"नहीं! ऐसा मत करो, छोड़ दो please..... जाने दो! नहीं! नहीं!" "रात्रि उठ! ऐसा कहकर मेघा (रात्रि की मां) ने रात्रि को झकझोर दिया। कितनी बार कहा है इस लड़की को की छोड़ दे ये किताबों की दुनिया, जहाँ कभी परियों की प्रेम कहानी होती है तो कभी पिशाच का बदला।" "मां...... मैं ठीक हूं, ये मेरी कहानियों की दुनिया नहीं है, कोई तो पहली है और मैं इसे सुलझाकर रहूंगी। और तब तक मेरी प्यारी मां, आप बस मेरा ऐसा ही ख्याल रखो ये कहते हुए रात्रि ने मेघा को गले लगाया।" "और सारा प्यार मां बेटी ही बांट लोगी या ....

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इश्क और अश्क - 1

"नहीं! ऐसा मत करो, छोड़ दो please..... जाने दो! नहीं! नहीं!""रात्रि उठ! ऐसा कहकर मेघा (रात्रि की मां) ने को झकझोर दिया। कितनी बार कहा है इस लड़की को की छोड़ दे ये किताबों की दुनिया, जहाँ कभी परियों की प्रेम कहानी होती है तो कभी पिशाच का बदला।""मां...... मैं ठीक हूं, ये मेरी कहानियों की दुनिया नहीं है, कोई तो पहली है और मैं इसे सुलझाकर रहूंगी।और तब तक मेरी प्यारी मां, आप बस मेरा ऐसा ही ख्याल रखो ये कहते हुए रात्रि ने मेघा को गले लगाया।""और सारा प्यार मां बेटी ही बांट लोगी या इस बेचारे ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 2

रात्रि जैसे ही उठती है, Mr. Maan की आवाज़ उसे रोक देती है...Mr. Maan (धीरे से, पर दृढ़ता से):"हम फिल्म सुपरस्टार ए.वी. सहगल के लिए बनाना चाहते हैं।"रात्रि के चेहरे का रंग उड़ जाता है...रात्रि (हैरानी में):"आप... शायद मज़ाक के मूड में हैं? एक सुपरस्टार को कहानियों की कमी है क्या? और... वो मेरे साथ ही क्यों काम करेंगे?"वो घबरा कर उठती है।रात्रि:"देखिए, मुझे और भी बहुत काम है। माफ कीजिए..."(और वो तेज़ी से निकल जाती है)Mr. Maan अपने चेयर पर गिर पड़ते हैं। तभी उनका फ़ोन बजता है।मान (थके स्वर में):"हां, मैंने प्रपोज़ल रखा... लेकिन बात बनी नहीं।"फोन ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 3

(जब दिल के रिश्तों पर राज़ भारी पड़ने लगें...)---अनुज ने गुस्से में उसका कॉलर पकड़ लिया और दहाड़ा —"तेरी कैसे हुई मेरी बहन के करीब आने की??"एवी ने झटके से अनुज को धक्का दिया और अकड़ते हुए बोला —"अबे हट! मुझे तुझसे नहीं, तेरी बहन से काम है।"रात्रि ने बीच में आकर दोनों को अलग किया और गुस्से में पूछा —"क्या काम है तुम्हें मुझसे?"एवी का लहजा अब भी अकड़भरा था —"ऐसे नहीं, मुझे तुमसे अकेले में बात करनी है।"अनुज का गुस्सा और भड़क उठा। उसने एवी के चेहरे पर ज़ोरदार मुक्का जड़ दिया —"तेरी हिम्मत कैसे हुई मेरी ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 4

(कुछ सपने सिर्फ रातों में नहीं आते... वो दिन में भी पीछा करते हैं)---“तुम मुझे नहीं पकड़ पाओगे, अविराज!”“अच्छा? भागो... मैं भी देखता हूं!”दोनो हँसते हुए दौड़ने लगते हैं।अविराज ने पीछे से प्रणाली को पकड़ लिया और बहुत प्यार से उसे अपनी बाहों में भर लिया।अविराज (मुस्कुराते हुए):“तो तुम कह रही थीं कि मैं तुम्हें पकड़ नहीं पाऊंगा?”प्रणाली (शरारती अंदाज़ में):“अरे… वो देखो! मेरी दासी आ गई।”अविराज (चौंकते हुए):“क्या? कहां? मैं छुपता हूं!”प्रणाली ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगती है —“वाह! क्या बहादुरी है आपकी… आप तो मेरी दासी से भी डर गए!”अविराज (शिकायती अंदाज़ में):“ये ठीक नहीं किया आपने!”---रात्रि की ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 5

असिस्टेंट: सर पार्टी की सारी तैयारी भी हो गई है। एवी: ओके... Let everyone informed.दूसरी तरफ... रात्रि अभी भी है और अपने केबिन में बैठी है।रात्रि (खुद से): ये सब क्या हो रहा है?फोन बजता है।रात्रि: हेलो… राबिया: सुन, मुझे एक और जगह के बारे में पता चला है। बता, कब चलना है? रात्रि: नहीं यार... अब नहीं। मैं अब उसमें और अंदर नहीं जाना चाहती। जो होगा, देख लूंगी। राबिया: तू श्योर है? रात्रि: हम्म्म्म… राबिया: अच्छा फैसला लिया है तूने।कॉल कट होता है। तभी डोर नॉक होती है।रात्रि: येस, कॉम इन। नेहा: मैम, शाम की पार्टी के ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 6

रात्रि अभी भी उस बत्तमीज़ आदमी के बारे में सोच रही है :"कौन था वो ? इतनी अकड़ और ही बत्तमीज़ भी..."रात भर उसकी आँखों में वही झलकता रहा।तभी अचानक—Mr. Maan: "Miss, आप कहा रह गई थी? कितने लोगों से मिलना है हमे।"रात्रि: "माफ करिए... कुछ काम आ गया था।"Mr. Maan: "कोई बात नहीं! इनसे मिलिए — ये हैं हमारी फिल्म की हीरोइन, मिस मलिष्का।"रात्रि (मुस्कुराते हुए): "Hello... I’m रात्रि मित्तल।"मलिष्का (नाक चढ़ाते हुए): "हम्मम्..."रात्रि अब और कोई ड्रामा नहीं चाहती थी, इसलिए वो चुपचाप वहाँ से निकल गई।स्टेज पर अनाउंसमेंट शुरू होता है—"May I have your attention guys...!"एवी ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 8

सबकी नजर महल के बाहर मैन गेट पर गई। अगस्त्य रात्रि को अपनी मजबूत बाहों में उठाए चला आ था। चेहरा सख्त, आंखों में गुस्से से ज्यादा कुछ छिपा हुआ।एवी (तेज़ी से दौड़ता हुआ): “रात्रि... क्या हुआ इसे? तुमने क्या किया इसके साथ?”अगस्त्य (गुस्से से): “रास्ता दोगे या यहीं छोड़ दूं इसे?”वो रात्रि को अंदर लेकर आया और उसे एक सोफे पर लिटा दिया। सब घबराए हुए उसकी हालत देख रहे थे।अर्जुन (परेशान होकर): “भाई, आपको ये कहां मिली?”अगस्त्य: “कुएं के पास पड़ी थी। अकेली... बेहोश।”धीरे-धीरे रात्रि को होश आया। उसकी आंखें धीरे से खुलीं।रात्रि (धीमे स्वर में): “मैं ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 9

सब अपने-अपने ऑफिस पहुंच चुके थे।रात्रि घर लौटी तो उसके चेहरे पर थकान के साथ-साथ वो डर और उलझन थी, जो उस रात की घटना ने उसके मन में भर दी थी।मेघा (मुस्कुराकर, प्यार से): “आ गई मेरी बच्ची... बहुत थक गई होगी न?”रात्रि (भीगी आंखों से): “I missed you, Maa...”इतना कहकर वो सीधा अपने कमरे में चली गई। दरवाजा बंद किया और बिस्तर पर लेटते ही वही कुएं वाली जगह, वो साया, और अगस्त्य की आंखें... सब कुछ आंखों के सामने घूम गया।दूसरी तरफ एवी भी अपने घर पहुंचा, लेकिन उसका चेहरा पहले जैसा शांत नहीं था। एक ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 10

रात्रि ऑफिस पहुंचीअर्जुन: मिस मित्तल आप आ गईं, चलिए हमें निकलना है! रात्रि: पर कहां? अर्जुन: से शूटिंग शुरू हो रही है। रात्रि: पर अगस्त्य का क्या........ (रात्रि की बात काटते हुए)एवी: वो अब इस प्रोजेक्ट का हिस्सा नहीं है। अर्जुन: एक टीम वहां ऑलरेडी पहुंच चुकी है, हमें भी निकलना है। (सब निकल गए)---रास्ते में ....रात्रि: क्या सच में अगस्त्य मान इस प्रोजेक्ट पर नहीं होंगे? एवी: तुम इतनी परेशान क्यों हो रही हो? उसके बिना ही ये मूवी अच्छे से बन पाएगी। (अर्जुन कुछ नहीं बोला। रात्रि को अच्छा नहीं लग रहा था।)---चलो चलो सब उतरो, हम आ गए – किसी ने आवाज लगाई।रात्रि और ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 7

सब लोकेशन पर जाने के लिए चल रहे हैंआगे चलते ही एक बोर्ड दिखा .....जिसपे लिखा था आगे जान मना है , ये जगह शापित है ।इतना पढ़ कर सब रुक गए ।नेहा : ये देखो क्या लिखा है , मैं तो अब और अंदर नही जाने वाली ।एवी : ये हर हिस्टोरिकल प्लेस पर लिखा होता है , इसमें ऐसे डरने की क्या बात है?रात्रि : क्या यहां आने से पहले किसी ने इस जगह को वेरिफाई किया था ?अर्जुन : इस जगह के बारे में किसी भी ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर कोई न्यूज या पिक्चर नही है,रात्रि : ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 11

