अमृत वाणी - संत वाणी - 17 Nitya Oswal द्वारा कुछ भी में हिंदी पीडीएफ

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अमृत वाणी - संत वाणी - 17

हम अक्सर सोचते हैं कि पवित्रता केवल सुबह नहा-धोकर मंदिर जाने, ग्रंथों को छूने या ऊंचे सामाजिक बंधनों को मानने में है। हम बाहर से तो बहुत साफ-सुथरे और शुद्ध बन जाते हैं, लेकिन हमारे भीतर समाज के कमजोर लोगों के प्रति छुआछूत, भेदभाव और कड़वाहट बनी रहती है। इस खोखली शुद्धता को तोड़ते हुए एकनाथ महाराज ने समझाया कि असली पवित्रता बाहर के छुआछूत में नहीं, बल्कि मन की करुणा में है। उनका एक बहुत ही सुंदर और प्रसिद्ध विचार है:

“जिसके हृदय में दया, क्षमा और शांति का वास है, साक्षात परमात्मा वहीं निवास करते हैं। ईश्वर को ढूंढने के लिए वैकुंठ जाने की ज़रूरत नहीं, वह तो हर पीड़ित और प्यासे जीव के भीतर मौजूद है।”
— संत एकनाथ 

इस वाणी को सुनकर लोग अक्सर दो अलग-अलग मानसिक जालों और विरोधाभासों में उलझ जाते हैं:
• पहला भ्रम (सामाजिक स्तर पर) : लोग सोचने लगते हैं कि “यदि हम समाज के बनाए कड़े नियमों, मर्यादाओं या शुद्धता के बंधनों को छोड़ देंगे, तो सामाजिक व्यवस्था कैसे चलेगी? क्या भेदभाव का विरोध करने से धर्म कमजोर नहीं होगा?”
• दूसरा भ्रम (सुरक्षा के स्तर पर) : लोग ‘करुणा’ (Compassion) और ‘कायरता’ (Cowardice) को एक ही समझ बैठते हैं। उनके मन में यह डर उठता है कि— “यदि हम हर समय बस दया और क्षमा ही करते रहेंगे, और कोई क्रिमिनल माइंडेड (अपराधी) व्यक्ति हमारी या किसी निर्दोष की जान लेने आ जाए, तो क्या हमें वहाँ भी दया दिखानी चाहिए? क्या चुपचाप अपनी बलि दे देना ही संतों का मार्ग है?”

विरोधाभास तब दूर होता है जब हम यह समझते हैं कि संतों की वाणी हमें न तो समाज को बांटना सिखाती है और न ही कायर बनना सिखाती है। सनातन अध्यात्म में दो तरह के धर्म बताए गए हैं—एक ‘संत धर्म’ (व्यक्तिगत शांति और सामाजिक एकता के लिए) और दूसरा ‘मर्यादा धर्म’ या ‘क्षत्रिय धर्म’ (आत्मरक्षा और अपराधियों से समाज की सुरक्षा के लिए)। दया हमेशा बेबस, गरीब और प्यासे जीवों पर की जाती है; क्रूर, हिंसक और दुष्ट अपराधी पर नहीं।

व्यावहारिक उदाहरण
इसे हम दो बहुत ही सीधे और व्यावहारिक उदाहरणों से पूरी गहराई से समझ सकते हैं:
• पहला उदाहरण (समाज के लिए) : फर्ज़ कीजिए कि आपके शरीर का कोई एक हिस्सा—जैसे आपका पैर—अचानक किसी गंदी जगह पर पड़ जाता है। क्या आप उस पैर को अपने शरीर से अलग करके फेंक देते हैं? बिल्कुल नहीं। आपका हाथ तुरंत आगे बढ़ता है और उस पैर को साफ़ करता है, क्योंकि आप जानते हैं कि पैर भले ही नीचे है, पर वह आपके अपने ही शरीर का हिस्सा है। इसी तरह, समाज का हर वर्ग और हर इंसान चाहे जितना गरीब या पीछे छूट गया हो, वह उसी परम पिता की संतान है। उसे छोटा समझकर दूर धकेलना अपने ही शरीर को काटने जैसा है।
• दूसरा उदाहरण (अपराधियों के लिए) : अब दूसरी तरफ, फर्ज़ कीजिए कि एक बहुत दयालु डॉक्टर के पास एक मरीज़ आता है जिसके हाथ में ‘गैंग्रीन’ (एक खतरनाक सड़न जो पूरे शरीर में फैलकर जान ले सकती है) हो गया है। अब उस डॉक्टर की सच्ची करुणा क्या कहती है? क्या वह उस सड़े हुए हाथ पर दया खाकर उसे छोड़ देगा? बिल्कुल नहीं। वह डॉक्टर तुरंत औज़ार उठाएगा और उस संक्रमित हाथ को काटकर अलग कर देगा ताकि बाकी का पूरा शरीर बच सके।

