तलवार अभी भी वर्धान की गर्दन पर थी।
पारस की आँखें — गुस्से से भरी।
वर्धान ने हिलने की कोशिश नहीं की।
बस — शांत आवाज़ में बोला —
"सुनो।"
"पहले सुनो। फिर जो चाहो करो।"
पारस की पकड़ ढीली नहीं हुई — पर वो चुप रहा।
वर्धान ने एक गहरी साँस ली —
"मैं इस दुश्मनी को खत्म करना चाहता हूँ।"
"दोनों लोकों के बीच जो पीढ़ियों से चला आ रहा है — वो मेरे राज में नहीं चलेगा।"
पारस ने उसे देखा — आँखों में सवाल था।
"बड़ी अच्छी बातें हैं।" — उसकी आवाज़ में व्यंग्य था — "पर तुमने मेरी बहन के साथ जो किया—"
"वो मैं जानता हूँ।" — वर्धान ने बात काटी।
"और उसका जवाब भी दूँगा।"
"पर पहले — कनिष्क के बारे में जानो।"
पारस ने एक पल सोचा।
और तलवार — थोड़ी नीचे हुई।
वर्धान ने बोलना शुरू किया —
"कनिष्क — बचपन से गरुड़ लोक को पाना चाहता है।"
"उसे लगता है — यह राज्य उसका हक है।"
"उसके पूर्वज का राज था — जो उनकी एक भूल की वजह से चला गया।"
पारस सुन रहा था।
"उसे क्रोध की बीमारी है — जो उसे अंदर से खाती है।"
"और उस क्रोध में — वो कुछ भी कर सकता है।"
वर्धान की आवाज़ भारी हुई —
"तुम पर जो हमला हुआ था — वो उसी ने किया था।"
"गरुड़ विष — वो उसका हथियार था।"
पारस की आँखें सिकुड़ गईं —
"पर वो हमला मुझ पर था?"
"नहीं।"
एक पल की ख़ामोशी।
"वो हमला ब्रह्मवर्धनी पर था।"
"प्रणाली पर।"
"तुम बीच में आ गए।"
पारस के हाथ काँपे।
"वो प्रणाली को मारकर गरुड़ लोक का राजा बनना चाहता है।"
"ब्रह्मवर्धनी के न रहने पर — गरुड़ लोक पर कोई रोक नहीं रहेगी।"
"और वो यही चाहता है।"
पारस ने तलवार और नीचे की —
"तो तुमने... प्रणाली को कोमा में क्यों भेजा?"
वर्धान ने उसकी आँखों में देखा —
"क्योंकि अगर मैं नहीं करता — कनिष्क करता।"
"और वो इतने प्यार से नहीं करता।"
आवाज़ में एक दर्द था —
"मैंने गरुड़ लोक में यह बात फैला दी कि मैंने ब्रह्मवर्धनी की शक्तियाँ छीन लीं — इसीलिए वो कोमा में गई।"
"कनिष्क को लगा — काम हो गया।"
"पर सच यह है..."
एक पल रुका —
"...प्रणाली के पास आज भी शक्तियाँ हैं।"
"और स्वर्ग का रास्ता भी।"
पारस —
सन्न हो गया।
तलवार उसके हाथ से लगभग गिर गई।
"क्या...?"
"आज भी...?"
वर्धान ने सिर हिलाया —
"हाँ।"
"और कनिष्क को जब यह पता चलेगा —"
उसने पारस की आँखों में देखा —
"वो फिर आएगा।"
पारस का चेहरा पीला पड़ गया —
"मतलब... मेरी बहन पर अभी भी खतरा है।"
"हाँ।"
कुटिया में सन्नाटा था।
पारस ने एक हाथ से मुँह ढका —
आँखें बंद कर लीं।
"तो... अब क्या होगा?"
वर्धान ने एक पल सोचा।
और धीरे से — बहुत धीरे से — बोला —
"इसका सबसे बेहतर तरीका..."
रुका।
जैसे यह शब्द कहने में तकलीफ हो रही हो।
"...यह है कि प्रणाली का विवाह अविराज से हो जाए।"
पारस ने ऊपर देखा।
"उसके बाद क्या होगा — मुझे भी नहीं पता।"
"पर फिलहाल — सबसे अच्छा तरीका यही है।"
"प्रणाली दूसरे कुल की हो जाए।"
वर्धान ने पारस की आँखों में देखा —
"महल जाओ।"
"अभी।"
पारस ने एक पल उसे देखा — फिर सिर हिलाया।
"हर मोड़ पर सैनिक तैनात करो।" — वर्धान ने कहा — "महल के मुख्य द्वार पर दोहरी पहरेदारी। पिछले दरवाज़े पर भी। और प्रणाली के कक्ष के बाहर — हर पल दो सैनिक।"
"वो जहाँ भी जाए — दो सैनिक साथ।"
"पर..." — उसने एक पल रुककर कहा —
"प्रणाली को कुछ पता नहीं चलना चाहिए।"
पारस ने सिर हिलाया —
और चला गया।
शाम हो चुकी थी।
महल में हल्दी की रस्म खत्म हो चुकी थी।
पारस सीधे सेनापति के पास गया।
"सुनो।"
सेनापति ने सिर झुकाया।
"आज रात से — महल की सुरक्षा दोगुनी होगी।"
"हर मोड़ पर सैनिक। हर दरवाज़े पर पहरा।"
"और राजकुमारी के कक्ष के बाहर — हर पल दो विश्वासपात्र सैनिक।"
सेनापति ने एक पल सोचा —
"कोई खतरा है राजकुमार?"
पारस ने उसे देखा —
"बस आदेश का पालन करो।"
सेनापति ने सिर झुकाया —
"जो आज्ञा।"
वर्धान पूरी रात सोया नहीं था।
करवटें बदलता रहा। छत को ताकता रहा। आँखें बंद करता — तो प्राणली का चेहरा आ जाता। आँखें खोलता — तो ज़िम्मेदारी का बोझ।
क्या सही है? क्या ग़लत?
वो लड़की धरती पर अकेली है... और यहाँ मैं बैठा हूँ।
भोर होते-होते वो उठ गया। मुँह धोया। कवच पहना। और निकलने से पहले —
पिताजी से मिलना ज़रूरी था।