"नहीं....! नहीं........! ये सच नहीं हो सकता!" — रात्रि चीख पड़ी।उसकी आवाज़ इतनी तीखी थी कि पेड़ों पर बैठे भी फड़फड़ा कर उड़ गए।कैंप में मौजूद हर शख़्स चौंक गया।एवी भी गुस्से से तमतमा गया:“ये सब क्या बोले जा रहे हैं आप? ये सब झूठ है! आपको कुछ नहीं पता... प्रणाली गंगा की तरह पवित्र थी!”उसकी आँखें नम थीं, पर आवाज़ में कोई काँप नहीं था — एक चट्टान जैसी सच्चाई से भरा हुआ साहस।चारों ओर सन्नाटा छा गया। सब एवी की ओर देखने लगे।कोई फुसफुसाया, “इसे क्या हो गया...”दूसरा बोला, “इतना personal क्यों हो गया suddenly?”लेकिन एवी बिना ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 12

अगस्त्य (हल्की, धीमी आवाज़ में, जैसे खुद से कह रहा हो):"मुझे भी हुआ था... जब कल रात... तुम..."रात्रि (एकदम क्या कहा तुमने?"अगस्त्य ने अचानक उसका हाथ झटक दिया, और एकदम सख्त आवाज़ में बोला:"जाओ यहाँ से! गेट आउट!!"रात्रि (आँखों में आँसू, पर आवाज़ में हिम्मत):"क्या बोल रहे थे तुम? बात अधूरी क्यों छोड़ रहे हो... पूरी बात करो!"अगस्त्य (कड़वे स्वर में):"ठीक है! मैं ही चला जाता हूँ!"वो मुड़कर जाने लगा...तभी रात्रि बोल उठी:"वो आग कैसे लगी थी...? बताओ अगस्त्य... वो तुमने ही लगाई थी ना?"अगस्त्य रुक गया।रात्रि (धीरे-धीरे उसके करीब जाते हुए):"इतना बड़ा पेड़... एक पल में कैसे जल ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 13

फिर उसने सांस देने के लिए रात्रि के होठों पर अपने होठ रख दिए और सांस देने लगा...ठंडी बारिश बूँदें उनके चेहरों पर पड़ रही थीं और उस तालाब के किनारे एक अधूरी मोहब्बत की साँसें रुकती जा रही थीं...आसमान में जैसे कोई शैतान जाग उठा हो…घनघोर काले बादल उमड़ आए —बिजली कड़कने लगी, हवाएं पागल हो चुकी थीं, जैसे सब कुछ उड़ा ले जाएंगी।हर पल… हर सेकंड… लगता जैसे किसी श्राप की घड़ी शुरू हो चुकी है।पर ये क्या……?!रात्रि की सांसें सुधरने के बजाय और मंद हो गईं।उसके होठों की नमी ठंडी होने लगी थी… जैसे प्रेम हार ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 14

रात्रि (नींद में बड़बड़ाते हुए): "अव... वी... वी... अविराज..."ये नाम सुनते ही अगस्त्य के चेहरे पर जैसे तूफान थम और दिल का दरवाज़ा टूट गया।उसके हाथ से रात्रि का हाथ छूट गया। उसके लब काँपने लगे...अगस्त्य (आहिस्ता, टूटे स्वर में): "अविराज...?"उसने रात्रि के माथे पर हाथ फेरा, उसकी उंगलियों में कंपन था, और आँखों में बेबसी।"मैं तुम्हें तुम्हारी पुरानी यादों से दूर रखना चाहता था... लेकिन तुम उसी में उलझती जा रही हो... ऐसा मत करो रात्रि।""एक बेहतर कल तुम्हारा इंतज़ार कर रहा है... भूल जाओ अपने बीते हुए कल को... और... मुझे भी।"इतना कहकर अगस्त्य मुड़ा... और उसके ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 15

एवी सिसकियों के बीच खुद से बड़बड़ा रहा था...एवी (टूटे हुए लहजे में):"ये दर्द समझने वाला कोई नहीं है...अब परेशानी हो रही है तुझे...?यही तो तू चाहता था ना... कि वो तुझसे दूर चली जाए...फिर आज जब वो आगे बढ़ रही है...तो ये आंसू क्यों बह रहे हैं...? क्यों...?"(उसने खुद को ही शीशे में घूरते हुए देखा, और खुद से नफ़रत सी महसूस की…)---दूसरी ओर, रात्रि खुश है... बहुत खुश।उसने किसी को बेहद अपनेपन से गले लगाया...और वो शख्स कोई और नहीं, एवी ही था।एवी (भीगी आंखों से मुस्कुराते हुए):"मैंने इस दिन के लिए कितना इंतज़ार किया है रात्रि...कितना ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 16

[Scene: सीकरपुर महल – अविराज आगबबूला]अविराज (गुस्से से):"महाराज अग्रेण ऐसा कैसे कर सकते हैं? उन्हें अच्छे से पता है मैं प्रणाली से विवाह करना चाहता हूं...फिर भी ये स्वयंवर...?क्या इसे मैं एक सीधा अपमान समझूं...?या फिर ये युद्ध का खुला ऐलान है...?"(उसके हाथ कांप रहे हैं, गुस्से में निमंत्रण पत्र फाड़ देना चाहता है, पर खुद को रोकता है)राजा माहेन् (गंभीरता से):"हर राजकुमारी का स्वयंवर करना हर राजा का कर्तव्य होता है पुत्र...अगर तुम्हें प्रणाली को जीवनसंगिनी बनाना है, तो जाओ...उसे जीत कर लाओ, और बनाओ सीकरपुर की कुलवधू।"अविराज (आँखों में दृढ़ निश्चय लिए):"जैसी आज्ञा पिताजी...अब से प्रणाली सिर्फ ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 17

[Scene: बीजापुर दरबार – बाघिन की सवारी पर अविराज की एंट्री]राजमहल के मुख्य द्वार पर जैसे ही अविराज घायल में, उस सफेद रानी बाघिन की सवारी करते हुए प्रवेश करता है —पूरा दरबार उसकी बहादुरी के लिए उठ खड़ा होता है।ढोल नगाड़े बजने लगते हैं, मंत्रोच्चारण होने लगता है।राजा अग्रेण गर्व से अविराज की ओर देखता है।राजा:"हम घोषणा करते हैं कि राजकुमार अविराज इस स्वयंवर के विजेता घोषित किए जाते हैं!"वहीं रात्रि भी एक कोने से यह दृश्य देख रही है।उसके चेहरे पर सुकून है, मुस्कान है... और राहत भी—कि अब उसे विवाह नहीं करना पड़ेगा।---[Scene: अगली सुबह — ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 18

प्रणाली (जोर से):"जो भी है... बाहर आओ।मैं जानती हूं मैं यहां अकेली नहीं हूं!"(चारों तरफ से नकाबपोश निकलते हैं 6 लोग)लड़ाई शुरू होती है!प्रणाली बहादुरी से लड़ती है... पर संख्या भारी पड़ती है।---पेड़ की डाल पर एक रहस्यमय युवक ऊपर एक शाख पर बैठा लड़ाई देख रहा है – मजबूत, लंबा, गेरुआ वस्त्र, चेहरा तेज़…युवक (मुस्कुराकर):"मानना पड़ेगा... तुम कमाल की योद्धा हो...पर समझदारी भी कोई चीज होती है।हर लड़ाई ताकत से नहीं... कभी-कभी पीछे हटना भी हुनर होता है।"प्रणाली (बिना देखे):"तो मौका क्यों गंवा रहे हो?आओ... हरा दो मुझे भी!"युवक बात को आगे बढ़ाता है: मदद ले लो अकेली ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 19

[Scene continues: अविराज चला गया…]कौन से ख्यालों में खोई है...?मेघा ने रात्रि को हिलाया।रात्रि किसी सोच में मसरूफ़ थी। दिल कहीं और जा चुका हो... मेघा की आवाज़ ने जैसे नींद तोड़ी हो। वो चौंकी और बोली:"हां… हां… मां…! क्या हुआ?"मेघा (थोड़ा चिंतित होकर):"जब से हॉस्पिटल आई है, तब से देख रही हूं… पता नहीं, किस सोच में गुम है तू? हुआ क्या है तुझे?"रात्रि (धीरे से, नजरें चुराकर):"मां... मैं बाहर कब जा सकती हूं...? मुझे काम पर वापस जाना है... प्लीज..."मेघा (कड़ाई से):"बिलकुल नहीं! तेरे पापा और भाई के स्ट्रिक्ट ऑर्डर हैं कि तुझे कहीं नहीं जाने दिया ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 20

उसने एवी को मार-मार कर जमीन पर गिरा दिया। उसकी आंखों में गुस्सा भरा था, मानो वो अपनी हर अपने हर गुस्से का हिसाब कर रहा हो।अगस्त्य (गुस्से में): बोल... कौन है तू?(और ये कहकर उसने एक और घूंसा उसके मुंह पर मारा...)एवी (मुंह से खून टपकता हुआ): क्या बोल रहे हो तुम...?अगस्त्य (एक और मुक्का मारते हुए): मेरे भाई को क्यों इन्वॉल्व किया... और मेरी रा...(तभी रात्रि चिल्लाती है)रात्रि: अगस्त्य...!अगस्त्य फौरन रुक गया। रात्रि ने पहली बार उसका नाम इतने हक से लिया था। अगस्त्य का जैसे हौसला बढ़ गया। उसने पलटकर उसे देखा और बोला:अगस्त्य: रात्रि...!इतने में ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 21

