उसे अपने सीने से लगा लिया।
प्राणली ने पहले हिचकिचाया।
एक पल के लिए।
बस एक पल।
और फिर —
वो टूट गई।
उसने उसकी कमीज़ मुट्ठी में भींच ली।
और रोने लगी।
ऐसे —
जैसे बहुत दिनों से रोकी थी।
जैसे थकी हुई थी —
मज़बूत दिखते-दिखते।
वर्धान ने कुछ नहीं कहा।
एक शब्द नहीं।
उसने बस —
उसे और क़रीब खींचा।
एक हाथ उसकी पीठ पर।
दूसरा उसके बालों में।
,वो जानता है ये गलत पर ये पर उसे इस पल इसी सुकून की जरूरत थी, एक पल के लिए सही गलत सब भूल जाना चाहता है वो, वो खुद से यही सवाल कर रहा है कि क्यों अब कुछ साधारण नहीं हो सकता , गरूड़ लोक, बीजा पुर , कनिष्क ये सब क्यू।
एक लंबी साँस ली —
जैसे ये साँस उसने पहली बार ली हो।
जैसे इससे पहले साँस लेना आता ही नहीं था।
गुफा में सन्नाटा था।
पानी टपक रहा था।
दीपक काँप रहा था।
पर उन दोनों के लिए —
वो पल रुका हुआ था।
प्राणली रोती रही।
वर्धान थामे रहा।
फिर धीरे-धीरे —
रोना थमा।
साँसें सधीं।
प्राणली ने सिर उठाया।
उसकी आँखें लाल थीं।
गाल भीगे थे।
वर्धान ने उसे देखा।
इतने क़रीब।
इतने क़रीब कि पलकें गिनी जा सकें।
उसने अपना अँगूठा उसके गाल पर फेरा।
एक बार।
बहुत हौले से।
आँसू पोंछे —
पर आँखें नहीं हटाईं।
प्राणली साँस लेना भूल गई।
जैसे उसने सब कुछ उसे दे दिया। जो था। जो नहीं था।
जैसे इसके बाद कुछ नहीं चाहिए था उसे।
प्राणली रोती रही।
वर्धान ने कुछ नहीं कहा।
बस उसे थामे रहा।
फिर धीरे से बोला —
"तुम्हें कुछ नहीं होगा।"
उसने उसे छोड़ा।
और बाहर जाने लगा।
प्राणली ने उसका हाथ पकड़ लिया।
उँगलियाँ उसकी कलाई पर।
वो रुका।
पीठ उसकी तरफ़ थी।
"और तुम्हें?"
चुप्पी।
हवा की आवाज़।
पानी की बूँदें।
वर्धान ने जवाब नहीं दिया।
उसने उसका हाथ हौले से हटाया।
और बोला —
"अदृश्य रेखा खींचो।"
प्राणली ने उसे जाते देखा।
फिर बाहर आई।
हाथ नीचे किए।
आँखें बंद कीं।
साँस ली — लंबी।
ध्यान लगाया।
और हाथों से चमक निकली —
धीरे-धीरे।
सुनहरी।
उससे एक रेखा बनी —
गुफा के चारों तरफ़।
दिखती नहीं थी।
पर थी।
वो वापस अंदर आई।
वर्धान जाने लगा।
पीछे मुड़ा।
और उसी पल —
उसके हाथ काँपे।
सिर घूमा।
एक पल के लिए दीवार धुंधली हो गई।
प्राणली ने देखा।
और दौड़ी।
उसे थामा —
"वर्धान—!"
वर्धान ने खुद को सँभाला।
उसने उसका हाथ हटाया — हौले से।
"कुछ नहीं है।"
"कुछ नहीं है?" प्राणली ने उसे देखा। "हाथ काँप रहे हैं तुम्हारे।"
वर्धान चुप रहा।
प्रणाली: तुम कौन हो वर्धान? तुम्हारी कौन सी शक्तियों की बात कर रहे थे तुम ?
वर्धान ने अपनी नजरें नीचे कर ली।
प्रणाली : वो धागा — जिसमें उसने अपनी शक्तियाँ डाली थीं —क्या सच उसमें तुम्हारी शक्तियां थी ?
वर्धान ने हामी में सर झुकाया।
तुम भी तो कही.... ???? ( प्रणाली ने एक सांस में पूछा )
वर्धान ने सांसे चढ़ा के उसे देखा
फिर खुद बोली : मुझे माफ कर दो, तुम्हे बुरा तो नहीं लगा? मैने तुम्हें गरुड़ सोच कर तुम्हारा अपमान किया ।।।
वर्धान की आंखों से पछतावे के आंसू गिर गए !