हमारा यह समाज भी एक विराट शरीर की तरह है। समाज के सीधे और कमज़ोर लोग हमारे अपने पैर की तरह हैं जिनकी हमें सेवा करनी है, लेकिन जो व्यक्ति पूरी तरह क्रिमिनल माइंडेड होकर अधर्म पर उतर आया है, वह उस गैंग्रीन की तरह है। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम और योगेश्वर श्री कृष्ण ने भी अधर्म का नाश करने के लिए शस्त्र उठाए थे, क्योंकि समाज को बचाने के लिए कैंसर की गांठ को काटना ही सच्ची करुणा है।

शंका का तार्किक समाधान
अब प्रश्न उठता है कि फिर एकनाथ महाराज जी की उस ‘क्षमा’ का क्या महत्व है, जहाँ उन्होंने अपने ऊपर बार-बार थूकने वाले दुष्ट को भी माफ कर दिया था?

यहाँ ‘निजी अपमान’ और ‘जान के खतरे’ के बीच का फर्क समझना होगा। गोदावरी नदी से स्नान करके लौटते समय उस दुष्ट व्यक्ति ने महाराज पर केवल थूककर उनका ‘अपमान’ किया था, उनकी जान नहीं लेनी चाही थी। महाराज ने उसे क्षमा करके सिद्ध किया कि वे अपने अहंकार से ऊपर उठ चुके हैं और उनके भीतर अगाध सब्र है।

लेकिन जब बात आपकी या किसी मासूम की जान पर बन आए, तो संतों का मार्ग हमें तीन स्पष्ट नियम सिखाता है:
• शारीरिक स्तर पर पूर्ण प्रतिरोध : भारत का कानून (Right to Private Defense) और हमारा धर्म, दोनों आपको आत्मरक्षा में अपराधी पर पूरी ताकत से जवाबी हमला करने का अधिकार देते हैं। दुष्टों के सामने हथियार उठाना पूरी तरह न्यायसंगत है।
• मानसिक स्तर पर स्थिरता : संकट के समय डरना या गुस्से में अंधा होना मना है। संतों की साधना हमें उस समय भी मन को शांत और सजग (Alert) रखना सिखाती है, ताकि आप सही रणनीति से अपनी जान बचा सकें।
• न्याय व्यवस्था पर भरोसा : अपराधी को पकड़वाना और उसे कानून के हवाले कर कड़ी से कड़ी सज़ा दिलाना ही सच्ची दया है, ताकि वह किसी और मासूम का नुकसान न कर सके।

आज की ज़िंदगी के लिए व्यावहारिक सूत्र
★ समान व्यवहार और करुणा: अपने घर या दफ्तर में काम करने वाले छोटे और कमज़ोर कर्मचारियों से हमेशा आदर और प्रेम से बात करें। उनके भीतर भी उसी परमात्मा को देखें।

★ कायरता का त्याग: यदि आप किसी गलत बात का विरोध करने से डर रहे हैं, तो खुद को यह झूठा दिलासा मत दीजिए कि “मैं तो बहुत शांत और दयालु हूँ।” डर को छोड़ना ही अध्यात्म की पहली सीढ़ी है।

★ शारीरिक व मानसिक मज़बूती: खुद को शारीरिक और मानसिक रूप से इतना तैयार रखें कि संकट आने पर आपका दिमाग ‘फ्रीज़’ न हो, बल्कि आप डटकर मुकाबला कर सकें।

आज की पावन प्रार्थना
“हे सर्वशक्तिमान परमात्मा! मेरे हृदय में समाज के हर कमज़ोर और बेबस जीव के प्रति अगाध प्रेम, करुणा और समरसता का भाव बनाए रखिए, ताकि मैं कभी किसी से भेदभाव न करूँ। लेकिन प्रभु, यदि कभी मेरी या किसी निर्दोष की सुरक्षा पर संकट आए, तो मुझे वो साहस, बल और विवेक दीजिए कि मैं कायर बनकर घुटने न टेकूँ, बल्कि अपनों और धर्म की रक्षा के लिए पूरी मज़बूती से काल बनकर खड़ा हो सकूँ।”