शर्ट लैस अगस्त्य… उसकी मस्कुलर बॉडी, छह पैक एब्स इतने साफ कि किसी की भी नजर वहीं अटक जाए। रात्रि की भी अटक गई। कुछ सेकंड के लिए जैसे सांस ही रुक गई हो उसकी।अगस्त्य धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ रहा था… रात्रि को जैसे होश ही नहीं रहा, उसकी आंखों में, उसके बदन की गर्माहट में खो गई थी।जब होश आया तो देखा कि वो बहुत… बहुत करीब था।इतने कि उसकी सांसें रात्रि के गालों को छू रही थीं।रात्रि एकदम ठिठकी, आंखें ऊपर कर के उसे देखा — छः फुट का लंबा चौड़ा मर्द… और वो खुद, नाजुक सी ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 22

तभी किसी ने दूर नॉक किया।एक नौकर ने डोर ओपन किया...एवी बिना किसी परमिशन के अंदर आ गया।रात्रि शॉक्ड गई एवी को यहां देखकर।उसे लगा कि एवी और अगस्त्य फिर न लड़ें।उसने एवी को रास्ते में रोका और बोली:रात्रि: एवी, तुम यहां कैसे???एवी (गुस्से में): वो सब छोड़ो... तुम ये बताओ, इसने तुम्हें यहां क्यों बुलाया?रात्रि कुछ बोलती उससे पहले ही अगस्त्य बोल पड़ा:अगस्त्य: मैंने नहीं बुलाया इसे, इसका मुझसे मिलने का मन हुआ तो आ गई... तुझे क्यों दिक्कत हो रही है?एवी (गुस्से में): दिक्कत तो अब तुझे होगी...!वो आगे बढ़ने लगा।रात्रि ने उसे रोक लिया और बोली:रात्रि: ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 23

चारों तरफ सितारों वाली लाइट, फूलों और प्रणाली की पेंटिंग से भरा वो कमरा, फूल उसकी राहों में... एक मैं चाहता हूं जितना प्यार मैं तुमसे करता हूं, उतना ही तुम भी करो।रात्रि मुस्कुराई: तुम मेरी जिंदगी की वो पहेली थे जिसे सुलझाने के लिए मैं किसी भी हद तक जा सकती थी और अब वो पहेली सुलझ गई है, तो इसके आगे मैं कुछ नहीं चाहती।एवी: क्या तुम मेरी गर्लफ्रेंड बनोगी?रात्रि को कुछ समझ नहीं आया...एवी: इतना परेशान मत हो, सोच कर जवाब देना। मैं वेट करूंगा।रात्रि सोचने लगी: कहाँ मिलेगा इतना समझने वाला पार्टनर... उसने अपनी आंखें ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 24

रात्रि ने वो सारे पेपर्स गुस्से में अगस्त्य के मुंह पर फेंके।रात्रि:"ये कॉन्ट्रैक्ट कैंसिलेशन के पेपर्स हैं जो तुमने हैं!तुम होते कौन हो मुझे इस प्रोजेक्ट से निकालने वाले?"अगस्त्य ने पेपर्स उठाए।थोड़ा देखा, फिर शांत लहजे में बोला:अगस्त्य:"बस...?यही बात है...?इतनी सी बात पर तुम मुझे इतना कुछ सुना रही हो?"रात्रि (सरप्राइज़्ड):"क्या मतलब?"अगस्त्य, बाकी सभी को देखकर बोला:अगस्त्य:"यही फिल्म देखोगे या अपनी बनाने के लिए निकलोगे भी?यहां का पैकअप... जाओ सब।"(सब जाने लगे)अगस्त्य (रात्रि की तरफ):"आप नहीं जा सकतीं।कृपया अपने घर जाएं।"रात्रि (गुस्से में उंगली दिखाते हुए):"तुम—"अगस्त्य उसकी उंगली पकड़ कर नीचे करता है:अगस्त्य (गंभीर होकर):"Now you're crossing your limits...इससे ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 25

उसने प्रणाली के चाकू वाले हाथों को अपने हाथों से पकड़ा, और एक तीव्र झटके में उसे घुमाकर सामने पेड़ से सटा दिया। वर्धान के एक हाथ में अब चाकू था, और दूसरे हाथ को उसने प्रणाली की गर्दन के पास टिका रखा था। चाकू धीरे-धीरे उसके गालों को छूता हुआ नीचे सरक रहा था।प्रणाली (डरी-सहमी आवाज़ में):"ये क्या कर रहे हो...?"वर्धान (आंखों में गहराई लिए हुए):"जैसा तुमने बोला... मैं एक जासूस हूं, तुमपे नजर रख रहा हूं..."वो बस उसे एकटक निहारता जा रहा था।प्रणाली:"छोड़ो मुझे..."वर्धान (धीमे, गंभीर स्वर में उसकी आंखों में देखते हुए):"सुनो फूल वाली... मुझे तुम्हारे ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 26

वो रोते-रोते:"अच्छा हुआ तुम आ गए... वरना..."फिर थोड़ी ही देर में रोते-रोते चिल्लाई:"तुम इतनी देर से क्यों आए...? मैं डर गई थी!"(और उसने वर्धान के सीने पर अपने नाज़ुक हाथों से मारा)वर्धान मुस्कुराया और बोला:"या तो रो लो... या गुस्सा कर लो।"वो उससे चिपक कर और भी ज़ोर से रोने लगी।वर्धान ने भी उसे हटाया नहीं... और उसके बालों को सहलाने लगा।प्रणाली (सिसकियों के बीच):"कल जब तुम पानी में गए थे... तब क्यों नहीं आए थे ये मगर?"वर्धान ने उसे अपने हाथों से पकड़ा, उसकी आंखों में देखा और दोनों हथेलियों से उसकी आंखों के आंसू पोंछते हुए बोला:"क्योंकि ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 27

---उसने फोन रखा, और अपना कोट पहनते हुए बोला :"ये लड़की चलती-फिरती प्रॉब्लम की दुकान है।"और कार लेकर निकल कुछ देर पहले निकली है, तो शहर से बाहर नहीं गई होगी..."अगस्त्य ने परेशान होते हुए कहा।वो उसे फोन पर फोन किए जा रहा है, फोन रिंग भी हो रहा है लेकिन कोई उठा नहीं रहा।किसी और को फोन करके पूछ भी नहीं सकता, क्योंकि किसी का फोन वहाँ काम नहीं करता।(अगस्त्य गुस्से में)"मन तो कर रहा है छोड़ दूँ इसे इसी जन्म में...बाक़ी देखा जाएगा अगले जन्म में।"थोड़ी देर में रात्रि का फोन बंद जाने लगा।अगस्त्य और परेशान हो ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 28

अगस्त्य ने झाड़ियों को डंडे से हिलाया तो वहाँ से एक नेवला निकल कर इतनी तेज़ी से भागा कि अगस्त्य चौंक गया। और इस चक्कर में रात्रि इतनी डर गई कि उसका पैर फिसला और वो अगस्त्य की बाहों में जा गिरी।अगस्त्य की नशीली आंखें रात्रि को ताड़ने लगीं, और अब दोनों एक-दूसरे को देख रहे थे...उसे हर वो लम्हा याद आ गया जब-जब अगस्त्य उसके साथ था —हाईवे की वो रात, वो बरसात में उसे बचाना, पानी से निकलना...कोई पागल ही होगा जिसे उससे इतना सब होने के बाद भी प्यार न हो।रात्रि ने बोला:"पता नहीं कब, क्यों ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 29

रात्रि डरने लगी:"कहीं ये मेरी कही हुई बातों का यहाँ तमाशा न बना दे...!ये अगस्त्य मान है, ये कुछ कर सकता है।"अगस्त्य:"आप में से कोई मुझे पसंद करता है क्या?"रात्रि (मन में):"नहीं... प्लीज़ कुछ मत बोलना।"अगस्त्य:"लगता है कोई मुझे पसंद नहीं करता।"मलिश्का:"नहीं...! ऐसा नहीं है, I like you!"अगस्त्य:"Okay fine, सो तुम मेरी पार्टनर हो!"मलिश्का खुश हो गई और बाकी सब शॉक्ड हो गए।सब:"क्या? पार्टनर...?!"रात्रि थोड़ा चिढ़ गई और खुद से बोलने लगी:रात्रि:"पार्टनर...? हम्म... शक्ल देखी है इसने अपनी...?"मलिश्का खुशी से:"हाँ... हाँ... मैं तो कब से..."अगस्त्य:"हाँ तो मेरी पार्टनर मलिश्का है।बाकी लोग परसों तक अपना-अपना पार्टनर चुन लेना।"अर्जुन:"मतलब?"अगस्त्य:"हमारे कुछ इन्वेस्टर्स ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 30

अब अगस्त्य सोच रहा है : पता तो चले की तुम हो कौन ?, उम्मीद करता हू ....मेरे शक हो ,और तुम सच में एक अच्छे इंसान होNext dayसुबह सुबह रात्रि का फोन बजारात्रि : हेलो......एवी : गुड मॉर्निग , तुम्हे पता है ना आज हमारी पहली डेट है ।रात्रि की नींद खुली और वो खुद में सोचने लगी : इसे अभी तक याद है ये ......एवी : हैलो तुम कुछ बोल क्यों नही रही हो । ....रात्रि ध्यान से निकलती हुई : हम..... हां.....सुन रही हू ....एवी : मैं आज शाम को सात बजे तुम्हे पिक कर लूंगारात्रि ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 31

उसने वन बाय वन वो पेपर्स देखे...(जैसे कोई बाप अपनी बेटी की लिए रिश्ता देख रहा हो)अगस्त्य ध्यान से पेपर्स देखते हुए:"ये सब तो ठीक ही लग रहे हैं, कोई फ्रॉड भी नहीं है, और पैसा भी अच्छा-खासा है... रात्रि को कोई दिक्कत नहीं होगी।"फिर उसने आगे देखा और बोला:"इसकी कितनी गर्लफ्रेंड रह चुकी हैं?"फिर वो फोन साइड करके सोचने लगा:"कहीं ये रात्रि को भी तो नहीं छोड़ देगा..."अगस्त्य ने सारे डॉक्यूमेंट्स देखे...अगस्त्य:"ये सब तो ठीक है, पर ये क्या है...?"उसने थोड़ा ज़ूम इन किया तो पता चला कि ये तो ड्राइविंग लाइसेंस है।अगस्त्य का फोन बजा:वेदिका:"सर, गेस्ट पहुँच ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 32

