इश्क और अश्क - 11 Aradhana द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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इश्क और अश्क - 11



"नहीं....! नहीं........! ये सच नहीं हो सकता!" — रात्रि चीख पड़ी।

उसकी आवाज़ इतनी तीखी थी कि पेड़ों पर बैठे पक्षी भी फड़फड़ा कर उड़ गए।
कैंप में मौजूद हर शख़्स चौंक गया।

एवी भी गुस्से से तमतमा गया:
“ये सब क्या बोले जा रहे हैं आप? ये सब झूठ है! आपको कुछ नहीं पता... प्रणाली गंगा की तरह पवित्र थी!”

उसकी आँखें नम थीं, पर आवाज़ में कोई काँप नहीं था — एक चट्टान जैसी सच्चाई से भरा हुआ साहस।

चारों ओर सन्नाटा छा गया। सब एवी की ओर देखने लगे।

कोई फुसफुसाया, “इसे क्या हो गया...”
दूसरा बोला, “इतना personal क्यों हो गया suddenly?”
लेकिन एवी बिना किसी को देखे वहाँ से तेज़ी से निकल गया।


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अब शाम ढल रही थी, आसमान नारंगी से स्याह होता जा रहा था।
महल की ओर लौटते वक़्त सबके मन में बस एक ही सवाल था —
"ये लोकेशन वाकई में… ठीक है?"


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लोकेशन पर सभी लौट आए।
इस बार सबने फैसला किया कि महल के अंदर नहीं, बाहर टेंट लगाकर रुकेंगे। डर की हल्की लहर थी सबके दिल में।

रात्रि आग के पास अकेली बैठी थी। आँसुओं की गर्मी उसकी पलकों से बह रही थी, पर अंदर एक अजीब ठंड ने उसे जकड़ रखा था।

तभी किसी ने उसके सामने एक रुमाल बढ़ाया।

रात्रि ने धीरे से गर्दन उठाई।

"एवी...? तुम..."

रात्रि (थोड़ी तुर्शी के साथ):
“तुम प्लीज़ यहां से चले जाओ… मैं नहीं चाहती कि और कोई बात बने।”

एवी (धीरे से मुस्कुराते हुए):
“ठीक है… तुम रोना बंद कर दो, मैं चला जाऊंगा।”

इतना कहकर वो वहीं बैठ गया — चुपचाप, उसके आँसुओं के साथ।


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रात्रि (धीरे से, टूटी आवाज़ में):
“तुम्हें पता है, जिस कहानी पर ये मूवी बन रही है… वो मेरे सपनों की दुनिया है।
इस कहानी का एक-एक हिस्सा मैंने महसूस किया है... ऐसा लगता था जैसे ये कहानी मेरी ज़िंदगी से जुड़ी है।
और ये जगह… बिलकुल वैसी ही है जैसी मेरे सपनों में आती थी।”

एवी ने अपना सिर झुकाया और अपने गालों पर हथेलियाँ टिकाते हुए बस उसे देखता रहा।
वो उसकी बातों में खो गया था।

रात्रि (रोती हुई):
"मैं इस लोकेशन पर आकर इसलिए खुश हुई थी क्योंकि मुझे लगा कि मैं उन सपनों को सुलझा लूंगी…
मुझे प्रणाली पर गर्व था। लेकिन उस बाबा की कहानी ने मेरी सोच हिला दी।
अगर... अगर वो सच में वैसी ही निकली तो?"

एवी ने तुरंत उसकी ठंडी, कांपती हथेलियाँ पकड़ लीं —
“Shhhhhhh…”

एवी (बहुत नर्मी से):
“ऐसा बिल्कुल नहीं है। तुम गलत नहीं हो… और न ही वो प्रणाली थी।
कभी-कभी कहानियाँ हमें डराने के लिए होती हैं… लेकिन जो महसूस किया है, वो झूठ नहीं हो सकता।”

अगस्त्य एक पेड़ के पीछे से यह सब सुन रहा था।
उसके चेहरे पर ईर्ष्या, गुस्सा और कुछ और अनकहा दौड़ गया।

जैसे ही एवी ने रात्रि को गले से लगाया —
अगस्त्य का खून खौल उठा।

उसने गुस्से में उसी पेड़ पर ज़ोर से मुक्का मारा — इतनी ताकत से कि छाल टूट गई।
और वो वहाँ से तेज़ी से निकल गया, जैसे कोई ज्वालामुखी फटने से पहले फूटता है।


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रात्रि के आँसू अब शांत हो चुके थे।
एवी धीरे-धीरे उसके करीब आने लगा…

लेकिन तभी —

रात्रि (चौंककर):
“आग…! एवी, देखो! आग लग गई है!”

एवी ने पीछे मुड़कर देखा — वही पेड़, जिस पर अगस्त्य खड़ा था… अब धधक रहा था।
आग की लपटें आसमान को छू रही थीं।

एवी ने तुरंत रात्रि को उठाया और एक सुरक्षित जगह बिठाया, फिर सबको आवाज़ लगाई।

कुछ ही देर में अर्जुन, नेहा, मलिश्का, विनोद और बाकी स्टाफ आ गए। आग बुझाने में घंटों लग गए।


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सब थके हुए थे, डरे हुए थे।

संजय:
“ये आग... वाकई में हादसा थी?”

नेहा:
“Hmmm… I agree, it felt deliberate.”

