तलवार हवा में थी।
सब कुछ एक पल में हुआ।
परास ने देखा और चिल्लाया :
"वर्धान—!"
पर वर्धान मुड़ा नहीं।
वो मुड़ नहीं पाया।
तलवार आई —
और उसकी पीठ में उतर गई।
एक पल की चुप्पी।
जैसे पूरी दुनिया ने साँस रोक ली।
वर्धान के पैर काँपे।
घुटना ज़मीन पर टेका।
एक हाथ ज़मीन पर।
सिर झुका।
परास दौड़ा।
"वर्धान—!"
वो उसके पास पहुँचा। उसे थामा।
वर्धान ने उसका हाथ पकड़ा —
"परास।" आवाज़ में दर्द था। पर घबराहट नहीं।
"चुप रहो। उठो। मैं हूँ।" परास का गला भर्रा गया।
"अविराज—" वर्धान ने कहा।
"गया। गुफा की तरफ़।"
"ठीक है।"
"ठीक है क्या — तुम्हारी पीठ में—"
"परास।"
वर्धान ने उसे देखा।
उन आँखों में —
एक अजीब सी शांति थी।
कनिष्क धीरे-धीरे आगे आ रहा था।
चेहरे पर वो मुस्कान —
जो तब होती है जब लगता है कि जीत गए।
"बड़े भाईया—" उसने कहा। "अब?"
वर्धान उठा।
परास ने सहारा दिया।
पर वर्धान ने हाथ हटा दिया।
खुद उठा।
धीरे।
पर उठा।
पीठ से खून बह रहा था।
चेहरे पर पसीना था।
पर आँखें —
आँखें वही थीं।
"कनिष्क।"
उसकी आवाज़ गूँजी।
"तुमने ग़लती की।"
कनिष्क हँसा —
"कौन सी? तलवार फेंकना? या—"
"यहाँ आना।"
और वर्धान ने पंख फैलाए।
वो पंख —
जिनकी शक्ति कम हो गई थी।
जो टूटे हुए धागे के बाद आधे रह गए थे।
पर अभी —
अभी उनमें कुछ था।
वर्धान ने छलाँग लगाई।
कनिष्क की तरफ़।
हवा में।
दोनों टकराए।
इतनी ज़ोर से —
कि ज़मीन काँपी।
परास खड़ा देखता रहा।
उसकी आँखें भर आईं।
दूसरी तरफ
प्राणली बैठी थी।
दीपक के पास।
घुटने छाती से लगाए।
आँखें दरवाज़े पर।
बाहर से आवाज़ें आ रही थीं।
तलवारें। चीख़ें। धमाके।
वो हर आवाज़ पर काँप जाती।
वो ठीक है।
वो ठीक होगा।
वो वापस आएगा।
उसने ख़ुद से कहा।
बार-बार।
तभी —
पैरों की आहट।
वो उठी।
दरवाज़े की तरफ़ देखा।
अविराज इधर उधर देख रहा है पर कुछ नहीं दुख रहा।
अविराज। (प्रणाली ने कहा, उसने अदृश्य रेखा पार करके देखा)
अविराज सामने खड़ा था।
घायल था। बाँह पर पट्टी बँधी थी। चेहरे पर ख़ून था।
पर खड़ा था।
दोनों ने एक-दूसरे को देखा।
एक लंबी चुप्पी।
"प्राणली।" अविराज ने कहा।
आवाज़ में वो सब था —
जो वो कहना चाहता था।
जो वो कभी कह नहीं पाया।
"वो कहाँ है?" प्राणली ने पूछा।
अविराज समझ गया।
"लड़ रहा है।"
"अकेला?"
"परास है उसके साथ।"
प्राणली ने आँखें बंद कीं।
एक पल।
"अविराज—" उसने कहा। "मुझे सच बताओ।"
"क्या?"
"वो ठीक है?"
अविराज चुप रहा।
और उस चुप्पी ने —
प्राणली का जवाब दे दिया।
उसने उठकर बाहर जाना चाहा —
अविराज ने रास्ता रोका।
"नहीं।"
"हटो।"
"प्राणली—" (अविराज चिल्लाया)
"मैंने कहा हटो!"
उन आँखों में —
वो चीज़ थी।
जो उसने सालों से देखना चाहा था।
पर किसी और के लिए थी।
वो हट गया।
प्राणली दौड़ पड़ी।
बाहर की तरफ़।
अविराज ने उसे जबरन पकड़ा ।
प्रणाली होश में आओ (उसने प्रणाली को झकझोर दिया)
वो दोनों अपनी जान की बाज़ी लगा रहे हैं तुम्हारी सुरक्षा के लिए और तुम !
अविराज ने उसे देखा और उसको छोड़ दिया।
*इधर*
वर्धान और कनिष्क।
दोनों ज़ख्मी।
दोनों खड़े।
वर्धान की साँसें भारी थीं।
पीठ से खून बह रहा था।
पर तलवार हाथ में थी।
कनिष्क ने उसे देखा।
"थक गए बड़े भाईया।"
"नहीं।"
"झूठ।"
कनिष्क ने हमला किया।
वर्धान ने रोका।
फिर से।
फिर से।
फिर से।
पर हर बार —
वो थोड़ा और धीमा हो रहा था।
परास ने देखा।
और वो आगे बढ़ा —
"वर्धान—"
तभी —
कनिष्क के दो सैनिक परास पर टूट पड़े।
वो उलझ गया।
वर्धान अकेला था।
कनिष्क ने तलवार उठाई —
और वार किया।
वर्धान ने रोका।
पर इस बार —
घुटने टिक गए।
कनिष्क ने उसे देखा।
ऊपर से नीचे।
"बस?"