एवी पीछे से बोलता है:"चल मेरी करतूत तो जाने दे, पर उसे तेरी करतूत याद आ गई तो......?"अगस्त्य ने बाल ठीक किए, हल्का सा मुस्कुराया और पलट कर एवी के कपड़े साफ करते हुए बोला:"छै...... कितना भोला है तू...... तुझे सच में लगता है कि मुझे इससे फर्क भी पड़ता है? चल जा आराम कर।"एवी:"जब तुझे इस बात से कोई फर्क ही नहीं पड़ता कि वो तेरे बारे में क्या सोचती है, तो इस बात से क्या फर्क पड़ता है कि वो किसके साथ है? छोड़, तू उसे और आगे बढ़।"अगस्त्य:"इस दुनिया में किसी भी लड़के को वो चुनकर ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 33

अगस्त्य ने उसे एक बार और देखा और थोड़ा शातिर वाली मुस्कान देकर बोला:"तुम तो मुझे अट्रैक्ट भी नहीं सकती!पर हां... अगर तुम मुझे खुश करना चाहती हो, तो मैं तुम्हें एक मौका दे सकता हूं... होटल में रू—"(बात खत्म होने से पहले ही रात्रि ने अपने हाथ उठाया और अगस्त्य के मुंह पर एक जोरदार और असरदार तमाचा जड़ दिया)अगस्त्य ने उसका हाथ पकड़ा और तेजी से मोड़कर उसकी कमर पर रखकर सामने दीवार में उसे सटा दिया, और दांतों को भींचते हुए गुस्से में बोला:"देखा...! ये है हमारी कहानी, इसमें नफरत, नफरत और सिर्फ नफरत है।तुम कहां ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 34

अर्जुन आगे बोलता है:"और अब उनकी चील की नज़र है इस पार्टी पर।"अगस्त्य:"स्ट्रिक्ट सिक्योरिटी रखो, इस पार्टी से कोई नहीं मिलनी चाहिए उन्हें।"अर्जुन:"जी भाई... आप थोड़ा शांत रहना प्लीज़..."अगस्त्य:"तुम मुझे शांत क्यों करते हो, मैं बस एक्शन का रिएक्शन देता हूं।"---बस शाम होने को है...रात्रि अपने घर पर तैयार हो रही है, और उसके दिमाग में वही अगस्त्य की बातें घूम रही हैं।रात्रि (खुद को आईने में देखते हुए):"क्या मैं इतनी बुरी दिखती हूं, जो वो मुझे इतना कुछ बोल गया?तो ठीक है, आज उसका ये भ्रम भी तोड़ दूंगी मैं।"---पार्टी शुरू हो रही है... धीरे-धीरे गेस्ट आने शुरू ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 35

अगस्त्य रात्रि को एक नज़र देखता है और बोलता है:"जब तुम अपना फैसला बदलो, तो बता देना... तब तक खड़े रहते हैं दोनों..."(वो बस अपना हाथ छुड़वाने की कोशिश में है)अर्जुन: "भाई..."तभी Mr. Raw वहाँ आते हैं।अगस्त्य ने उन्हें देखा तो तुरंत रात्रि का हाथ छोड़कर उसके आगे खड़ा हो गया, उसे कवर करते हुए।अगस्त्य (एकदम प्रोफेशनल अंदाज़ में): "Yes, Mr. Raw. Do you want something?"Mr. Raw: "No... actually, my partners were asking for the meeting with the cast..."(इतने में रात्रि वहाँ से बचकर निकल गई)अगस्त्य: "Okay... I'll arrange. Give me just 30 minutes."Mr. Raw: "Okay."Mr. Raw वहाँ से ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 36

अर्जुन गार्ड्स से: "रोको... भाई को, देख क्या रहे हो?"अगस्त्य: "तुम में से कोई भी बीच में आया, तो भर नौकरी के लिए तरस जाओगे।"अर्जुन (गुस्से में): "रोको भाई को...!"तीन-चार गार्ड्स ने मिलकर अगस्त्य को रोका।मीडिया वाला: "सारी वीडियो बना ली ना..."दूसरा: "हाँ... सब हो गया, तूने फोटोज ली ना सारी??"पहला: "हम्म... अब निकल, जल्दी।"वो निकल गए।तभी Mathew के बाकी पार्टनर्स भी आ गए।Mr. John: "What did you do with Mathew?"अगस्त्य: "Ask him... what did he do with my girl. I mean... a girl."Mr. Raw: "You lost our partnership."(अगस्त्य उसके मुँह के पास आया और भारी आवाज़ में बोला): ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 37

आंखें मत खोलना।और उसने ऐसा कुछ किया कि उसे उस जलन से राहत मिलने लगी।अब अगस्त्य ने अपना हाथ आंखों से हटा लिया।रात्रि (मन में): कौन हो तुम?अगस्त्य: तुम जाओ और आराम करो।(रात्रि चली जाती है)अगस्त्य (खुद से): तुझे खुद पर काबू रखना होगा, वरना इतिहास खुद को दोहराएगा।रात्रि (खुद से): कोई तो कड़ी है, जो मुझे और तुम्हें जोड़े हुए है, अगस्त्य... पर क्या?(अगस्त्य घर पहुंचता है)अर्जुन ने उसे अंदर आते ही पकड़ लिया।अर्जुन: भाई, सब ठीक तो है?अगस्त्य: हम्म...(वो जाने लगता है)अर्जुन (पीछे से): आप उसे बता क्यों नहीं देते कि आप उससे कितना प्यार करते हैं?(अगस्त्य ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 38

रात्रि: मुझे ये समझ नहीं आ रहा, सारे राज़ खुल गए हैं... तुम मेरे सामने हो, तुमने मुझे सब भी दिया, फिर इन सपनों का क्या मतलब है?एवी सोच में पड़ गया।रात्रि: कहीं ऐसा तो नहीं कि तुमने मुझे सब कुछ बताया ही नहीं?वो एवी को घूर रही है।रात्रि: कहीं ऐसा तो नहीं... कि तुम कुछ छुपा रहे हो?एवी घबरा गया और बोला: ये... ये... तुम... ये तुम क्या बोल रही हो?रात्रि कुछ नहीं बोली।दूसरी तरफ अगस्त्य अपने ऑफिस के लिए निकल गया।पर ये खबर थमने का नाम नहीं ले रही...अगस्त्य ऑफिस पहुंचा।अर्जुन: भाई... आप कुछ दिन के लिए ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 39

एक लड़की उस भीड़ से निकलती हुई आगे आई।अगस्त्य उसे देख कर दंग रह गया, उसकी आंखें दो-दो इंच बड़ी हो गईं, और उसके मुंह से निकला: "सय्युरी...?"वो लड़की भीड़ से निकलती हुई बाहर आई और बोली:"मैं भी उस दिन पार्टी में थी। जो कुछ आपने उस वीडियो में देखा था, वो सिर्फ आधा सच था..."सब हैरान हो गए, और सबने अपना माइक और कैमरा उसकी तरफ कर लिया।अगस्त्य अभी भी शॉक में है...!अगस्त्य (रात्रि से): तुम घर जाओ... मैं यहां संभाल लूंगा।रात्रि उसको उस लड़की को घूरते हुए देख लेती है।रात्रि (हैरानी से): ये लड़की...?अगस्त्य: क्या... तुम जानती ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 40

सय्युरी: ...एवी... अगस्त्य... और रात्रि के सपने... सब उससे झूठ बोलते हैं... बेचारी!!!बस एक मैं ही हूं जो उसे बताना चाहती हूं।अगस्त्य: खबरदार...! I am warning you!सय्युरी: इस जन्म में भी प्यार हो गया क्या?वो उसे इग्नोर करके जाने लगा।रात्रि उन दोनों को ढूंढने के लिए बाहर आती है, सय्युरी जाते हुए अगस्त्य को रोकती है।सय्युरी (चिल्लाते हुए): वर्धान... वर्धान... सुनो तो!सय्युरी के ये शब्द रात्रि के कानों में पड़ गए।वो वहीं अपनी जगह पर रुक गई, उसकी आंखें झुंझलाने लगीं, उसे कुछ तो याद आ रहा है।रात्रि (आधे होश में खुद से): वर्धान...? ये नाम मैंने सुना है... ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 41

रात्रि: तो तुम मुझे सच बताओगे...? बोलो... बताओगे??मुझे जवाब चाहिए — बोलो, बताओ... बताओगे सब सच?एवी (गुस्से में): हां... बताऊंगा तुम्हें सब सच, सब कुछ!अब तुम उससे नहीं मिलोगी।एवी रात्रि को अपने घर ले गया, उसे शांत किया और पानी पिलाया...और बोला:एवी:मैं युद्ध पर तो चला गया था...पर वहां जाकर भी तुम्हारे ही ख्याल थे...---️ फ्लैशबैक ️(वर्धान और प्रणाली की कहानी में अब तक आपने पढ़ा: वर्धान को मगर के दांतों से चोट लग चुकी है, और वो ठीक नहीं हैं।वो प्रणाली से वादा करता है कि वो कल उसे उसी जगह मिलेगा, पर कोई आता है और उसे ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 42

प्रणाली अपने कक्ष में आराम से सो रही है।तभी कुछ आवाजें आने लगीं... और वो तेज़ होती जा रही आंखें खुलीं। उसने देखा — बहुत सारी दासियां उसके चारों ओर खड़ी थीं।वो थोड़ा अचंभित हो गई।प्रणाली (मन में): इतनी दासियां...? ये सब क्या हो रहा है...?और इनके हाथों में ढालें क्यों हैं?उसने एक दासी से पूछा:प्रणाली: ये सब क्या हो रहा है???एक दासी (घबराई हुई):राजकुमारी, आप शांत रहिए...!अब उसे घबराहट होने लगी। वो चिल्लाई:प्रणाली: हुआ क्या है...? बताओ मुझे अभी...!दासी:राजकुमारी... गरुड़ों का हमला है।उन्होंने हम पर हमला कर दिया है, और महल में युद्ध हो रहा है।प्रणाली थोड़ा घबरा ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 43

