जो खुद की मेहनत से आगे बढ़ता है, अपनी जिम्मेदारियां निभाता है और दूसरों के अधिकारों का सम्मान करना जानता है।
जीवन के लिए मुख्य सीख
★ किसी भी व्यक्ति को केवल उसकी बड़ी गाड़ियों या बंगलों को देखकर भाग्यशाली या धार्मिक न समझें। चाहे कोई समाज में कितना भी अमीर होने का दावा करे, जब तक उसकी कमाई का जरिया साफ नहीं है, तब तक उसका ऐश्वर्य खोखला है।
★ जब हमें यह समझ आ जाती है कि ईमानदारी की सूखी रोटी भी बेईमानी के पकवानों से लाख गुना बेहतर है, तो हमारे भीतर का यह घमंड पूरी तरह टूट जाता है कि “पैसा ही सब कुछ है।” अपनी मेहनत की कद्र करना, दूसरों के हक की रक्षा करना और अपनी कमाई में से थोड़ा हिस्सा जरूरतमंदों को देना ही ईश्वर की सच्ची भक्ति और पुण्य है।
आज की पावन प्रार्थना
“हे परमात्मा, मुझे ऐसी सच्चाई और शक्ति दें कि मेरे शब्दों और कर्मों में हमेशा एकरूपता बनी रहे। मेरे भीतर का पाखंड और लालच दूर हो ताकि मैं कभी किसी का हक न मारूं, बल्कि अपनी नेक कमाई पर हमेशा संतोष रख सकूं। 🙏”