विनोद:
“क्या ये लोकेशन safe है भी? या हम किसी बर्बादी के सेट पर शूट कर रहे हैं?”

मलिश्का (थोड़ी नाटकीय):
“लगता है मेरी पहली फिल्म अधूरी ही रह जाएगी…”

एवी, अर्जुन और रात्रि चुप थे — पर उनके मन में एक ही बात थी — “ये आग अपने आप नहीं लगी…”


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कुछ देर बाद...

एवी:
"रात्रि, चलो अंदर।"

रात्रि (धीरे से):
"मुझे कुछ देर अकेले रहना है..."

एवी एक पल ठहरकर चला गया।

रात्रि उस जले हुए पेड़ के पास पहुंची,
वो उसकी परिक्रमा करने लगी जैसे कोई रहस्य उसे खींच रहा हो।

तभी उसे राख में कुछ चमकता दिखा।

वो झुकी, धीरे से राख हटाई…
एक अंगूठी… बहुत खास।

उसमें एक पक्षी की नक्काशी थी, और आँख में सफ़ेद हीरे की जगह तारे का आकार।

रात्रि (धीरे से):
"ये किसकी अंगूठी है...?
जिसने आग लगाई, शायद वही इसका मालिक है।"


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अगली सुबह...

शूटिंग की तैयारियाँ ज़ोरों पर थीं। आज प्रणाली और अविराज का पहला सीन था।

रात्रि ने अर्जुन को ढूँढा।

रात्रि:
“Mr. Maan… कल अगस्त्य से बात नहीं हो पाई, वो फोन पर थे।
पर... उनकी ये अंगूठी गिर गई थी।”
(उसने अंगूठी दिखाते हुए कहा)

अर्जुन:
“कमाल है! भाई ये अंगूठी कभी नहीं उतारते।
और कल से उन्हें इसकी खबर तक नहीं?”

रात्रि (मन में):
"तो मेरा शक सही था… ये अंगूठी उसी की है।"

अर्जुन:
“मिस मित्तल? आप कहां खो गईं? लाइए, मैं उन्हें दे देता हूँ।”

रात्रि (हल्की सी स्माइल देते हुए):
"नहीं… ये काम मुझे ही करना है।"


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शूटिंग के बीच अगस्त्य स्क्रिप्ट पढ़ते हुए बैठा था।
रात्रि सीधे उसके पास गई — और बिना कुछ कहे उसका हाथ पकड़कर उसे खींचते हुए महल के एक कमरे में ले गई।

अगस्त्य:
“ओहो! Miss Mittal, थोड़ा धीरे… आप reporter हैं या kidnapper?”

कमरे के अंदर पहुंचते ही रात्रि ने हाथ झटक दिया और आग बबूला हो गई।

रात्रि (गुस्से से):
“समझते क्या हो तुम खुद को? और चाहते क्या हो!?”

अगस्त्य (हैरान):
"Wait... हाथ पकड़ के मुझे यहाँ लाई तुम हो, और पूछ मुझसे रही हो — मैं क्या समझता हूं?"

रात्रि ने उसकी ओर अंगूठी फेंकी:
“ये तुम्हारी ही है, ना?!”

अगस्त्य (हल्की मुस्कान के साथ, एक ताना):
“Wow, Miss Mittal! तुम्हे तो जासूस होना चाहिए था!
राइटर बन कर अपना टैलेंट waste कर दिया…”

(वो झुककर अंगूठी उठाता है और उंगली में पहन लेता है)

रात्रि (कड़े स्वर में):
“मेरे टैलेंट की फिक्र मत करो — ये पूछो कि मुझे ये मिली कहाँ!”

अगस्त्य (धीरे से):
"बताए बिना मानोगी नहीं… तो बताओ।"

रात्रि (आँखों में सवाल लिए):
"कल रात तुम कहाँ थे?"

ये सवाल सीधा दिल के भीतर चुभा।

अगस्त्य की आँखों में रात्रि और एवी की पासियाँ घूम गईं।

वो आगबबूला हो उठा और गरज पड़ा:
"OUT!"

आवाज़ इतनी तेज़ थी कि रात्रि सिहर गई।

अगस्त्य पास आया…
उसने रात्रि को दीवार की ओर धकेला — अब उसके पीछे दीवार थी, और सामने लंबा, चौड़ा, गुस्से में खौलता अगस्त्य।

उसकी आँखें लाल थीं, साँसें तेज़।

अगस्त्य (गुस्से में):
"क्या मैंने पूछा कि तुम कल रात कहाँ थी?
किसके साथ थी? क्या कर रही थी या क्या करने वाली थी?!
नहीं ना?!"

रात्रि (काँपते होंठों से):
“अगस्त्य… मुझे दर्द हो रहा है…”

अगस्त्य (धीरे, टूटी आवाज़ में):
“मुझे भी हुआ था… जब कल रात तुम…”

रात्रि (धीरे):
"क्या…?"

(अगस्त्य एकदम चुप हो गया)

फिर उसने उसका हाथ छोड़ दिया — और दरवाज़ा खोलते हुए कहा:
“जाओ यहां से… GET OUT.”


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🔥 (To Be Continued...)
Agle part me:

अगस्त्य का रहस्य और गहरा होगा

रात्रि को उस अंगूठी का इतिहास पता चलेगा

और एवी? वो भी कुछ छुपा रहा है…