बेटा... प्रणाली तुम्हारी ज़िम्मेदारी है, तुम्हें उसका ख़याल रखना होगा।(महाराज के शब्द पारस के कानों में गूंजने लगे और नहीं, उसके दिमाग में एकाएक क्या विचार आया।)वो उस तलवार और प्रणाली के बीच आकर खड़ा हो गया।सबकी आंखें फट गईं।प्रणाली (चिल्लाई): भैया...?महाराज: राजकुमार...?पर तब तक वह तलवार राजकुमार की पीठ में धंस गई, और राजकुमार वहीं ध्वस्त हो गए।वो नीचे गिरा... प्रणाली उसे संभालते-संभालते धरती पर बैठ गई,उसके दोनों हाथों में उसका भाई बेजान पड़ा है।वार इतना तीखा था कि पारस को कुछ आखिरी अल्फ़ाज़ भी बोलने का वक्त नहीं मिला।प्रणाली की आंखों से आंसू बाहर बहने लगे।महाराज जितनी ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 44

हम ऐसा नहीं कर सकते पिता जी प्रणाली ने पीछे हटते हुए कहा ।हम अपने भाई और इस राज होने वाले राजा को वापस लाएंगे।सीन चेंज ,दूसरी तरफ एक महल , बड़ा ही भव्य और शानदार , सूर्य की करने छत से होकर , वहा के स्तंभों से टकरा कर कुछ इस तरह उस जगह को रोशन कर रहे हैं के मानो , सूर्य देव स्वयं ही वहा बैठे हो , चारो तरफ रोशनी पत्थरों पर बारीक कारीगरी , पर उतना ही भव्य उसका पूरा नजारा ।इसी महल में एक कमरा है , बहुत ही सुंदर और आलीशान ......पर ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 45

बाबा: और तुम मुझे देख सकती हो... उसका मतलब तुम भी कोई साधारण कन्या नहीं हो!प्रणाली: देख सकती हो क्या मतलब है??????वो वृद्ध हल्का सा मुस्कुराया और बोला: कुछ नहीं।प्रणाली: आप एक गरुड़ होकर धरती पर कैसे और क्यों हैं?वृद्ध: तुम्हें गरुड़ों में इतनी दिलचस्पी क्यों है?प्रणाली: क्योंकि मैं एक ब्रह्मवर्धानी हूं...वृद्ध: ओ... तो तुम हो वो...?प्रणाली: वो कौन...? बाबा, आप मुझे जानते हैं? आप कौन हैं?वृद्ध: मैं वो शापित गरुड़ हूं, जो इकलौता गवाह बचा है ३०० साल पहले हुई उस घटना का... जिसकी वजह से ये सब शुरू हुआ!प्रणाली: कौन सी घटना, बाबा? बताइए... ये मेरे लिए ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 46

प्रणाली तालाब के सहारे गरुड़ लोक पहुंची।(चूंकि वो एक ब्रह्म वरदानी थी और इस पीढ़ी की परी भी, तो लिए वहां पहुंचना ज्यादा मुश्किल न था।)यहां का नजारा इतना खूबसूरत है — सोने-सी निकलती हुई धूप पेड़ों पर इस कदर पड़ रही है मानो किसी स्त्री का सोलह श्रृंगार कर दिया हो।चांदी से बहते झरने और इस पानी से निकलती आवाज़ कानों को अलग प्रकार का सुख दे रही है...प्रणाली वहां की माया से निकलकर और सब से बचकर महल पहुंची।वहां दरवाजे के अंदर घुसने के लिए अपने हाथों की छाप देनी पड़ती है।अब वो सोच में पड़ गई ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 47

वैद्य: गरुड़ शोभित...! राजकुमार की नब्ज और दिल की धड़कनें अब अपनी रफ़्तार में आ गई हैं।गरुड़ शोभित (आश्चर्य क्या सच में?तभी वहां एक लड़की आती है—लड़की (घबराई सी): क्या वर्धान को होश आ गया?गरुड़ शोभित उसे देखते हैं और उनके चेहरे पर मुस्कुराहट दौड़ जाती है।गरुड़ शोभित (स्नेह से): ओ... तुम आ गई सय्युरी...? आओ!वो लड़की बड़े ही हक से अंदर आ गई। उसकी चाल में अधिकार था, और आंखों में चिंता।सय्युरी (थोड़ी शिकायत भरे लहजे में): गरुड़ शोभित... अभी तक वर्धान को होश क्यों नहीं आया?गरुड़ शोभित (हल्की सी झुंझलाहट के साथ): तुम्हें कितनी बार कहा है, ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 48

प्रणाली भागते-भागते तालाब के पास पहुँचने ही वाली थी,लेकिन उससे पहले ही सामने से सैनिकों ने उसे घेर लिया।सैनिक: है ये वो बहुरूपिया? चल, अब हमारे साथ—गरुड़ के पास।रात बहुत काली और घनी थी, किसी का चेहरा ठीक से दिख नहीं रहा था।सैनिक जब उसका नकाब हटाने लगे, तभी एक तलवार की नोक एक सैनिक की गर्दन पर आ टिकी।साथ ही एक तेज़, ठंडी आवाज़ गूंजी—रहस्यमयी आवाज: एक अकेले पर इतने लोग?थोड़ी गलत बात नहीं लग रही?चाँद कभी बादलों से निकल रहा था, कभी उन्हीं में गुम हो जा रहा था।इसी आती-जाती रोशनी में उस शख्स की आँखें एक ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 49

[गरुड़ लोक | सुबह का पहला पहर]गरुड़ शोभित (रौबदार आवाज़ में): धरती पर जा रहे हो?वर्धान् एक पल को गया।मन में सवाल उठा—“इन्हें कैसे पता चला?”गरुड़ शोभित (आँखों में सीधे देख कर):सोच क्या रहे हो? मुझे ये भी पता चल गया है कि तुम वहाँ क्यों और किससे मिलने जा रहे हो।वर्धान् (आश्चर्य और संदेह में):पिताजी...? क्या मेरी गैर-मौजूदगी में आपने मेरी जासूसी करवाई?गरुड़ शोभित (गंभीरता से):तुम अभी पूरी तरह स्वस्थ नहीं हो।इसलिए तुम कहीं नहीं जा सकते।और ये अनुरोध नहीं, आदेश है।वर्धान् रुक गया। फिर एक हीरो जैसी चाल में पलटा,आँखों में वही पुरानी आग और आवाज़ में ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 50

अगस्त्य कॉल पिक करके:"मुझे पता था तुम कॉल करोगी... मुझे भी तुमसे मिलना है सय्युरी। मैं अभी तुम्हारे घर रहा हूँ, एड्रेस दो।"(अगस्त्य ने कहा)दूसरी तरफ, रात्रि वहाँ से निकलती है।एवी:"कहाँ जा रही हो?"रात्रि:"अगस्त्य के पास!"एवी (मायूस होकर):"क्या...? पर क्यों?"रात्रि:"उसे मेरे सवालों के जवाब देने होंगे!"और वह निकलकर बाहर पहुँची।अगस्त्य ने just अपनी कार स्टार्ट ही की थी कि रात्रि अपने दोनों हाथ फैलाकर उसकी कार के आगे आ गई।कार बस एक-दो स्टेप ही आगे बढ़ी थी कि उसने रात्रि को सामने देखकर तुरंत ब्रेक मारी।(वो दांत पीसते हुए बाहर आया।)अगस्त्य:"मरना चाहती हो क्या? या चाहती हो कि मैं ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 51

दोनों की नज़दीकियाँ बढ़ने लगीं...अगस्त्य: देखा... यही वो वजहें हैं, जिनकी वजह से तुम ये कहानी नहीं जान सकती (धीरे से): पर मैं जानना चाहती हूँ।अगस्त्य (फिक्रमंद आवाज में): तुम्हें हॉस्पिटल चलना चाहिए।रात्रि अगस्त्य से थोड़ा पीछे हटी और कार फिर स्टार्ट की।थोड़ी देर में वो दोनों सय्युरी के घर पहुँचे।रात्रि: आ गए।अगस्त्य (अपनी आँखें दिखाते हुए): अब तुम यहीं मेरा वेट करना! मैं आता हूँ।रात्रि (मुँह टेढ़ा करके): तो तुम्हें लगता है कि मैं तुम्हारे पीछे आऊँगी?अगस्त्य (कार से बाहर निकलते हुए): हाँ!...और वो चला गया।रात्रि (कार की सीट पर हाथ मारते हुए): इसे क्या मैं जासूस लगती ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 52

अगस्त्य वहाँ से निकल गया।सय्युरी गुस्से में पास में रखा वास तोड़कर ज़ोर से चिल्लाती है:"आआआआआआ........!"पिछली बार इतना सब के बाद भी उसका गुस्सा और अकड़ कम नहीं हुई... इसे तो शुक्र मनाना चाहिए कि मैं इसे हासिल करना चाहती हूँ!---दूसरी तरफ,अगस्त्य बाहर आया... उसकी कार वहीं खड़ी थी, पर जब उसने कार के पास जाकर देखा — रात्रि वहाँ नहीं थी।अगस्त्य (साँस भरते हुए): As expected, वो चली गई......और वो भी वहाँ से निकल गया।---रात्रि टैक्सी में बैठी जा रही थी...(अपने और अगस्त्य के अच्छे पलों को याद करते हुए...)तभी उसके फोन पर एक कॉल आई।रात्रि: "हेलो एवी...!"एवी: ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 53

