मंत्रों की आवाज़ महल में गूँज रही थी।
धीमी। गहरी।
हर शब्द जैसे हवा में घुल रहा हो — पर प्रणाली के कानों तक पहुँच नहीं रहा था।
वो बैठी थी — दुल्हन के वस्त्रों में। लाल। भारी। सुंदर।
पर अंदर से —
खाली।
आज के बाद सब बदल जाएगा।
उसने हाथ देखे — मेहंदी थी। हल्दी की पीलाहट थी।
यही तो चाहते थे सब।
यही सही है।
पर दिल —
दिल एक ही सवाल पूछता था —
तो फिर इतना भारी क्यों है?
उसने आँखें बंद कर लीं।
और उसी अँधेरे में —
एक चेहरा था।
वही आँखें। वही मुस्कान।
"जाओ।"
प्रणाली ने होंठ भींच लिए।
जाने दो।
जाने दो उसे।
उधर —
महल के बाहर।
वर्धान खड़ा था।
अकेला।
भरोसेमंद सैनिक दूर थे।
वो महल को देख रहा था — उस एक खिड़की को — जहाँ दीपक जल रहा था।
अंदर जाना था।
पर पाँव —
पाँव नहीं उठ रहे थे।
उसने एक लंबी साँस ली —
"कैसे आऊँ अंदर..."
आवाज़ इतनी धीमी थी — जैसे खुद से भी छुपा रहा हो।
"वहाँ तुम किसी और की दुल्हन बनकर बैठी हो।"
"वो मेहंदी... वो हल्दी... वो वस्त्र..."
उसने आँखें बंद कर लीं।
"यह सब किसी और के लिए है।"
"और मैं..."
रुका।
"...मैं वो हूँ जिसने तुम्हें यहाँ तक पहुँचाया।"
गला भर आया।
"कैसे देखूँ तुम्हें किसी और का होते हुए।"
"यह ख्याल भी — दिल को हिला रहा है।"
हवा चली — ठंडी।
पर वर्धान को महसूस नहीं हुई।
"पर जाना होगा।"
"कनिष्क आएगा।"
"और तुम्हें कुछ नहीं होने दे सकता।"
"चाहे मुझे खुद को कितना भी तोड़ना पड़े।"
उसने आँखें खोलीं।
दिल पर पत्थर रखा।
और अंदर आ गया।
मंत्र गूँज रहे थे।
अग्नि जल रही थी।
और उसी पल —
प्रणाली को कुछ महसूस हुआ।
एक अजीब सी गर्माहट।
जैसे कोई जाना पहचाना —
पास हो।
उसने आँखें खोलीं।
और बिना सोचे — बिना समझे —
बस होंठों से निकल गया —
"वर्धान...!"
अविराज —
जो अब तक शांत बैठा था —
एक पल के लिए जम गया।
उसने प्रणाली को देखा।
वो घबराहट। वो आँखें — जो अचानक जीवित हो गई थीं।
और वो नाम —
"वर्धान।"
कनिष्क की वो बात —
जो उसने कभी नहीं मानी थी —
आज —
सच लगी।
उसके हाथ काँपे।
उसने शेरवानी पर लगी तलवार को — कसकर — पकड़ लिया।
प्रणाली ने दरवाज़े की तरफ देखा —
वर्धान।
धरती के कपड़ों में। बिना कवच के। बिना पंखों के।
पर आँखें —
वही आँखें।
जो कभी नहीं बदलती थीं।
प्रणाली का दिल एक पल के लिए रुक गया।
वो आया।
पर साथ ही —
एक दर्द भी था।
क्यों आया?
अब क्यों?
जब सब तय हो चुका है?
आँखें भर आईं —
पर उसने पलकें झपकाईं।
नहीं।
वर्धान सीधे उसके पास आया।
रुका।
उसने प्रणाली को देखा —
उस लाल जोड़े में।
उस मेहंदी में।
उन भरी आँखों में।
एक पल — बस एक पल —
उसके चेहरे पर कुछ टूटा।
पर अगले ही पल —
वो फिर शांत था।
उसने धीरे से — प्रणाली की कलाई थामी।
हाथ काँप रहे थे — पर थामे रखा।
और एक लाल धागा —
धीरे धीरे — बाँधने लगा।
प्रणाली ने नीचे देखा —
"यह क्या है?" — फुसफुसाई।
वर्धान की आवाज़ गहरी थी — भारी —
"रक्षासूत्र।"
"इसमें मेरी शक्तियाँ हैं।"
"गरुड़ विष इसे भेद नहीं पाएगा।"
प्रणाली ने उसे देखा —
"तुम्हारी शक्तियाँ...? मतलब? गरुड़ विष...?"
वर्धान ने कोई जवाब नहीं दिया।
बस — धागा बाँधता रहा।
उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं।
पर हाथ नहीं छोड़ा।
जब धागा बँध गया —
उसने एक पल — उस कलाई को थामे रखा।
जैसे छोड़ना नहीं चाहता था।
और फिर —
छोड़ दिया।
उसने प्रणाली की आँखों में देखा —
गहरे। सीधे।
"कुछ भी हो —"
आवाज़ टूट रही थी — पर शब्द नहीं टूटे —
"— इसे मत तोड़ना।"
प्रणाली की आँखों से एक आँसू बह निकला।
उसने कुछ कहना चाहा —
"वर्धान... तुम—"
तभी —
"बड़ी हिम्मत है तुम्हारी।"
तलवार निकलने की आवाज़।
अविराज।
आँखों में आग थी। हाथ में तलवार। चेहरे पर दर्द था — जो गुस्से में छुप रहा था।
वर्धान ने पलटकर देखा — शांत।
पारस आगे आया —
उसने अविराज की तलवार थाम ली।
"यह मेरा अतिथि है।"
अविराज ने उसे देखा —
"तुम जानते भी हो इसे? यह—"
पारस ने एक नज़र से उसे चुप करा दिया।
धीरे से — पर मज़बूती से — इशारे से बैठने को कहा।
अविराज की मुट्ठी भिंची रही।
आँखों में आँसू थे — जो गुस्से में छुप रहे थे।
पारस अविराज के कान में धीरे से : प्रणाली की इसका सच नहीं पता चलना चाहिए वरना वो और टूट जाएगी ।
इतना सुनकर वो बैठ गया।
और तभी —
पीछे से एक आवाज़ आई।
हल्की। शांत।
पर उसमें एक ज़हर था —
एक खतरा था —
"अच्छा..."
सबने पलटकर देखा।
दरवाज़े पर —
कनिष्क।
होंठों पर वही मुस्कान।
हरी आँखों में एक चमक —
"तो यहाँ मेल मिलाप हो ही चुका है।"