वर्धान ने ऊपर देखा।
आँखें कनिष्क पर।
वर्धान और कनिष्क।
तलवारें टकरा रही थीं।
हर वार के साथ वर्धान थोड़ा और धीमा हो रहा था।
पीठ का घाव रिस रहा था।
पर वो रुका नहीं।
कनिष्क ने देखा।
और मुस्कुराया।
उसने अपनी तलवार घुमाई —
ज़ोर से।
वर्धान ने रोका।
पर इस बार —
तलवार उसके हाथ से छूट गई।
कनिष्क ने वार किया —
"वर्धान!" ( पारस चिल्लाया)
और वो बीच में आ गया।
खच्छ्छ्छ।
एक पल की चुप्पी।
परास ने नीचे देखा।
तलवार उसके सीने में थी।
वर्धान ने देखा।
और उसकी दुनिया —
रुक गई।
"परास—"
परास के घुटने मुड़े।
वो गिरा।
वर्धान ने उसे थाम लिया।
ज़मीन पर।
अपनी गोद में।
"पारस........" वर्धान की आवाज़ काँप रही थी। :— ये क्या किया तुमने।"
परास ने उसे देखा।
होंठों पर एक हल्की मुस्कान।
वो मुस्कान —
जो हमेशा रहती थी।
"तुम्हें... अभी जाना है।" उसने कहा। आवाज़ टूट रही थी। "प्राणली को... बचाओ।"
"परास चुप रहो—"(वर्धान)
उसने उसकी कलाई पकड़ी।
"मैं ठीक हूँ।"
झूठ था।
दोनों जानते थे।
वर्धान की आँखें भर आईं।
पहली बार।
परास ने उसका हाथ थपथपाया —
"जाओ।"
वर्धान वहीं रहा।
हिला नहीं।
"वर्धान—" परास की आवाज़ और धीमी हो गई। "अगर तुम यहाँ बैठे रहे — तो मेरा मारना बेकार हो जाएगा।"
वर्धान ने उसे देखा।
उस चेहरे को।
उस मुस्कान को।
और कुछ —
उसके भीतर टूट गया।
उसने परास का हाथ अपने हाथों में लिया।
एक पल।
बस एक पल।
फिर उठा.....
तलवार उठाई कुछ सैनिकों को पारस के पास छोड़ा। जाने का मन नहीं था पर जाना तो था ही।
इधर —
कनिष्क पारस को तलवार लगते ही जंगल के लिए निकल पड़ा।
मैं आ रहा हु देवी !
उसके होंठों पर मुस्कान आई।
उसने पंख फैलाए।
और जंगल की तरफ़ उड़ा।
इधर उधर देख कोई भी देश दिखा।
गुफा के पास पहुँचा।
ऐसे तो वो बाहर नहीं आएगी।
पेड़ों की आड़ में रुका।
उसने एक लंबी साँस ली।
और —
आवाज़ बदल ली।
वर्धान की आवाज़।
बिल्कुल वैसी।
वही भारीपन।
वही गहराई।
"प्राणली..........!"
दर्द था उसमें।
गहरा दर्द।
गुफा के भीतर —
प्राणली बैठी थी।
दीपक के पास।
आँखें बंद।
वो आवाज़ सुनी।
और —
उठ गई।
वर्धान।
"प्राणली— मदद—"
आवाज़ काँप रही थी।
दर्द से भरी।
प्राणली के पैर चल पड़े।
"वर्धान!"
वो अदृश्य रेखा तक आई।
रुकी।
इधर वर्धान भी घायल जंगल जा रहा था
वर्धान कह रहा है: — रेखा मत पार करना...कुछ भी हो जाए।
"प्राणली.....!
वो आवाज़ आती ही का रही है
वो दर्द।
अविराज : रुको.... वर्धान इस जगह को जनता है , वो खुद यहां आ जाएगा।
पर प्रणाली कुछ नहीं सुन रही।
प्राणली से रहा नहीं गया।
उसने रेखा पार की।
बाहर आई।
जंगल में।
अँधेरा था।
पेड़ों की परछाईं थी।
"वर्धान? कहाँ हो?"
कोई जवाब नहीं।
वो आगे बढ़ी।
"वर्धान—"
और तभी —
पीछे से हाथ आया।
मुँह पर।
प्राणली ने छूटने की कोशिश की।
पर पकड़ मज़बूत थी।
कनिष्क।
उसने प्राणली को अपनी तरफ़ घुमाया।
और उसकी आँखों में देखकर —
हँसा।
"देवी।" उसकी आवाज़ वापस अपनी हो गई थी। "आपका शुक्रिया। ख़ुद बाहर आ गईं।"
प्राणली ने उसे देखा।
और समझ गई।
"तुमने—" उसकी आवाज़ काँपी। "तुमने उसकी आवाज़—"
"हाँ।" कनिष्क ने कहा। "आसान था।"
प्राणली ने छूटने की कोशिश की।
"छोड़ो मुझे—"
"अभी नहीं देवी।"
उसने इशारा किया।
दो सैनिक आए।
प्राणली ने चिल्लाना चाहा —
"वर्ध—"
कनिष्क ने उसका मुँह दबाया।
"चिल्लाने से कुछ नहीं होगा।" उसने शांत आवाज़ में कहा। "वो अभी... व्यस्त है।"
प्राणली की आँखें भर आईं।
कनिष्क ने ऊपर देखा।
आसमान में।
और उड़ान भरी।
प्राणली को लेकर।