वर्धांन बिना उसे कोई जवाब दिए आगे बढ़ गया।सय्युरी उसे रोकते हुए:"वर्धांन! तुम जानते हो ना कि हम एक-दूसरे जुड़े हैं... हमारी किस्मत साथ ही जुड़ी है!"वर्धांन चला गया।सय्युरी (मन ही मन सोचते हुए):“आख़िर ये जा कहां रहा है... वो भी पूरी तरह ठीक हुए बिना?”वो अगस्त्य का पीछा करने ही जा रही थी कि बीच रास्ते में गरुड़ शोभित से टकरा गई।सय्युरी (हड़बड़ाते हुए):"माफ़ कीजिए गरुड़ शोभित... मैंने आपको देखा नहीं!"गरुड़ शोभित (मुस्कुराते हुए):"कोई बात नहीं! लेकिन तुम जा कहाँ रही हो?"सय्युरी (सामने इशारा करते हुए):"वो... वर्धांन... पता नहीं कहाँ चला गया।"गरुड़ शोभित (हल्के से मुस्कुराकर):"अरे, तुम परेशान ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 54

अब रात्रि बाजार से होकर दूसरी ओर अपनी सवारी मंगवाती है, और बैठकर आगे बढ़ने लगती है।सवारी अभी कुछ दूर पहुँची थी कि अचानक एक शख्स सामने आकर खड़ा हो गया, और पालकी के आगे सिर झुका कर बैठ गया।आगे खड़े रक्षक ने पूछा —"ए! कौन है तू? दिख नहीं रहा, शाही सवारी है? हट जा यहाँ से!"शख्स ने सिर झुकाए कहा:"मैं एक फरियादी हूँ जनाब… राजकुमारी से गुज़ारिश करने आया हूँ, और मदद की उम्मीद रखता हूँ।"रक्षक ने तलवार निकालते हुए कहा —"ऐसे छलावे तो हमने बहुत देखे हैं शाही सवारियों में..."वो शख्स अब भी विनती कर रहा ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 55

वर्धांन: हां तो मैं कहीं फँस गया होऊंगा… ये तुमने सोचा कभी?प्रणाली (कुछ याद करते हुए): अरे हां… तुम्हें चोट लगी थी ना…(वो वर्धांन को दोनों हाथों से पकड़कर ध्यान से देखने लगती है।)वर्धांन को उसकी ये फ़िक्र बहुत प्यारी लगती है।वो देखती है कि वर्धानं उसे घूर रहा है।प्रणाली (गुस्से में): अरे… मुझे क्या देख रहे हो! कुछ पूछ रही हूँ मैं?वर्धांन (हल्की मुस्कान के साथ): ये पूछ लेती तो कब का ठीक हो गया होता।पता है पर उस हालत में भी ऐसा लगा कि तुम मेरे पास आई थीं… तुमने मुझे छुआ और कहा — "तुम जल्दी ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 56

सीन: वर्धांन और गरुड़ शोभितवर्धांन गरुड़ लोक पहुंचता है।गरुड़ शोभित अपने दरबार में किसी काम में व्यस्त हैं,तो वर्धांन इंतज़ार करने लगता है।काम खत्म होते ही, वह उन्हें उनके कक्ष में ले जाता है और गुस्से में बोल पड़ता है:वर्धांन (गुस्से में):"पिता जी... आप ऐसा कैसे कर सकते हैं?"गरुड़ शोभित (हैरान होकर):"क्या हुआ? तुम इतने क्रोधित क्यों हो?"वर्धांन:"आप ही तो बचपन से बताते आए हैं कि हम एक संधि से बंधे हैं..."गरुड़ शोभित:"कौन सी संधि? तुम बोल क्या रहे हो?"वर्धांन (आवेश में):"मेरी बेहोशी की हालत में आपने बीजापुर पर हमला किया?! आप ऐसा कैसे कर सकते हैं?"गरुड़ शोभित (हैरानी ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 57

---पूरा चाँद आसमान में बहुत गुमान से फैला है। और उसी चाँद की चाँदनी में, प्रणाली आराम से अपने की खिड़की पर बैठकर ये सोच रही थी कि अब उसे एक झूठी शादी नहीं करनी पड़ेगी।वो वर्धांन के बारे में सोचकर भी मुस्कुरा उठी... उसे अच्छा लग रहा था।दूसरी तरफ, अपने किए गए फैसले से परेशान वर्धांन खुद को कहीं सुकून नहीं दे पा रहा था।आख़िर उसे एक मासूम को अपने प्रेमजाल में फँसाना है — यही सोचकर बेचैनी और बढ़ गई थी।वो आसमान में एक हवाई गश्त पर निकल पड़ा।उसके वो विशाल, सुनहरे और गुदगुदे पंख हवा में ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 58

"अगर आगे चलकर मुझसे कोई गलती हो जाएगी...तो तुम मुझे माफ़ कर दोगी?"(उसने प्रणाली से पूछा)"ज़रूर... लेकिन... वो सच एक गलती हुई तो ही..."(वो धीमे से बोली)"मुझे तुम अच्छी लगती हो..."(वो अचानक बोल पड़ा)"हम्म...? हां...? क्या?"(वो फटी आँखों से चौंक कर बोली)"मैं चाहता हूँ... हम यहाँ से कहीं दूर चले जाएं। बोलो...चलोगी मेरे साथ?"(वर्धांन की आँखें नम हो गईं)प्रणाली को कुछ समझ नहीं आया कि वो क्या बोले।वर्धांन ने अपना हाथ आगे बढ़ाया —उसकी "हाँ" का इंतज़ार करते हुए..."बोलो, प्रणाली...?"(उसने दोबारा पूछा)प्रणाली के माथे पर हल्की सी शिकन उभरी —"तुम्हें मेरा नाम कैसे पता? मैंने तो नहीं बताया..."वर्धांन चौंक ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 59

"तुम्हें तो खुश होना चाहिए कि तुम्हें अब किसी मासूम को धोखा नहीं देना होगा... तो ख़ुशी दिखाओ?""लेकिन मुझे बुरा क्यों लग रहा है...? अच्छा क्यों नहीं लग रहा..."(वो खुद से शिकायते कर रहा है):::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::वर्धान गरुड़ लोक पहुँचा, और अपने पुस्तकालय में सारी किताबों की छानबीन करने लगा...उसने बहुत सी किताबें देखीं, पर शायद वो नहीं मिला जो उसे चाहिए था।तभी वहाँ सय्युरी आई।"क्या कर रहे हो?"(उसने पीछे से पूछा तो वर्धान चौंक गया।)"अरे... क्या कर रही हो, डरा दिया तुमने!"(उसने किताबों को देखते हुए ही जवाब दिया।)"पर तुम कर क्या रहे हो? मुझे बताओ!" (उसने फिर पूछा।)"गरुड़ विष..."(वो ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 60

प्रणाली गहरी नींद में जा चुकी है।वर्धांन उसके गालों को छूते हुए बोला –"मैं तुम्हारे सोने का इंतज़ार कर था..."हवा से उसके बाल गालों को छूने लगते हैं।वर्धांन उन बालों को हटाने के लिए अपना हाथ आगे बढ़ाता है, पर कुछ सोच कर रुक गया..."नहीं! ये गलत है... मैं खुद को तुमसे दूर क्यों नहीं रख पा रहा?"(उसने अपने हाथ पीछे करते हुए कहा)वर्धांन वहाँ से निकलकर अब महल के अंदर चला गया और न जाने किस तलाश में घूम रहा है...कभी वो सैनिकों से बचता, तो कभी महल के हर दरवाज़े का मुआयना करता।पर कुछ घंटों की मशक्कत ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 61

वैद्य आए, उन्होंने पारस की नब्ज को पकड़ा और बोले:"माफ कीजिएगा महाराज, पर राजकुमार अब इस दुनिया में नहीं को इतना तेज़ झटका लगा कि वह दो कदम पीछे हो गए...और अपना सीना कस कर पकड़ लिया!महारानी ने ज़ोर से रोना शुरू कर दिया।"नहीं...! ये नहीं हो सकता!" (प्रणाली ने सदमे में कहा)पूरे महल में मातम छा गया, और हर तरफ से रोने की आवाजें आने लगीं।आज प्रणाली का राज्याभिषेक था...प्रणाली अपने भाई के पास गई और उससे उठने की गुहार करने लगी।"भैया... उठिए ना... प्लीज़..."...और उसने पाया कि पारस का शरीर अब भी गरम है!"ऐसा कैसे हो सकता ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 62

उन लोगों ने अपने-अपने हाथों में तीखे-तीखे खंजर ले रखे हैं।वर्धांन:(अपने सहारे से खड़े होते हुए)“मैंने अपनी ताक़त खो है... पर हिम्मत नहीं!”घुसपैठिए (करीब आते हुए):“अच्छा! तो आओ... दिखा दो अपनी हिम्मत!”वो लोग वर्धांन की तरफ बढ़ते जा रहे हैं।वर्धांन ने वहीं से एक लकड़ी उठाकर उनके रास्ते में फेंकी, जिससे उलझकर वो चारों-पांचों गिर पड़े।एक घुसपैठिया (दाँत पीसते हुए):“रस्सी जल गई... लेकिन बल नहीं गया!”और वो सब एक साथ वर्धांन पर हावी हो गए...वर्धांन ने अपनी पूरी ताक़त से मुकाबला किया,पर इस वक़्त उनका जोर उस पर भारी पड़ रहा था।तभी जंगल के एक तरफ़ से एक आवाज़ ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 63

