शहनाई अभी भी बज रही थी।
किसी को ख़बर नहीं थी कि रोकें।
बाहर ढोल था। हँसी थी। फूल थे।
लगता है यहां मेल मिलाप पहले ही हो चुका है(किसी की आवाज आई ।)
एक पल में सब बंद ...शहनाई , ढोल सब
सबकी नजर मुख्य द्वार पर।। ।
ये कनिष्ठ ही था।
भीतर —
भीतर तलवारें थीं।
कनिष्क चल रहा था।
धीरे-धीरे।
जैसे वो किसी बाज़ार में टहल रहा हो।
जैसे उसे पता हो — ये जगह उसी की है।
हर क़दम पर उसके जूते की आवाज़ फर्श पर गूँज रही थी —
ढम।
ढम।
ढम।
मंडप के फूल हवा में काँप रहे थे।
दीपों की लौ थरथराई।
जैसे वो भी डर गई हों।
परास की नज़र उस पर पड़ी।
और बस एक पल लगा।
हाथ उठा — सिपाहियों ने इशारा समझा ।
खट। खट। खट।
एक साँस में। एक आवाज़ में।
सैकड़ों तलवारें निकल आईं।
कनिष्क रुका नहीं।
उसके होंठों पर एक हल्की मुस्कान थी —
वो मुस्कान जो तब होती है जब किसी को पता हो कि उसके पास जवाब है।
उसने बस एक बार पलटकर देखा —
और उसके सैनिक निकल आए।
दीवारों से।
छाया से।
छत से।
जैसे वो पहले से वहाँ थे।
जैसे वो मेहमान बनकर आए थे — और असली चेहरा अभी दिखाया।
मंडप में अब दो तरफ़ की धारें थीं।
बीच में —
बस काँपती हुई अग्नि।
कनिष्क फिर चला।
एक क़दम।
दो क़दम।
उसकी आँखें सिर्फ़ एक जगह थीं —
प्राणली।
और तभी —
वर्धान की भारी आवाज : सोचना भी मत कनिष्क!
वर्धान बीच में।
इतनी तेज़ी से आया कि हवा महसूस हुई।
कनिष्क और प्राणली के बीच — एक दीवार बनकर खड़ा हो गया।
उसकी आँखें खुली थीं।
पर उनमें जो था —
वो आँखें बंद होने पर भी जलता रहता।
वर्धान ने पूरे ऐंठ से कहा :एक क़दम और ...— बस एक क़दम और — और मैं तुम्हें याद दिला दूँगा कि असली गरुड़ कौन है।
कनिष्क रुका।
उसने वर्धान को देखा —
ऊपर से नीचे तक।
धीरे से।
जैसे कोई पुरानी चीज़ को पहचान रहा हो।
और फिर —
हवा चली धूल उड़ी कनिष्क ने पंख फैलाए...
मंडप में जो बचे थे —
वो भाग खड़े हुए।
औरतें चीख़ीं। बच्चे रोए। बूढ़े ठोकर खाकर गिरे।
फूलों की मालाएँ टूटकर ज़मीन पर बिखर गईं।
दीपक उलटे। तेल फैला।
अग्नि काँपी —
पर बुझी नहीं।
प्राणली उठ गई थी।
उसने उन पंखों को देखा —
काले। विशाल। रात जैसे।
उसकी साँस एक पल के लिए रुकी।
"गरुड़ वंशज...!"
वो शब्द निकले — आश्चर्य में। पहचान में।
डर में नहीं।
उसने एक पल भी नहीं सोचा।
बगल में खड़े सैनिक की म्यान से तलवार खींची —
झनक।
और आगे बढ़ गई।
आँखों में आग थी।
तलवार हाथ में थी।
और आवाज़ में —
वो सब था जो एक राजकुमारी को राजकुमारी बनाता है।
"तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई — बीजापुर में क़दम रखने की।"
परास और वर्धान —
दोनों एक साथ।
उसके आगे।
ढाल बनकर।
परास ने उसका कंधा पकड़ा — हौले से। पर मज़बूती से।
"प्रणाली.....!"
बस एक शब्द।
पर उस एक शब्द में था —
पीछे रहो। अभी नहीं। हम हैं।
प्राणली रुकी।
पर तलवार नहीं छोड़ी।
वर्धान की नज़र कनिष्क पर थी।
टिकी हुई।
हिली नहीं।
वर्धान ने धीरे से कहा —
"भूलना मत कनिष्क। गरुड़ कभी अपनी शक्ति का इस्तेमाल नहीं कर सकते बीजापुर पर।"
कनिष्क ने उसे देखा।
एक पल।
सिर्फ़ एक पल।
और फिर हँसा —
इतने हल्के से।
जैसे कोई मज़ाक सुना हो जो पुराना हो चुका हो।
उसने पंख समेटे।
आवाज़ में एक अजीब सी शांति उतर आई —
"चिंता मत करो वर्धान।"
उसने चारों तरफ़ एक नज़र डाली।
"मेरे पूर्वजों ने जो बेवकूफ़ी की थी —"
एक पल रुका।
"— मैं नहीं करूँगा।"
सन्नाटा।
सबने उसे देखा।
उस मुस्कान को देखा।
जिसमें कुछ था —
जो अभी समझ नहीं आया।
और फिर —
कनिष्क मुड़ा।
सब देखते रहे।
धीरे से।
अविराज की तरफ़।
चलकर उसके पास गया।
सबको आश्चर्य हुआ कनिष्क अविराज की जानता है ???