प्रणाली : तुमने कोई साधना की है ? हा कि ही होगी तभी तुम्हारे पास शक्तियां हैं।।।
वर्धान और नहीं सुन पाया।
उसने प्रणाली को चुप कराया,
और बोला : मैं सिर्फ तुम्हारी हिफाजत चाहता हूँ बस ।।।।
प्रणाली ने धीमी आवाज में : पर वो धागा
वो टूट गया था।
अविराज ने तोड़ दिया था।
और अब —
अब वर्धान तुम तुम्हारी जान को भी खतरा है, गरुड़ अपने मकसद के लिये किसी भी हद तक जा सकते है हमारा था रहना ठीक नहीं है
वर्धान ने उसे शांत किया और बोला : कुछ नहीं होगा ,
"तुम यहीं रहना। ठीक है।"
वो मुड़ा।
प्रणाली ने धीमी आवाज में पूछा :अविराज को यहाँ लाओगे?"
"हाँ।" (वर्धान)
"और फिर?" ( प्रणाली)
वर्धान ने एक पल रुककर उसे देखा।
प्रणाली : फिर हमारी शादी होगी। जैसा तय था।"
वर्धान: हां
प्राणली ने उसकी आँखों में देखा।
प्रणाली :"और फिर सब ठीक हो जाएगा?"
वर्धान:"हाँ।"
प्रणाली: "और फिर तुम चले जाओगे?"
प्रणाली : "हाँ......
एक पल।
और फिर —
चटाक।
प्राणली ने उसके गाल पर तमाचा मारा।
ज़ोर का। तेज़।
वर्धान का सिर एक तरफ़ मुड़ गया।
वो चुप रहा।
हिला नहीं।
"तुम यहाँ आए ही क्यों?"
प्राणली की आवाज़ काँप रही थी।
आँखों में आँसू थे — पर गुस्सा भी था।
"क्यों आए? अगर जाना ही था — अगर सब ठीक करके जाना ही था — तो आए क्यों?"
वर्धान ने उसे देखा।
उसके गाल पर लाली थी।
पर आँखों में —
कुछ था।
जो वो कह नहीं सकता था।
अभी नहीं।
"यहाँ रुको।"
वो मुड़ा।
"वर्धान—"
रुका।
पीठ उसकी तरफ़।
"वो धागा... सच में रक्षासूत्र था?"
"हाँ।"
"तो अविराज ने क्यों तोड़ा?"
चुप्पी।
बूँदें टपकती रहीं।
दीपक काँपता रहा।
वर्धान चला गया।
प्राणली वहीं खड़ी रही।
उस काँपती रोशनी में।
अकेली।
उसने अपनी हथेली देखी —
जिसने अभी उसे मारा था।
जो अभी भी उसे थामना चाहती थी
महल के आँगन में आधी सेना लाश बन चुकी थी।
दोनों तरफ़ की।
ज़मीन पर खून था। टूटी तलवारें थीं। जलती मशालें थीं।
परास और कनिष्क।
दोनों ज़ख्मी।
पर दोनों खड़े।
परास की बाईं बाँह पर गहरा घाव था। साँसें भारी थीं। पर आँखें —
आँखें अभी भी लड़ रही थीं।
वर्धान आया।
तेज़ी से।
और एक हुलार —
कनिष्क उछला।
ज़मीन पर गिरा।
धड़ाम।
परास ने एक पल राहत की साँस ली।
वर्धान उसके पास आया —
"अविराज कहाँ है?"
परास ने इशारा किया।
दूर —
अविराज लड़ रहा था।
परास की सेना की तरफ़ से।
उसकी तलवार चल रही थी — पर आँखें कहीं और थीं।
वर्धान सीधे उसके पास गया।
"अविराज।"
अविराज ने पलटकर देखा।
उन दोनों के बीच एक पल की चुप्पी रही।
जिसमें बहुत कुछ था।
"तक्षक गुफा की तरफ़ जाओ। प्राणली इंतज़ार कर रही है।"
"पर—"
"जाओ।"
वर्धान की आवाज़ में कोई गुस्सा नहीं था।
बस एक थकान थी।
अविराज ने उसे देखा।
एक पल।
और चल पड़ा।
तभी —
पीछे से आवाज़ आई।
कनिष्क उठ चुका था।
उसने तलवार उठाई।
और वर्धान की तरफ़ फेंकी —
पूरी ताक़त से।
खच्छ्छ्छ—!