---और ये "खचचच..." की आवाज आई। तलवार उसके शरीर में घुस चुकी थी!"वर्धांन....!"(प्रणाली पूरी जान से चीखी)उसने ये मंजर आंखों से देखा।वो तलवार वर्धांन के पेट को चीरती हुई उसके शरीर में धंसी थी...वर्धांन ने अपनी आंखें बंद होने से पहले प्रणाली को वहां आते हुए देखा।और उसे देखकर मानो मौत भी उसके हलक में फंसकर रह गई..."त...त... तुम... यहां क्यों आई...? भ...भ... भाग जाओ यहां से..."(उसने लड़खड़ाती आवाज में प्रणाली से कहा)वर्धांन की ये हालत देख कर प्रणाली की आंखों से नदियां बहने लगीं...उसे कुछ समझ नहीं आया।वो भाग कर उसके पास आई, उन घुसपैठियों को एक ओर ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 64

"महल नहीं, तो कहां ले जाऊं तुम्हे?"(प्रणाली को कुछ समझ नहीं आ रहा था)वो बहुत घबरा गई और सोचने "कैसे बचाऊं तुम्हे..."माथे पर हाथ रखकर सोचने लगी...ऊपर से वर्धांन के शरीर से पानी की तरह निकलता खून, उसकी धड़कनें और बढ़ा रहा था।कुछ देर सोचने के बाद, उसने वर्धांन को खड़ा करने की कोशिश की और उसे अपने सीने से लगाकर उड़ने लगी...उसे अभी ठीक से उड़ना नहीं आ रहा इसलिए लड़खड़ा रही है.....फिर भी हिम्मत बांधे हुए उड़े जा रही।।।।"वर्धांन, अपनी आंखें खोलो... मैं तुम्हे कुछ नहीं होने दूंगी... हिम्मत मत हारना!"(उसकी घबराई हुई आवाज भर्राई हुई थी)वो ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 65

प्रणाली (संदेह से बाबा को देखते हुए): आप... आप कुछ जानते हैं?(बाबा ने तुरंत नज़रें फेर लीं और बात दी)बाबा (गंभीर स्वर में): तुम बस बाहर पहरा दो... अभी और कोई सवाल मत करो।बाहर प्रणाली के सिपाही आ चुके हैं, लेकिन उन्हें कुछ भी नज़र नहीं आ रहा...सिपाही आपस में बातें करते हैं —पहला सिपाही: कुछ दिख क्यों नहीं रहा? क्या वो यहीं है?दूसरा सिपाही: पता नहीं... जैसे कुछ अदृश्य ताक़त हमें भ्रमित कर रही हो।अगला दिन हुआ...सिपाही अब भी उसकी तलाश में हैं और आसपास ही कहीं मंडरा रहे हैं... पर नतीजा शून्य।शाम हो चुकी है, पर स्थिति ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 66

सिपाही प्रणाली को महल लेकर आए। वो एकदम बेजान हो गई थी। उसकी बस आंखें खुली थीं और आंसू रहे थे।"तुरंत वैद्य को बुलाया जाए!" किसी ने कहा।कुछ ही देर में उसकी आंखें भी बंद हो गईं......और इस तरफ अगस्त्य की आंखें झटके से खुलीं।वो चिल्लाया —"प्रणाली...!"तभी अर्जुन उसके कमरे में आया —"भाई, आप ठीक तो हैं ना?" (उसने चिंता में पूछा)अगस्त्य हड़बड़ाया और इधर-उधर देखने लगा। फिर उसे याद आया कि यह एक सपना था।वो सोचने लगा —"नहीं... ये सपना सच नहीं हो सकता। अगर तुम्हें कुछ पता चल गया, तो मैं तुम्हें फिर खो दूंगा...""भाई...? आप क्या ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 67

रात्री : तो… आपके पास हैं मेरे सारे सवालों के जवाब…?सारे तो नहीं… लेकिन हाँ… तुम्हारे सपनों के जवाब… मेरे पास हों।एक उम्रदराज़ औरत ने मुस्कुराते हुए, लेकिन आँखों में अजीब सी गहराई लिए सामने से कहा…---दूसरी तरफ़—अगस्त्य, फोन में लोकेशन ऑन करके, सड़क पर तूफ़ान की तरह दौड़ रहा था।उसके चेहरे पर चिंता की लकीरें साफ़ थीं, जबड़े कसे हुए, उंगलियां स्टीयरिंग पर और भी ज़ोर से दब रहीं थीं।वो उसे बार-बार कॉल कर रहा था…पर रात्री… बस स्क्रीन पर देखती… और फिर नजरें फेर लेती।कुछ पल बाद… उसने कॉल कट कर दी।अगस्त्य का दिल धक-धक कर रहा ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 68

अगस्त्य ने अपनी दोनों बाहों से Ratri को थाम लिया,जैसे उसकी सारी दुनिया सिर्फ इसी पल में सिमट गई kholo… Ratri…”उसकी आवाज़ का हर लफ़्ज़ एक गहरा सा प्यार और डर लेकर आ रहा था,जैसे वक्त खुद रुका हुआ हो।एक पल में ही Agastya की आँखें आँसुओं से भर गई…और फिर उनमें ख़ून उतर आया, जैसे उसका दिल और दिमाग दोनों एक ही साथ झंझुटा रहे हों।Ratri का कोई जवाब न आने पर,उसने दांतों को पीसते हुए कहा:“क्या याद दिलाया तुमने इसे…?Jaan pyari है तो जितना पता सब बताओ…”वो औरत, जो इस पूरी scene की गवाह थी,थोड़ी देर के ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 69

A. V.: “kya tumhare paas abhi bhi shaktiyaan hai…”उसने Agastya के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा…Agastya कुछ पल रहा…उसकी सांसें भारी थीं… आँखें लाल…“Koi shakti nhi h mere pass, sb shapit hai…”उसने दांतों को पीसते हुए A.V. का हाथ झटक दिया…जैसे उस स्पर्श ने ही उसके अंदर के घाव को छू लिया हो।A.V. कुछ पल उसे देखता रहा… फिर हल्की सी मुस्कान उसके होंठों पर आई…पर वो मुस्कान… जीत की नहीं… टूटे हुए अहसास की थी…“Theek h… shyd tum khud hi ratri ko theek nhi Krna chahte…Ratri meri kbhi nhi ho skti, ye to me Usi Janam me ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 70

अगस्त्य का यह रूप कोई नया नहीं था…यह वही था, कोई अलग इंसान नहीं।और चाहे अगस्त्य हो या वर्धन, अपनी ज़िद के पक्के थे…इसका मतलब था—सय्युरी को अगस्त्य के सवालों के जवाब देने ही होंगे।सय्युरी ने धीरे से कहा,“ठीक है… जाओ फिर।”अगस्त्य की आँखों में दृढ़ निश्चय जाग रहा था…और उसने सीधे पूछा,“मुझे वो रास्ता बताओ, जिससे प्रणाली पारस के लिए गरुड़ पुष्प लेने गई थी!”सय्युरी अजीब सा मुँह बनाते हुए उसकी तरफ देखी—“तुम्हें उस रास्ते से क्यों जाना है?”अगस्त्य के हाथ धीरे से कस गए…उसकी साँसें तेज हो गईं… और आँखों में एक ऐसी ज़िद की चमक थी—जो ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 71

दृश्य: सय्युरी का घर(सय्युरी का घर – अगस्त्य बेचैन खड़ा है। तभी उसका फोन बजता है।)A.V. (फोन पर, घबराहट आवाज़ में):“Agastya… Ratri की condition बहुत critical है। Doctors कह रहे हैं कि अगर जल्द कुछ नहीं किया गया, तो वो coma में जा सकती है।”(अगस्त्य की आँखें एक पल के लिए बंद हो जाती हैं। उसकी साँसें तेज हो जाती हैं।)Agastya (धीमी पर दृढ़ आवाज़ में):“Main use kuch nahi hone dunga.”(फोन काटने के बाद, अगस्त्य सय्युरी की तरफ मुड़ता है।)Agastya:“Sayyuri, mujhe Garud Lok jana hoga… aur tum mere saath chalogi.”Sayyuri (गंभीर नज़र से देखते हुए):“Tum bhool rahe ho, ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 72

अगस्त्य सय्युरी के साथ तुरंत कार में बैठा, और कार सीधा अस्पताल पर रुकी।वह कार से निकला… आगे बढ़ने ही था कि उसका सिर बहुत तेज़ चकराया और वह लड़खड़ा गया। सय्युरी ने तुरंत उसे पकड़ लिया।अगस्त्य ने खुद को संभालते हुए कहा—“मैं ठीक हूँ… चलो…”वह आगे बढ़ने लगा कि पीछे से सय्युरी ने उसका हाथ पकड़ लिया।सय्युरी (दबी हुई आवाज़ में):“अगस्त्य…”वह रुक गया, पीछे पलटा और बेसब्री के साथ बोला—“चलो…”सय्युरी ने अपनी पकड़ उसकी कलाई पर और कस ली और इशारे से उसका ध्यान उसके शरीर की ओर दिलाया।अगस्त्य ने जब खुद को देखा, तो उसके शरीर पर ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 73

सब लोग अगस्त्य को उसके घर ले आए। अर्जुन ने रास्ते में ही डॉक्टरों की पूरी टीम और सारी मंगवा ली थीं — क्योंकि अगस्त्य मान का अस्पताल जाना मुमकिन नहीं था। दुश्मन की नज़रें हर जगह थीं।अगस्त्य को बेड पर लिटाया गया। उसका चेहरा पीला पड़ चुका था, होंठ सूखे थे — फिर भी उसने आँखें खोलने की कोशिश की।उसके होंठ हिले..."का... कानि... रा... रात्रि..."बस इतना — और वो बेहोश हो गया।कमरे में सन्नाटा छा गया।डॉक्टरों ने तुरंत ऑपरेशन की तैयारी शुरू की।काफी देर बाद डॉक्टर बाहर आए। उनके चेहरे पर चिंता की लकीरें साफ़ दिख रही थीं।"गोली ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 74