इतने क़रीब कि कंधे लगभग छू जाएँ।
इतने क़रीब कि साँस महसूस हो।
झुककर —
बिल्कुल धीमी आवाज़ में —
जैसे दोस्त दोस्त से राज़ बाँटता है —
"देख रहे हो उस धागे को?"
अविराज की नज़र गई।
प्राणली की कलाई पर।
वो लाल धागा।
पतला। साधारण।
"वो कोई रक्षासूत्र नहीं है।"
कनिष्क की आवाज़ रेशम जैसी थी।
पर नीचे —
बिल्कुल नीचे देखा और आवाज़ थोड़ी और धीरे
वो कोई रक्षा सूत्र नहीं.... ज़हर है।
"उसमें प्राणली की शक्तियाँ क़ैद हैं। जब सही वक़्त आएगा —"
उसने एक पल रुककर वर्धान को देखा —
"— वो खींच लेगा। सब कुछ।"
अविराज चुप था।
सुन रहा था।
"गरुड़ लोक का यही धर्म है अविराज।" कनिष्क की आवाज़ और धीमी हो गई। "वहाँ के राजा का यही काम है। शक्तिमान को ढूँढो। उसके क़रीब जाओ। उस पर भरोसा करवाओ।"
उसने एक पल लिया।
अविराज की आँखों में सीधे देखा —
"और जब वो बिल्कुल अकेला हो —"
(होंठों पर वही मुस्कान।)
"— उसे ज़िंदा नहीं रहने देते।"
अविराज की साँस —
रुक गई।
दिल में कुछ हुआ।
जैसे किसी ने सांसे खीचली हो— और सब कुछ उधड़ने लगा हो।
उसने प्राणली को देखा।
वो वर्धान के पास खड़ी थी।
कुछ बात हो रही थी उन दोनों के बीच।
प्राणली की आँखें वर्धान पर थीं —
वो आँखें जो अविराज ने कभी अपने लिए नहीं देखी थीं।
कभी नहीं।
सालों में नहीं।
उस लाल धागे को देखा।
वर्धान को देखा।
क्या ये सच है?
क्या इसीलिए वो आया है?
महीनों से। इतने महीनों से — क्या सब एक चाल थी?
और प्राणली —
प्राणली जो उस पर भरोसा करती है —
जो उसकी वजह से मुझसे दूर हो गई —
वो नहीं जानती।
उसकी आँखें लाल हो गईं।
जबड़ा कस गया।
मुट्ठियाँ भिंच गईं।
और वो उठ गया।
तेज़ क़दमों से।
सीधे।
प्राणली की तरफ़।
वर्धान ने उसे आते देखा।
उसकी आँखों में कुछ पढ़ा —
और उसके पेट में एक अजीब सी सिकुड़न हुई।
अविराज ने प्रणाली का हाथ पकड़ा कस के ,बहुत कस के....
"अविराज—" (प्रणाली की चीख निकली )
वर्धान रोकने की कोशिश करना चाहता था पर नहीं कि।
पारस सैनिकों के साथ दुश्मनों पर तलवार टिकाए हुए।
पारस यही से : अविराज क्या कर रहे हो?
पर अविराज सुनने के मूड में नहीं था।
उसने प्राणली की कलाई पकड़ी।
और वर्धान से दूर ले आया।
प्रणाली: तुम इस गरुड़ वंशज को जानते हो??
अविराज कुछ नहीं सुन रहा,
उसने प्रणाली को देखा फिर वर्धान को और फिर
उस लाल धागे को देखा —
एक पल।
बस एक पल।
और तोड़ दिया।
टच।
एक छोटी सी आवाज़।
पर उस छोटी सी आवाज़ में —
जैसे सब कुछ टूट गया।
वर्धान के पैर काँपे।
उसने दीवार थामी।
हाथ दीवार पर रखा — बस एक पल के लिए।
आँखें बंद हुईं।
फिर खुलीं।
शक्तियाँ कम हो गई थीं।
सबने देखा था।
प्राणली ने अपनी कलाई देखी।
टूटे धागे के दो टुकड़े —
ज़मीन पर।
बिखरे हुए।
उसने अविराज को देखा।
उसकी आँखों में।
उसमें गुस्सा था। दर्द था। और कुछ था —
जो वो कह नहीं पा रहा था।
फिर वर्धान को देखा।
वो सँभल चुका था।
चेहरे पर कुछ नहीं था।
बिल्कुल कुछ नहीं।
पर आँखें —
आँखें सब कह रही थीं।