प्रणाली की आँखें खुली थीं।पर मन कहीं और था।कमरे में धीरे धीरे सब आ गए थे — माँ, पिताजी, परस — सबके चेहरों पर राहत थी, खुशी थी। जैसे कोई बड़ा तूफान टल गया हो।पर प्रणाली के अंदर —एक अलग ही तूफान था।वर्धान।बस यही एक नाम था जो उसके दिमाग में घूम रहा था। वो ठीक है? कहाँ है? क्या हुआ उसे?तभी अगरेन का स्वर सुनाई दिया —"अब तो अविराज भी युद्ध से आ गया है... तो अब तुम दोनों के विवाह की तैयारी शुरू कर सकते हैं।"प्रणाली ने सुना — पर जैसे सुना नहीं।परस ने धीरे से कहा ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 75

झोपड़ी की खाली ज़मीन देखने के बाद प्रणाली रुकी नहीं।पाँव खुद ब खुद उस राह पर चल पड़े — शायद दिल को याद थी।नदी।वो जगह — जहाँ वो कितनी बार मिले थे। कभी झगड़ते हुए। कभी हँसते हुए। कभी बिना कुछ कहे — बस साथ बैठे हुए। यह जगह उनकी थी — बिना कहे, बिना तय किए।पर आज —यहाँ भी कोई नहीं था।प्रणाली धीरे धीरे पेड़ों के पास गई। उँगलियों से छाल छुई — जैसे इन पेड़ों से पूछ रही हो — क्या तुमने उसे देखा?पेड़ चुप रहे।वो नदी के किनारे आकर बैठ गई। पानी बह रहा था — ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 76

वर्धान अपनी नम आंखों और दुनिया जीत लेनी वाली मुस्कान से : मै......और फिर —कुछ याद आया।अचानक।जैसे किसी ने पानी डाल दिया हो।जो उसको उसके दूत ने बताया था , राजा और प्रणाली के बीच का संवाद :"अब तो अविराज भी युद्ध से आ गया है... तो अब तुम दोनों के विवाह की तैयारी शुरू कर सकते हैं।"वर्धान की मुस्कान धीरे धीरे —फीकी पड़ गई।हथेलियाँ — जो प्रणाली के चेहरे पर थीं — धीरे से हट गईं।एक कदम पीछे।बस एक कदम।पर उस एक कदम में जैसे पूरी दुनिया का फासला था।"प्रणाली..." — आवाज़ बदल गई थी। अब उसमें वो ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 77

गरुड़ लोक में शाम उतर रही थी।सुनहरी रोशनी धीरे धीरे फीकी पड़ रही थी — आसमान में बादल थे गहरे, भारी। जैसे कुछ आने वाला हो।वर्धान अपने कक्ष की खिड़की के पास खड़ा था।नदी किनारे का वो लम्हा अभी भी दिल में था — प्रणाली का चेहरा, उसकी आवाज़, उसकी भीगी आँखें।"एक बार बता दो कि तुम ठीक हो।"उसने आँखें बंद कर लीं।जाना ही था उसे। यही सही था।तभी —बाहर से एक आवाज़ आई।गरुड़ों का कोलाहल। पंखों की फड़फड़ाहट। और फिर — सब शांत।वर्धान ने आँखें खोलीं।कुछ था — हवा में। एक अजीब सी भारीपन। जैसे तूफ़ान से पहले ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 78

"वर्धान — छोड़ो उसे!"सायूरी आ गई थी।उसने दोनों को अलग किया — वर्धान को पीछे खींचा, कनिष्क को छुड़ाया।कनिष्क झाड़े।और मुस्कुराया — उसी इत्मीनान से।"अरे वाह..."उसकी नज़र सायूरी पर गई —"मेरी भाभी प्रतियोगिता की उम्मीदवार नंबर दो।"और बिना एक पल रुके — वो चला गया।पत्तों के बीच से। आराम से। जैसे कुछ हुआ ही नहीं।वन में अब सिर्फ दोनों थे।सायूरी ने कनिष्क की पीठ देखी — फिर वर्धान की तरफ मुड़ी।"भाभी प्रतियोगिता...?"उसकी आवाज़ में हैरानी थी — पर आँखों में कुछ और था।"यह सब क्या है वर्धान?"वर्धान ने उसे नहीं देखा।"कुछ नहीं।""मुझसे दूर रहो।"और चलने लगा।सायूरी ने उसका हाथ ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 79

पारस चुपचाप बैठा रहा।प्रणाली के रोने की आवाज़ धीरे धीरे शांत हो रही थी।कितनी देर बाद —उसने अपना सिर पोंछीं।और बोली —"भैया... वो बस एक साधारण इंसान है।"पारस ने उसे देखा।"उसका नाम वर्धान है।"पारस की आँखों में कुछ हिला — पर वो चुप रहा। सुनता रहा।प्रणाली ने सब बताया —जंगल में पहली मुलाकात। वो झोपड़ी। वो बाबा। वो नदी किनारे की बातें। वो हँसी। वो झगड़े।और फिर — वो आखिरी लम्हा।"जाओ।"पारस देर तक चुप रहा।गरुड़ लोक और बीजापुर की पुरानी कहानी उसे पहले से पता थी।और अब —एक एक बात जुड़ रही थी।उसने धीरे से पूछा —"जिस दिन मेरे ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 80

तलवार अभी भी वर्धान की गर्दन पर थी।पारस की आँखें — गुस्से से भरी।वर्धान ने हिलने की कोशिश नहीं — शांत आवाज़ में बोला —"सुनो।""पहले सुनो। फिर जो चाहो करो।"पारस की पकड़ ढीली नहीं हुई — पर वो चुप रहा।वर्धान ने एक गहरी साँस ली —"मैं इस दुश्मनी को खत्म करना चाहता हूँ।""दोनों लोकों के बीच जो पीढ़ियों से चला आ रहा है — वो मेरे राज में नहीं चलेगा।"पारस ने उसे देखा — आँखों में सवाल था।"बड़ी अच्छी बातें हैं।" — उसकी आवाज़ में व्यंग्य था — "पर तुमने मेरी बहन के साथ जो किया—""वो मैं जानता हूँ।" ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 81

वर्धान ने द्वार पर दस्तक दी।"आइए।"शोभित खिड़की के पास खड़े थे। सुबह की पहली रोशनी उनके सफ़ेद पंखों पर रही थी। उम्र थी चेहरे पर — पर आँखें अभी भी तेज़ थीं। वही आँखें जो वर्धान को बचपन से पढ़ लेती थीं।उन्होंने पलटकर देखा।बेटे को देखा।आँखों के नीचे काले घेरे। चेहरे पर थकान। पर जबड़ा कसा हुआ — जैसे कमज़ोरी दिखाने से डर लग रहा हो।"रात भर जागे?" शोभित ने सीधे पूछा।वर्धान ने एक पल रुककर कहा —"जी।"शोभित कुछ नहीं बोले। बस इशारे से बैठने को कहा।वर्धान बैठ गया। पर बात शुरू नहीं हुई तुरंत।कुछ देर चुप्पी रही — ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 82

दूल्हे राजा... बहुत जच रहे हो।”अविराज ने पलटकर देखा।कनिष्क।दरवाज़े पर टिका हुआ… बाँहें सीने पर…चेहरे पर वही मुस्कान — हमेशा कुछ छुपा होता था।अविराज (सपाट, ठंडे स्वर में):“क्या चाहते हो कनिष्क?”कनिष्क अंदर आया…दरवाज़ा बंद किया…धीरे से… बहुत धीरे से…जैसे हर आवाज़ को भी सुनने की इजाज़त न हो।कनिष्क (हल्की मुस्कान के साथ):“बस देखने आया था…मेरा दोस्त आज दूल्हा बन रहा है…और उसके चेहरे पर खुशी नहीं है।”अविराज:“खुशी है।”कनिष्क (धीरे, काटते हुए):“झूठ…”वह उसके बिल्कुल करीब आ गया।इतना करीब कि उसकी साँसें तक महसूस हो रही थीं।कनिष्क:“मैं तुम्हें जानता हूँ, अविराज…तुमसे बेहतर… शायद तुम खुद को नहीं जानते।”अविराज चुप रहा।उसकी उंगलियाँ ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 83

मंत्रों की आवाज़ महल में गूँज रही थी।धीमी। गहरी।हर शब्द जैसे हवा में घुल रहा हो — पर प्रणाली कानों तक पहुँच नहीं रहा था।वो बैठी थी — दुल्हन के वस्त्रों में। लाल। भारी। सुंदर।पर अंदर से —खाली।आज के बाद सब बदल जाएगा।उसने हाथ देखे — मेहंदी थी। हल्दी की पीलाहट थी।यही तो चाहते थे सब।यही सही है।पर दिल —दिल एक ही सवाल पूछता था —तो फिर इतना भारी क्यों है?उसने आँखें बंद कर लीं।और उसी अँधेरे में —एक चेहरा था।वही आँखें। वही मुस्कान।"जाओ।"प्रणाली ने होंठ भींच लिए।जाने दो।जाने दो उसे।उधर —महल के बाहर।वर्धान खड़ा था।अकेला।भरोसेमंद सैनिक दूर थे।वो ...और पढ़े

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इश्क और अश्क - 84

शहनाई अभी भी बज रही थी।किसी को ख़बर नहीं थी कि रोकें।बाहर ढोल था। हँसी थी। फूल थे।लगता है मेल मिलाप पहले ही हो चुका है(किसी की आवाज आई ।)एक पल में सब बंद ...शहनाई , ढोल सबसबकी नजर मुख्य द्वार पर।। ।ये कनिष्ठ ही था।भीतर —भीतर तलवारें थीं।कनिष्क चल रहा था।धीरे-धीरे।जैसे वो किसी बाज़ार में टहल रहा हो।जैसे उसे पता हो — ये जगह उसी की है।हर क़दम पर उसके जूते की आवाज़ फर्श पर गूँज रही थी —ढम।ढम।ढम।मंडप के फूल हवा में काँप रहे थे।दीपों की लौ थरथराई।जैसे वो भी डर गई हों।परास की नज़र उस पर ...और पढ़े

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